Saturday, November 4, 2023

अनुसंधान सत का

कलतक जो जीवन जाना था,
है जीवन क्या अनजाना था। 
छद्म तथ्य  से  लड़ते लड़ते,
पथ  अन्वेषण  करते करते,
दिवस साल अतीत हुए कब,
हफ्ते मास व्यतीत  हुए जब,
जाना जो अब तक जाना था,
वो सत ना था पहचाना  था।
इस जग का तो कथ्य यही है,
जग  अंतर  नेपथ्य यही है,
जिसकी यहाँ प्रतीति होती ,
ह्रदय रूष्ट कभी प्रीति होती।
नयनों को  दिखता जो पग में,
कहाँ कभी टिकता वो जग में।
जग परिलक्षित बस माया है,
स्वप्न दृश्य सम भ्रम काया है,
मरू  में  पानी  दृष्टित  जैसे,
चित्त  में  सृष्टि  सृष्टित  वैसे,
जग भ्रम है अनुमान हो कैसे?
सत का  अनुसंधान  हो कैसे?

अजय अमिताभ सुमन 

Sunday, October 29, 2023

गर भिन्नता स्वीकार ना हो


क्या भला हो देश का गर भिन्नता स्वीकार ना हो।

देश के उत्थान में व्यवधान है बाधा गरीबी।

धर्म जाति भिन्नता ना , विघ्न है ब्याधा गरीबी।

किन्तु इसका ज्ञान हो हाँ ,मेधा का अपमान हो ना।

धर्म जाति  प्रान्त आदि , एकता प्रतिमान हों हाँ।

ज्ञान, बुद्धि, प्रज्ञा शुद्धि, आ सभी में हम जगाएँ।

सूत्र हो अभिन्नता का ,साथ डग मिलकर बढ़ाएँ।   

इस वतन के देशवासी, प्रांत भिन्न वेश भाषा भाषी,

रूप जाति रंग भिन्न अब आ कहें पर एक हैं सब?

धर्म जाति तोड़ने का अब यहाँ हथियार ना हो।

क्या भला हो देश का गर भिन्नता स्वीकार ना हो।


अजय अमिताभ सुमन

Saturday, October 21, 2023

स्वीकारोक्ति :एक राजपूत की:

निज जाति गुणगान ये सारा ,
क्यूं कर मैंने ना स्वीकारा।
राजपूत हूं बात सही है, 
पर मुझमें वो बात नही है।

क्या वीर थे वो सेनानी, 
क्षत्रियों की अमिट कहानी।
महाराणाप्रताप कुंवरसिंह 
क्या थे योद्धा स्वअभिमानी।

प्रभु राम जीवन अध्याय , 
प्राण जाय पर वचन न जाय।
आज समय की मांग नहीं है 
सत्यनिष्ठ कोई बन पाय।

शोणित में अंगार नहीं है 
सीने में हुंकार नहीं है।
राजपूत के वचनों में जो 
होता था वो धार नहीं है।

नियति का जो कालचक्र है 
सर्वप्रथम अब हुआ अर्थ है।
वर्तमान की चाह अलग कि 
शौर्य पराक्रम वृथा व्यर्थ है।

निज वाणी पर टिक रह जाना 
आज समय की मांग नहीं है।
वादे पर हीं मर मिट जाना, 
आज समय की मांग नहीं है।

आज वक्त कहता ये मुझसे , 
शत्रु मित्र की बात नहीं है।
एक आचरण श्रेयकर अब तो,
अर्थ संचयन बात सही है।

अर्थ संचयन करता रहता , 
निज वादे पे टिके न रहता।
राजपूत जो धारण करते 
ओज तेज ना रहा हमारा।
निज जाति सम्मान था प्यारा, 
पर इसकारण ना स्वीकारा।

