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5.इल्जाम नहीं है
ये घर है मेरा दुकान नहीं है,
गैर ज़रूरी कोई समान नहीं है।
ना कोई हसरत कि इतना भी कम क्या,
कि मुझपे किसी का एहसान नहीं है।
उतना ही कहता हूँ जितना ज़रूरी,
हर लफ़्ज़ यूँ ही कोई बयान नहीं है।
ज़मीं से उठा हूँ, ज़मीं ही है दौलत,
मेरी चाहतों में कोई आसमान नहीं।
अमीरी का मौसम भले कम रहा हो,
मगर सर पे कोई इल्ज़ाम नहीं है।
जो मिलते हैं मुझसे, अदब से ही मिलते,
कि इतना भी मिलना आसान नहीं है।
अजय अमिताभ सुमन
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3.निशानी लहरों की
हवाओं पर कोई कहानी लिखूँ,
अपनी मैं क्यों ज़िंदगानी लिखूँ?
जो दिखता है वो ही तो सच है मेरा,
और क्या मैं दास्ताँ बयानी लिखूँ?
साहिल-ए-रेत निशानी का क्या,
सब मौजें मिटाएँ नादानी लिखूँ?
पल में बदलती है सूरत-ए-जहाँ,
हर एक लम्हा बस रवानी लिखूँ?
हवाओं पर कोई कहानी लिखूँ,
अपनी मैं क्यों ज़िंदगानी लिखूँ?
अजय अमिताभ सुमन
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2.पितृ-व्याख्यान
क्या रखा है कल्प बिताना औरों के गुणगान में,
वर्तमान से वक्त बचा लो तुम निज के निर्माण में।
पूर्व अतीत की चर्चा कर क्या रखा गर्वित होने में,
पुरखों के रण-घात सुना क्या रखा हर्षित होने में।
भुजा क्षीण हो तेरा फिर क्या रखा स्वाभिमान में?
वर्तमान से वक्त बचा लो तुम निज के निर्माण में।
कुछ पूर्वज के सुरमा होने से कुछ क्षण को बल मिलता,
निज हाथों से उद्यम रचने पर अभिलाषित फल मिलता।
निज कर्म करो, क्यों कल्प बिताते पितृ-व्याख्यान में?
वर्तमान से वक्त बचा लो तुम निज के निर्माण में।
अजय अमिताभ सुमन
1.सौदा-ए-बुलंदी
वो जो छू लेता है बुलंदी, कोई इनाम नहीं होता,
ये रूह का इम्तिहान है, कोई वरदान नहीं होता।
बुलंदी मिलते ही बढ़ने लगती है रूह-ए-तन्हाई,
बिना गुरूर-ए-जुनूँ के नामो-निशान नहीं होता।
आसमाँ छू भी ले इंसाँ, तो मुकम्मल कहाँ होता,
बड़ा आदमी होने से कोई गुणगान नहीं होता।
ऊँचे ख़्वाबों की है कीमत तेरी नींद, तेरे उसूल,
सौदा-ए-बुलंदी यूँ ही किसी के नाम नहीं होता।
अजय अमिताभ सुमन
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