मैं हिंदू, तुम मुस्लिम, दिन-रात जगते-सोते,
खो गए हो तुम अख़बार होते-होते
भारत पे हुए भारी ये मंदिर ये मस्जिद
बचा बस वोट मुद्दा चुनाव होते-होते।
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ज़ुबाँ से बताना ज़रूरी नहीं अहले दिल जताना ज़रूरी नहीं
ख़ामोशियाँ कह जाती वो बातें चुप रह जाना कमजोरी नहीं
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दुनिया में रहकर सीखते भी क्या हो
कि रेत पर बैठे हो लिखते भी क्या हो
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ना नज़रें मिलायीं ना हँसकर ही कोई बात की,
तुम्हीं कहो भला, ये भी कोई मुलाक़ात थी
बदलते हुए वक्त का ठहरा हुआ एक मंज़र,
कि जीते तो खुलकर बेवजह एहतियात की।
हम तो कैद रह गए उस एक लम्हें में फंसकर
पर वक्त ने कहा वो यूँ हीं इत्तिफ़ाक़ात थी।
अलविदा कहा ठीक, पर देख लेते मुड़कर ,
कि बेरुख़ी से फिर वही रस्म-ए-हयात की।
ना नज़रें मिलायीं ना हँसकर ही कोई बात की,
तुम्हीं कहो भला, ये भी कोई मुलाक़ात थी
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अजीब है ऐ ख़ुदा तू, और तेरी ये ख़ुदाई भी,
हासिल भी ऐसे कि जैसे है तू मेरी तनहाई भी।
ये हवा भी, ये पानी भी , ये आग भी आकाश भी,
कि मेरे जिंदा होने में हीं छुपी तेरी रहनुमाई भी।
सुकून भी मिलता है तेरी नाम के बदौलत मगर
सवालों के घेरे में अक्सर होती तेरी परछाई भी।
तुझे समझने की कोशिश में खो जाता हूँ अक्सर,
कि तू है,तेरे जहाँ में मै भी और तुझसे जुदाई भी।
अजीब है ऐ ख़ुदा तू, और तेरी ये ख़ुदाई भी।
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अगर मस्जिद में तू है, मंदिर में तू है,
मंदिर में मस्जिद में नफरत फिर क्यूँ है?
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