हिंदी कोष:हिंदी कविताओं और कहानियों की पत्रिका
इस ब्लॉग पे प्रस्तुत सारी रचनाओं (लेख/हास्य व्ययंग/ कहानी/कविता) का लेखक मैं हूँ तथा ये मेरे द्वारा लिखी गयी है। मेरी ये रचना मूल है । मेरे बिना लिखित स्वीकीर्ति के कोई भी इस रचना का, या इसके किसी भी हिस्से का इस्तेमाल किसी भी तरीके से नही कर सकता। यदि कोई इस तरह का काम मेरे बिना लिखित स्वीकीर्ति के करता है तो ये मेरे अधिकारों का उल्लंघन माना जायेगा जो की मुझे कानूनन प्राप्त है। (अजय अमिताभ सुमन: सर्वाधिकार सुरक्षित :Ajay Amitabh Suman:All Rights Reserved)
Monday, January 12, 2026
कोर्ट मसल्स
Friday, January 9, 2026
दलील
एक बार कोर्ट में ज़ोरदार बहस चल रही थी। एक तरफ का वकील साहब तो ऐसे चिल्ला रहे थे मानो वो कोयल नहीं, पूरा स्पीकर सिस्टम हों – "माई लॉर्ड! ये अन्याय है! ये ज़ुल्म है! ये... ये... बर्दाश्त के बाहर है!!" आवाज़ इतनी तेज़ कि कोर्ट की दीवारें भी काँप रही थीं।
पहला वकील थोड़ा शांत हुआ, लेकिन अंदर से सोचा – "अरे, कोयल तो मीठा गाती है, मैं तो गरज रहा हूँ!"
वो रुके, थोड़ा ड्रामैटिक पॉज़ लिया और बोले,"अगर कोयल चालाकी से बाज़ के घोंसले के पास जाकर बार-बार 'कूहू-कूहू' करे, और बाज़ को इतना तंग कर दे कि बाज़ गुस्से में अपना शिकार छोड़कर कोयल का पीछा करने लगे... तो शिकार कोयल नहीं, पर दूसरे पक्षी उठा ले जाते हैं!"
कोर्ट रूम में ठहाका लग गया। पहला वकील साहब अब सोच में पड़ गए – "अरे, ये तो मेरे साथ ही हो रहा है! मैं चिल्ला रहा हूँ, और ये चुपचाप मेरी दलीलों की कमज़ोरियाँ निकाल रहे हैं!"
जज साहब हँसते हुए बोले, "बहुत खूब! तो साहब लोग, न कोयल बनिए जो सिर्फ़ गाए, न ऐसे बाज़ बनिए जो गुस्से में अपना शिकार गँवा दें। बस चालाक कोयल और समझदार बाज़ का कॉम्बिनेशन बनिए – मीठी आवाज़ में मज़बूत तर्क दीजिए।"
मोरल ऑफ़ द स्टोरी: कोर्ट में न ज़्यादा कोयल बनो, न गुस्सैल बाज़। थोड़ा कोयल का मीठापन + थोड़ा बाज़ का फोकस = जीत पक्की!
सर्कस
अपना गधा संपन्न था, पर सुखी नहीं। दर्द तो था, पर इसका कारण पता नहीं चल रहा था। मल्टी नेशनल कंपनी में कार्यरत होते हुए भी, अजीब सी बैचैनी थी। सर झुकाते झुकाते उसकी गर्दन तो टेढ़ी हो ही गई थी, आत्मा भी टेढ़ी हो गई थी। या यूँ कहें कि १० साल की नौकरी ने उसे ये सिखा दिया था कि सीधा रहे तो कोई भी खा लेगा। जीने के लिए आत्मा का भी टेढ़ा होना ज़रुरी है। गधे ने ये जान भी लिया था और मान भी लिया था। तो फिर ये शोक कैसा? शायद ये वो कॉर्पोरेट शोक था, जहाँ बोनस मिलने पर भी चेहरा उदास रहता है, क्योंकि अगला टारगेट पहले से दोगुना होता है। गधा सोचता, "मैं तो बस एक सॉफ्टवेयर इंजीनियर हूँ, लेकिन लगता है मैं एक ह्यूमन रिसोर्स हूँ – हर कोई मुझे इस्तेमाल कर रहा है।"
इसी उधेड़बुन में कार ड्राइव करते हुए ऑफ़िस पहुँचता, सर झुकाता, जी हुजूरी करता, घर लौटता। पैसे तो काफी मिल गए थे, पर साथ में मिले सीने का दर्द भी। डॉक्टर के पास पहुंचा। पूरा चेक अप हुआ। कोई बीमारी नहीं निकली। डॉक्टर ने कहा, "कोई बीमारी नहीं है। टी. वी. देखो, सैर सपाटा करो, मोर्निंग वाक करो, सब ठीक हो जाएगा।" गधा सोचता रहा, "डॉक्टर साहब, आपकी फीस तो बीमारी से ज्यादा है, लेकिन इलाज टीवी? क्या मैं कोई पुराना रेडियो हूँ जो बैटरी बदलने से ठीक हो जाऊँ?"
रात भर नींद नहीं आई थी। दिन भर बैठे-बैठे उदासी सी छाई हुई थी। सोचा ज़रा सुबह सुबह मोर्निंग वाक किया जाए। गधा जम्हाई लेते हुए पार्क पहुँच गया। वहाँ जाते हीं उसकी नींद हवा हो गई। वहाँ बड़े बड़े नमूने पहुंचे हुए थे। एक मोटा भाई पेड़ के तने को ऐसे ज़ोर ज़ोर से धक्का दे रहा था, जैसे कि पेड़ को हीं उखाड़ फेकेगा। कोई कमर हिला रहा था। एक शेख चिल्ली महाशय कभी दीखते, कभी नहीं दीखते। कौतुहल बढ़ता गया। निरीक्षण करने में ज्ञात हुआ, दंड बैठक कर रहे थे। अद्भुत नज़ारा था। मोटी मोटी गधियाँ ऐसे नाज़ुक मिज़ाज से चल रही थी, मानो दुनिया पे एहसान कर रहीं हो। तो कुछ "सेल्फी" लेने में व्यस्त थी। १०-१२ गधे बिना बात के ज़ोर ज़ोर से हँस रहे थे। ये नए जमाने का हास्य आसन था। एक गधा गीता का पाठ कर रहा था तो दूजा सर नीचे और पैर उपर कर शीर्षासन लगा के बैठा हुआ था।
जब एक सियार बोलता है तो दूसरे को भी सनक चढ़ जाती है। दूसरा सियार कारण नहीं पूछता। जब किसी को छींक आती है तो दूसरी भी आती है, फिर तीसरी भी आती है। अलबत्ता दूसरों को भी आने लगती है। यदि रोकने की कोशिश की जाय तो बात छींक को बहुत बुरी लगती है। वो पूछने लगती है, "पहले तो ऐसा नहीं किया, ऐसे तो आप नहीं थे। आज क्या हुआ, ये नाइंसाफी क्यों? ये बेवफाई क्यों? पहले तो ना बुलाने पर हमे आने देते थे। कभी कभी तो नाक में लकड़ी लगा के भी हमारे आने का इन्तज़ाम करते थे। अब क्या हुआ? क्यों इस नाचीज पे ज़ुल्म ढा रहे है?" छींक की फरियाद रंग लाती है, बंद कपाट खुल जाते हैं और फिर वो नाक के सारे सुपड़ो को साफ करते हुए बाहर निकाल ले जाती है। गधों की जात सियारों और छींकों के जैसी हीं होती है। एक बोले तो दूसरा भी बोलना शुरू कर देता है। एक छींक आये तो दूसरी, फिर तीसरी। बिल्कुल "वायरल" हो जाती है। दूसरे गधे को शीर्षासन करते हुए देखकर, अपने गधे भाई को भी सनक चढ़ गई। ये भी अपना सर नीचे करने लगा। ज्यों ज्यों सर नीचे करने की कोशिश करता, त्यों त्यों दुनिया उलटने लगती और ये सीधा हो जाता। फिर सोचा, "दुनिया उल्टी हो जाए, इससे तो बेहतर है, दुनिया पे एहसान कर लिया जाए और इसको सीधा ही रहने दिया जाए।" निष्कर्ष ये निकला की गधे ने शीर्षासन की ज़िद छोड़ दी।
लेकिन सनक कहाँ रुकने वाली थी? पार्क से लौटते हुए गधे ने देखा, एक होर्डिंग पर लिखा था – "योगा क्लास जॉइन करो, आत्मा को चमकाओ!" सोचा, क्यों न योगा ट्राई किया जाए? अगले दिन योगा क्लास पहुँचा। इंस्ट्रक्टर एक दुबला-पतला गधा था, जो कहता, "ओम शांति, ओम शांति। अब सूर्य नमस्कार!" गधा ने कोशिश की, लेकिन सूर्य नमस्कार कम, सूर्य को गाली ज्यादा निकली। एक आसन में पैर ऊपर करने की कोशिश में गिर पड़ा, और बगल वाली गधी पर। गधी चिल्लाई, "ये क्या हरकत है? मीटू मूवमेंट सुना है?" गधा शर्मिंदा हो गया। इंस्ट्रक्टर ने कहा, "कोई बात नहीं, पहली बार सब गिरते हैं। लेकिन याद रखो, योगा से आत्मा सीधी होती है।" गधा सोचता रहा, "मेरी आत्मा पहले से टेढ़ी है, सीधी करने से क्या वो टूट नहीं जाएगी?"
योगा से ऊबकर गधे ने जिम ज्वाइन किया। गधों को कूदते देखा, वजन उठाते देखा। और तो और एक गधी ने 40 किलो का वजन चुटकी में उठा लिया। उसे भी जोश आ गया। उसने एक दम 60 किलो से शुरुआत की। नतीजा वो ही हुआ, जो होना था। कमर लचक गयी। गर्दन और आत्मा तो थे ही टेड़े पहले से, अब कमर भी टेड़ी हो गई। गधी के सामने बेईज्जती हुई अलग सो अलग। अब कमर में बैक सपोर्ट लगा कर लचक लचक कर चलने लगा। उसको चाल को देख कर भैंस ने कमेंट मारा, आँखों से इशारा कर गाने लगी "तौबा ये मतवाली चाल झुक जाए फूलों की डाल, चाँद और सूरज आकर माँगें, तुझसे रँग-ए-जमाल, हसीना! तेरी मिसाल कहाँ।" गधा सोचा, "भैंस जी, आपकी चाल देखकर तो ट्रैफिक जाम हो जाता है, लेकिन कमेंट आप कर रही हैं?"
जिम की असफलता के बाद गधा सोचने लगा, शायद थोड़ा शॉपिंग थेरेपी ट्राई की जाए। मॉल गया। वहाँ गधों की भीड़ थी, सब कुछ न कुछ खरीद रहे थे जैसे खुशी स्टॉक में खत्म होने वाली हो। गधे ने एक ब्रांडेड शर्ट खरीदी, जो इतनी महँगी थी कि उसकी कीमत से एक गाँव का गधा पल सकता था। घर आकर पहनी, लेकिन दर्द वही का वही। सोचा, "ये शर्ट तो खुशी नहीं दे रही, उल्टा पॉकेट में छेद कर गई।" फिर एक गैजेट खरीदा – स्मार्ट वॉच, जो हार्ट रेट बताती। लेकिन हर बार बीप करती, "आपका हार्ट रेट हाई है, रिलैक्स करो!" गधा चिल्लाया, "तू रिलैक्स कर, मैं तो पहले से तनाव में हूँ!"