अजय अमिताभ सुमन

Saturday, October 14, 2023

काम,क्रोध,भोग आदि मोक्ष भी परमार्थ है

काम,क्रोध,भोग आदि मोक्ष भी परमार्थ है


कृष्ण में अभिव्यक्ति है शक्ति की भक्ति की,

कर्म से आसक्ति तो फल से भी विरक्ति की।

राधा के कान्हा तो शकुनि के छलिया हैं,

काल दुर्योधन के  मुरली के रसिया हैं। 

कल्मष विकर्म आदि पातक प्रतिकूल वो,

धर्म कर्म मर्म  आदि जिनके अनुकूल हो।

सृष्टि की क्रिया प्रतिक्रिया के चक्र हैं,

सृष्टि के कर्ता भी कारक पर अक्र हैं।

साम,दाम,दंड, भेद ,विषदंत आवेग आदि,

लोभ का संवेग ना हीं मोह संवेग व्याधि।

युद्ध हो समक्ष गर जो शस्त्रों में दक्ष हैं,

पक्ष ना विपक्ष में ना कोई समकक्ष है।

आगत जो काल भी है , काल जो व्यतीत भी,

चल रहा जो आज भी है , गुजरा अतीत भी।

मन की चंचलता में, चित्त के अवधारण में,

सृष्टि की सृजना  संरक्षण  संहारण में।

रूप रंग देह धारी दृश्य दृष्टित भिन्न वो,

सृष्टि की भिन्नता से भिन्न अवच्छिन्न वो।

कृष्ण सर्व सत्व आदि  तत्व अनेकार्थ हैं,

काम,क्रोध,भोग आदि मोक्ष भी परमार्थ है।      


अजय अमिताभ सुमन 

Saturday, October 7, 2023

तेरा यूं मुकर जाना

 होगा क्या मुकरोगे,तुम जो किसी बात पे?

बिगड़ेगा तेरा क्या इतनी सी बात पे?

कहते तो ठीक हो पर याद जभी आओगे,

जेहन में बरबस बरबाद याद आओगे।

याद रह जायेगा ,तेरा यूँ बदलना,

कि करके वो वादा, वादे पे मुकरना।

किया किसपे भरोसा ये शिकवा रहेगा,

इस खोटे से रिश्ते झूठे से जज्बात पे।

गर ना सुधर जाते हो इतनी सी बाते पे,

गर तुम मुकर जाते हो इतनी सी बाते पे। 


अजय अमिताभ सुमन 

Saturday, September 30, 2023

इम्तिहान

इम्तिहान


खुदा ये तू भी तेरा जहान क्या है? 

सफर ये कैसा तेरा इम्तिहान क्या हैं? 

कि दुनिया भी है तेरी और बंदे भी तेरे, 

और पूछते तुझीसे  पहचान क्या है? 


अजय अमिताभ सुमन 

Saturday, July 1, 2023

शौक-ए-आदम

 दुनिया ये तेरी मेरी ,फरक फकत के यूं है,

ना आरजू हुनुज है , ना कोई जुस्तजू हैI


दियार-ए-खंजर माफिक, है मंजर कायनात के,

ताऊन से भी उसरत, तबियत हालात केI


धुएं का असर है कि , लहर इक सड़ा हुआ,

जहर में बसर है ये , खाक में पड़ा हुआ।


बह रही ना हर सहर ,मसर्रत बहार की, 

शामें है शाम-ए-हिज्र ,रातें शब-ए-फ़िराक़ कीI


सजदे तो मैं भी रखता ,रहगुजर में माबूद,

फकत तल्खी-ए-जिस्त से ,रूह तन्हा रंज-ए-वजूद।


चलो चलें पूरा करने ,अपने आपने शौक,

तू पैदा कर नस्ल-ए-आदम, मैं मुकर्रर अपनी मौतI


अजय अमिताभ सुमन

Friday, April 28, 2023

हिंदू कौन

हिंदू कौन,
क्या कोई पंथ या मजहबी विकृति है?
नहीं, गठजोड़ है संस्कृतियों का ,ये सबकी स्वीकृति है।
हिंदू वो भी हैं जो भगवान को मानते हैं,
हिंदू वो भी हैं जो भगवान को ना मानते है,
और वो भी जो खुद को हिंदू नहीं मानते हैं।
यहां योगी के लिए योग तो भोगी के लिए भोग है ,
भक्ति,नृत्य, ज्ञान,तंत्र, मदिरा भी ना अवरोध है।
तभी तो इसमें हैं कृष्ण भी शिव भी ,प्रभु राम भी,
चार्वाक भी इसी में तो खानखाना रहमान भी।
बुद्ध , गोरख, कबीर ,नानक, इसमें रविदास भी,
महावीर, साईबाबा , तो मीरा, सूरदास भी।
आदमी तो आदमी पत्थर का भी उपयोग है,
मतों में है विरोध पर विरोध में सहयोग है।
जिसमें शामिल हैं सब जो सबमें युक्त है,
हिंदुत्व कोई बंधन नहीं ये सर्वबंधन मुक्त है।

