Wednesday, October 28, 2026

माँग लिया खानदान

नेत्रदान  के पक्ष में नेता बाँट रहे थे ज्ञान

बता रहे थे लोगों को कि है ये पुण्य महान ।

ये कर्म पुण्य महान कि होता खुश अंधा बेचारा।

तेरे कर्म से दुखियों का मिट जाता अंधियारा। 


तब हमने भी घबड़ाकर अपना पक्ष सुनाया,

डर से कंपित अंतर्मन का  थोड़ा सत्य बताया,

नेताजी एक बात बताएँ, इस पुण्य व्यापार में,

पाप पुण्य का लेखा जोखा होगा किस दरबार में?


नेता बोले अरे भाई ये  कैसी बात सुनाते हो,

पुण्य कमाने का है अवसर कैसा तर्क बताते हो?

अंधे को संसार दिखेगा, जीवन में खुशहाली होगी,

देख सकेगा चाँद सितारे, बगिया में  हरियाली होगी!”


मैने तब डर डर के बोला क्षमा करें श्रीमान ।

क्षमा करें श्रीमान कि लगाकर आँख हमारी ।

अगर किसी लंगड़े ने किसी युवती पे मारी ।

आँखें तो हैं साधन, इस नीयत का क्या होगा?

जिसने की हो गड़बड़, या दोष मेरा लगेगा?


 तुम्ही कहो नेताजी उस अंधे का क्या बिगरेगा ।

है तो आँख हमारी ही  , पाप हमी को लगेगा ।

कल को मेरी आँखों से गर कोई चोरी करता 

किसके मत्थे पापा चढ़ेंगे इसका लेखा जोखा।


मान लीजिए, मैं स्वर्ग गया और ठाठ से बैठा,

चित्रगुप्त ने फिर खोला, पापा पुण्य का ठेका ।

दान किया था नेक काम, नीयत थी भरपूर!

मेरे कहने पर क्या होगा, क्या मेरा  कसूर?


नेता बोले कर्म करो, मत सोचो परिणाम,

नेत्रदान को दुनिया देती जय-जयकार प्रणाम!

हमने कहा सहमत हैं, इसमें भी क्या हो विवाद,

आप रखें आँखें टेबल पर फिर आगे कोई संवाद!”


सुनकर मेरी बात नेताजी  खाँसे बारंबार,

बोले इस विषय पर चर्चा होगी अगली बार!”

फिर मंच से उठकर नेता  भागे थे श्रीमान,

जैसे नेत्र नहीं मैने हो माँग लिया  खानदान!

जैसे नेत्र नहीं मैने हो माँग लिया  खानदान!

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