Monday, August 29, 2022

जनतंत्र या युद्धतंत्र

मनुष्य और पशु में अनेक अंतर हैं। इनमें से एक महत्वपूर्ण अंतर यह भी है कि जानवर अपने समाज के समग्र कल्याण के बारे में सोच नहीं सकता, जबकि मानव न केवल सोच सकता हैं अपितु और इस सोच की दिशा में कार्य भी कर सकता है।

जबकि पशु का जीवन उसकी पशु वृत्ति से हीं संचालित होता है। इस सृष्टि में जो अपने को सबसे योग्य साबित कर पाता है , वो हीं जीने के योग्य माना जाता है । इन परिस्थितियों में पशु वृत्ति एक पशु के अस्तित्व के लिए महत्वपूर्ण कड़ी भी साबित होती है। 

लेकिन इसका दूसरा पहलु ये भी है कि अपनी इसी सोच के कारण एक जानवर संतानोत्तपत्ति और क्षुधा के अलावा कुछ और सोच नहीं सकता । संतान उत्त्पन्न करना, खाना के मारना और खाने के लिए मर जाना, यही मुख्य केंद्र बिंदु होता है जानवर के जीवन का।

जबकि ज्यादा से ज्यादा लोगो के जीवन बनाने की सोंच ने मानव को बेहतर से बेहतर व्यवस्था को अपनाने को मजबूर किया । मानव की इसी सोच ने उसे घुम्मकड़ और खानाबदोश जीवन शैली का त्याग कर सामंती सभ्यता को अपनाने के लिए प्रेरित किया।

 सबकी भलाई ज्यादा से ज्यादा हो सके, अपनी इसी सोच के कारण मानव ने फिर सामंतवादी व्यवस्था के स्थान पर राजतंत्र को अपना लिया ताकि एक सुव्यवस्थित और सुनियांत्रित राजव्यस्था द्वारा ज्यादा से ज्यादा लोगों की सुरक्षा और ज्यादा से ज्यादा जनकल्याण हो सके।

जब राजशाही व्यवस्था व्यवस्था द्वारा सत्ता एक व्यक्ति के हाथों केन्द्रित हो गई और समग्र जनकल्याण के लक्ष्य को हासिल करने में सक्षम ना हो सकी तब मानव ने राजशाही का त्याग कर लोकतांत्रिक व्यवथा का वरण कर लिया। वर्तमान समय में लोकतांत्रिक व्यवस्था हीं विश्व के अधिकांश देशों में प्रचलित है। 

इतिहास गवाह है, मानव ने न केवल समग्र जनकल्याण की परिकल्पना की अपितु एक ऐसे समाज के निर्माण के लिए कड़ी मेहनत भी जो आम लोगों के कल्याण के लिए बेहतर विकल्प प्रदान कर सके। लोकतांत्रिक व्यव्यथा मानव के इसी सोच का परिणाम है।

लोकतांत्रिक व्यवस्था के मूल में आम जनता का कल्याण हीं होता है । जनतंत्र के मुलभूत विचार को संयुक्त राज्य अमरीका के महान राष्ट्रपतियों में से एक राष्ट्रपति श्री अब्राहम लिंकन के शब्दों में संक्षेपित कर प्रस्तुत किया जा सकता है। 

श्री अब्राहम लिंकन ने एक बार कहा था, "लोकतंत्र लोगों का, लोगों के लिए और लोगों द्वारा शासन है"। इसका तात्पर्य है कि लोकतंत्र सरकार वो एक प्रणाली है जिसमें आम जनता के कल्याण को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जाती है।

आम आदमी अपने जन प्रतिनिधियों को इस उम्मीद के साथ वोट देते हैं कि वो आम आदमी की दशा और दिशा में सुधार के लिए उत्कृष्ट कानून बनाएंगे। एक आम आदमी में ये आशा होती है कि जन प्रतिनिधि ऐसे कार्य करेंगे ताकि इनकी स्थिति में सुधार हो। इसी सोच और इसी दृष्टिकोण के साथ ये जन प्रतिनिधि कार्य करेंगे, ऐसी उम्मीद होती है आम आदमी की ।

