Monday, October 26, 2026

मोबाइल में बसते प्राण

मैं ना बालक एक शैतान, 

इतनी सी विनती भगवान, 

एक वीक की छुट्टी मिल जाए, 

जो मुझको हो जाए जुकाम।


स्कूल की बस जब आए, 

मेरा दिल तब खूब घबराए, 

जूता एक मिले बिस्तर पर, 

दूजा जाने कहाँ छुपाए!


बैग मेरा इतना है भारी, 

जैसे ईंटें भर दी सारी, 

किताबों के नीचे दबकर, 

रोती रहती पीठ बेचारी!


होमवर्क का नाम जो आए, 

नींद मुझे झटपट आ जाए, 

पेंसिल ढूँढ़ूँ आधे घंटे, 

फिर कॉपी ही मिल ना पाए!


गणित की जब घंटी बजती, 

मेरी धड़कन तेज़ है चलती, 

मैडम पूछें, “दो दूनी कितने?” 

अक्ल मेरी छुट्टी पर रहती!


मम्मी बोले, “पढ़ ले बेटा,” 

मैं कहता पढ़ता हूँ गणित!” 

मोबाइल लेकर बैठूँ मैं, 

जैसे दुनिया का हूँ पंडित!


पापा पूछें, “नंबर कितने?” 

मैं कह दूँ, “बस पास हो जितने!” 

मार्कशीट जब सामने आए, 

पापा पूछें, “ये तो ईतने?”


रील बनाऊँ, गेम चलाऊँ, 

खुद को हीरो खूब बताऊँ, 

पढ़ने का जब समय हो जाए, 

वाई-फाई को दोष लगाऊँ!


दूध देख के उल्टी आती, 

भिंडी भी है बहुत सताती, 

खाने की भी चीज़ है कोई, 

बैंगन, कटहल, लौकी-भाजी।


मैगी, बर्गर, गरम समोसे, 

छोले-कुलचे, इडली-डोसे, 

दूध-मलाई, मक्खन, हलवा, 

दादी भर-भर नरम पड़ोसे।


मम्मी-पापा खुश हो जाएँ, 

मेरे नंबर सब बढ़ जाएँ, 

बिना पढ़े टॉपर बन जाऊँ, 

टीचर ताली खूब बजाएँ!


पर भगवन ने आँख दिखाई, 

बोल अक्ल है कहाँ गँवाई? 

छुट्टी, मैगी  ठीक ठाक पर 

करनी होगी खूब पढ़ाई!”


मैं बोला, “प्रभु, बात है सच्ची, 

मेरी नीयत थोड़ी है कच्ची, 

पढ़ भी लूँगा, खेल भी लूँगा, 

बस छुट्टी हो थोड़ी अच्छी!”


मैं ना बालक एक शैतान, 

नटखटपन मेरी पहचान, 

पढ़ाई हो पर थोड़ी सी

मोबाइल में बसते प्राण

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