Monday, November 4, 2024

आंगना में सोना जईसन

 आंगना में सोना जईसन उतरल किरीनियाँ कि,

देखी जिया हुलसेला मोर, कि देखी जिया हुलसेला मोर।

मह मह महकेला आम के मंजरिया,आम के मंजरिया,
कुहू कुहू कुहुकेले काली रे कोईलिया, काली रे कोईलिया।
रस रस टपकेला महुआ जे गछिया कि,
बिनत में होखे लागल भोर, कि बिनत में होखे लागल भोर।
आंगना में जईसन उतरल किरीनियाँ कि,
देखी जिया हुलसेला मोर, कि देखी जिया हुलसेला मोर।

हरिहर पातवा ह घरती के सड़िया, कि घरती के सड़िया
सेमर के फूलवा से शोभेला सेजरिया, कि शोभेला सेजरिया।
देखि के सजल रुप ऋतुराज बिहँसेले,
भौरा मचावे लागल शोर , कि भौरा मचावे लागल शोर।
आंगना में सोना जईसन उतरल किरीनियाँ कि,
देखी जिया हुलसेला मोर, कि देखी जिया हुलसेला मोर।

गेंदवा के फूलवा ह सोना के गहनवा, कि सोना के गहनवा,
रंगे रंगे फूलवा से शोभेला लहँगवा , कि शोभेला लहँगवा।
श्रीनाथ 'आशावादी, अंखिया निहारे देखि,
गउआँ ई रस में विभोर , कि गउआँ ई रस में विभोर।
आंगना में सोना जईसन उतरल किरीनियाँ कि,
देखी जिया हुलसेला मोर, कि देखी जिया हुलसेला मोर।

Sunday, November 3, 2024

रुद्रावताराय हनूमते नमः


रुद्रावताराय हनूमते नमः
(Rudravataraya Hanumate Namah)

रुद्रावताराय नमो हनूमते,
क्रोधाग्निसंयुताय महाबलाय।
लंका दहनकारिणे दयापराय,
शत्रुविनाशकाय नमो नमः॥

रक्तनेत्राय वीराय महाकायाय,
रामप्रियाय भक्ताय अनन्यदाय।
वज्रकायाय योगिनां वरिष्ठाय,
दुष्टनिवारणाय सदा शुभदाय॥

सर्वसंकटनाशकाय करालवक्त्राय,
जय जय हनुमान महाक्रोधमूर्तये॥

Praise to Devotee Hanuman
(Praise to Devotee Hanuman)

O humble Hanuman, so loyal and true,
In service of Ram, all strength flows through you.
With boundless devotion, you carry His name,
In every deed, you honor His flame.

You bridge worlds with love, both fierce and kind,
Protector of hearts, with wisdom refined.
Through trials and storms, your faith stands tall,
The purest devotee, answering His call.

O Hanuman, bless us with love and grace,
In your fearless heart, we find our place.

योगी तुम, ज्ञानी हनुमान,
भक्ति और ज्ञान से भरा है तू ध्यान।

संकटों में साथी, संकट मोचन नाम,
तेरी कृपा से मिलता, हर भक्त को आराम।

तेरे तेज से मिटता, हर एक अंधकार,
भक्तों के हृदय में, बसा है तेरा प्यार।

राम का प्रिय भक्त, हर दिल में बसता,
तेरे नाम का जाप कर, हर दुःख से लड़ता।

तेरी भक्ति से मिलता, हर मन को सुकून,
दुखों का नाशक, हर भक्त का हो तुम मूल।

हे हनुमान, तेरा आशीर्वाद सदा मेरे साथ,
तेरी महिमा से मिलता, हर दिन नया विश्वास।



डमरूनादमाश्रितं शिवं

डमरूनादमाश्रितं शिवं
(Damaru Nadam Ashritam Shivam)

डमरूनादमाश्रितं शिवं, नृत्यम् अतुलं महेश्वरम्,
सृष्टिसंहारकर्ता यो, तस्मै नतमहम् शंकरम्।

यदा डमरू मृदुलध्वनिं करोतिसंप्रभासते,
शिवस्य ताण्डवे लीनं, यत्र विश्वं निवासते।
तस्मिन् रुद्रनृत्ये नूतनं, संजीवयति अणुरणुः,
संहारसृष्टिसंयुजं, तस्य पदं परमं ध्रुवम्।

