कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण भज रे मन
कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण भज रे मन
कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण भज रे मन
कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण भज रे मन
कृष्ण में अभिव्यक्ति है शक्ति की भक्ति की,
कर्म से आसक्ति तो फल से भी विरक्ति की।
कृष्ण पक्ष के कृष्ण रात्रि में कृष्ण अति अँधियारे थे ,
तब विधर्मी कंस संहारक गिरिधर वहीं पधारे थे।
वृंदावन कुंजों में प्रेम के प्रवाह कृष्ण,
कुरुक्षेत्र धूलि में न्याय की राह कृष्ण
गोपियों के चित्त में अनुराग के सागर हैं ,
अर्जुन के संशय में हैं ज्ञान के गागर हैं
कृष्ण प्रेम की अनुभूति हैं , कृष्ण प्रेम का विस्तार हैं ,
कृष्ण भाव की गहराई हैं कृष्ण भाव के संसार हैं ।
मीरा के हृदय में रहते अनहद वो नाद कृष्ण,
अर्जुन के संशय में कहते गीता-संवाद कृष्ण।
प्रेम की पराकाष्ठा भी हैं ज्ञान की परिभाषा ,
जीवन के द्वंद्वों में हैं धर्म विजय की आशा।
राधा के कान्हा तो शकुनि के छलिया हैं,
काल दुर्योधन के मुरली के रसिया हैं।
सुदामा चावल में प्रेम का प्रसाद कृष्ण,
मित्रता के मूल्य का अनुपम संवाद कृष्ण।
कभी गोपी के वस्त्र चुराकर मर्यादा के पाठ पढ़ाए,
पांचाली के वस्त्र बढ़ाकर चीर हरण से उसे बचाए।
इस जग को रचने वाले कभी कहलाये थे माखनचोर,
कभी गोवर्धन पर्वत धारी कभी युद्ध तजते रणछोड़।
पूतना , शकटासुर ,तृणावर्त असुर अति अभिचारी ,
कंस आदि के मर्दन कर्ता कृष्ण अति बलशाली।
वो कान्हा थे योगि राज पर भोगी बनकर नृत्य करें,
जरासंध जब रण को तत्पर भागे रण से कृत्य रचे।
सारंग धारी कृष्ण हरि ने वत्सासुर संहार किया ,
बकासुर और अघासुर के प्राणों का व्यापार किया।
मात्र तर्जनी से हीं तो गिरि धर ने गिरि उठाया था,
कभी देवाधि पति इंद्र को घुटनों तले झुकाया था।
जब पापी कुचक्र रचे तब वो चक्र चलाते हैं,
कुटिल दर्प सर्वत्र फले तब दृष्टि वक्र उठाते हैं।
उरग जिनसे थर्र थर्र काँपे पर्वत जिनके हाथों नाचे,
इन्द्रदेव भी कंपित होते हैं नतमस्तक जिनके आगे।
एक हाथ में चक्र हैं जिनके मुरली मधुर बजाते हैं,
गोवर्धन धारी डर कर भगने का खेल दिखातें है।
जैसे गज शिशु से कोई डरने का खेल रचाता है,
कारक बन कर कर्ता का कारण से मेल कराता है।
राधा के कान्हा तो शकुनि के छलिया कृष्ण ,
काल दुर्योधन के मुरली के रसिया हैं कृष्ण ।
कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण भज रे मन
कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण भज रे मन
कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण भज रे मन
कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण भज रे मन
कल्मष विकर्म आदि पातक प्रतिकूल वो,
धर्म कर्म मर्म आदि जिनके अनुकूल हो।
सृष्टि की क्रिया प्रतिक्रिया के चक्र कृष्ण ,
सृष्टि के कर्ता भी कारक पर अक्र कृष्ण
साम,दाम,दंड, भेद ,विषदंत आवेग आदि,
लोभ का संवेग ना हीं मोह संवेग व्याधि।
युद्ध हो समक्ष गर जो शस्त्रों में दक्ष हैं,
पक्ष ना विपक्ष में ना कोई समकक्ष है।
वो व्याप्त है नभ में जल में चल में थल में भूतल में,
