इस ब्लॉग पे प्रस्तुत सारी रचनाओं (लेख/हास्य व्ययंग/ कहानी/कविता) का लेखक मैं हूँ तथा ये मेरे द्वारा लिखी गयी है। मेरी ये रचना मूल है । मेरे बिना लिखित स्वीकीर्ति के कोई भी इस रचना का, या इसके किसी भी हिस्से का इस्तेमाल किसी भी तरीके से नही कर सकता। यदि कोई इस तरह का काम मेरे बिना लिखित स्वीकीर्ति के करता है तो ये मेरे अधिकारों का उल्लंघन माना जायेगा जो की मुझे कानूनन प्राप्त है। (अजय अमिताभ सुमन: सर्वाधिकार सुरक्षित :Ajay Amitabh Suman:All Rights Reserved)
Saturday, November 4, 2023
अनुसंधान सत का
Sunday, October 29, 2023
गर भिन्नता स्वीकार ना हो
क्या भला हो देश का गर भिन्नता स्वीकार ना हो।
देश के उत्थान में व्यवधान है बाधा गरीबी।
धर्म जाति भिन्नता ना , विघ्न है ब्याधा गरीबी।
किन्तु इसका ज्ञान हो हाँ ,मेधा का अपमान हो ना।
धर्म जाति प्रान्त आदि , एकता प्रतिमान हों हाँ।
ज्ञान, बुद्धि, प्रज्ञा शुद्धि, आ सभी में हम जगाएँ।
सूत्र हो अभिन्नता का ,साथ डग मिलकर बढ़ाएँ।
इस वतन के देशवासी, प्रांत भिन्न वेश भाषा भाषी,
रूप जाति रंग भिन्न अब आ कहें पर एक हैं सब?
धर्म जाति तोड़ने का अब यहाँ हथियार ना हो।
क्या भला हो देश का गर भिन्नता स्वीकार ना हो।
अजय अमिताभ सुमन
Saturday, October 21, 2023
स्वीकारोक्ति :एक राजपूत की:
Saturday, October 14, 2023
काम,क्रोध,भोग आदि मोक्ष भी परमार्थ है
काम,क्रोध,भोग आदि मोक्ष भी परमार्थ है
कृष्ण में अभिव्यक्ति है शक्ति की भक्ति की,
कर्म से आसक्ति तो फल से भी विरक्ति की।
राधा के कान्हा तो शकुनि के छलिया हैं,
काल दुर्योधन के मुरली के रसिया हैं।
कल्मष विकर्म आदि पातक प्रतिकूल वो,
धर्म कर्म मर्म आदि जिनके अनुकूल हो।
सृष्टि की क्रिया प्रतिक्रिया के चक्र हैं,
सृष्टि के कर्ता भी कारक पर अक्र हैं।
साम,दाम,दंड, भेद ,विषदंत आवेग आदि,
लोभ का संवेग ना हीं मोह संवेग व्याधि।
युद्ध हो समक्ष गर जो शस्त्रों में दक्ष हैं,
पक्ष ना विपक्ष में ना कोई समकक्ष है।
आगत जो काल भी है , काल जो व्यतीत भी,
चल रहा जो आज भी है , गुजरा अतीत भी।
मन की चंचलता में, चित्त के अवधारण में,
सृष्टि की सृजना संरक्षण संहारण में।
रूप रंग देह धारी दृश्य दृष्टित भिन्न वो,
सृष्टि की भिन्नता से भिन्न अवच्छिन्न वो।
कृष्ण सर्व सत्व आदि तत्व अनेकार्थ हैं,
काम,क्रोध,भोग आदि मोक्ष भी परमार्थ है।
अजय अमिताभ सुमन
Saturday, October 7, 2023
तेरा यूं मुकर जाना
होगा क्या मुकरोगे,तुम जो किसी बात पे?
बिगड़ेगा तेरा क्या इतनी सी बात पे?
कहते तो ठीक हो पर याद जभी आओगे,
जेहन में बरबस बरबाद याद आओगे।
याद रह जायेगा ,तेरा यूँ बदलना,
कि करके वो वादा, वादे पे मुकरना।
किया किसपे भरोसा ये शिकवा रहेगा,
इस खोटे से रिश्ते झूठे से जज्बात पे।
गर ना सुधर जाते हो इतनी सी बाते पे,
गर तुम मुकर जाते हो इतनी सी बाते पे।
अजय अमिताभ सुमन
Saturday, September 30, 2023
इम्तिहान
इम्तिहान
खुदा ये तू भी तेरा जहान क्या है?
सफर ये कैसा तेरा इम्तिहान क्या हैं?
कि दुनिया भी है तेरी और बंदे भी तेरे,
और पूछते तुझीसे पहचान क्या है?
अजय अमिताभ सुमन
Saturday, July 1, 2023
शौक-ए-आदम
दुनिया ये तेरी मेरी ,फरक फकत के यूं है,
ना आरजू हुनुज है , ना कोई जुस्तजू हैI
दियार-ए-खंजर माफिक, है मंजर कायनात के,
ताऊन से भी उसरत, तबियत हालात केI
धुएं का असर है कि , लहर इक सड़ा हुआ,
जहर में बसर है ये , खाक में पड़ा हुआ।
बह रही ना हर सहर ,मसर्रत बहार की,
शामें है शाम-ए-हिज्र ,रातें शब-ए-फ़िराक़ कीI
सजदे तो मैं भी रखता ,रहगुजर में माबूद,
फकत तल्खी-ए-जिस्त से ,रूह तन्हा रंज-ए-वजूद।
चलो चलें पूरा करने ,अपने आपने शौक,
तू पैदा कर नस्ल-ए-आदम, मैं मुकर्रर अपनी मौतI
अजय अमिताभ सुमन
Friday, April 28, 2023
हिंदू कौन
क्या कोई पंथ या मजहबी विकृति है?
