अंधा कोई भक्त नहीं हूँ भाई।
अपनी राह स्वयं चुनता हूँ,
अपने मन की बात सुनता हूँ।
किसी लकीर का दास नहीं हूँ,
किसी सोच का उपहास नहीं हूँ।
प्रश्नों से मेरा नाता गहरा,
तर्कों से ही जीवन है मेरा।
जो सच लगे उसे अपनाऊँ,
जो झूठ लगे उसे ठुकराऊँ।
अपनी बुद्धि का अभ्यस्त हूँ भाई,
नहीं किसी पंथ का भक्त हूँ भाई।
अंधा कोई भक्त नहीं हूँ भाई।
मैं करता हूँ खुद की पूजा,
मेरा ईश्वर मैं ना दूजा।
अपने भीतर दीप जलाता,
खुद से खुद का मार्ग बनाता।
जन्म से खुद को हिन्दू पाऊँ,
पड़े ज़रूरत सिख बन जाऊँ।
कभी ज़रूरत मुस्लिम हो लूँ,
कभी बौद्ध, ईसाई हो लूँ।
कर्म जहाँ जिस रूप में माँगे,
वैसा ही व्यवहार निभाऊँ।
मानवता का धर्म निभाऊँ,
प्रेम के बीज जहाँ उगाऊँ।
मजहब की दीवारों से परे,
सबके दुख में साथ निभाऊँ।
किसी एक रंग का अभ्यस्त नहीं हूँ ,
किसी एक रूप में व्यक्त नहीं हूँ।
इसलिए अनासक्त हूँ भाई,
नहीं किसी पंथ का भक्त हूँ भाई।
अंधा कोई भक्त नहीं हूँ भाई।
मंदिर-मस्जिद, गुरुद्वारे,
सब लगते हैं मुझे प्यारे।
गिरजाघर की घंटी सुनता,
बुद्ध-विहार में शांति चुनता।
कहीं अजान की स्वर-लहरी,
कहीं गुरुवाणी लगती प्यारी।
कहीं वेद की ऋचाएँ गूँजें,
कहीं कबीर के दोहे सूझें।
नानक की वाणी पढ़ लेता,
बुद्ध के पथ पर चल लेता।
कबीर की उलटबाँसियों में,
जीवन के अर्थ समझ लेता।
पर स्थानों से बँधता नहीं,
प्रतीकों में अटकता नहीं।
सबका आदर करता हूँ भाई,
पर अंधश्रद्धा ना अपनाई।
अंधा कोई भक्त नहीं हूँ भाई।
पंथ ज्ञान के रस्ते सारे,
तो सबके सब हुए हमारे।
गणित कभी, बायो पढ़ता हूँ,
पुस्तक से खुद को गढ़ता हूँ।
कभी इतिहास खँगालता हूँ,
कभी विज्ञान संभालता हूँ।
कभी दर्शन में डूबा रहता,
कभी प्रकृति से संवाद करता।
पर इनकी ना करता पूजा,
पड़े ज़रूरत पढ़ता दूजा।
एक किताब अंतिम सच नहीं,
एक विचार ही पूर्ण नहीं।
ज्ञान नदी है, बहते रहना,
सीखते रहना, कहते रहना।
प्रश्नों से परहेज़ नहीं है,
उत्तर का भी क्रेज नहीं है।
जिज्ञासा का अनुरक्त हूँ भाई,
ज्ञानासक्त हर वक्त हूँ भाई।
नहीं किसी का भक्त हूँ भाई।
अंधा कोई भक्त नहीं हूँ भाई।
वेद पढ़ूँ या कुरान पढ़ूँ,
गुरुग्रंथ या बाइबल पढ़ूँ।
त्रिपिटक में कुछ खोज करूँ,
गीता का भी बोध करूँ।
जो जीवन को बेहतर कर दे,
जो मन के अंधेरे हर दे।
जो मानव को मानव समझे,
जो पीड़ा को अपनी समझे।
वही विचार मेरा अपना,
वही ज्ञान मेरा सपना।
किसने कहा, यह कम ज़रूरी,
क्या है कहा, बात है पूरी।
नाम नहीं, गुण देखता हूँ,
कथन नहीं, संदर्भ देखता हूँ।
सार ग्रहण करने का अभ्यस्त हूँ भाई,
नहीं किसी पंथ का भक्त हूँ भाई।
अंधा कोई भक्त नहीं हूँ भाई।
मेरा तन ही मेरा धन है,
मेरा श्रम ही मेरा चंदन है।
तन-मन अर्पित अपने जीवन को,
अपने कर्म और अपनेपन को।
मैं हूँ तो ये पंथ हैं सारे,
मुझसे इनके अर्थ हैं न्यारे।
मनुष्य नहीं तो कौन पुकारे,
कौन बनाए मंदिर-द्वारे?
किसके मन में श्रद्धा जागे,
किसके होंठों पर मंत्र विराजें?
इंसानियत से धर्म बने हैं,
मानव से ही कर्म बने हैं।
मुझसे ही ये सब फलते हैं,
मेरे होने से चलते हैं।
इसलिए खुद से अनुरक्त हूँ भाई,
नहीं किसी पंथ का भक्त हूँ भाई।
अंधा कोई भक्त नहीं हूँ भाई।
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