(डमरूनादमाश्रितं शिवं, नृत्यम् अतुलं महेश्वरम्)

भस्मलेपनधारिणं, अर्धनारीश्वरं हरम्,
डमरूध्वनितं वादनं, योगिश्रेष्ठं नमाम्यहम्।
ताण्डवकालनृत्ये, लीनं सर्वं चराचरम्,
शिवस्य नर्तनं हि भव, जीवितं च जगद्धरम्।

(डमरूनादमाश्रितं शिवं, नृत्यम् अतुलं महेश्वरम्)

डमरूस्वनजागृतं हि, वेदनादस्य मूलकम्,
कालोऽपि नमति तस्मै, महादेवस्य शूलिनः।
सर्वत्र शिवः सदा स्थितः, कालक्ष्णे शिवस्य छवि,
डमरूध्वनितेन यो, समस्तं विश्वं निर्ममे।

(डमरूनादमाश्रितं शिवं, नृत्यम् अतुलं महेश्वरम्)

सर्वयुगान्तरं नित्यं, यो निर्माति महेश्वरः,
शिवस्य लीला अनंतकं, महाकालस्य योगिनः।
जयतु जयतु देवो, नित्यशक्तिरमाप्यते,
डमरूध्वनिना सदा, हि विश्वे शिवः प्रवर्तते।

(डमरूनादमाश्रितं शिवं, नृत्यम् अतुलं महेश्वरम्)


जालिम ये दीमक सारी, मक्कार खा गई

गवाह सारे सच के, अखबार खा गई, 
जालिम ये दीमक सारी, मक्कार खा गई। 

बेईमानों के नमक का, कर्जा बहुत था भारी,
चटी थी फाइल सारी, गुनाहगार की बीमारी।
कि कुर्सी के काले चिट्ठे , किरदार खा गई ,
जालिम ये दीमक सारी, मक्कार खा गई। 

घिसे हुए थे चप्पल,लाचार की कहानी,
कि धूल में सने सब ,बेगार की जुबानी।
कंकालों पर हुए जो , अत्याचार खा गई ,
जालिम ये दीमक सारी, मक्कार खा गई। 

खोखली सी फ़ाइल  खोखली तहरीरें,
जो सच की भेंट चढ़ी, ये स्याह सी तक़दीरें।
खुद्दारों की जो थी वो, आवाज़ खा गई,
जालिम ये दीमक सारी, मक्कार खा गई।

थी भूख की ये मारी, आदत की थी लाचारी,
दफ्तर के सारे सारे , दलालों  से थी यारी,
सच के जो भी थे सारे , चौकीदार खा गई ,
जालिम ये दीमक सारी, मक्कार खा गई।

तफसीस क्या करें हम, दफ्तर के सब अधिकारी,
दीमक से भी सौदा करते, दीमक भी है व्यापारी।
दफ्तर के फर्जी किस्से, ओहदेदार खा गई।
जालिम ये दीमक सारी, मक्कार खा गई।

