Tuesday, November 3, 2026

चिराग़ और आफ़ताब

उतना ही फ़र्क़ है चिराग़ और आफ़ताबों में,
जितना कि एक कलम और हज़ारों किताबों में।
जितना कि कलम से जन्म ले लेती है इंक़लाब , 
और किताबें उम्र गुज़ार देती तमाम जवाबों में।
उतना ही फ़र्क़ है चिराग़ और आफ़ताबों में,
जितना कि एक कलम और हज़ारों किताबों में।

चिराग़ एक कोने की हीं मिटा पाता है तन्हाई ,
और आफ़ताब भरता रोशनी तमाम चनाबों में।
कहने को तो जहाँ में सब हैं एक बराबर मगर 
फ़र्क़ तो होता हीं है  किरदार के खिताबों में ।
उतना ही फ़र्क़ है चिराग़ और आफ़ताबों में,
जितना कि एक कलम और हज़ारों किताबों में।

कोई लफ़्ज़ बनकर रह जाता है ज़ुबाँ तक ही,
कोई सोच बनकर उतर जाता है इंक़लाबों में।
कोई सदियों तलक दोहराया जाता है महफ़िलों में,
कोई ख़ामोश रहकर भी ज़िंदा रहता है ख्वाबों में
उतना ही फ़र्क़ है चिराग़ और आफ़ताबों में,
जितना कि एक कलम और हज़ारों किताबों में।

सर कलम होने पर कभी इतिहास नहीं बदलता 
कभी सल्तनतें टिक नहीं पातीं 

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