 लेकिन क्या वास्तव में ऐसा ही हो रहा है ? देखने वाली बात ये है कि राजनैतिक पार्टियाँ और जनता द्वारा चुने गए जन प्रतिनिधी जनता की उम्मीदों पर खड़े उतर रहे हैं या नहीं ? हाल फिलहाल की राजनैतिक घटनाएं कुछ और हीं संकेत कर रहीं हैं।

इस लोकतांत्रिक व्यवस्था में ये अपेक्षा की जाती है की जन प्रतिनिधि अपने कामों को आधार बना कर हीं जनता का वोट मांगेंगे। परंतु हम जो देख रहे हैं, वह यह है कि इन राजनीतिक नेताओं और दलों को आम जनता के हितों की कोई परवाह नहीं है।

हाल फिलहाल में पश्चिम बंगाल , बिहार, उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, दिल्ली इत्यादि राज्यों में जो भी राजनैतिक घटनाएं दृष्टिगोचित हो रहीं है , वो कुछ ऐसा हीं परिलक्षित कर रही हैं। एक बात तो स्पष्ट है केंद्र और राज्य सरकारों के बीच तालमेल का स्पष्ट आभाव दिख रहा है । 

पश्चिम बंगाल में चुनावों के बाद वृहद पैमाने पर भड़की हुई हिंसा, उत्तर प्रदेश में चुनावी रैलियों के दौरान जन प्रतिनिधियों द्वारा एक दूसरे के खिलाफ अमर्यादित भाषा का उपयोग आखिर क्या साबित करता है? 

कभी कभी तो लगता है कि ये राजनैतिक पार्टियाँ एक दुसरे की दुश्मन हैं । राजनैतिक मंचों पर गला फाड़ फाड़ के एक दुसरे के व्यक्तित्व का मजाक उड़ना , और इस प्रक्रिया में किसी भी हद तक चले जाना इन लोगो की फितरत बनती जा रही है ।

किसी एक राजनैतिक पार्टी को कटघरे में खड़ा करना अनुचित है। महाराष्ट्र में जिस तरह शिव सेना टूटकर भारतीय जनता से मिलकर सरकार बनाती है तो बिहार में बिल्कुल विपरीत घटना क्रम दिखाई पड़ता है। 

बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार फिर भारतीय जनता पार्टी से अपना पल्ला झाड़कर आर. जे. डी. के साथ मिल जाते हैं तो सरकार के बदलने के साथ साथ हीं संजय राउत का जेल के अंदर जाना और दिल्ली में आम आदमी पार्टी पर रेड पड़ना। अजीब तरह की राजनीति दिखाई पड़ रही है इस देश में।  

ऐसा लगता है लोगों द्वारा चुने जाने के बाद, ये नेता अपने मिशन से बिल्कुल भटक जा रहे हैं । आज कल जब हम टी.वी. पर इन नेताओं द्वारा किए गए राजनीतिक डिबेट को देखते है तो हमें दिखाई पड़ता हीं क्या है, केवल अमर्यादित आरोपों और प्रत्यारोपों के सिवा।  

तमाम नेता और राजनैतिक पार्टियां आपस में लड़ने और एक-दूसरे को बेवकूफ बनाने की होड़ में लगी हुई हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि इन राजनेताओं का मुख्य लक्ष्य चुनाव जीतना हीं रह गया है। ऐसा प्रतीत हो रहा है कि केंद्र और राज्य सरकारें एक दुसरे के साथ नहीं अपितु अपने अपने विकास करने के लिए उत्सुक है । 

राजनैतिक चुनाव और युद्ध में कोई अंतर दिखाई नही पड़ रहा है। कहते हैं कि युद्ध और प्रेम में सबकुछ जायज है। परंतु आज कल का जो राजनैतिक माहौल बन पड़ा है , ऐसा लगता है कि शायद अब ये कहना उचित होगा कि युद्ध, प्रेम, राजनीति और चुनाव में सबकुछ जायज है। 

देश में राजनैतिक पार्टियों द्वारा सरकारी तंत्र जैसे कि सी . बी.आई. और ई. डी.का दुरुपयोग, जाति और धर्म के नाम पर हिंसा करने और जन प्रतिनिधियों द्वारा आम जनता में हिंसात्मक प्रवृत्ति को फ़ैलाने की कोशिश और क्या साबित करती है? 