अजय अमिताभ सुमन

Saturday, November 2, 2024

बुद्धं शरणं प्राप्य

 बुद्धं शरणं प्राप्य, धीरं शान्तिं ददाति यः।

अज्ञानतमसः शत्रुं, ज्ञानदीपप्रकाशकम्॥ १ ॥


करुणासागरं शान्तं, दुःखत्राणं महाश्रयम्।

सर्वजीवहिते युक्तं, तथागतं नमाम्यहम्॥ २ ॥


बोधिवृक्षसमासीनं, चिन्मुद्रामणिनायकम्।

संसरामृतनाशाय, धर्मचक्रं प्रवर्तकम्॥ ३ ॥


सम्यग्दृष्टिप्रदं शुद्धं, सम्यक्संकल्पनायकम्।

आहिंसायाः प्रणेतेर्यं, बुद्धं तं प्रणमाम्यहम्॥ ४ ॥


चतुर्नयप्रदं श्रेष्ठं, मार्गदर्शनकारकम्।

सर्वदुःखविनाशाय, तं बुद्धं शरणं व्रजे॥ ५ ॥


निर्वाणप्राप्तिकारणं, मोक्षदं सततं महम्।

संसरक्लेशहारिणं, धीरं बुद्धं नमाम्यहम्॥ ६ ॥


प्रज्ञावन्तं तपोनिष्ठं, शीलसम्पन्नमुत्तमम्।

ध्यानसमाधिसंयुक्तं, तं बुद्धं प्रणमाम्यहम्॥ ७ ॥


सर्वक्लेशविनाशाय, सर्वजीवहिते रतम्।

सर्वत्र विजयं यान्तं, बुद्धं धीरं नमाम्यहम्॥ ८ ॥

कृष्ण में अभिव्यक्ति है-Long

कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण भज रे मन
कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण भज रे मन
कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण भज रे मन
कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण भज रे मन
कृष्ण में अभिव्यक्ति है शक्ति की भक्ति की,
कर्म से आसक्ति तो फल से भी विरक्ति की।
कृष्ण पक्ष के कृष्ण रात्रि में कृष्ण अति अँधियारे थे ,
तब विधर्मी कंस संहारक गिरिधर वहीं पधारे थे।
वृंदावन कुंजों में प्रेम के प्रवाह कृष्ण,
कुरुक्षेत्र धूलि में न्याय की राह कृष्ण
गोपियों के चित्त में अनुराग के सागर हैं ,
अर्जुन के संशय में हैं ज्ञान के गागर हैं
कृष्ण प्रेम की अनुभूति हैं , कृष्ण प्रेम का विस्तार हैं ,
कृष्ण भाव की गहराई हैं कृष्ण भाव के संसार हैं ।
मीरा के हृदय में रहते अनहद वो नाद कृष्ण,
अर्जुन के संशय में कहते गीता-संवाद कृष्ण।
प्रेम की पराकाष्ठा भी हैं ज्ञान की परिभाषा ,
जीवन के द्वंद्वों में हैं धर्म विजय की आशा।
राधा के कान्हा तो शकुनि के छलिया हैं,
काल दुर्योधन के मुरली के रसिया हैं।
सुदामा चावल में प्रेम का प्रसाद कृष्ण,
मित्रता के मूल्य का अनुपम संवाद कृष्ण।
कभी गोपी के वस्त्र चुराकर मर्यादा के पाठ पढ़ाए,
पांचाली के वस्त्र बढ़ाकर चीर हरण से उसे बचाए।
इस जग को रचने वाले कभी कहलाये थे माखनचोर,
कभी गोवर्धन पर्वत धारी कभी युद्ध तजते रणछोड़।
पूतना , शकटासुर ,तृणावर्त असुर अति अभिचारी ,
कंस आदि के मर्दन कर्ता कृष्ण अति बलशाली।
वो कान्हा थे योगि राज पर भोगी बनकर नृत्य करें,
जरासंध जब रण को तत्पर भागे रण से कृत्य रचे।
सारंग धारी कृष्ण हरि ने वत्सासुर संहार किया ,
बकासुर और अघासुर के प्राणों का व्यापार किया।
मात्र तर्जनी से हीं तो गिरि धर ने गिरि उठाया था,
कभी देवाधि पति इंद्र को घुटनों तले झुकाया था।
जब पापी कुचक्र रचे तब वो चक्र चलाते हैं,
कुटिल दर्प सर्वत्र फले तब दृष्टि वक्र उठाते हैं।
उरग जिनसे थर्र थर्र काँपे पर्वत जिनके हाथों नाचे,
इन्द्रदेव भी कंपित होते हैं नतमस्तक जिनके आगे।
एक हाथ में चक्र हैं जिनके मुरली मधुर बजाते हैं,