घर आकर सर खुजाने लगा, पर "आईडिया" आये तो आये कहाँ से। वोडाफ़ोन वालों ने सारे आइडियाज चुरा रखे थे। कोई संत महात्मा भी दिखाई नहीं पड़ रहे थे जो जुग जुग जिओ का आशीर्वाद देते। सारे के सारे आशीर्वाद तो अम्बानी के "जिओ" के पास पहुँच गए थे। गधे की टेल भी एयर टेल वालों ने चुरा रखा था, बेचारा पुंछ हिलाए तो हिलाए भी कैसे? फिर सोचा, क्यों न सोशल मीडिया पर खुशी ढूँढी जाए? इंस्टाग्राम खोला। वहाँ गधे रील्स बना रहे थे – एक गधा दुबई में घूम रहा, दूसरा मालदीव्स में। कैप्शन: "लाइफ इज ब्यूटीफुल!" गधा ने अपनी एक सेल्फी पोस्ट की, कैप्शन: "मॉर्निंग वॉक!" लेकिन कमेंट्स आए: "भाई, तू तो उदास लग रहा, कोई फिल्टर यूज कर!" गधा डिप्रेस हो गया, सोचा, "सोशल मीडिया पर सब खुश दिखते हैं, लेकिन रियल लाइफ में सब गधे ही हैं।"
टी.वी. खोला तो सारे चैनेल पे अलग अलग तरह के गधे अपनी अपनी पार्टी के लिए प्रलाप करते दिखे। पार्लियामेंट में गधों की हीं सरकार थी, पर गधों की बात कोई नहीं करता। घास की जरुरत थी गधों को। खेत के खेत कंक्रीट में तब्दील होते जा रहे थे। सारे के सारे गधे कौओं की भाषा बोल रहे थे। कोई मंदिर की बात करता, कोई मस्जिद की बात करता। मंदिर-मस्जिद की लड़ाई में कौओं की चाँदी हो रही थी। मंदिर के सामने बहुत तरह के छप्पन भोगों की बरसात हो रही थी। बड़े बड़े मैदान, खलिहान शहरों में तब्दील हो रहे थे और गधों में भुखमरी बढ़ती जा रही थी। पार्लियामेंट में गधे, कौओं की बातें करते और कौओं से चुनाव के वक्त पोलिटिकल डोनेशन लेते। कहने को गधों की सरकार थी, पर कौओं के मौज़ थे। सारे चैनेल पे गधे कौओं की भाषा बोल रहे थे। एक चैनल पर डिबेट: "क्या गधों को घास मिलनी चाहिए?" लेकिन पैनल में सब कौए थे, जो कहते, "नहीं, गधों को कंक्रीट खाना चाहिए, डेवलपमेंट के लिए!" गधा हँसा, "ये डिबेट तो मेरी लाइफ जैसी है – सब बोलते हैं, कोई सुनता नहीं।"
ऊब कर गधे ने टी. वी. स्विच ऑफ किया और अपनी 40 मंज़िली अपार्ट्मेंट के कबुतरखाने नुमा घोसले से बाहर निकल कर नीचे देखने लगा। दूर दूर तक अपार्ट्मेंट हीं अपार्ट्मेंट। कोई पेड़ नहीं, कोई चिड़िया नहीं। चिड़िया भी क्या करे, सारी की सारी "ट्विटर" पे ट्विट करने में व्यस्त थीं। कोई चहचहाहट सुनाई नहीं पड़ती थी। तभी एक ड्रोन उड़ा, जो अमेज़न से पैकेज डिलिवर कर रहा था। गधा सोचा, "अब तो हवा में भी ट्रैफिक है, ज़मीन पर क्या बचा?" फिर एक विचार आया – क्यों न वर्क फ्रॉम होम की जगह वर्क फ्रॉम जंगल ट्राई किया जाए? लेकिन जंगल कहाँ? सब तो मॉल में बदल चुके थे।
अंत में गधा समझ गया, खुशी न पार्क में है, न जिम में, न शॉपिंग में, न सोशल मीडिया में। खुशी तो बस एक मिथ है, जिसे कॉर्पोरेट वाले बेचते हैं ताकि गधे चलते रहें। लेकिन गधा अब भी दौड़ रहा है, क्योंकि रुकना तो गधों की डिक्शनरी में नहीं है। और इस तरह, गधे की जिंदगी एक अंतहीन सर्कस बन गई, जहाँ हर कोई जोकर है, लेकिन हँसी किसी की नहीं आती।
मुमुक्षु
अध्याय 1: प्रश्न और उत्तर
एक शांत शाम थी, जब सूरज की अंतिम किरणें आश्रम की दीवारों पर सुनहरी चमक बिखेर रही थीं। मुमुक्षु, एक युवा स्नातक छात्र, गुरुदेव के चरणों में बैठा था। उसका मन ईश्वर की खोज में व्याकुल था। बचपन से ही वह भगवान के बारे में इतनी उत्कंठा से बात करता था कि उसके मित्र उसे 'भक्त' कहकर चिढ़ाते थे। आज उसने एक गहन प्रश्न पूछा, "गुरुदेव, क्या भोग और स्त्री का उपभोग करते हुए परम ब्रह्म का साक्षात्कार किया जा सकता है?"
गुरुदेव की आँखें शांत झील की तरह थीं। उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा, "बिल्कुल किया जा सकता है, मुमुक्षु। इतिहास के पन्नों में अनेक उदाहरण मिल जाएंगे। तंत्र मार्ग में तो यौन क्रीड़ा और स्त्री का बड़ा उपयोग है। वहाँ काम को साधना का माध्यम बनाया जाता है। यहां तक कि श्री रामकृष्ण परमहंस जी ने स्त्री का उपयोग करते हुए भी उसी परम ब्रह्म के दर्शन किए, जो भक्ति मार्ग का अनुसरण करते हुए। उन्होंने अपनी पत्नी शारदा देवी को माँ काली का रूप मानकर पूजा की, और उस माध्यम से दिव्य अनुभूति प्राप्त की। लेकिन याद रखो, ईश्वर प्राप्ति के लिए योग, ध्यान और ब्रह्मचर्य का मार्ग ही सर्वोत्तम है। तंत्र मार्ग पशु वृत्ति के मनुष्यों के लिए उपयोगी है, जहां काम को नियंत्रित कर ऊर्जा में परिवर्तित किया जाता है। ब्रह्मचर्य के पालन से पुरुष की इंद्रियां इतनी संयमित, सूक्ष्म और शरीर इतना शक्तिशाली हो जाता है कि जब परम ऊर्जा का शरीर पर शक्तिपात होता है, तब शरीर उस परम ऊर्जा को झेलने में सक्षम हो पाता है।"
मुमुक्षु के मन में यह बात गहराई से उतर गई। वह सोचने लगा कि क्या वह इस मार्ग पर चल सकता है?
अध्याय 2: मुमुक्षु का परिचय और गुरु से भेंट
मुमुक्षु एक साधारण परिवार का लड़का था, दिल्ली के एक कॉलेज में स्नातक की पढ़ाई कर रहा था। उसका नाम राजीव था, लेकिन आध्यात्मिक खोज में वह खुद को 'मुमुक्षु' कहलाना पसंद करता था, अर्थात मुक्ति की इच्छा रखने वाला। बचपन से ही वह मंदिरों में घंटों बैठा रहता, रामायण और गीता पढ़ता। उसके पिता एक सरकारी क्लर्क थे, जो कहते थे, "बेटा, पहले नौकरी कर लो, फिर भगवान की खोज करना।" लेकिन मुमुक्षु का मन दुनिया की चकाचौंध से ऊब चुका था।
उसी शहर में एक दिन गुरुजी पधारे। उनका नाम स्वामी विवेकानंद सरस्वती था, लेकिन लोग उन्हें बस 'गुरुजी' कहते थे। अफवाहें थीं कि उन्हें ईश्वरानुभूति हो चुकी है। वे ध्यान की गहराइयों में उतरकर लोगों को मार्गदर्शन देते थे। मुमुक्षु ने सुना तो उत्सुक हो उठा। वह आश्रम पहुंचा, जहां सैकड़ों लोग बैठे थे। गुरुजी की सभा में वह पहली बार गया। गुरुजी ने प्रवचन दिया, "ईश्वर बाहर नहीं, भीतर है। ध्यान से उसे खोजो।" मुमुक्षु प्रभावित हुआ और नियमित रूप से आने लगा। गुरुजी ने उसे देखा और कहा, "तुममें जिज्ञासा है, लेकिन धैर्य सीखो।" जल्द ही मुमुक्षु उनके निर्देशानुसार ध्यान करने लगा – सुबह उठकर प्राणायाम, फिर ध्यान।
कॉलेज में उसकी क्लास में अनेक लड़कियां थीं। वे फैशनेबल कपड़े पहनतीं – टॉप जो पीठ को नंगा छोड़ देते, स्कर्ट जो जांघों को उजागर करते, और ब्लाउज जो वक्ष को उभारते। मुमुक्षु बहुतों के प्रति आकर्षित होता। ध्यान के समय उसके मानस पटल पर उनके वक्ष, उनकी मांसल जांघें, उनके उन्नत स्तन, उनकी नंगी पीठ बार-बार आ जातीं। वह विचलित हो जाता, ध्यान टूट जाता।
अध्याय 3: प्रारंभिक संघर्ष और गुरु की सलाह
एक दिन क्लास में एक लड़की, नाम था रिया, उसके बगल में बैठी। उसकी शर्ट की नेकलाइन इतनी गहरी थी कि उसके उभरे वक्ष साफ दिख रहे थे। मुमुक्षु की नजरें बार-बार वहां जातीं। घर लौटकर ध्यान में वह दृश्य फिर आया। वह परेशान हो गया। अगले दिन वह गुरुजी के पास गया और सब बता दिया। "गुरुदेव, मेरी इंद्रियां मुझे धोखा दे रही हैं। ध्यान में वासना आ जाती है।"
गुरुजी ने शांत स्वर में कहा, "यह स्वाभाविक है, मुमुक्षु। वासना मन की कमजोरी है। सर्वदा स्वयं की श्वासों पर ध्यान दो। जब-जब किसी युवती के शरीर के प्रति वासना जागे, अपने ध्यान को अपनी नाभि पर ले जाओ। वासना को जब तक ध्यान का साथ नहीं मिलता, ये प्रकट नहीं होती। ध्यान नाभि पर होने से मन मस्तिष्क में वासना का जन्म नहीं हो पाता।"
मुमुक्षु ने इस मार्ग पर चलना शुरू किया। अब क्लास में जब किसी सहपाठिनी के उरोज उसे आकर्षित करते, नंगी पीठ दिखाई पड़ती, खुली नाभि चमकती, मोटी जांघें लुभातीं, मांसल वक्ष उभरते, वह तुरंत अपना ध्यान स्वयं की नाभि पर ले जाता। श्वासों की गति पर फोकस करता। धीरे-धीरे वासना साक्षीभाव से नियंत्रित होने लगी। वह ध्यान के मार्ग पर आगे बढ़ चला।
नया घटना: एक दिन कॉलेज फेस्ट में वह शामिल हुआ। वहां लड़कियां डांस कर रही थीं, उनके शरीर की हर हलचल कामुक लग रही थी। एक लड़की ने उसे डांस के लिए आमंत्रित किया। वह इनकार कर गया, लेकिन मन में तूफान उठा। घर जाकर उसने घंटों ध्यान किया, नाभि पर फोकस कर वासना को दबाया।