आम आदमी पार्टी का मुख्य मुद्दा आम आदमी का कल्याण ही रहा है। लेकिन जिस तरह शराब के दुकानों को धडदल्ले से शराब बेचने की छूट दिल्ली में दी जा रही थी उससे जनता का किस तरह से भला हो रहा था, ये बिल्कुल समझ से बाहर है। 

अभी अभी 28 अगस्त को कोर्ट की ऑर्डर के तहत ट्विन टावर को ध्वस्त किया गया। कोर्ट के आर्डर के कारण भस्म हो गया भ्रष्टाचार का आलीशान भवन । लेकिन ट्विन टावर का ध्वस्त होना इस बात को फिर से साबित करता है कि भष्टाचार की जड़े हमारे जनतांत्रिक मूल्यों को बिल्कुल दीमक की तरह चाट रही हैं। 

ये तो अच्छा है कोर्ट ने लोकतांत्रिक ताने बाने को बचाये रखने में अबतक महत्वपूर्ण भूमिका अदा की हैं । लेकिन महत्वपूर्ण सवाल है कि क्या केवल कोर्ट की हीं जिम्मेवारी है कि वो लोकतांत्रिक मूल्यों को बचा कर रखे ?

फिर आम जनता द्वारा चुने हुए इन जन प्रतिनिधियों का क्या औचित्य ? क्या राजनैतिक पार्टियाँ और जन प्रतिनिधि निज स्वार्थ की पूर्ति हेतु हीं काम करते रहेंगे , जैसे कि आजकल के राजनैतिक परिदृश्य में दृष्टिगोचित हो रहा है । 

जनकल्याण की भावना का स्थान स्व पार्टी कल्याण ने ले लिया है और निहित स्वार्थ के लिए राजनैतिक पार्टियां और जनप्रतिनिधी किसी भी हद तक जाने को ऐसे तैयार बैठे हुए है, जैसे कि देश में जनतंत्र नहीं अपितु युद्धतंत्र हीं हैं।

यह देश में बहुत ही दुखद परन्तु सच्ची स्थिति है। ऐसा प्रतीत होता है कि शासन की वर्तमान शैली पूरी तरह से पशु प्रवृत्ति पर हावी है। जिस पशु प्रवृत्ति से आगे बढ़कर मानव ने बेहतर से बेहतर शासन प्रणाली को अपनाया , अब वो सारे के सारे मानवीय मूल्य धराशायी प्रतीत हो रहे हैं । 

केंद्र की सरकार हो या की राज्य की सरकारें, सारी की सारी सरकारें युद्ध की प्रवृत्ति से संचालित हो रही है। जिसको जहाँ मौका मिल रहा है , एक दुसरे को हानि पहुँचाने से चुक नहीं रहे हैं । ऐसा प्रतीत होता है कि शासन का मूल रूप अब लोकतंत्र के बजाय युद्धतंत्र है। 

सवाल यह है कि शासन के इस मौजूदा स्वरूप से कैसे लड़ा जाए? इस प्रवृत्ति को मिटाने का लोकतांत्रिक तरीका क्या हो सकता है? आखिर कैसे इन राजनैतिक पार्टियों को जन प्रतिनिधियों को समझाया जाये जनतांत्रिक शासन व्यवस्था का आधार जनता का कल्याण है , ना कि खुद का कल्याण ।

प्रजातान्त्रिक व्यवस्था के मूल में जनता हीं होती है तो इस प्रश्न का जवाब जनता को हीं देना होगा। इस समस्या का समाधान भी आम जनता को हीं निकलना होगा ? लेकिन कब और कैसे , ये तो भविष्य हीं बता पायेगा। लेकिन हमारे पास इसका समाधान निकलने तक इंतजार करने के अलावा कोई और विकल्प बचा हीं क्या है?