गोवर्धन धारी डर कर भगने का खेल दिखातें है।
जैसे गज शिशु से कोई डरने का खेल रचाता है,
कारक बन कर कर्ता का कारण से मेल कराता है।
राधा के कान्हा तो शकुनि के छलिया कृष्ण ,
काल दुर्योधन के मुरली के रसिया हैं कृष्ण ।
कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण भज रे मन
कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण भज रे मन
कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण भज रे मन
कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण भज रे मन
कल्मष विकर्म आदि पातक प्रतिकूल वो,
धर्म कर्म मर्म आदि जिनके अनुकूल हो।
सृष्टि की क्रिया प्रतिक्रिया के चक्र कृष्ण ,
सृष्टि के कर्ता भी कारक पर अक्र कृष्ण 
साम,दाम,दंड, भेद ,विषदंत आवेग आदि,
लोभ का संवेग ना हीं मोह संवेग व्याधि।
युद्ध हो समक्ष गर जो शस्त्रों में दक्ष हैं,
पक्ष ना विपक्ष में ना कोई समकक्ष है।
वो व्याप्त है नभ में जल में चल में थल में भूतल में,
बीत गया जो पल आज जो आने वाले उस कल में।
उनसे हीं बनता है जग ये वो हीं तो बसते हैं जग में,
जग के डग डग में शामिल हैं शामिल जग के रग रग में।
क्षण-क्षण परिवर्तन में शाश्वत आधार कृष्ण ,
काल के प्रवाह में कालातीत विस्तार कृष्ण
कृष्ण केवल नाम नहीं, अनंत संवाद कृष्ण,
मौन में भी बोलते, अज्ञेय निर्विवाद कृष्ण।
अंतिम निष्कर्ष नहीं, सतत विचार कृष्ण,
चेतना की यात्रा के अनंत विस्तार कृष्ण।
नाम परे, रूप परे, शब्दों के पार कृष्ण
कृष्ण स्वयं प्रश्न में, द्वंदों के पार कृष्ण।
आगत जो काल भी है , काल जो व्यतीत कृष्ण,
चल रहा जो आज भी है , गुजरा अतीत कृष्ण।
क्षण-क्षण परिवर्तन में शाश्वत आधार कृष्ण ,
काल के प्रवाह में कालातीत विस्तार कृष्ण
वे सरल भी, जटिल भी, सहज भी, गंभीर भी,
वे धरा के निकट भी पर ब्रह्म जैसे धीर भी।
मन की चंचलता में, चित्त के अवधारण में,
सृष्टि की सृजना संरक्षण संहारण में।
रूप रंग देह धारी दृश्य दृष्टित भिन्न वो,
सृष्टि की भिन्नता से भिन्न अवच्छिन्न वो।
कृष्ण सर्व सत्व आदि तत्व अनेकार्थ है,
काम,क्रोध,भोग आदि मोक्ष भी परमार्थ है।
कृष्ण में आरंभ है, नभ धरा विस्तार है,
कृष्ण जगत मूल में, कृष्ण में संसार है।
कृष्ण ही जिज्ञासा, कृष्ण ही समाधान,
कृष्ण ही साधना हीं, कृष्ण ही निर्वाण।
कंस अरि कृष्ण कान्हा गोविन्दम घन श्याम,
अमिताभ कर रहा है प्रभु शत शत प्रणाम
कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण भज रे मन
कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण अभिनंदनम
कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण पद पूजनम
कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण अरि मर्दनम
कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण चरण वन्दनम
कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण भज रे मन
कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण भज रे मन
कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण भज रे मन
कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण भज रे मन