अजय अमिताभ सुमन

Sunday, April 23, 2023

हवाओं पर कोई कहानी लिखूं,


हवाओं पर कोई  कहानी लिखूं,

अपनी मैं क्यों जिंदगानी लिखूं?

लहरें क्या सागर में बनना बिछड़ना है ,

मिट्टी का जीवन मिट्टी में बिखरना है,

हंसना कभी रोना निखरना बिफरना,

है जन्मों की आदत पुरानी लिखूं?

हवाओं पर कोई कहानी लिखूं,

अपनी मैं क्यों जिंदगानी लिखूं?


अजय अमिताभ सुमन

Saturday, April 8, 2023

बाजार में मिला नहीं

 तू भी क्या चीज है कि 

नाम का गिला नहीं,

शोहरत  की दौड़ में थे 

सब तू हिला नहीं।


नफासत के पीछे 

कुछ विरासत के पीछे ,

कुछ रोजी और रोटी 

सियासत  के पीछे।


एक तू है कि नाम ना 

काम की  फिकर है,

बदनाम भी है पूरा 

फिर भी बेफिकर है?


रियासत की दौड़ में थे 

सब तू मिला नहीं,

माजरा ये क्या है  

बाजार में  हिला  नहीं?


अजय अमिताभ सुमन

सर्वाधिकार सुरक्षित

Saturday, April 1, 2023

भाप बना पानी सागर से

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पानी का स्वभाव है ऊपर से नीचे को बहना। आप पानी को कहीं भी रख दें, वो सर्वदा नीचे की ओर बहता है, फिर चाहे वो नदिया हो या कि झरना। पानी को अपने स्वभाव से विपरित दिशा में , यानी कि नीचे से ऊपर ले जाने में अथक परिश्रम करने पड़ते हैं, फिर चाहे कि वो नीचे से छत पर हीं ले जाना क्यों ना हो। लेकिन मिट्टी का जल पौधों में जड़ों द्वारा खींचकर पत्तों पर ले जाना कैसे संभव हो पाया? आखिर कौन सी वो शक्ति है जो पौधों में पानी को अपने स्वभाव के विपरित दिशा में , अर्थात नीचे से ऊपर की ओर जाने को बाध्य करती है?
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भाप बना पानी सागर से
बादल पर ले जाता कौन
=====
भाप बना पानी सागर से, 
बादल पर ले जाता कौन?
और भाप को बुंद बना फिर,
सागर में बरसाता कौन?
=====
छत से  तल को नीचे पानी ,
बहते बहते खुद हीं जाय,
किंतु ऊपर छत को पानी ,
चढ़े नहीं बिन किए उपाय।
=====
क्योंकि नीचे से पानी खुद ,
ना ऊपर को  चढ़ पाता है,
श्रम करने पड़ते कितने पानी ,
से तब नर लड़ पाता है।
=====
पर अज्ञात पेड़ में कैसे, 
पानी पत्तों  पर गढ़ जाए?
मिट्टी का पानी जड़ से ये, 
कैसे ऊपर को चढ़ पाए?
=====
नीचे से ऊपर को पानी,  
पौधों में रख आता कौन?
भाप बना पानी सागर से,
बादल पर ले जाता कौन?
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और भाप को बुंद बना फिर,
सागर में बरसाता कौन?
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अजय अमिताभ सुमन:
सर्वाधिकार सुरक्षित 
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Monday, March 13, 2023