अध्याय 4: प्रगति और घमंड का उदय
लगभग दो महीने बीत चुके थे। अब उसे लड़कियों के उभरे वक्ष, खुली नाभि दिखाई पड़तीं, लेकिन वह विचलित न होता। लड़कियां उसे देखकर मुस्कुरातीं, लेकिन वह कोई प्रतिउत्तर न देता। उसके मन में घमंड आने लगा। उसे लगने लगा कि वह जितेंद्रिय बन चुका है, काम वासना पर विजय प्राप्त कर चुका है। वह दोस्तों से कहता, "मैं अब इंद्रियों का स्वामी हूं।"
नया घटना: एक बार वह बाजार गया। वहां एक युवती से टकरा गया। उसकी साड़ी सरक गई, कमर दिख गई। पहले तो मन डोला, लेकिन उसने तुरंत नाभि पर ध्यान केंद्रित किया। वासना शांत हो गई। वह खुद पर गर्व करने लगा।
अध्याय 5: पहला स्वप्न और निराशा
एक रात वह सोया हुआ था। स्वप्न में उसने देखा कि उसकी सहपाठिनी रिया उसके पास आकर एकदम से खड़ी हो गई। उससे कलम मांगती है। जब वह देता है, कलम हाथ से छूट जाती है। जैसे ही रिया कलम लेने झुकती है, उसके कपड़े पीछे से सरक कर नीचे गिर जाते हैं। उसका पूरा नंगा बदन, कमर की उभार, सब मुमुक्षु के सामने आ जाते हैं। वह घबराकर मुमुक्षु की गोद में गिर जाती है। मुमुक्षु उसे कसकर अपने बदन से भींच लेता है। उसके हाथ नवयुवती के स्तनों को दबोच लेते हैं। स्वप्न टूटने पर मुमुक्षु बहुत निराश हुआ। उसकी दो महीनों की मेहनत बेकार हो चुकी थी। वह रोने लगा, "मैं असफल हूं।"
अगले दिन गुरुजी को बताया। गुरुजी ने कहा, "मुमुक्षु, तुमने चेतन मन को तो वश में कर लिया है, लेकिन असली परीक्षा अवचेतन मन पर विजय है। स्वप्न के समय अवचेतन मन दबी हुई वासनाओं को दिखाता है। उसी पर विजय प्राप्त करनी होती है। स्वयं पर नियंत्रण बनाए रखो। ध्यान जारी रखो।"
अध्याय 6: निरंतर अभ्यास और नए स्वप्न
मुमुक्षु ने अभ्यास तेज किया। अब वह रात को सोने से पहले भी नाभि ध्यान करता। दो-तीन महीने बाद फिर स्वप्न आया। लड़की फिर आई, इस बार पूर्ण नग्न रूप में। उसने मुमुक्षु के कपड़े खोल दिए। मुमुक्षु की नसें फटने लगीं। उस अति सुंदरी नग्न स्त्री को चूमने की इच्छा हुई, लेकिन वह स्वयं पर नियंत्रण रखता रहा। स्वप्न टूट गया। उसे अपनी जीत पर खुशी हुई।
नया घटना: इस बीच वह एक यात्रा पर गया। हिमालय की तलहटी में एक आश्रम में रहा। वहां साधु मिले, जिन्होंने उसे बताया कि वासना प्रकृति का हिस्सा है, लेकिन उसे ऊर्जा में बदलो। वहां ध्यान में उसे पहली बार हल्की रोशनी दिखी। लौटकर गुरुजी को बताया, वे खुश हुए।
इस तरह समय बीतने लगा। दो-तीन महीने के अंतराल पर नग्न लड़कियों के स्वप्न आते – कभी कोई नंगा बदन दिखाती, कभी खुली नाभि, कभी मांसल जांघ, तो कभी मादक स्तन। लेकिन वह सजग रहता और उठ जाता। इसी बीच ध्यान में विचित्र रोशनियां नजर आने लगीं। गुरुजी के पास जाकर वह स्वयं के जितेंद्रिय होने की घोषणा करने लगा।
अध्याय 7: चार साल बाद की हार और अहंकार का पतन
लगभग चार साल बीत चुके थे। मुमुक्षु ध्यान की गहराइयों में गोते लगा रहा था। वह अब आश्रम में ज्यादा समय बिताता, कॉलेज खत्म हो चुका था। एक दिन ध्यान में उसने देखा एक पुरुष चोट खाकर गिर पड़ा है। वह जैसे ही उसके पास जाता है, अचानक वह पुरुष एक नग्न स्त्री में परिवर्तित हो जाता। उसके दो बड़े-बड़े स्तन मुमुक्षु की छाती में गड़ जाते हैं। मुमुक्षु हमेशा की तरह जगना चाहता था, लेकिन उस कामुक स्त्री ने मुमुक्षु के हाथ को स्वयं के कमर के नीचे भाग में चिपका दिया। मुमुक्षु की सांस तेज हो गई। उस स्त्री ने मुमुक्षु को पकड़कर सारे कपड़े फाड़ डाले। उसकी नसें गर्म हो उठीं। वह उस स्त्री के चुम्बन लेने लगा। उसका ब्रह्मचर्य फिर भंग हो चुका था।
नया घटना: इस घटना से पहले, वह एक गांव में गया जहां एक युवती की मदद की। वह बीमार थी, मुमुक्षु ने उसे दवा दी। लेकिन उसकी नजरें उसके शरीर पर गईं। वह भागा, लेकिन मन में अपराध बोध रहा।
अति निराशा से वह अपराध भाव में गुरु के सामने प्रस्तुत हुआ। गुरुजी ने कहा, "ये तुम्हारे अहंकार की हार हुई है। अवचेतन मन बहुत मजबूत होता है। कभी उसके सामने तन कर मत जाओ। जब तक तुम्हारे मन में जितेंद्रिय होने का भाव रहेगा, तब तक तुम हारते रहोगे। स्त्री से घृणा नहीं, स्त्री को स्वीकार करो। अपनी माँ के रूप में, अपनी बहन के रूप में। फिर स्त्री से भागने की जरूरत नहीं पड़ेगी। ईश्वर के सामने तन कर खड़े होने से नहीं, बल्कि झुकने से जीत मिलती है। जितने की कोशिश करोगे तो हारोगे। हार स्वीकारोगे तो जीतोगे।"
अध्याय 8: परिवर्तन और नई दृष्टि
मुमुक्षु के मन में काफी परिवर्तन आ चुका था। अब वह लड़कियों को देखता, लेकिन उनके अर्धनग्न कपड़े नहीं दिखते। उनकी मुस्कान दिखती, उनके खुले बदन नहीं। उनकी करुणा दिखती, वासना नहीं। वह अब स्त्रियों को देवी रूप में देखता। ध्यान के मार्ग पर वह काफी आगे बढ़ चुका था। ध्यान के समय दूधिया प्रकाश में तैरता रहता।
नया घटना: वह अब आश्रम में दूसरों को सिखाने लगा। एक युवती आई, जो ध्यान सीखना चाहती थी। पहले वह डरता, लेकिन अब उसे माँ का रूप देखा। उसने बिना विचलित हुए सिखाया।
अध्याय 9: अंतिम वर्ष और गुरु का स्वर्गवास
दस-बारह साल बीत चुके। उसके गुरुजी का स्वर्गवास हो चुका था। मुमुक्षु आश्रम में ही रह रहा था, अब वह खुद गुरु बन चुका था। एक दिन ध्यान के समय उसने देखा एक शेर गाय के पीछे भाग रहा है। वह गाय को बचाने के लिए शेर के सामने आ खड़ा होता है। जैसे ही शेर उस पर झपट्टा मारता है, मुमुक्षु जमीन पर गिर जाता है। शेर और गाय खूबसूरत पुरुष और स्त्री में परिवर्तित हो जाते हैं और प्रेमालिंगन करने लगते हैं। एक दूसरे को चूमने लगते हैं। उनकी जांघें, कमर, वक्ष एक दूसरे में समा जाते हैं। उनके कपड़े एक-एक कर शरीर से सरक कर नीचे गिरने लगते हैं। फिर दोनों नग्न स्त्री में परिवर्तित होकर उसकी तरफ आने लगते हैं। खूबसूरत युवतियों के स्तन कड़े हैं। आँखों से वासनामयी निमंत्रण आ रही थी।
नया घटना: इससे पहले, वह एक सपने में एक नदी किनारे गया। वहां देवी का दर्शन हुआ, जो स्त्री रूप में थी। उसने सीखा कि प्रकृति में पुरुष और स्त्री का मिलन सृष्टि का आधार है।
मुमुक्षु अवचेतन मन के इस प्रहार से नहीं भागता। इस बार ध्यान से उठने की कोशिश नहीं करता। वह खुद दोनों युवतियों के पास उनके कपड़े पहनाकर उनकी पूजा करता है। दोनों स्त्रियां देवी में परिवर्तित होकर अंतर्ध्यान हो जाती हैं। इस बार वह युवतियों से भागता नहीं, अपितु उनको स्वीकार करता है। चारों तरफ दूधिया प्रकाश फैल जाता है। मुमुक्षु अति शांति की अवस्था में स्थापित हो जाता है। अब उसे ब्रह्मचर्य के रक्षण की आवश्यकता नहीं थी। वह परम ब्रह्म में विलीन हो चुका था।
समापन: शिक्षा
इस यात्रा से मुमुक्षु ने सीखा कि सच्ची विजय संघर्ष में नहीं, स्वीकृति में है। वह अब दूसरों को यही सिखाता – भोग में नहीं, संयम में; घृणा में नहीं, प्रेम में ईश्वर मिलता है।
Thursday, January 8, 2026
संदर्भ
रेस्ट आर रेस्ट
कचहरी की तीसरी मंज़िल पर बने उस पुराने से चेंबर में एडवोकेट साहब अपनी फाइलों के पहाड़ के बीच बैठे थे। मेज़ पर चाय ठंडी हो चुकी थी, चश्मा नाक के आधे रास्ते पर टिका था और सिर पर बाल… जैसे जीवन की पूरी केस-डायरी लिखी हो।
मुवक्किल साहब—नवीन-नवीन मुक़दमेबाज़—अंदर आए। हाथ में एक मोटी फाइल, चेहरे पर मासूमियत और दिमाग़ में एक ही सवाल।
उन्होंने कुर्सी खींचते हुए बड़े भोलेपन से पूछा,“सर… एक बात पूछूँ?”
वकील साहब ने बिना सिर उठाए कहा,“पूछिए, मगर जल्दी… जज साहब की कॉफी ब्रेक ख़त्म होने वाली है।”
मुवक्किल ने गौर से वकील साहब के सिर को देखा। फिर थोड़ी हिम्मत जुटाकर बोले—“सर, आपके सिर के सिर्फ़ 10 प्रतिशत बाल ही काले हैं और पूरे 90 प्रतिशत सफ़ेद क्यों?”