अजय अमिताभ सुमन: सर्वाधिकार सुरक्षित

Sunday, August 28, 2022

वर्तमान से वक्त बचा लो: पंचम भाग

 

विवाद अक्सर वहीं होता है, जहां ज्ञान नहीं अपितु अज्ञान का वास होता है। जहाँ ज्ञान की प्रत्यक्ष अनुभूति  होती है, वहाँ  वाद, विवाद या प्रतिवाद क्या स्थान ?  आदमी के हाथों में  वर्तमान समय के अलावा कुछ भी नहीं होता। बेहतर तो ये है कि इस अनमोल पूंजी को  वाद, प्रतिवाद और विवाद में बर्बाद करने के बजाय अर्थयुक्त संवाद में लगाया जाए, ताकि किसी अर्थपूर्ण निष्कर्ष पर पहुंचा जा सके। प्रस्तुत है मेरी कविता "वर्तमान से वक्त बचा लो तुम निज के निर्माण में" का पंचम भाग।

==============

वर्तमान से वक्त बचा लो

पंचम भाग 

==============

क्या रखा है वक्त गँवाने 

औरों के आख्यान में,

वर्तमान से वक्त बचा लो 

तुम निज के निर्माण में।

==============

अर्धसत्य पर कथ्य क्या हो

 वाद और प्रतिवाद कैसा?

तथ्य का अनुमान क्या हो 

ज्ञान क्या संवाद कैसा?

==============

प्राप्त क्या बिन शोध के 

बिन बोध के अज्ञान में ? 

वर्तमान से वक्त बचा लो 

तुम निज के निर्माण में।

==============

जीवन है तो प्रेम मिलेगा 

नफरत के भी हाले होंगे ,

अमृत का भी पान मिलेगा 

जहर उगलते प्याले होंगे ,

==============

समता का तू भाव जगा 

क्या हार मिले सम्मान में?

वर्तमान से वक्त बचा लो 

तुम निज के निर्माण में।

==============

जो बिता वो भूले नहीं 

भय है उससे जो आएगा ,

कर्म रचाता मानव जैसा 

वैसा हीं फल पायेगा।

==============

यही एक है अटल सत्य 

कि रचा बसा लो प्राण में , 

वर्तमान से वक्त बचा लो 

तुम निज के निर्माण में।

==============

क्या रखा है वक्त गँवाने 

औरों के आख्यान में,

वर्तमान से वक्त बचा लो 

तुम निज के निर्माण में।

==============

अजय अमिताभ सुमन:

सर्वाधिकार सुरक्षित 

Saturday, August 13, 2022

पलटू



इस सृष्टि में बदलाहटपन स्वाभाविक है। लेकिन इस बदलाहटपन में भी एक नियमितता है। एक नियत समय पर हीं दिन आता है, रात होती है। एक नियत समय पर हीं मौसम बदलते हैं। क्या हो अगर दिन रात में बदलने लगे? समुद्र सारे नियमों को ताक पर रखकर धरती पर उमड़ने को उतारू हो जाए? सीधी सी बात है , अनिश्चितता का माहौल बन जायेगा l भारतीय राजनीति में कुछ इसी तरह की अनिश्चितता का माहौल बनने लगा है। माना कि राजनीति में स्थाई मित्र और स्थाई शत्रु नहीं होते , परंतु इस अनिश्चितता के माहौल में कुछ तो निश्चितता हो। इस दल बदलू, सत्ता चिपकू और पलटूगिरी से जनता का भला कैसे हो सकता है? प्रस्तुत है मेरी व्ययंगात्मक कविता "मान गए भई पलटू राम"। 