एक केंद्र में कर स्थापित


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सौर मंडल को रचना कितनी व्यवस्थित है। एक केंद्र में सूर्य स्थापित और अनगिनत समय से अपने अपने कक्ष में सूर्य की परिक्रमा करते हुए इसके ग्रह। आखिर कौन सी वो शक्ति है जो अनगिनत समय सूरज के चारों तरफ ग्रहों को व्यवस्थित तरीके से एक हीं कक्ष में परिक्रमा करवा रही है? आखिर कौन है सौर मंडल की सुव्यवस्था का आधार?
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एक केंद्र में कर स्थापित
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एक केंद्र में कर स्थापित ,
दिनकर को रख आता कौन?
पृथ्वी, मंगल , बुध, शुक्र को,
वृत्त में गोल घुमाता कौन?
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निशा बाद प्रात को लाता,
रजनी में हिमकर चमकाता,
जभी आर्त्त हो धरा पुकारे,
जलधर से पानी बरसाता।
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अगर हमे ना कोई उठाये,
सुप्ति से ना हमें जगाए ,
शयन कक्ष की सुस्ती में रहते,
हमको ना कोई बताए।
=====
पर सदियों से उठा उठा कर ,
खग को प्रतिदिन बता बता कर,
सूरज को नित रोज जगा कर,
प्राची से ले आता कौन?
=====
एक केंद्र में कर स्थापित ,
दिनकर को रख आता कौन?
पृथ्वी, मंगल , बुध, शुक्र को,
वृत्त में गोल घुमाता कौन?
=====
अजय अमिताभ सुमन
सर्वाधिकार सुरक्षित

Wednesday, March 8, 2023

दिनकर की दीप्ति को आखिर

 


ईश्वर की शक्ति असीम और अपरम्पार है। सूरज की रोशनी आखिर धरती पर कैसे पहुंचती है। धरती अनेक मौसम आते हैं। परंतु उनको बारी बारी से एक क्रम में कौन लाता है? धरती को और सौर मंडल के अनेक तारों और ग्रहों को कौन थामे रहता है? आखिर कौन है वो शक्ति?ईश्वर की असीम शक्ति को रेखांकित करती हुई कविता।

=====

दिनकर की दीप्ति को आखिर,

अवनि पर पहुंचाता कौन?

शीत ग्रीष्म वृष्टि को क्रम से,

एक एक कर लाता कौन?

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एक अहन को तृण हस्त में,

रख पाना ना आसां है,

किंतु उसकी पाणि में शशि ,

मुष्टि में कहकशाँ है?

=====

दिनकर को रचता अंतर में,

तारों को धरता अंदर में,

ग्रह को रखता जो अभ्यंतर,

परम तत्व वो शक्ति कौन?

=====

दिनकर की दीप्ति को आखिर,

अवनि पर पहुंचाता कौन?

शीत ग्रीष्म वृष्टि को क्रम से,

एक एक कर लाता कौन?