वकील साहब ने चश्मा उतारा, गहरी साँस ली और कुर्सी की पीठ से टिक गए।चेहरे पर ऐसी मुस्कान आई, मानो कोई पुराना, दर्दभरा लेकिन मज़ेदार फैसला सुनाने वाले हों।
“देखिए,” उन्होंने गंभीर आवाज़ में कहा,“ये जो 90 प्रतिशत सफ़ेद बाल हैं ना… ये पूरी तरह डेली केस टेस्ट का स्ट्रेस हैं।”
मुवक्किल घबरा गया।“इतना ज़्यादा स्ट्रेस, सर?”
वकील साहब उँगलियों पर गिनाने लगे—“एक तारीख़ जो पड़ती है और जज साहब छुट्टी पर निकल जाते हैं—स्ट्रेस।मुवक्किल जो कहता है ‘सर, बस पाँच मिनट में सब समझा देता हूँ’ और पाँच घंटे निकल जाते हैं—स्ट्रेस।
फीस समय पर न मिले—स्ट्रेस।और जब केस जीत जाएँ और मुवक्किल कहे ‘सर, भगवान की कृपा से हुआ’—तब भी स्ट्रेस।”
मुवक्किल सिर हिलाता रहा।
फिर उसने हिम्मत करके आख़िरी सवाल पूछा—“और सर… जो 10 प्रतिशत बाल काले हैं?”
वकील साहब हल्का सा हँसे, फाइल बंद की और बोले—“वो?”
थोड़ा रुककर बोले—“रेस्ट आर रेस्ट.”
मुवक्किल चुप।वकील साहब चाय का आख़िरी घूँट लेते हुए बोले—“वो भगवान की दया है, जेनेटिक्स है, और थोड़ा सा भ्रम है कि ज़िंदगी में अभी सब कुछ बिगड़ा नहीं है।”
इतने में बाहर से पेशकार की आवाज़ आई—“सर, आपका केस पुकारा जा रहा है।”
वकील साहब खड़े हुए, कोट ठीक किया और जाते-जाते मुवक्किल से बोले—“अब समझे? केस तो आज आपका है… मगर सफ़ेद बाल मेरे क्यों हैं।”
डेडली इंस्ट्रक्शन्स
लकड़ी की पुरानी बेंचें, दीवार पर संविधान की प्रस्तावना, और बीच में ऊँचे आसन पर विराजमान माननीय न्यायाधीश महोदय, जिनकी भौंहें हमेशा ऐसी तनी रहती थीं मानो contempt jurisdiction अभी-अभी जाग उठेगा।
कटघरे में खड़ा था अभियुक्त—चेहरे पर वही क्लासिक भाव: “मैं निर्दोष हूँ, बाकी सब परिस्थितिजन्य साक्ष्य हैं।”
और सामने खड़े थे पीड़ित पक्ष के अधिवक्ता—काली कोट, सफेद बैंड, और आत्मविश्वास ऐसा कि मानो IPC की सारी धाराएँ उन्हें कंठस्थ हों।
न्यायाधीश ने फाइल पलटी, चश्मा ठीक किया और गंभीर स्वर में पूछा—मिस्टर लॉयर, एक प्रारंभिक प्रश्न है। आप इस हत्या के मामले में पीड़ित की ओर से पेश हो रहे हैं—यह तो स्पष्ट है।परंतु यह बताइए… आपको निर्देश किसने दिए हैं?”
अदालत में सन्नाटा।स्टेनोग्राफर ने टाइप करना रोक दिया।पेशकार ने पानी का गिलास आधा रास्ते में ही रोक लिया।
अधिवक्ता ने आत्मविश्वास से उत्तर दिया—“माई लॉर्ड… पीड़ित ने।”
अब सन्नाटा नहीं, बल्कि सस्पेंस।न्यायाधीश ने धीरे से चश्मा उतारा, अधिवक्ता को ऊपर से नीचे तक देखा और बोले—“आप कहना क्या चाहते हैं?पीड़ित… जो कि इस समय स्वर्गवासी है…उसने आपको निर्देश दिए?”
अधिवक्ता ने पूरे आत्मविश्वास से सिर हिलाया—“जी हाँ, माई लॉर्ड।”
अब अदालत में हल्की खुसर-पुसर।पीछे बैठा एक जूनियर वकील फुसफुसाया—“लगता है अब Evidence Act में नई धारा जुड़ने वाली है—Section 32A: Instructions from Afterlife।”
न्यायाधीश ने हथौड़ा हल्का सा बजाया—“शांति बनाए रखें।मिस्टर लॉयर, क्या आप यह कहना चाहते हैं कि आपको मृत व्यक्ति से निर्देश प्राप्त हुए?”
अधिवक्ता (शांत स्वर में):“माई लॉर्ड, बिल्कुल।और यदि मैं जोड़ सकूँ—ये निर्देश अत्यंत स्पष्ट थे।”
न्यायाधीश की भौंहें और ऊपर चली गईं—“यह तो बड़ा ही… असामान्य है।क्या आप अदालत को यह भी बताएँगे कि ये निर्देश किस माध्यम से प्राप्त हुए?”
अधिवक्ता ने फाइल खोली, एक काग़ज़ निकाला और बोला—“माई लॉर्ड, ये निर्देश मरने से पहले दिए गए थे।जब पीड़ित जीवित था—inter vivos, जैसा कि रोमन विधि में कहा गया है।उसने स्पष्ट कहा था—‘अगर मेरे साथ कुछ हो जाए, तो केस लड़ना… और पूरी ताकत से लड़ना।’”
पीछे से किसी ने धीमे से कहा—“वाह, ये तो dying declaration 2.0 है।”
न्यायाधीश ने हल्की मुस्कान दबाते हुए कहा—“तो आप यह कहना चाहते हैं कि यह कोई paranormal instruction नहीं, बल्कि पूर्व निर्देश हैं?”
अधिवक्ता:“बिल्कुल माई लॉर्ड।हालाँकि यदि अदालत अनुमति दे, तो मैं यह भी कहना चाहूँगा कि इस केस में निर्देश मरने के बाद भी प्रभावी हैं।”
अब न्यायाधीश मुस्कुरा ही पड़े—“तो यह कहा जा सकता है कि यह मामला Dead men tell no tales का अपवाद है?”
अधिवक्ता (झुककर):“माई लॉर्ड, कानून में एक सिद्धांत है—Actus non facit reum nisi mens sit rea।
यहाँ मृतक की mens आज भी अदालत के समक्ष जीवित है।”
पूरा कोर्टरूम हँसी से गूँज उठा।यहाँ तक कि अभियुक्त भी मुस्कुरा दिया—हालाँकि उसे तुरंत एहसास हुआ कि यह मुस्कान उसके लिए खतरनाक हो सकती है।
न्यायाधीश ने हथौड़ा बजाया और बोले—ठीक है, मिस्टर लॉयर। अदालत आपके ‘डेडली इंस्ट्रक्शन्स’ को स्वीकार करती है। लेकिन एक बात याद रखिए— अगर अगली तारीख पर आप कहेंगे कि ‘आज पीड़ित सपने में आया था’,तो आपको पहले मेडिकल बोर्ड के सामने पेश होना पड़ेगा।”
पूरा कोर्ट फिर से ठहाकों से भर गया। और इस तरह अदालत ने यह मान लिया कि—कभी-कभी न्याय की लड़ाई इतनी ज़ोरदार होती है कि मौत भी उसे चुप नहीं करा पाती।
मिठास
शाम के लगभग सात बज रहे थे।कचहरी की पुरानी इमारत से निकलते हुए अधिवक्ता आदित्य वर्मा ने अपनी काली कोट की जेब में हाथ डाला और गहरी साँस ली। आज भी वही दिन—तीन तारीखें, दो स्थगन, एक तीखी बहस और जज साहब की वही गंभीर दृष्टि।
उसका सिर भारी था, दिमाग थका हुआ और दिल… दिल किसी मीठी राहत की तलाश में था।“कुछ तो ऐसा चाहिए जो आज की कड़वाहट धो दे,” उसने खुद से कहा।सड़क के कोने पर एक छोटी-सी आइसक्रीम की दुकान चमक रही थी। रंगीन बोर्ड, फ्रिज की हल्की गुनगुनाहट और बच्चों की हँसी। आदित्य वहीं रुक गया।
“भैया, एक चॉकलेट आइसक्रीम देना,”फिर हल्की मुस्कान के साथ बोला—“आज कुछ ज़्यादा ही तनाव है। थोड़ा सुकून चाहिए।”
दुकान के पीछे खड़ा व्यक्ति—लगभग पचास साल का, साधारण कपड़े, माथे पर पसीने की हल्की रेखा—आदित्य को देख मुस्कुराया।उसकी मुस्कान में अपनापन था, पर आँखों में कोई अनकहा बोझ।
“तनाव?”वह बोला,“साहब, आपका काम तो फिर भी आसान है।”
आदित्य चौंका।“आसान?”“मैं वकील हूँ। रोज़ लोगों की लड़ाइयाँ, झूठ-सच, हार-जीत… आपको लगता है ये आसान है?”
दुकानदार ने आइसक्रीम निकालते हुए कहा—“साहब, आपकी लड़ाई दिमाग की है। मेरी लड़ाई शरीर और मन—दोनों से है।”
आदित्य ने उत्सुकता से पूछा—“कैसे?”
दुकानदार ने गहरी साँस ली।“मैं डायबिटिक हूँ।”
आदित्य ने सहानुभूति से सिर हिलाया।“तो?”
वह हल्की-सी कड़वी हँसी हँसा—“तो साहब, मुझे इस आइसक्रीम की दुकान पर लगातार बारह दिन खड़ा रहना है।”
“बारह दिन?”आदित्य की भौंहें सिकुड़ीं।
उसकी आवाज़ में कोई शिकायत नहीं थी, बस एक सच्चाई थी।
“साहब,”वह बोला,“आप केस हारते हैं तो अपील होती है।मेरे लिए हर दिन एक नई परीक्षा है—स्वाद सामने है, पर मना है।खुशी चारों तरफ है, पर मेरे लिए नहीं।”
आदित्य चुप हो गया।उसने महसूस किया कि कोर्टरूम की बहसें, ऊँची आवाज़ें, फाइलों का बोझ—सब अचानक हल्के लगने लगे।
आदित्य ने आइसक्रीम ली, कुछ क्षण उसे देखा, फिर दुकानदार से कहा—“भैया, आज ये आइसक्रीम सिर्फ मेरी नहीं है।”
उसने एक चम्मच लिया, एक कौर खाया और फिर आइसक्रीम आगे बढ़ा दी।“नहीं साहब, मैं नहीं खा सकता।”
आदित्य मुस्कुराया—“चिंता मत कीजिए, ये अदालत का आदेश नहीं…बस इंसानियत की पेशकश है।”
दुकानदार की आँखों में नमी आ गई।
Sunday, January 4, 2026
धार्मिक भेड़िया
कोरोना के दुसरे दौर का प्रकोप कम हो चला था। दिल्ली सरकार ने थोड़ी और ढील दे दी थी। डिस्ट्रिक्ट कोर्ट थोड़े थोड़े करके खोले जा रहे थे। मित्तल साहब का एक मैटर तीस हजारी कोर्ट में लगा हुआ था।
जज साहब छुट्टी पे थे। उनके कोर्ट मास्टर को कोरोना हो गया था। लिहाजा कोर्ट से तारीख लेकर टी कैंटीन में चले गए। सोचा चाय के साथ साथ मित्रों से भी मुलाकात हो जाएगी।
वहाँ पे उनके मित्र चावला साहब भी मिल गए। दोनों मित्र चाय की चुस्की लेने लगे। बातों बातों में बातों बातों का सिलसिला शुरु हो गया।
चावला साहब ने कहा, अब तो ऐसा महसूस हो रहा है, जैसे कि वो जीभ हैं और चारों तरफ दातों से घिरे हुए हैं। बड़ा संभल के रहना पड़ रहा है। थोड़ा सा बेफिक्र हुए कि नहीं कि दांतों से कुचल दिए जाओगे।
मित्तल साहब को बड़ा आश्चर्य हुआ। इतने मजबूत और दृढ निश्चयी व्यक्ति के मुख से ऐसी निराशाजनक बातें। उम्मीद के बिल्कुल प्रतिकूल। कम से कम चावला साहब के मुख से ऐसी बातों की उम्मीद तो बिल्कुल नहीं थी।
मित्तल साहब ने थोड़ा आश्चर्य चकित होकर पूछा ; क्या हो गया चावला साहब, ऐसी नाउम्मीदी की बातें क्यों ? बुरे वक्त का दौर चल रहा है। बुरे वक्त की एक अच्छी बात ये है कि इसको भी एक दिन गुजर जाना होता है। बस थोड़े से वक्त की बात है।
चावला साहब ने बताया : ये जो डॉक्टर की कौम होती है ना, जिसे हम भगवान का दूसरा रूप कहते हैं, दरअसल इन्सान की शक्ल में भेड़िये होते हैं। उन्होंने आगे कहा, उन्हें कोरोना हो गया था। उनका ओक्सिजन लेवल 70 चला गया था। फेफड़े की भी कंडीशन 16/25 थी जो की काफी खराब थी।
हॉस्पिटल को रोगी से कोई मतलब नहीं था। उन्हें तो लेवल नोट गिनने से मतलब था। रोज के रोज लोग मरते चले जा रहे थे। पर डॉक्टर केवल ऑनलाइन हीं सलाह दे रहे थे। किसी को भी खांसी हो तो काफी मोटे मोटे पैसे वसूले जा रहे थे।आखिर किस मुंह से हम इन्हें ईश्वर का दूसरा रूप कहें ?