बीत गया जो पल आज जो आने वाले उस कल में।
उनसे हीं बनता है जग ये वो हीं तो बसते हैं जग में,
जग के डग डग में शामिल हैं शामिल जग के रग रग में।
क्षण-क्षण परिवर्तन में शाश्वत आधार कृष्ण ,
काल के प्रवाह में कालातीत विस्तार कृष्ण
कृष्ण केवल नाम नहीं, अनंत संवाद कृष्ण,
मौन में भी बोलते, अज्ञेय निर्विवाद कृष्ण।
अंतिम निष्कर्ष नहीं, सतत विचार कृष्ण,
चेतना की यात्रा के अनंत विस्तार कृष्ण।
नाम परे, रूप परे, शब्दों के पार कृष्ण
कृष्ण स्वयं प्रश्न में, द्वंदों के पार कृष्ण।
आगत जो काल भी है , काल जो व्यतीत कृष्ण,
चल रहा जो आज भी है , गुजरा अतीत कृष्ण।
क्षण-क्षण परिवर्तन में शाश्वत आधार कृष्ण ,
काल के प्रवाह में कालातीत विस्तार कृष्ण
वे सरल भी, जटिल भी, सहज भी, गंभीर भी,
वे धरा के निकट भी पर ब्रह्म जैसे धीर भी।
मन की चंचलता में, चित्त के अवधारण में,
सृष्टि की सृजना संरक्षण संहारण में।
रूप रंग देह धारी दृश्य दृष्टित भिन्न वो,
सृष्टि की भिन्नता से भिन्न अवच्छिन्न वो।
कृष्ण सर्व सत्व आदि तत्व अनेकार्थ है,
काम,क्रोध,भोग आदि मोक्ष भी परमार्थ है।
कृष्ण में आरंभ है, नभ धरा विस्तार है,
कृष्ण जगत मूल में, कृष्ण में संसार है।
कृष्ण ही जिज्ञासा, कृष्ण ही समाधान,
कृष्ण ही साधना हीं, कृष्ण ही निर्वाण।
कंस अरि कृष्ण कान्हा गोविन्दम घन श्याम,
अमिताभ कर रहा है प्रभु शत शत प्रणाम
कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण भज रे मन
कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण अभिनंदनम
कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण पद पूजनम
कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण अरि मर्दनम
कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण चरण वन्दनम
कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण भज रे मन
कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण भज रे मन
कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण भज रे मन
कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण भज रे मन
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कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण भज रे मन
कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण भज रे मन
कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण भज रे मन
कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण भज रे मन
कृष्ण में अभिव्यक्ति है शक्ति की भक्ति की,
कर्म से आसक्ति तो फल से भी विरक्ति की।
राधा के कान्हा तो शकुनि के छलिया हैं,
काल दुर्योधन के मुरली के रसिया हैं।
कभी गोपी के वस्त्र चुराकर मर्यादा के पाठ पढ़ाए,
पांचाली के वस्त्र बढ़ाकर चीर हरण से उसे बचाए।
इस जग को रचने वाले कभी कहलाये थे माखनचोर,
कभी गोवर्धन पर्वत धारी कभी युद्ध तजते रणछोड़।
पूतना , शकटासुर ,तृणावर्त असुर अति अभिचारी ,
कंस आदि के मर्दन कर्ता कृष्ण अति बलशाली।
वो कान्हा थे योगि राज पर भोगी बनकर नृत्य करें,
जरासंध जब रण को तत्पर भागे रण से कृत्य रचे।
सारंग धारी कृष्ण हरि ने वत्सासुर संहार किया ,