=====

अजय अमिताभ सुमन

सर्वाधिकार सुरक्षित

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Sunday, February 26, 2023

रोजी रोटी के क्या दाने


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एक व्यक्ति इस जीवन में आया है तो जीवन को चलाने के लिए जीवन पर्यंत उसे अथक प्रयास भी करने पड़ते हैं। लेकिन इस जीवन पर्यंत अथक परिश्रम करने के चक्कर में आदमी पूरा का पूरा घनचक्कर बन जाता है। इसी विषय वस्तु पर आधारित प्रस्तुत है हास्य व्ययंगात्मक कविता , रोजी रोटी के क्या दाने, खाने बिन खाने पछताने।
=====
रोजी रोटी के क्या दाने,
खाने बिन खाने पछताने।
=====
रोजी रोटी के चक्कर में,
साहब कैसे बीन बजाते,
भैंस चुगाली करती रहती,
राग भैरवी मिल सब गाते,
माथे पर ताले लग जाय, 
मंद बुद्धि बंदा बन जाय ,
और लोग बस देते ताने,
रोजी रोटी के क्या दाने,
खाने बिन खाने पछताने।
=====
रोजी रोटी चले हथौड़े,
हौले माथे सब बम फोड़े,
जो भी बाल बचे थे सर पे,
एक एक करके सब तोड़े,
कंघी कंघा काम न आए,
तेल ना कोई असर दिखाए,
है माथे चंदा उग आने,
रोजी रोटी के क्या दाने,
खाने बिन खाने पछताने।
=====
कभी सांप को रस्सी समझे,
कभी नीम को लस्सी समझे ,
जपते जपते रोटी रोटी,
क्या ना करता छीनखसोटी,
प्रति दिन होता यही उपाए,
किसी भांति रोटी आ जाए,
देखे रस्ते या अनजाने, 
रोजी रोटी के क्या दाने,
खाने बिन खाने पछताने।
=====
रोजी रोटी सब मन भाए,
ना खाए तो  जी ललचाए,
जो खाए तो जी जल जाए,
छुट्टी करने पर शामत है,
छुट्टी होने पर आफत है,
बिन वेतन ना शराफत है,
यही खुशी भी गम के ताने ,
रोजी रोटी के क्या दाने,
खाने बिन खाने पछताने।
=====
या दिल्ली हो या कलकत्ता,
सबसे ऊपर मासिक भत्ता,
आंखो पर चश्मा  खिलता है,
चालीस में अस्सी दिखता है,
वेतन का बबुआ ये चक्कर ,
पूरा का पूरा घनचक्कर,
कमर टूटी जो चले हिलाने,
रोजी रोटी के क्या दाने,
खाने बिन खाने पछताने।
=====
रोटी ऐसा दिन दिखलाती,
अनजाने में भी नचवाती,
फटी जेब फिर भी भगवाती,
रोजी के आपा धापी ने,
गुल खिलवाया ऐसा भी कि,
कहने को तो शहर चले थे,
पर साहब जा पहुंचे थाने,
रोजी रोटी के क्या दाने,
खाने बिन खाने पछताने।
=====
रोजी रोटी के क्या दाने,
खाने बिन खाने पछताने।
=====
अजय अमिताभ सुमन
सर्वाधिकार सुरक्षित 
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Sunday, February 5, 2023

ठंडी क्या आफत है भाई


ठंडी क्या आफत है भाई ,
सर पे टोपी बदन रजाई ,
भूले सारे  सैर सपाटा ,
गलियों में कैसा सन्नाटा,
दादी का कैसा खर्राटा, 
जैसे कोई धड़म पटाखा ,
पानी से तब हाथ कटे है , 
जब जब आटा हाथ सने है,
भिंडी लौकी कटे ना भाई ,
सर पे टोपी बदन रजाई ,
ठंडी क्या आफत है भाई।

भूल गए सब चादर वादर, 
कूलर भी ना रहा बिरादर,
क्या दुबले क्या मोटे तगड़े ,
एक एक कर सबको  रगड़े,
थर थर थर थर कंपते गात ,
और मुंह से निकले भाप , 
बाथ रूम को जब भी जाते,
बूंद बूंद से बच कर जाते, 
मौसम ने क्या ली अंगड़ाई,
सर पे टोपी बदन रजाई ,
ठंडी क्या आफत है भाई।

ऐ.सी.ने फुरसत पाई है, 
कूलर दीखते हरजाई है ,
बिस्तर बिस्तर छाई आलस, 
धूप बड़ी दिल देती ढाढ़स,   
कुहासा अम्बर को छाया ,
गरम चाय को जी ललचाया,
स्वेटर दास्ताने तन भाए ,
कि मन भर भर भर को चाहे ,
गरम पकौड़े ,गरम कढ़ाई ,
सर पे टोपी बदन रजाई ,
ठंडी क्या आफत है भाई।

सन सन सन हवा जो आती,
कानों को क्या खूब सताती ,
कट कट कट दांत बजे जब,
गरम आग पर हम तने  तब,
चाचा चाची काका काकी,
साथ बैठ कर घुर तपाते,
राग बजाते एक सुर में,
बैठे बैठे मिल सब गाते,
इससे बड़ी ना विपदा भाई,
सर पे टोपी बदन रजाई ,
ठंडी क्या आफत है भाई।

अजय अमिताभ सुमन:
सर्वाधिकार सुरक्षित 

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