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कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण भज रे मन

कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण भज रे मन

कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण भज रे मन

कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण भज रे मन

कृष्ण में अभिव्यक्ति है शक्ति की भक्ति की,

कर्म से आसक्ति तो फल से भी विरक्ति की।

राधा के कान्हा तो शकुनि के छलिया हैं,

काल दुर्योधन के मुरली के रसिया हैं।

कभी गोपी के वस्त्र चुराकर मर्यादा के पाठ पढ़ाए,

पांचाली के वस्त्र बढ़ाकर चीर हरण से उसे बचाए।

इस जग को रचने वाले कभी कहलाये थे माखनचोर,

कभी गोवर्धन पर्वत धारी कभी युद्ध तजते रणछोड़।

पूतना , शकटासुर ,तृणावर्त असुर अति अभिचारी ,

कंस आदि के मर्दन कर्ता कृष्ण अति बलशाली।

वो कान्हा थे योगि राज पर भोगी बनकर नृत्य करें,

जरासंध जब रण को तत्पर भागे रण से कृत्य रचे।

सारंग धारी कृष्ण हरि ने वत्सासुर संहार किया ,

बकासुर और अघासुर के प्राणों का व्यापार किया।

मात्र तर्जनी से हीं तो गिरि धर ने गिरि उठाया था,

कभी देवाधि पति इंद्र को घुटनों तले झुकाया था।

जब पापी कुचक्र रचे तब वो चक्र चलाते हैं,

कुटिल दर्प सर्वत्र फले तब दृष्टि वक्र उठाते हैं।

उरग जिनसे थर्र थर्र काँपे पर्वत जिनके हाथों नाचे,

इन्द्रदेव भी कंपित होते हैं नतमस्तक जिनके आगे।

एक हाथ में चक्र हैं जिनके मुरली मधुर बजाते हैं,

गोवर्धन धारी डर कर भगने का खेल दिखातें है।

जैसे गज शिशु से कोई डरने का खेल रचाता है,

कारक बन कर कर्ता का कारण से मेल कराता है।

मीरा हृदय में बहते एक अनहद हैं नाद कृष्ण,

अर्जुन संशय में कहते गीता-संवाद कृष्ण

वृंदावन कुंजों में प्रेम के प्रवाह कृष्ण,

कुरुक्षेत्र धूलि में न्याय की राह कृष्ण

सुदामा चावल में प्रेम का प्रसाद कृष्ण,

मित्रता के मूल्य का अनुपम संवाद कृष्ण।

क्षण-क्षण परिवर्तन में शाश्वत आधार कृष्ण ,

काल के प्रवाह में कालातीत विस्तार कृष्ण

कृष्ण केवल नाम नहीं, अनंत संवाद हैं,

मौन में भी बोलते, अज्ञेय निर्विवाद हैं।

वे सरल भी, जटिल भी, सहज भी, गंभीर भी,

वे धरा के निकट भी पर ब्रह्म जैसे धीर भी।

वे अंतिम निष्कर्ष नहीं, सतत विचार हैं,

वे चेतना की यात्रा के अनंत विस्तार हैं।

कल्मष विकर्म आदि पातक प्रतिकूल वो,

धर्म कर्म मर्म आदि जिनके अनुकूल हो।

सृष्टि की क्रिया प्रतिक्रिया के चक्र हैं,

सृष्टि के कर्ता भी कारक पर अक्र हैं।

साम,दाम,दंड, भेद ,विषदंत आवेग आदि,

लोभ का संवेग ना हीं मोह संवेग व्याधि।

युद्ध हो समक्ष गर जो शस्त्रों में दक्ष हैं,

पक्ष ना विपक्ष में ना कोई समकक्ष है।

कृष्ण केवल नाम नहीं, अनंत संवाद हैं,

मौन में भी बोलते, अज्ञेय निर्विवाद  हैं।

आगत जो काल भी है , काल जो व्यतीत भी,

चल रहा जो आज भी है , गुजरा अतीत भी।

मन की चंचलता में, चित्त के अवधारण में,

सृष्टि की सृजना संरक्षण संहारण में।

रूप रंग देह धारी दृश्य दृष्टित भिन्न वो,

सृष्टि की भिन्नता से भिन्न अवच्छिन्न वो।

कृष्ण सर्व सत्व आदि तत्व अनेकार्थ है,

काम,क्रोध,भोग आदि मोक्ष भी परमार्थ है।

कृष्ण में आरंभ है, नभ धरा विस्तार है,

कृष्ण जगत मूल में, कृष्ण में संसार है।

कृष्ण ही जिज्ञासा, कृष्ण ही समाधान,

कृष्ण ही साधना हीं, कृष्ण ही निर्वाण।

कंस अरि कृष्ण कान्हा गोविन्दम घन श्याम,

अमिताभ कर रहा है प्रभु शत शत प्रणाम

कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण भज रे मन

कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण अभिनंदनम

कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण पद पूजनम

कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण अरि मर्दनम

कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण चरण वन्दनम

कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण भज रे मन

कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण भज रे मन

कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण भज रे मन

कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण भज रे मन

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धर्मपथं प्रदर्शयन

धर्मपथं प्रदर्शयन्, शान्तिमार्गं सदा यशः॥

शुद्धबुद्धिं प्रकटयन्, संसारं तौष्ण्ययुज्।

करुणारसपूर्णं च, दुःखमुक्तिं विधास्यसि॥

ज्ञानमय भिक्षुकानां, यत्र आत्मा विशुद्धते।

शान्तिदाता धर्मराज, सर्वत्र स्वर्गस्य तिष्ठसि॥

पञ्चशीलं धृतं यत्र, अष्टाङ्गिकमार्गः प्रियः।

सम्यक् दृष्टिः सम्यक् सङ्कल्पः, शान्तिं करोति सर्वदा॥

श्रावकाणां पथप्रदर्शक, सततं सुखदायक।

निर्भयं च शान्तिमय, बुद्धं वन्दे जगतां गुरुम्॥

विश्वशान्तिं ददाति, प्रज्ञां च प्रकटयति।

तस्मै बुद्धाय नमः सदा, करुणाय च सर्वदा॥

नमो नमः शिवाय

 नमो नमः शिवाय त्वं, त्रिनेत्राय महेश्वर।

नीलकण्ठाय शान्ताय, शम्भवे परमेश्वर॥

कैलासवासिने तुभ्यं, गङ्गाधर नमोऽस्तु ते।

जगदाधार रूपाय, सर्वेशाय नमो नमः॥

चन्द्रशेखर चर्माङ्गे, त्रिपुरान्तक शूलधृते।

पिनाकपाणये नित्यं, नमः शर्वाय शङ्कर॥

भूतनाथ महाकाय, व्योमेश परमं शिवम्।

कालकाल महायोगिन्, प्रपन्नानां सुखप्रदम्॥

ध्यानमग्नं च सर्वात्मन्, योगिनां हृदये स्थितम्।

करुणासागरं शान्तं, नमो नटवरप्रिय॥

पशुपतिं प्रणम्याहम्, महादेव जगत्पते।

वन्दे त्वां गिरिजाकान्तं, शम्भो लोकनायक॥

शंकरस्य करालं तं, शरणं मे हरं हरम्।

मृडंकरं महात्मानं, नमो नित्यं हराय ते॥

नित्यं योगिनां योगं, दातारं मङ्गलप्रदम्।

भक्तानां दीनबन्धुं त्वां, नमामि सर्वमङ्गलम्॥

अनादि देव शिवाय, विश्वं सृष्टिं करिष्यते।

विध्वंसाय च पालयते, तस्मै नित्यं नमो नमः॥

रुद्राय त्रिपुरारये, भयहराय शूलिने।

नमोऽस्तु ते महाकाय, विश्वनाथ शिवाय ते॥

नमामि भारतं पुण्यं

नमामि भारतं पुण्यं, विविधसंस्कृतिपूरितम्।

धर्मजातिविभेदेन, एकताम् अस्य भूषितम्॥

यत्र वेदानां मन्त्राः, कुरुते लोकं प्रकाशयम्।

कुरुक्षेत्रे गीता वाणी, ज्ञानदीपं प्रज्वालयेत्॥

नानावर्णेषु जीवन्ति, प्रेमबंधनसंयुताः।

एका जातिर्मनुष्याणां, यत्र सर्वे सहोदराः॥

एकं राष्ट्रं समुज्ज्वलं, विविधासु कलासु च।

भारतं संगीतमयम्, एकसूत्रेण बध्नति॥

एकताम् अनुभवामः, धर्माणां यत्र संगमः।

मातृभूमिर्मे सदा जयेत्, यत्र वसुधैव कुटुम्बकम्॥

सदा दीप्यते भारतं, विविधत्वे एकभावना।

नमो मातृभूमये, विविधायै एकतायै॥

Friday, November 1, 2024

ओ.टी.पी.

 सुत उठ के दिल क्या मांगे,ओ.टी.पी. भैया ओ.टी.पी.!

सुबह शाम सब गुनगुनाएं,ओ.टी.पी. भैया ओ.टी.पी.!
फोन उठाओ, फिर सोचो,अरे ओ.टी.पी. कहां से लाओ?
पेटीएम हो या बैंक का झंझट,सारे काम में ये क्यों लाओ?

फ़ोन करो या बिल भरो तुम,ओ.टी.पी. भैया ओ.टी.पी.!
दूध पियो या चाय पियो तुम,ओ.टी.पी. भैया ओ.टी.पी.!
हर तरफ बस यही माया है,ओ.टी.पी. का ही तो साया है!
ऊपर वाले की महिमा में,अब ओ.टी.पी. भी आया है!

अब हर जगह इसका ही डंका,बिन इसके सबकुछ सूना सूना!
जिंदगी की धड़कन बन जाए,ओ.टी.पी. भैया ओ.टी.पी.!
सिक्स डिजिट का ये जादू,हर किसी पर है चढ़ा भूत सा!
पैसा हो या हो ट्रांजैक्शन,बस ओ.टी.पी. का ही राग सुना!