हिंदू वो भी हैं जो भगवान को मानते हैं,
हिंदू वो भी हैं जो भगवान को ना मानते है,
और वो भी जो खुद को हिंदू नहीं मानते हैं।
यहां योगी के लिए योग तो भोगी के लिए भोग है ,
भक्ति,नृत्य, ज्ञान,तंत्र, मदिरा भी ना अवरोध है।
तभी तो इसमें हैं कृष्ण भी शिव भी ,प्रभु राम भी,
चार्वाक भी इसी में तो खानखाना रहमान भी।
बुद्ध , गोरख, कबीर ,नानक, इसमें रविदास भी,
महावीर, साईबाबा , तो मीरा, सूरदास भी।
आदमी तो आदमी पत्थर का भी उपयोग है,
मतों में है विरोध पर विरोध में सहयोग है।
जिसमें शामिल हैं सब जो सबमें युक्त है,
हिंदुत्व कोई बंधन नहीं ये सर्वबंधन मुक्त है।
अजय अमिताभ सुमन
Sunday, April 23, 2023
हवाओं पर कोई कहानी लिखूं,
हवाओं पर कोई कहानी लिखूं,
अपनी मैं क्यों जिंदगानी लिखूं?
लहरें क्या सागर में बनना बिछड़ना है ,
मिट्टी का जीवन मिट्टी में बिखरना है,
हंसना कभी रोना निखरना बिफरना,
है जन्मों की आदत पुरानी लिखूं?
हवाओं पर कोई कहानी लिखूं,
अपनी मैं क्यों जिंदगानी लिखूं?
अजय अमिताभ सुमन
Saturday, April 8, 2023
बाजार में मिला नहीं
तू भी क्या चीज है कि
नाम का गिला नहीं,
शोहरत की दौड़ में थे
सब तू हिला नहीं।
नफासत के पीछे
कुछ विरासत के पीछे ,
कुछ रोजी और रोटी
सियासत के पीछे।
एक तू है कि नाम ना
काम की फिकर है,
बदनाम भी है पूरा
फिर भी बेफिकर है?
रियासत की दौड़ में थे
सब तू मिला नहीं,
माजरा ये क्या है
बाजार में हिला नहीं?
अजय अमिताभ सुमन
सर्वाधिकार सुरक्षित
Saturday, April 1, 2023
भाप बना पानी सागर से
Monday, March 13, 2023
एक केंद्र में कर स्थापित
=====
एक केंद्र में कर स्थापित
=====
एक केंद्र में कर स्थापित ,
दिनकर को रख आता कौन?
पृथ्वी, मंगल , बुध, शुक्र को,
वृत्त में गोल घुमाता कौन?
=====
निशा बाद प्रात को लाता,
रजनी में हिमकर चमकाता,
जभी आर्त्त हो धरा पुकारे,
जलधर से पानी बरसाता।
=====
अगर हमे ना कोई उठाये,
सुप्ति से ना हमें जगाए ,
शयन कक्ष की सुस्ती में रहते,
हमको ना कोई बताए।
=====
पर सदियों से उठा उठा कर ,
खग को प्रतिदिन बता बता कर,
सूरज को नित रोज जगा कर,
प्राची से ले आता कौन?
=====
एक केंद्र में कर स्थापित ,
दिनकर को रख आता कौन?
पृथ्वी, मंगल , बुध, शुक्र को,
वृत्त में गोल घुमाता कौन?
=====
अजय अमिताभ सुमन
सर्वाधिकार सुरक्षित
Wednesday, March 8, 2023
दिनकर की दीप्ति को आखिर
ईश्वर की शक्ति असीम और अपरम्पार है। सूरज की रोशनी आखिर धरती पर कैसे पहुंचती है। धरती अनेक मौसम आते हैं। परंतु उनको बारी बारी से एक क्रम में कौन लाता है? धरती को और सौर मंडल के अनेक तारों और ग्रहों को कौन थामे रहता है? आखिर कौन है वो शक्ति?ईश्वर की असीम शक्ति को रेखांकित करती हुई कविता।
दिनकर की दीप्ति को आखिर,
अवनि पर पहुंचाता कौन?
शीत ग्रीष्म वृष्टि को क्रम से,
एक एक कर लाता कौन?
=====
एक अहन को तृण हस्त में,
रख पाना ना आसां है,
किंतु उसकी पाणि में शशि ,
मुष्टि में कहकशाँ है?
=====
दिनकर को रचता अंतर में,
तारों को धरता अंदर में,
ग्रह को रखता जो अभ्यंतर,
परम तत्व वो शक्ति कौन?
=====
दिनकर की दीप्ति को आखिर,
अवनि पर पहुंचाता कौन?
शीत ग्रीष्म वृष्टि को क्रम से,
एक एक कर लाता कौन?
=====
अजय अमिताभ सुमन
सर्वाधिकार सुरक्षित
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Sunday, February 26, 2023
रोजी रोटी के क्या दाने
Sunday, February 5, 2023
ठंडी क्या आफत है भाई
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