मित्तल साहब ने कहा : देखिए चावला साहब, यदि आपका अनुभव किसी एक हॉस्पिटल या किसी एक डॉक्टर के साथ खराब है, इसका ये तो मतलब नहीं कि सारी की सारी डॉक्टर की कौम हीं खराब है।
अभी देखिए, हमारे सामने डॉ. अग्रवाल का उदाहरण है। जब तक जिन्दा रहे, तब तक लोगो की सेवा करते रहे, यहाँ तक मरते मरते भी लोगो को कोरोना से चेताते हीं रहे।
चावला साहब ने आगे कहा : भाई होस्पिटल तो हास्पिटल, हमारे दफ्तर में भी सब भेड़िये हीं बैठे हैं। किसी को ये फ़िक्र नहीं कि चावला साहब मौत के मुंह से लड़कर आये हैं, थोड़ी सहायता कर लें।
चाहे जूनियर हो, स्टेनो ग्राफर हो, क्लर्क हो या क्लाइंट हो, मुंह पर तो सब मीठी मीठी बातें करते हैं, पर सबको अपनी अपनी पड़ी हैं। सबको अपने मतलब से मतलब है। कभी कभी तो मुझे मौत से भय लगने लगता है।
मित्तल साहब बोले : भाई हम वकीलों की जमात भी कौन सी अच्छी है ? हमारे सामने जो भी क्लाइंट आता है, वो अपनी परेशानी लेकर हीं आता है। उसके लिए परेशानी का मौका हमारे लिए मौका है। हम कौन सा संत जैसा व्यवहार करते हैं ?
चावला साहब ने बीच में टोकते हुए कहा ; लेकिन हम तो मौत के बाद भी सौदा तो नहीं करते। हमारे केस में यदि कोई क्लाइंट लूट भी जाता है, फिर भी वो जिन्दा तो रहता है। कम से कम वो फिर से कमा तो सकता है।
मित्तल साहब ने कहा : भाई यदि किसी क्लाइंट का खून चूस चूस के छोड़ दिया भी तो क्या बचा ? इससे तो अच्छा यही कि जिन्दा लाश न बनकर कोई मर हीं जाये। और रोज रोज मुर्दा लाशें देखकर डॉक्टर तो ऐसे हीं निर्दयी हो जाते हैं। आप हीं बताइये अगर डॉक्टर मरीज से प्यार करने लगे तो शरीर की चिर फाड़ कैसे कर पाएंगे ?
शमशान घाट का कर्मचारी लाशों को जलाकर हीं अपनी जीविका चलाता है। किसी की मृत्यु उसके लिए मौका प्रदान करती है पैसे कमाने का। एक शेर गाय के दोस्ती तो नहीं कर सकता। गाय और घास में कोई मित्रता का तो समंध नहीं हो सकता ? एक की मृत्यु दिसरे के लिए जीवन है। हमें इस तथ्य को स्वीकार कर लेना चाहिए।
चावला साहब ने आगे कहा ; ठीक है डाक्टरों की बात छोड़िये, कोर्ट को हीं देख लीजिए, एक स्टाफ को कोरोना हो जाये तो पुरे कोर्ट की छुट्टी, पर यदि वकील साहब को कोरोना हुआ है तो एक सप्ताह की डेट ऐसे देते हैं जैसे कि एहसान कर रहे हों।
और तो और दफ्तर से सारे कर्मचारी को अपनी पड़ी है, चावला साहब कैसे हैं, इसकी चिंता किसी को नहीं ? अपने भी पराये हो गए। जिन्हें मैं अपना समझता था, सबने दुरी बना ली, जैसे कि मैं कोई अछूत हूँ। कभी कभी तो मुझे जीवन से भय लगने लगता है।
मित्तल साहब समझ गए, कोरोना के समय अपने व्यक्तिगत बुरे अनुभवों के कारण चावला साहब काफी हताश हो गए हैं।
उन्होंने चावला साहब को समझाते हुए कहा : देखिए चावला साहब जीवन तो संघर्ष का हीं नाम है। जो चले गए वो चले गए। हम तो जंगल में हीं जी रहे हैं। जीवन जंगल के नियमों के अनुसार हीं चलता है। जो समर्थवान है वो जीता है।
चावला साहब ने कहा : लेकिन नैतिकता भी तो किसी चिड़िया का नाम है।
मित्तल साहब ने कहा : भाई साहब नैतिकता तो हमें तभी दिखाई पड़ती है जब हम विपत्ति में पड़ते हैं। जब औरों पे दुःख आता है तो हम कौन सा नैतिकता का पालन कर लेते हैं ? कौन सा व्यक्ति है जो ज्यादा से ज्यादा पैसा नहीं कमाना चाहता है ? पैसा कमाने में हम कौन सा नैतिक रह पाते हैं।
जब ट्रैफिक सिग्नल पर भरी गर्मी में कोई लंगड़ा आकर पैसा मांगता है, तो हम कौन सा पैसा दे देते हैं। हमारे दफ्तर में यदि कोई स्टाफ बीमार पड़ जाता है तो हमें कौन सी दया आती है उनपर ? क्या हम उनका पैसा नहीं काट लेते ? कम से कम इस तरह की हरकत डॉक्टर तो नहीं करते होंगे।
चावला साहब : पर कुछ डॉक्टर तो किडनी भी निकला लेते हैं ?
मित्तल साहब : हाँ पर कुछ हीं। पकडे जाने पर सजा भी तो होती है। जो क्राइम करते हैं सजा तो भुगतते हीं हैं, चाहे डॉक्टर हो, वकील हो या कि दफ्तर का कोई कर्मचारी।
यदि ये दुनिया जंगल है तो जीने के लिए भेड़िया बनना हीं पड़ता है। ये जो कोर्ट, स्टाफ, डॉक्टर, दफ्तर के लोग आपको भेड़िये दिखाई पड़ है, केवल वो हीं नहीं, अपितु आप और मैं भी भेड़िये हैं। ये भेड़िया पन जीने के लिए जरुरी है। हाँ अब ये स्वयं पर निर्भर करता है कि आप एक अच्छा भेड़िया बनकर रहते है, या कि सिर्फ भेड़िया।
चावला साहब के होठों पर व्ययन्गात्मक मुस्कान खेलने लगी।
उन्होंने उसी लहजे में मित्तल साहब से कहा : अच्छा मित्तल साहब कोई धर्मिक भेड़िया को जानते हैं तो जरा बताइए ?
मित्तल साहब सोचने की मुद्रा में आ गए। उत्तर नहीं मिल रहा था।
चावला साहब ने कहा : अच्छा भाई चाय तो ख़त्म हो गई, अब चला जाया। और हाँ उत्तर मिले तो जरुर बताइएगा, कोई धार्मिक भेड़िया, किसी एक दफ्तर का।
Saturday, January 3, 2026
गोलगप्पे
रविवार का दिन था।पत्नी जी ने फरमान जारी किया –“आज गोलगप्पे खाने की तीव्र इच्छा हो रही है।”
अब रविवार हो, पत्नी जी की इच्छा हो और गोलगप्पे हों —यह त्रिवेणी संगम टाला नहीं जाता।मैंने भी बिना बहस किए कह दिया,“ठीक है, शाम को 6 बजे चलते हैं।”
शाम के ठीक 6 बजे हम पहुँचे उसी गोलगप्पे वाले ठेले पर,जो हमारी कॉलोनी के बाहर रोड पर सालों से तपस्या कर रहा है।
वहाँ का नज़ारा ऐसा था मानो गोलगप्पे नहीं,अमृत बाँटा जा रहा हो।
लोग हाथ में प्लेट लेकर ऐसे लाइन में लगे थे,जैसे आधार कार्ड बनवाने आए हों। कोई आगे झाँक रहा था, कोई पीछे से दबाव बना रहा था, और पत्नी जी बीच-बीच में कह रही थीं –“देखो ज़रा, पानी कम मत डालना!”
करीब 15 मिनट बाद हमारा नंबर आया। लेकिन उन 15 मिनटों में मेरे अंदर का दार्शनिक जाग चुका था।
मैं सोचने लगा –बेचारा क्या कमाता होगा? बेचारा धूप में खड़ा रहता है। बेचारा घर कैसे चलाता होगा? बेचारा बच्चों की फीस कैसे भरता होगा? मतलब पूरे 15 मिनट मैं उसे गरीबी रेखा के नीचे से ऊपर खींच रहा था।
जब हमारी बारी आई तो मैंने बड़े अपनत्व से पूछ लिया – “भाई, दिन भर में क्या कमा लेते हो?”
मन में यही उम्मीद थी कि 300–400 रुपये बोल देगा और मैं अंदर से संतोष की सांस लूँगा कि चलो, हम ही ज्यादा दुखी नहीं हैं।
गोलगप्पे वाला मुस्कराया और बोला –“साहब जी, भगवान की कृपा से माल पूरा लग जाता है।”
मैंने कहा –“अरे भाई, ऐसे आध्यात्मिक उत्तर मत दो, थोड़ा गणित में समझाओ।”
वो बोला – “साहब, सुबह 7 बजे घर से 3000 खाली गोलगप्पे की पूरियाँ लेकर निकलते हैं और शाम 7 बजे से पहले
सब भगवान की कृपा से बिक जाती हैं।”
अब यहाँ से मेरे दिमाग का कैलकुलेटर ऑन हो गया।
10 रुपये में 6 गोलगप्पे…3000 गोलगप्पे मतलब…करीब 5000 रुपये की बिक्री!