फ़ोन करो या बिल भरो तुम,ओ.टी.पी. भैया ओ.टी.पी.!
दूध पियो या चाय पियो तुम,ओ.टी.पी. भैया ओ.टी.पी.!
अब तो सब मिलके बोलें,ओ.टी.पी. भैया ओ.टी.पी.!
ओ.टी.पी. की महिमा गाएं,ओ.टी.पी. भैया ओ.टी.पी.!

बकरी माई

 सच कहता हूँ बात बराबर, सुन ले मेरे भाई,

तुझ से लाख टके है बेहतर तेरी बकरी माई।
तू मेरा दिमाग चबाये, और बकरी ये पत्ता,
तू बातों से मुझे पकाए बात बुरी पर सच्चा।
घर की बकरी से घर का भोजन चलता है सारा,
पर बकरी का दाना पानी घास पात हीं चारा।
डेंगू वेन्गु मच्चड़ वच्चड़ सबसे हमें बचाए,
दूध पिला के बूढ़े को भी झटपट रोड भगाए
इस बकरी को दुह दुह के गाँधी बन गए पठ्ठा ,
उम्र पचासा पार गए फिर भी तरुणी से ठठ्ठा।
इतनी छोटी सी बकरी पर ऐसी इसकी जात ,
पीकर गाँधी दूध इसी के खट्टे कर दिए दांत।
जय हो बकरी माई, तेरी महिमा अपरंपार,
सच में जीवन जीने का बस तू हीं है आधार।
इसीलिए कहता हूँ सुन लो भैया और भौजाई,
बार बार दुहराते जाओ जय हो बकरी माई।

कौन हूँ मैं ? ये मिट्टी? मिट्टी से बीज

कौन हूँ मैं ?

ये मिट्टी?
मिट्टी से बीज,
बीज से तना ,
तना से शाखें ,
शाखों से पत्ती ,
पत्ती से कली ,
कली से फूल,
फूल से फल,
फल से अन्न,
अन्न से रक्त,
रक्त से कोशिका ,
कोशिका से ऊतक ,
ऊतक से मांस,
मांस से पेशी,
पेशी से मज्जा,
मज़्ज़ा से अस्थि
अस्थि से देह,
और देह से श्वांस ,
श्वांस से प्राण ,
प्राण से मैं
मिट्टी हूँ मैं,
मिट्टी से ,
बीज,
तना ,
शाखें ,
पत्ती ,
कली ,
फूल,
फल,
अन्न,
रक्त,
कोशिका ,
ऊतक ,
मांस,
पेशी,
मज्जा,
अस्थि
देह,
श्वांस ,
प्राण ,
प्राण से मैं
मिट्टी हूँ मैं,

आंगना में सोना जईसन

 आंगना में सोना जईसन उतरल किरीनियाँ कि,

देखी जिया हुलसेला मोर, कि देखी जिया हुलसेला मोर।

मह मह महकेला आम के मंजरिया,आम के मंजरिया,
कुहू कुहू कुहुकेले काली रे कोईलिया, काली रे कोईलिया।
रस रस टपकेला महुआ जे गछिया कि,
बिनत में होखे लागल भोर, कि बिनत में होखे लागल भोर।
आंगना में सोना जईसन उतरल किरीनियाँ कि,
देखी जिया हुलसेला मोर, कि देखी जिया हुलसेला मोर।

हरिहर पातवा ह घरती के सड़िया, कि घरती के सड़िया
सेमर के फूलवा से शोभेला सेजरिया, कि शोभेला सेजरिया।
देखि के सजल रुप ऋतुराज बिहँसेले,
भौरा मचावे लागल शोर , कि भौरा मचावे लागल शोर।
आंगना में सोना जईसन उतरल किरीनियाँ कि,
देखी जिया हुलसेला मोर, कि देखी जिया हुलसेला मोर।

गेंदवा के फूलवा ह सोना के गहनवा, कि सोना के गहनवा,
रंगे रंगे फूलवा से शोभेला लहँगवा , कि शोभेला लहँगवा।
श्रीनाथ 'आशावादी, अंखिया निहारे देखि,
गउआँ ई रस में विभोर , कि गउआँ ई रस में विभोर।
आंगना में सोना जईसन उतरल किरीनियाँ कि,
देखी जिया हुलसेला मोर, कि देखी जिया हुलसेला मोर।
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अवि