======

तेरी पर चलती रहे दुकान,

मान गए भई पलटू राम।

======

कभी भतीजा अच्छा लगता,

कभी भतीजा कच्चा लगता,

वोहीं जाने क्या सच्चा लगता,

ताऊ का कब  नया पैगाम ,

अदलू, बदलू, डबलू  राम,

तेरी पर चलती रहे दुकान।

======

जहर उगलते अपने चाचा,

जहर निगलते अपने चाचा,

नीलकंठ बन छलते चाचा,

अजब गजब है तेरे काम ,

ताऊ चाचा रे तुझे  प्रणाम,

तेरी पर चलती रहे दुकान।

======

केवल चाचा हीं ना कम है,

भतीजा भी एटम बम है,

कल गरम था आज नरम है,

ये भी कम ना सलटू राम,

भतीजे को भी हो सलाम,

तेरी पर चलती रहे दुकान।

======

मौसम बदले चाचा बदले,

भतीजे भी कम ना बदले,

पकड़े गर्दन गले भी पड़ले।

क्या बच्चा क्या चाचा जान,

ये भी वो भी पलटू राम,

इनकी चलती रहे दुकान।

======

कभी ईधर को प्यार जताए,

कभी उधर पर कुतर कर खाए,

कब किसपे ये दिल आ जाए, 

कभी ईश्क कभी लड़े धड़ाम,

रिश्ते नाते सब कुर्बान,

तेरी पर चलती रहे दुकान।

======

थूक चाट के बात बना ले,

जो  मित्र था घात लगा ले,

कुर्सी को हीं जात बना ले,

कुर्सी से हीं दुआ सलाम,

मान गए भई पलटू राम,

तेरी पर चलती रहे दुकान।

======

अहम गरम है भरम यही है,

ना आंखों में शरम कहीं है,

सबकुछ सत्ता धरम यही है,

क्या वादे कैसी है जुबान ,

कुर्सी चिपकू बदलू राम,

तेरी पर चलती रहे दुकान।

======

चाचा भतीजा की जोड़ी कैसी,

बुआ और बबुआ के जैसी,

लपट कपट कर झटक हो वैसी,

ताक पे रख कर सब सम्मान,

धरम करम इज्जत  ईमान,

तेरी पर चलती रहे दुकान।

======

अदलू, बदलू ,झबलू राम,

मान  गए भई पलटू राम।

======

अजय अमिताभ सुमन

सर्वाधिकार सुरक्षित 


Saturday, July 16, 2022

कैसे बना दुर्योधन का शरीर वज्र का


महाभारत के अंतिम पल में जब भीम और दुर्योधन के बीच  निर्णायक युद्ध चल रहा था तब भीम की अनगिनत कोशिशों के बावजूद दुर्योधन के शरीर को कोई भी हानि नहीं पहुंच रही थी। भीम द्वारा दुर्योधन के शरीर पर गदा से बार बार प्रहार करने के बावजूद दुर्योधन का शरीर जस का तस बना हुआ था।  इसका कारण ये था कि दुर्योधन के शरीर के कमर से ऊपर का हिस्सा वज्र की भांति मजबूत था।

जब भीम दुर्योधन को किसी भी प्रकार हरा नहीं पा रहे थे तब भगवान श्रीकृष्ण द्वारा निर्देशित किए जाने पर युद्ध की मर्यादा का उल्लंघन करते हुए छल द्वारा भीम ने  दुर्योधन की जांघ पर प्रहार किया जिस कारण दुर्योधन घायल हो गिर पड़ा और अंततोगत्वा उसकी मृत्यु हो गई। प्रश्न ये उठता है कि आम मानव का शरीर तो वज्र का बना नहीं होता , फिर  दुर्योधन का शरीर वज्र का कैसे बन गया था? उसका शरीर वज्रधारी किस प्रकार बना?