अब मान लो 50% खर्च निकाल दिया, फिर भी भाई साहब दिन के 2500 रुपये कमा रहे हैं!
यानी महीने के…75,000 रुपये!!!
यहाँ मेरा दिमाग गोलगप्पे की तरह फट गया।
अब वो मुझे बेचारा नहीं लग रहा था…बेचारा तो मैं हो गया था।
7–8 क्लास पढ़ा इंसान इज्जत से 75,000 रुपये कमा रहा है। 45 लाख का घर ले चुका है। 4 दुकानें खरीद कर किराये पर दे रखी हैं, जिनसे महीने के 30,000 रुपये अलग से आते हैं।
और इधर हम…सालों पढ़ाई की, डिग्रियाँ लीं, इंटरव्यू दिए, फिर 50–55 हजार की नौकरी।
किराये के मकान में रहते हैं, और रोज़ सुबह टाई बाँधकर झूठी शान में निकल जाते हैं, जैसे देश की अर्थव्यवस्था हमारे कंधे पर टिकी हो।
अब जब भी गोलगप्पे खाता हूँ, तो पानी में थोड़ा नमक नहीं, थोड़ा आत्मग्लानि ज़्यादा लगती है।
या अली , ट्रेन चली
पता नहीं आपने कभी भोगी कि नहीं भोगी
रेल की जनरल बोगी
जहाँ आदमी नहीं,
आदमी की सहनशक्ति चढ़ती है
और उतरती है इज्ज़त, साँस और आत्मा
एक ही स्टेशन पर।
एक बार हम भी कर रहे थे यात्रा
सोच रहे थे –
“चलो, आम आदमी हैं
आम आदमी की तरह ही चलेंगे”
प्लेटफार्म पर देखकर सवारियों की मात्रा
हमारे पसीने छूटने लगे
ऐसे नहीं कि गर्मी थी
भीड़ देखकर आत्मा को ही हीट स्ट्रोक आ गया
हम झोला उठाकर घर की ओर फूटने लगे
कि तभी एक कुली आया
मुस्कुरा कर बोला –
“अन्दर जाओगे ?”
हमने कहा – “तुम पहुँचाओगे ?”
वो बोला –
“बड़े-बड़े पार्सल पहुँचाए हैं
आपको भी पहुँचा दूँगा
मगर रुपये पूरे पचास लूँगा।”
हमने कहा – “पचास रुपैया ?”
वो बोला – “हाँ भैया
दो रुपये आपके
बाकी सामान के”
हमने कहा – “सामान नहीं है, अकेले हम हैं”
वो बोला –
“बाबूजी,
आप किस सामान से कम हैं !
भीड़ देख रहे हैं,
कंधे पर उठाना पड़ेगा,
धक्का देकर अन्दर पहुँचाना पड़ेगा
वैसे तो ये हमारे लिए बाएँ हाथ का खेल है
मगर आपके लिए
दाँया हाथ, बायाँ हाथ,
घुटना, कमर
सब लगाना पड़ेगा
मंजूर हो तो बताओ”
हमने कहा – “देखा जायेगा,
तुम उठाओ”
कुली ने बजरंगबली का नारा लगाया
और पूरी ताकत लगाकर
जैसे ही हमें उठाया
कि खुद बैठ गया
दूसरी बार कोशिश की
तो लेट ही गया
तीसरी बार देखा ही नहीं
सीधे भगवान को याद किया
बोला –
“बाबूजी पचास रुपये तो बहुत कम हैं
हमें क्या मालूम था कि आप आदमी नहीं,
एटम बम हैं
आपको तो भगवान ही उठा सकता है
हम क्या खाकर उठाएंगे
आपको उठाते-उठाते
खुद ही दुनिया से उठ जायेंगे !”
तभी गाड़ी ने सीटी दे दी
हम झोला उठाकर भागे
बड़ी मुश्किल से
डिब्बे के अन्दर घुस पाए
डिब्बे के अन्दर का दृश्य घमासान था
पूरा डिब्बा अपने आप में
हल्दी घाटी का मैदान था
लोग लेटे थे,
बैठे थे,
खड़े थे
जो कहीं फिट नहीं हुए
वो बर्थ के नीचे ऐसे पड़े थे
जैसे रेलवे का एक्स्ट्रा स्टॉक हों
हमने एक गंजे यात्री से कहा –
“भाई साहब
थोड़ी सी जगह हमारे लिए भी बनाइये”
वो सिर झुका के बोला –
“आइये हमारी खोपड़ी पे ही बैठ जाइये
आप ही के लिए तो साफ़ की है
केवल दस रुपये देना
लेकिन फिसल जाओ
तो हमसे मत कहना”
तभी एक भरा हुआ बोरा
खिड़की के रास्ते चढ़ा
आगे बढ़ा
और गंजे के सिर पर गिर पड़ा
गंजा चिल्लाया –
“किसका बोरा है ?”
बोरा फौरन खड़ा हो गया
और उसमें से एक लड़का निकल कर बोला –
“बोरा नहीं है
बोरे के भीतर बारह साल का छोरा है
अन्दर आने का यही एक तरीका बचा है
ये हमने अपने माँ-बाप से सीखा है
आप तो एक बोरे में ही घबरा रहे हैं
ज़रा ठहर जाओ
अभी गद्दे में लिपट कर
हमारे बाप जी अन्दर आ रहे हैं
उनको आप कैसे समझाओगे
हम तो खड़े भी हैं
वो तो आपकी गोद में ही लेट जाएँगे”
एक अखंड सोऊ
चादर ओढ़ कर सो रहा था
एकदम कुम्भकरण का बाप हो रहा था
हमने जैसे ही उसे हिलाया
उसकी बगल वाला चिल्लाया –
“ख़बरदार हाथ मत लगाना
वरना पछताओगे
हत्या के जुर्म में अन्दर हो जाओगे”
हमने पूछा –
“भाई साहब क्या लफड़ा है ?”
वो बोला –
“बेचारा आठ घंटे से बिना हिले-डुले पड़ा है
क्या पता ज़िंदा है या मरा है
आपके हाथ लगते ही
अगर ऊपर पहुँच गया
तो इस भीड़ में ज़मानत कराने
क्या तुम्हारा बाप आयेगा ?”
एक नौजवान खिड़की से अन्दर आने लगा
तो पूरा डिब्बा मिलकर
उसे बाहर धकियाने लगा
नौजवान बोला –
“भाइयों… भाइयों…
सिर्फ खड़े रहने की जगह चाहिए”
अन्दर से आवाज़ आई –
“क्या ?
खड़े रहने की जगह चाहिए ?
तो प्लेटफार्म पर खड़े हो जाओ
ज़िंदगी भर खड़े रहो
कोई हटाये तो कह देना
जिसे देखो घुसा चला आ रहा है
रेल का डिब्बा साला
जेल हुआ जा रहा है !”
इतना सुनते ही
एक अपराधी जोर से चिल्लाया –
“रेल को जेल मत कहो
मेरी आत्मा रोती है
यार जेल के अन्दर
कम से कम
चलने-फिरने की जगह तो होती है !”
प्यारे!
आम आदमी का हमसफ़र बन के देखो
एक बार जनरल क्लास में
सफ़र करके देखो
फिर समझ में आएगा
कि भारत में
आत्मनिर्भर नहीं
आत्म-सहनशील कैसे बनते हैं
चिल्ड्रन्स डे
एक बार की बात है, एक छोटे से शहर में एक प्यारा सा लड़का रहता था, जिसका नाम था चिंटू। चिंटू बहुत जिज्ञासु था – मतलब हर चीज के पीछे पड़ जाता था, जैसे कोई रिपोर्टर।
एक दिन सुबह-सुबह चिंटू बिस्तर से उठा और देखा कि स्कूल जाने का टाइम हो गया, लेकिन मम्मी-पापा चाय पी रहे हैं, कोई जल्दी नहीं। चिंटू दौड़ता हुआ पापा के पास गया और बोला,
“पापा! आज स्कूल में छुट्टी क्यों है? मैं तो सोचा था मैडम जी आज फिर मेरी कॉपी फाड़कर मुझे स्टैंड ऑन द बेंच करवाएंगी!”
पापा ने चाय का घूंट लिया और मुस्कुराते हुए बोले, “बेटा, आज 14 नवंबर है।”
चिंटू ने आंखें गोल कीं, “तो? क्या आज कोई नया प्लैनेट डिस्कवर हुआ है?”
“नहीं रे चिंटू, आज चिल्ड्रन्स डे है!”
“वाह! चिल्ड्रन्स डे!” चिंटू खुशी से उछल पड़ा। “फिर तो टीचर्स क्यों इतना मुस्कुरा रही थीं कल? जैसे लॉटरी लग गई हो!”
पापा हंस पड़े, “क्योंकि आज बच्चे खुश रहते हैं, और बच्चे खुश तो टीचर्स खुश। घर में भी यही फॉर्मूला है – तुम खुश तो मम्मी खुश, मम्मी खुश तो पापा खुश।”
“और बच्चे खुश क्यों होते हैं?” चिंटू ने तुरंत अगला सवाल दागा।
“अरे बाबू, क्योंकि स्कूल बंद है! कोई होमवर्क नहीं, कोई पीरियड नहीं, कोई ‘स्टैंड अप ऑन द बेंच’ नहीं। बस फुल मस्ती!”
चिंटू सोच में पड़ गया। “ये चिल्ड्रन्स डे आखिर होता क्या है?”
पापा गंभीर होकर बोले, “बेटा, आज चाचा नेहरू का बर्थडे है।”
“चाचा नेहरू?” चिंटू हैरान। “मेरे तो सिर्फ सोनू चाचा हैं, जो आते ही मेरे गाल खींचते हैं। ये चाचा नेहरू कौन हैं? आपने कभी मिलवाया ही नहीं! फोटो भी नहीं दिखाई!”
पापा ने बताया, “वो इंडिया के पहले प्राइम मिनिस्टर थे। बहुत बड़े लीडर। बच्चों से बहुत प्यार करते थे। इसलिए उनका बर्थडे चिल्ड्रन्स डे के रूप में मनाते हैं।”
“प्राइम मिनिस्टर क्या होता है?” चिंटू की जिज्ञासा बढ़ती जा रही थी।
“वो जो पूरे देश को चलाता है। रोड बनवाता है, ट्रेन चलवाता है, सबको ऑर्डर देता है।”
चिंटू ने पापा को ऊपर से नीचे तक देखा और बोला, “तो फिर आप देश क्यों नहीं चलाते पापा? आप तो सिर्फ ऑफिस जाते हो और शाम को थके-हारे आते हो!”
पापा खांसते हुए बोले, “बेटा, प्राइम मिनिस्टर बनने के लिए बहुत ताकत चाहिए। बहुत बड़ी ताकत!”
“कितनी बड़ी? हल्क से भी ज्यादा? थॉर वाली?”
“नहीं बेटा… स्पाइडरमैन से थोड़ी कम, आयरन मैन से थोड़ी ज्यादा, और हल्क से बहुत कम।”
“तो आपके पास ताकत नहीं है?” चिंटू ने मासूमियत से पूछा।
“है रे चिंटू! मेरे पास भी ताकत है। मैं घर चलाता हूँ। बिजली का बिल भरता हूँ, राशन लाता हूँ, तेरी फीस भरता हूँ। ये भी कोई कम ताकत है भाई?”