 दूध मलाई मख्खन हलवा, देखो परियां लाई,

जन्मदिन पर अवि के मेरे ,खुशियाँ हरपल छाई ।
सजी रहे थाली में तेरे लड्डू की मिठास,
प्यारी सी मुस्कान अवि की प्यारी प्यारी खास।

भरे रहे जीवन में तेरे खुशियाँ अपरम्पार ,
हर सुबह हो सुबह सुनहरी हर रात हो प्यार।
जैसे फूल महकते हैं डालों पर सजकर खिलकर,
वैसे तू खुशियों से चमके खिले रहे मंज़िल पर।

भेज रहा हूँ खूब सजाकर प्रेम आशिष हजार ,
प्रेम आनंद और अपनापन तुझे मिले बार-बार।
दूध मलाई मख्खन हलवा, देखो परियां लाई,
मेरे प्यारे अवि को, जन्मदिन की ढेरों बधाई।

ओ मेरी कविते तू कर परिवर्तित अपनी भाषा

ओ मेरी कविते, तू कर परिवर्तित अपनी भाषा,

तू फिर से सजा दे ख्वाब नए प्रकटित कर जन मन व्यथा।
ये देख देश का नर्म पड़े ना गर्म रुधिर,
भेदन करने है लक्ष्य भ्रष्ट हो ना तुणीर।

तू भूल सभी वो बात की प्रेयशी की गालों पे,
रचा करती थी गीत देहयष्टि पे बालों पे।
ओ कविते नहीं है वक्त देख सावन भादों,
आते जाते है मेघ इन्हें आने जाने दो।

कविते प्रेममय वाणी का अब वक्त कहाँ है भारत में?
गीता भूले सारे यहाँ भूले कुरान सब भारत में।
परियों की कहे कहानी कहो समय है क्या?
बडे मुश्किल में हैं राम और रावण जीता।

यह राष्ट्र पीड़ित है अनगिनत भुचालों से,
रमण कर रहे भेड़िये दुखी श्रीगालों से।
बातों से कभी भी पेट देश का भरा नहीं,
वादों और वादों से सिर्फ हुआ है भला कभी?

राज मूषको का उल्लू अब शासक है,
शेर कर रहे न्याय पीड़ित मृग शावक है।
भारत माता पीड़ित अपनों के हाथों से ,
चीर रहे तन इसका भालों से , गडासों से ।

गर फंस गए हो शूल स्वयं के हाथों में,
चुकता नहीं कोई देने आघातों में।
देने होंगे घाव कई री कविते ,अपनों को,
टूट जाये गर ख्वाब उन्हें टूट जाने दो।

राष्ट्र सजेगा पुनः उन्हीं आघातों से,
कभी नहीं बनता है देश बेकार की बातों से।
बनके राम कहो अब होगा भला किसका ?
राज शकुनियों का दुर्योधन सखा जिसका।

तज राम को कविते और उनके वाणों को,
तू बना जन को हीं पार्थ सजा दे भालों को।
जन में भड़केगी आग तभी राष्ट्र ये सुधरेगा,
उनके पुरे होंगे ख्वाब तभी राष्ट्र ये सुधरेगा।

तू कर दे कविते बस इतना ही कर दे,
निज कर्म धर्म है बस जन मन में भर दे।
भर दे की हाथ धरे रहने से कभी नहीं कुछ भी होता,
बिना किये भेदन स्वयं ही लक्ष्य सिध्ह नहीं होता।

तू फिर से जन के मानस में ओज का कर दे हुंकार,
कि तमस हो जाये विलीन और ओझल मलिन विकार।
एक चोट पे हो जावे परजीवी यहां सारे मृत ,
जनता का हो राज यहां पर, जन गण मन हो सारे तृप्त।

कि इतिहास के पन्नों पे लिख दे जन की विजय गाथा ,
शासक , शासित सब मिट जाएँ हो यही राष्ट्र की परिभाषा।
जीवन का कर संचार नवल सकल प्रस्फ़ुटित आशा,
ओ मेरी कविते, तू कर परिवर्तित अपनी भाषा,
तू फिर से सजा दे ख्वाब नए प्रकटित कर जन मन व्यथा।

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