आम किदवंती है कि जब महाभारत का युद्ध अपने अंतिम  दौर में चल रहा था और कौरवों में केवल दुर्योधन हीं बच गया था तब कौरवों की माता गांधारी ने अपने बचे हुए एकमात्र पुत्र दुर्योधन की जान बचाने के लिए उससे कहा वो उनके सामने निर्वस्त्र होकर आ जाये।

किदवंती ये कहती हैं की दुर्योधन की माता गांधारी सत्यवती नारी थी। जब उनको ये ज्ञात हुआ कि उनके पति घृतराष्ट्र अंधे हैं, तो उन्होंने भी अपनी आंखों पर पट्टी बांध लिया।

उनकी सतित्त्व के कारण उनकी आंखों में दिव्य शक्ति आ गई थी। उनकी आंखों में इतनी ऊर्जा समाई हुई थी कि उनकी दृष्टि जिसपर भी पड़ती, वो वज्र की भांति मजबूत हो जाता। माता गांधारी अपनी इसी दिव्य शक्ति का उपयोग कर दुर्योधन का शरीर वज्र का बनाना चाहती थी। 

इसी उद्देश्य से माता गांधारी ने दुर्योधन को अपने सामने पूर्ण रूप से निर्वस्त्र होकर आने को कहा था ताकि दुर्योधन का शरीर पूर्ण रूप से वज्र की तरह मजबूत हो जाए और उसपर किसी भी भांति के अस्त्रों या शस्त्रों का प्रभाव न हो सके। 

ऐसा माना जाता है की अपनी माता की बात मानकर दुर्योधन नग्न अवस्था में हीं अपनी माता गांधारी से मिलने चल पड़ा था। परन्तु मार्ग में ही दुर्योधन की मुलाकात श्रीकृष्ण से हुई। श्रीकृष्ण ने दुर्योधन के साथ इस तरीके से मजाक किया कि दुर्योधन पूर्ण नग्न अवस्था में अपनी माता के पास नहीं जा सका।

ऐसा कहा जाता है कि जब अपनी माता की आज्ञानुसार दुर्योधन जा रहा था तो  भगवान श्रीकृष्ण ने उसे रास्ते में हीं रोक लिया और दुर्योधन से मजाक करते हुए  कहा  कि माता गांधारी के पास इस तरह नग्न अवस्था में मिलने क्यों जा रहे हो ? तुम कोई छोटे से बच्चे तो हो नहीं, फिर इस तरह का व्यवहार क्यों?

जब दुर्योधन ने पूरी बात बताई तब श्रीकृष्ण जी ने उसको अपने कमर के निचले हिस्से को पत्तों से ढक लेने के लिए कहा । इससे माता की आज्ञा का पालन भी हो जाएगा और दुर्योधन जग हंसाई  से भी बच जायेगा। दुर्योधन को श्रीकृष्ण की बात उचित हीं लगी।

दुर्योधन भगवान श्रीकृष्ण की छल पूर्ण बातों का शिकार हो गया।  श्रीकृष्ण की सलाह अनुसार उसने अपने कमर के निचले हिस्से को पत्तों से ढँक लिया और उसी अवस्था में माता फिर गांधारी के समक्ष उपस्थित हुआ। 

उसके बाद दुर्योधन की माता ने जैसे हीं अपने नेत्र खोले, उनकी दृष्टि दुर्योधन के नग्न शरीर पर पड़ी जिसकी वजह से उसका शरीर वज्र के समान कठोर हो गया। परंतु उसके जांघ मजबूत नहीं हो सके क्योकि उसकी माता  गांधारी की दृष्टि पत्तों के कारण कमर के निचले भाग पर नहीं पड़ सकी। इस कारण उसके कमर का निचला भाग कमजोर रह गया । इस तरह की कहानी हर जगह मिलती है।

किन्तु जब हम महाभारत का अध्ययन करते हैं , तो दूसरी हीं बात निकल कर आती है । पांडवों के वनवास के दौरान जब दुर्योधन को चित्रसेन नामक गंधर्व ने बंदी बना लिया था और फिर अर्जुन ने चित्रसेन से युद्ध कर दुर्योधन को छुड़ा लिया था , तब दुर्योधन आत्म ग्लानि से भर गया और आमरण अनशन पर बैठ गया।