“लेकिन प्राइम मिनिस्टर वाली ताकत क्यों नहीं?”
पापा ने गहरी सांस ली, “बेटा, तुम बड़े होकर समझ जाओगे। अभी तुम्हारी उम्र नासमझी की है।”
“पर मैं अभी क्यों नहीं समझ सकता?”
“क्योंकि अभी तुम्हारी उम्र समझने की नहीं, समोसे और आइसक्रीम खाने की है!”
“नहीं पापा, मुझे अभी समझना है!”
पापा ने चाबी निकाली और लहराते हुए बोले, “ठीक है, पहले ये कार चलाकर दिखाओ!”
चिंटू पीछे हट गया, “अरे नहीं! मैं तो अभी छोटा हूँ। पैर भी ब्रेक तक नहीं पहुँचते!”
पापा मुस्कुराए, “बस यही बात है! छोटे हो इसलिए कार नहीं चला सकते। इसी तरह छोटे हो इसलिए देश चलाने की बात भी अभी नहीं समझ सकते। जब बड़े हो जाओगे, कार चला लोगे, वोट डालोगे, तब समझ जाओगे।”
चिंटू थोड़ा शांत हुआ, फिर अचानक बोला, “अच्छा… तो चाचा नेहरू कहाँ हैं अभी?”
“क्यों? क्या प्लान है?”
“अरे पापा, शाम हो गई ना! बर्थडे सेलिब्रेट करना है। केक काटना है, गिफ्ट देना है। मैं अपना पुराना रिमोट वाला हेलिकॉप्टर दे दूँगा उन्हें!”
पापा का चेहरा गंभीर हो गया। “बेटा… चाचा नेहरू तो अब इस दुनिया में नहीं हैं। मतलब… स्वर्ग में पार्टी कर रहे होंगे।”
चिंटू की आंखें बड़ी हो गईं, “तो फिर उनका बर्थडे क्यों मना रहे हैं? स्वर्ग में केक पहुँचेगा कैसे? ड्रोन से?”
पापा हंस पड़े, “अरे ये सवाल तुम पूछ रहे हो या मैं? अच्छा, इंटेलिजेंट कौन है – तुम या पापा?”
चिंटू सर खुजाने लगा, “पापा… मैं तो…”
“चलो, अब तुम ही बताओ – मरने के बाद भी बर्थडे क्यों मनाते हैं?”
चिंटू ने सोचा-सोचा और फिर चहक उठा, “पापा, शायद… शायद इसलिए कि स्कूल बंद रहे!”
पापा जोर से हंसे, “हा हा हा! बिलकुल सही जवाब! मुझे भी ठीक-ठीक नहीं पता, लेकिन स्कूल बंद रहता है ना, बस यही काफी है!”
फिर पापा ने चिंटू को गले लगाया और बोले, “चलो अब छुट्टी का फायदा उठाओ – चिप्स खाओ, कार्टून देखो, गेम खेलो। देश की चिंता कल से शुरू करना। आज तो बस चाचा नेहरू को दूर से हैप्पी बर्थडे बोल दो!”
चिंटू ने छत की तरफ देखकर जोर से चिल्लाया, “हैप्पी बर्थडे चाचा नेहरू! थैंक यू स्कूल बंद करने के लिए!”
और इस तरह चिंटू का चिल्ड्रन्स डे बड़े मजे से बीता। आखिर बच्चों का दिन था ना – सवाल पूछने का, मस्ती करने का, और सबसे जरूरी… स्कूल न जाने का!
Friday, January 2, 2026
प्रतिक्रिया
रेस्तरां में हल्की पीली रोशनी फैली हुई थी। धीमा संगीत बज रहा था और चम्मच-काँटों की आवाज़ों के बीच बातचीत का एक शोर था। उसी माहौल में एक युवक ने हिम्मत जुटाई। उसने सामने वाली मेज़ पर अकेली बैठी एक लड़की की ओर देखा, मुस्कराया और शालीनता से पूछा—
“क्या मैं आपके साथ बैठ सकता हूँ?”
अचानक लड़की की आवाज़ पूरे रेस्तरां में गूँज उठी।
“क्या?? क्या तुम मेरे साथ एक रात बिताना चाहोगे?? क्या तुम पागल हो?!”
एक पल के लिए जैसे समय थम गया। आसपास बैठे लोग खाना छोड़कर उनकी ओर देखने लगे। कुछ की भौंहें चढ़ गईं, कुछ के चेहरे पर हैरानी थी, और कुछ में नैतिक गुस्सा। युवक का चेहरा लाल पड़ गया। उसे समझ ही नहीं आया कि उसने ऐसा क्या कह दिया। बिना कुछ बोले, सिर झुकाए वह उठ खड़ा हुआ और शर्मिंदगी के साथ दूसरी खाली मेज़ पर जाकर बैठ गया।
कुछ मिनट बीते। माहौल फिर सामान्य होने लगा। तभी लड़की उठी, अपना बैग संभाला और हँसते हुए उस युवक के पास आई। अब युवक ने चैन की साँस ली। वह पास आकर बोली,“मैं मनोविज्ञान का छात्रा हूँ। दरअसल, मैं आपका व्यवहार देख रही थी। यह जानना चाहती थी कि अचानक सार्वजनिक अपमान पर इंसान कैसे प्रतिक्रिया करता है।उस लड़की ने हल्की मुस्कान के साथ युवक को देखा।
युवक ने जानबूझकर अपनी आवाज़ ऊँची कर दी और बोला—“क्या?? सिर्फ एक रात के लिए 3,000 डॉलर?! यह तो हद से ज़्यादा है!!”
अब की बार पूरा रेस्तरां चौंक गया। सभी की निगाहें लड़की पर टिक गईं। कुछ के चेहरे पर अविश्वास था, कुछ में घृणा, और कुछ में फुसफुसाहटें शुरू हो गईं। वही लड़की, जो कुछ देर पहले नैतिकता की ऊँची आवाज़ थी, अब सबकी नज़रों में कटघरे में खड़ी थी।
युवक खामोशी से उठा, उसके पास गया और धीरे से उसके कान में फुसफुसाया—“मैं भी एक वकील हूँ… और मुझे अच्छे से पता है कि हालात को अपने पक्ष में कैसे मोड़ा जाता है।”
यह कहकर वह मुस्कराया और बाहर निकल गया, पीछे छोड़ गया एक सवाल—शब्द ज़्यादा ताक़तवर होते हैं या संदर्भ?
Thursday, January 1, 2026
आस्था की कसौटी
पात्रों का परिचय (Patron ke Parichay – संक्षिप्त जीवन कहानियाँ)
- आर्यन — 38 वर्षीय स्वतंत्र पत्रकार और कट्टर नास्तिक। दिल्ली में पला-बढ़ा। बचपन में पिता की अचानक मृत्यु और माँ की लंबी बीमारी ने उसे ईश्वर के प्रति विद्रोही बना दिया। एक बार उसने एक लेख लिखा था: "ईश्वर यदि है, तो वह या तो क्रूर है या अनुपस्थित।" इसी लेख के कारण उसे कई बार धमकियाँ मिलीं, लेकिन वह कभी नहीं झुका।
- डॉ. कबीर वर्मा — 52 वर्षीय भौतिकशास्त्री, आईआईटी प्रोफेसर। वैज्ञानिक दृष्टिकोण से जीता है। उसकी पत्नी कैंसर से गुज़री थी; आखिरी दिनों में वह अस्पताल के बिस्तर पर प्रार्थना करती रही, पर कबीर ने सिर्फ़ दवाइयों पर भरोसा किया। उसकी आँखों में आज भी वह दर्द है जो विज्ञान भी नहीं मिटा सका।
- शेखर — 45 वर्षीय संस्कृत विद्वान और छोटे से मंदिर का पुजारी। उत्तराखंड के एक गाँव से। बचपन में बाढ़ ने उसका पूरा परिवार छीन लिया था। तब से वह मानता है कि "सब कुछ ब्रह्म का खेल है"। जीवन में दुख आए, तो कर्म कहता है—और वह चुपचाप स्वीकार कर लेता है।
- डेविड — 41 वर्षीय ईसाई मिशनरी, अफ्रीका में काम कर चुका। बचपन में अनाथालय में पला। एक बार जब वह बीमार पड़ा था, तो कोई डॉक्टर नहीं आया—बस एक पादरी ने प्रार्थना की और वह ठीक हो गया। उसी दिन से उसका विश्वास अटूट है: "ईश्वर प्रेम है, और प्रेम कभी व्यर्थ नहीं जाता।"
- याकोव — 57 वर्षीय रब्बी (यहूदी धर्मगुरु)। पोलैंड से इजरायल आया। होलोकॉस्ट में उसके दादा-परदादा मारे गए। फिर भी वह कहता है: "ईश्वर ने हमसे वाचा की है। हम दुख सहेंगे, पर वह हमें छोड़ेगा नहीं।" उसकी दाढ़ी में सफेद बालों के साथ-साथ दर्द की गहरी लकीरें भी हैं।
- तेनज़िन — 49 वर्षीय तिब्बती बौद्ध भिक्षु। दलाई लामा के साथ चीन से भागा। तिब्बत में उसके मठ को तोड़ा गया, कई साथी मारे गए। फिर भी वह मुस्कुराता है और कहता है: "दुख इसलिए है क्योंकि हम चीजों को स्थायी मानते हैं।"
- मीरा — 35 वर्षीय लेखिका और अज्ञेयवादी। मुंबई में रहती थी। प्रेम में कई बार धोखा खाया, परिवार ने छोड़ा। वह कहती है: "मैं न ईश्वर को मानती हूँ, न नकारती हूँ। मैं बस देखती हूँ। और जो दिखता है, वही सच है—बाकी सब कहानियाँ।"
समुद्र का कटघरा"
समुद्र की अथाह गहराई में एक छोटा-सा निर्जन द्वीप था—हरी-भरी झाड़ियाँ, काले पत्थर, और एक सूखता हुआ स्रोत। जहाज़ डूबने के बाद केवल ये सात बचे थे। पहले दिन तो बस आघात था। दूसरे दिन से भूख, प्यास और सवाल शुरू हुए।
पहला दिन: ईश्वर का अभियोग
ईश्वर का अभियोग
सूरज अभी उगा ही था कि आर्यन ने चुप्पी तोड़ी—नारे की तरह नहीं, आरोप की तरह।
“यदि ईश्वर है,” उसने कहा, “तो बताओ—यह जहाज़ क्यों डूबा?
हम क्यों यहाँ सड़ रहे हैं?
क्या यही उसकी महान योजना थी—कुछ को बचाना, कुछ को आँकड़ों में बदल देना?”
डेविड ने रेत पर घुटने टेक दिए, हाथ जोड़कर बोला,
“ईश्वर ने हमें स्वतंत्र इच्छा दी है। तूफान शायद किसी मानवीय भूल का परिणाम था—या प्रकृति का नियम।”
कबीर ने सूखे होंठों पर जीभ फेरते हुए कहा,
“तो फिर ईश्वर ने प्रकृति को इतना अंधा क्यों बनाया?
जो बच्चों और अपराधियों में फर्क न कर सके?”
शेखर ने आँखें मूँदकर उत्तर दिया,
“प्रकृति ब्रह्म है। ब्रह्म न कर्ता है, न भोक्ता।
सब उसकी लीला है—तत् त्वम् असि।”
आर्यन हँसा—कड़वाहट भरी हँसी।
“लीला?