बकासुर और अघासुर के प्राणों का व्यापार किया।
मात्र तर्जनी से हीं तो गिरि धर ने गिरि उठाया था,
कभी देवाधि पति इंद्र को घुटनों तले झुकाया था।
जब पापी कुचक्र रचे तब वो चक्र चलाते हैं,
कुटिल दर्प सर्वत्र फले तब दृष्टि वक्र उठाते हैं।
उरग जिनसे थर्र थर्र काँपे पर्वत जिनके हाथों नाचे,
इन्द्रदेव भी कंपित होते हैं नतमस्तक जिनके आगे।
एक हाथ में चक्र हैं जिनके मुरली मधुर बजाते हैं,
गोवर्धन धारी डर कर भगने का खेल दिखातें है।
जैसे गज शिशु से कोई डरने का खेल रचाता है,
कारक बन कर कर्ता का कारण से मेल कराता है।
मीरा हृदय में बहते एक अनहद हैं नाद कृष्ण,
अर्जुन संशय में कहते गीता-संवाद कृष्ण
वृंदावन कुंजों में प्रेम के प्रवाह कृष्ण,
कुरुक्षेत्र धूलि में न्याय की राह कृष्ण
सुदामा चावल में प्रेम का प्रसाद कृष्ण,
मित्रता के मूल्य का अनुपम संवाद कृष्ण।
क्षण-क्षण परिवर्तन में शाश्वत आधार कृष्ण ,
काल के प्रवाह में कालातीत विस्तार कृष्ण
कृष्ण केवल नाम नहीं, अनंत संवाद हैं,
मौन में भी बोलते, अज्ञेय निर्विवाद हैं।
वे सरल भी, जटिल भी, सहज भी, गंभीर भी,
वे धरा के निकट भी पर ब्रह्म जैसे धीर भी।
वे अंतिम निष्कर्ष नहीं, सतत विचार हैं,
वे चेतना की यात्रा के अनंत विस्तार हैं।
कल्मष विकर्म आदि पातक प्रतिकूल वो,
धर्म कर्म मर्म आदि जिनके अनुकूल हो।
सृष्टि की क्रिया प्रतिक्रिया के चक्र हैं,
सृष्टि के कर्ता भी कारक पर अक्र हैं।
साम,दाम,दंड, भेद ,विषदंत आवेग आदि,
लोभ का संवेग ना हीं मोह संवेग व्याधि।
युद्ध हो समक्ष गर जो शस्त्रों में दक्ष हैं,
पक्ष ना विपक्ष में ना कोई समकक्ष है।
कृष्ण केवल नाम नहीं, अनंत संवाद हैं,
मौन में भी बोलते, अज्ञेय निर्विवाद हैं।
आगत जो काल भी है , काल जो व्यतीत भी,
चल रहा जो आज भी है , गुजरा अतीत भी।
मन की चंचलता में, चित्त के अवधारण में,
सृष्टि की सृजना संरक्षण संहारण में।
रूप रंग देह धारी दृश्य दृष्टित भिन्न वो,
सृष्टि की भिन्नता से भिन्न अवच्छिन्न वो।
कृष्ण सर्व सत्व आदि तत्व अनेकार्थ है,
काम,क्रोध,भोग आदि मोक्ष भी परमार्थ है।
कृष्ण में आरंभ है, नभ धरा विस्तार है,
कृष्ण जगत मूल में, कृष्ण में संसार है।
कृष्ण ही जिज्ञासा, कृष्ण ही समाधान,
कृष्ण ही साधना हीं, कृष्ण ही निर्वाण।
कंस अरि कृष्ण कान्हा गोविन्दम घन श्याम,
अमिताभ कर रहा है प्रभु शत शत प्रणाम
कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण भज रे मन
कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण अभिनंदनम
कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण पद पूजनम
कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण अरि मर्दनम
कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण चरण वन्दनम
कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण भज रे मन
कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण भज रे मन
कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण भज रे मन
कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण भज रे मन
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