नीत्शे ने ठीक कहा था—‘ईश्वर मर चुका है, और हमने उसे मारा है।’
और यह द्वीप उसकी कब्र है।”
याकोव ने पत्थर उठाते हुए कहा,
“हमने वाचा तोड़ी। नियम तोड़े।
दंड मिलना स्वाभाविक है।”
तेनज़िन शांत था।
“ईश्वर का प्रश्न ही भ्रम है।
दुख है—और दुख का कारण है।”
मीरा सबको देख रही थी—जैसे जूरी नहीं, बल्कि मानवता की गवाही सुन रही हो।
“शायद हम सब अधूरे हैं।
और अधूरे लोग ही पूर्ण उत्तर माँगते हैं।”
दूसरा दिन: पीड़ा का त्रिकोण
धूप जलाने लगी। होंठ फट गए। पानी की बाल्टी में अब मुश्किल से दो घूँट बचे थे।
कबीर ने कहा, "यदि ईश्वर सर्वशक्तिमान और दयालु है, तो यह पीड़ा क्यों?"
डेविड ने जवाब दिया, "पीड़ा आत्मा को शुद्ध करती है।"
मीरा ने तीखा सवाल किया, "तो क्या अफ्रीका में भूख से मरता 5 साल का बच्चा भी आत्मा की जिम्नास्टिक कर रहा था?"
डेविड चुप हो गया।
आर्यन ने एपिक्यूरस का प्रसिद्ध त्रिकोण दोहराया: "ईश्वर बुराई रोकना चाहता है, पर रोक नहीं पाता? → कमज़ोर। रुकना चाहता है, पर रोकना नहीं चाहता? → दुष्ट। दोनों चाहता है? → बुराई कहाँ से? न चाहता है, न रोक पाता है? → फिर उसे ईश्वर क्यों कहें?"
तेनज़िन ने धीरे से कहा, "दुख है, दुख का कारण है तृष्णा, तृष्णा का निरोध है निर्वाण।"
शेखर बोले, "कर्म का चक्र। पिछले जन्म का फल।"
याकोव ने विरोध किया, "नहीं, यह वाचा का उल्लंघन है। ईश्वर न्याय करता है।"
तीसरा दिन: प्रार्थना का परीक्षण
पानी लगभग खत्म था।
डेविड ने सबको इकट्ठा किया।
“आज हम प्रार्थना करेंगे,” उसने कहा, “एक साथ।
यदि ईश्वर सुनता है—तो आज सुने।”
सबने अलग-अलग ढंग से आँखें बंद कीं।
किसी ने मंत्र, किसी ने स्तुति, किसी ने मौन।
घंटों बाद—कुछ नहीं।
न बारिश।
न बादल।
न कोई संकेत।
कबीर ने चुप्पी तोड़ी,
“यदि यह प्रयोग होता, तो हम इसे असफल कहते।”
आर्यन ने जोड़ा,
“और फिर भी, असफल प्रयोगशाला को हम मंदिर कहते रहते हैं।”
डेविड का विश्वास पहली बार काँपा।
उसकी उँगलियाँ काँप रही थीं।
चौथा दिन: नैतिकता का पतन
भूख ने बहस को हिंसक बना दिया।
नारियल को लेकर झगड़ा हुआ।
याकोव ने कहा, “बच्चों और कमजोरों को पहले मिलना चाहिए।”
आर्यन ने पलटकर कहा,
“नैतिकता पेट भरे होने का विलास है।”
मीरा बीच में आई,
“यदि ईश्वर नैतिक है, तो क्या वह यहाँ होता तो राशन बाँटता—या चमत्कार करता?”
कोई जवाब नहीं आया।
उस रात शेखर ने स्वीकार किया—
“कभी-कभी मुझे भी लगता है…
कर्म का सिद्धांत बहुत सुविधाजनक है।
हर अन्याय को ‘पिछले जन्म’ में डाल देना।”
पाँचवाँ दिन: घायल आर्यन और करुणा
आर्यन का पैर फिसलकर चट्टान से टकराया।
खून बहा।
संक्रमण फैलने लगा।
जिसने ईश्वर को सबसे ज़्यादा नकारा था—वही अब सबसे असहाय था।
सबने मिलकर उसकी देखभाल की।
डेविड ने अपने हिस्से का पानी दे दिया।
याकोव ने रात भर पहरा दिया।
तेनज़िन ने ध्यान में बैठकर उसके दर्द के साथ साँसें मिलाईं।
डेविड ने कहा,
“देखो—यही ईश्वर का प्रेम है। हमारे भीतर।”
कबीर मुस्कुराया,
“या यह विकास की देन है—सहानुभूति।
ईश्वर की आवश्यकता नहीं।”
मीरा ने धीमे से कहा,
“पर यदि बिना ईश्वर के भी हम अच्छे हो सकते हैं—
तो फिर ईश्वर की शर्त क्यों?”
आर्यन, बुखार में काँपते हुए बुदबुदाया,
“शायद… कारण मायने नहीं रखता।
बस… करुणा रखती है।”
छठा दिन: विश्वास का टूटना
डेविड रात में रोया।
पहली बार।
“मैंने जीवन भर प्रार्थना की,” उसने मीरा से कहा,
“और आज—मैं नहीं जानता कि मैं किससे बात कर रहा हूँ।”
मीरा ने उत्तर नहीं दिया।
कभी-कभी सवाल का सबसे ईमानदार जवाब—मौन होता है।
अंतिम दिन: उद्धार और अनुत्तरित प्रश्न
सातवें दिन हेलीकॉप्टर की आवाज़ आई।
धूल उड़ी।
आशा लौटी।
जाने से पहले मीरा ने सबको देखा—
थके हुए, बदले हुए, कम निश्चित।
उसने कहा:
“हम यहाँ आए थे एक प्रश्न लेकर—
ईश्वर है या नहीं?हम जा रहे हैं बिना उत्तर के।
पर एक बात स्पष्ट है—
ईश्वर का प्रश्न मनुष्य से बड़ा नहीं।यह मनुष्य की पीड़ा,
उसकी जिद,
उसकी करुणा
और उसके संदेह का ही दूसरा नाम है।शायद ईश्वर कोई सत्य नहीं—
बल्कि हमारी सबसे लंबी,
सबसे ईमानदार बहस है।”
वे चले गए।
समुद्र फिर शांत हो गया।
पर प्रश्न—
द्वीप पर नहीं,
उनके भीतर रह गया।
और शायद हर उस मनुष्य के भीतर भी,
जो कभी रात में तारों को देखकर पूछता है—
“तुम हो भी,
या सिर्फ़ मेरी उम्मीद?”
Wednesday, December 31, 2025
ओहदा
शाम तक फाइलों में व्यस्त रहने के बाद शुक्ला जी ने अपने क्लर्क से आगामी सप्ताह आने वाली फाइलों के बारे में पूछताछ की। क्लर्क ने सारी फाइलों की डिटेल शुक्ला जी को बता दी। कुछ फाइलें हाई कोर्ट की थी तो कुछ फाइलें डिस्ट्रिक्ट कोर्ट की थीं।
पास हीं बैठे उनके सहयोगी गुप्ता जी ने हाई कोर्ट में आने वाली फाइल के बारे में पूछा तो क्लर्क उस वकील का नाम बता दिया जो उस फाइल को हैंडल करने वाले थे। गुप्ता जी ने पूछा कि उस फाइल के बारे में तो मुझसे बात की गई थी। फिर किसी और को फाइल क्यों पकड़ा दिया गया?क्लर्क ने शुक्ला जी की तरफ इशारा कर दिया।
शुक्ला जी ने कहा; गुप्ता जी आपको तो पता हीं है, काफी काम करना है इस फ़ाइल में। आपने कोई रुचि नहीं दिखाई सो मैंने फाइल किसी और को दे दिया है।
गुप्ता जी ने कहा; अरे भाई रुचि दिखाई या ना दिखाई , क्या फर्क पड़ता है? फाइल तो लाकर मुझे दे देते। फिर मैं निश्चय करता कि मुझे केस को करना है या नहीं।
गुप्ता जी इन बातों ने शुक्ला जी के अहम को चोटिल कर दिया। उन्होंने चुभती हुई आवाज में कहा;गुप्ता जी आपने मुझे क्लर्क समझ रखा है क्या जो फ़ाइलों को ढोता फिरूँ?आपको रुचि थी तो फाइल खुद हीं मंगवा लेते।
शुक्ला जी को इस बात का ध्यान नहीं रहा कि अनजाने में उनके द्वारा दिये गए जवाब का असर किसपे किसपे हो सकता है। उनके क्लर्क को ये बात चुभ गई। उसने गुप्ता जी से पूछा; सर क्या क्लर्क का काम केवल फाइल ढ़ोना हीं होता है क्या? क्या क्लर्क मंद बुद्धि के हीं होते हैं?
शुक्ला जी उसकी बात समझ गए। उन्होंने बताया; नहीं ऐसी बात बिल्कुल नहीं है। क्लर्क काफी महत्वपूर्ण हैं किसी भी वकील के लिये। ऐसा नहीं है कि क्लर्क कम बुद्धिमत्ता वाले हीं होते हैं। उन्होंने बहुत सारे उदाहरण दिये जहाँ क्लर्क अपने मेहनत के बल पर जज और वकील बन गए।
शुक्ला जी ने आगे बताया ;केवल ओहदा काफी नही है किसी के लिए। किसी ने वकील की डिग्री ले ली है इसका ये मतलब नहीं कि वो वकील का काम करने में भी सक्षम हो। बहुत सारे वकील मिल जाएंगे जो आजीवन क्लरिकल जॉब हीं करते रहे गए, और बहुत सारे ऐसे क्लर्क भी मिल जाएंगे तो वकीलों से भी ज्यादा काम कर लेते हैं।
केवल डिग्री या पद काफी नहीं है पदानुसार सम्मान प्राप्त करने के लिए। सम्मान कमाना पड़ता है। एक विशेष पदवी पर आसीन व्यक्ति के पास उसी तरह की योग्यता या बुद्धिमता हो ये कोई जरूरी । बुद्धिमता तो सतत अभ्यास मांगती है। इसे लगातार कोशिश करके अर्जित करना पड़ता है।
महाभारत के समय सारथी को नीची दृष्टि से देखा जाता था। महारथी कर्ण को जीवन भर सूतपुत्र कहकर अपमानित किया जाता रहा। परंतु जब भगवान श्रीकृष्ण ने सारथी का काम किया तो उनकी गरिमा का क्षय नहीं हुआ बल्कि सारथी का पद हीं ऊंचा हो गया।
अल्बर्ट आइंस्टीन भी ऑफिस में किसी बड़े पोस्ट पर नही थे। उनका जॉब भी क्लरिकल हीं था। परंतु विज्ञान के क्षेत्र में उन्होंने कितनी ऊंचाई प्राप्त की ये सब जानते हैं। आजकल अल्बर्ट आइंस्टीन को महान वैज्ञानिक के रूप में हीं जाना जाता है न कि इस बात के लिए की वो किस प्रकार का जॉब किया करते थे।
अनजाने में शुक्ला जी के मुख से जो बात निकल गई थी उसकी भरपाई करने की शुक्ला जी ने काफी कोशिश की। शुक्ला जी की कोशिश रंग ला रही थी। उनके क्लर्क के चेहरे पर शांति की मुस्कान प्रतिफलित होने लगी थी।
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