इस बात का वर्णन महाभारत में घोषयात्रा पर्व के विपक्षाशदधिकद्विशततमोऽध्यायः में मिलता है। घोषणा पर्व में इस बात का जिक्र आता है कि दुर्योधन के आमरण अनशन पर बैठ जाने के बाद उसको कर्ण , दु:शासन और शकुनी आदि उसे अनेक प्रकार से समझाने की कोशिश करते हैं फिर भी दुर्योधन नहीं मानता।

दुर्योधन की ये अवस्था देखकर दानव घबरा जाते है कि अगर दुर्योधन मृत्यु को प्राप्त हो जाता है तो  उनका पक्ष इस दुनिया में कमजोर हो जायेगा। इस कारण वो दुर्योधन को पाताल लोक ले जाते है और उसको नाना प्रकार से समझाने की कोशिश करते हैं । इसका जिक्र कुछ इस प्रकार आता है। दानव दुर्योधन से कहते हैं:

भोः सुयोधन राजेन्द्र भरतानां कुलोहह । 

शूरैः परिवृतो नित्यं तथैव च महात्मभिः ॥ १ ॥ 

अकार्षीः साहस मिदं कस्मात् प्रायोपवेशनम् । 

आरमत्यागी हाधोयाति वाच्यतां चायशस्करीम्॥२॥

दानव बोले-भारतवंश का भार वहन करने वाले महाराज दुर्योधन ! आप सदा शूरवीरों तथा महामना पुरुषों से घिरे रहते हैं। फिर आपने यह आमरण उपवास करने का साहस क्यों किया है? आत्म हत्या करने वाला पुरुष तो अधो गतिको प्राप्त होता है और लोक में उसकी निन्दा होती है, जो अवश फैलाने वाली है॥ 

न हि कार्यविरुडेपु बहुपापेषु कर्मसु । 

मूलघातिपुसश्यन्ते बुद्धिमन्तो भवविधाः ॥ ३ ॥

जो अभी कार्यों के विरुद्ध पढ़ते हों,  जिनमें बहुत पाप भरे हो तथा जो अपना विनाश करनेवाले हो, ऐसे आत्महत्या आदि अक्षम विचार आप-जैसे बुद्धिमान पुरुष को शोभा नहीं देता ॥३॥ 

नियच्छनां मति राजन धर्मार्थसुखनाशिनीम्।

श्रूयतां तु प्रभो तश्यं दिव्यतां चारमनो नृप। 

यशःप्रतापपीयी शां हर्षवर्धनीम् ॥ ४॥

निर्मार्ण च शरीरमा तातो धैर्यमवाप्नुहि ॥ ५ ॥

प्रभो ! एक रहस्य की बात सुनिये । नरेश्वर राजन ! आपका यह आत्म हत्या सम्बन्धी विचार धर्म , अर्थ पराक्रम का नाश करने वाला तथा शत्रुओ का हर्ष बढ़ाने वाला है । 

दुर्योधन को फिर भी निराश होते देख दानव आगे बताते हैं कि दानवों ने अति श्रम करके दुर्योधन का वज्रधारी शरीर भगवान शिव की आराधना करके प्राप्त किया था।  

पूर्वकायश्च पूर्वस्ते निर्मितो वज्रसंचयैः ॥ ६ ॥

राजन् ! पूर्वकाल में हमलोगों ने तपस्या द्वारा भगवान शंकर की आराधना करके आपको प्राप्त किया था । आपके शरीर का पूर्वभाग-जो नाभि से ऊपर है वज्र समूहसे बना हुआ है ।। ६ ॥ 

अस्त्रैरभेद्यः शस्त्रैश्चाप्यधः कायश्च तेऽनघ । 

कृतः पुष्पमयो देव्या रूपतः स्त्रीमनोहरः॥ ७ ॥

वह किसी भी अस्त्र-शस्त्र से विदीर्ण नहीं हो सकता। अनघ ! उसी प्रकार आपका नाभि से नीचे का शरीर पार्वती देवी ने पुष्प मय बनाया है, जो अपने रूप-सौन्दर्यसे स्त्रियों के मनको मोहने वाला है ।। ७ ॥ 

एवमीश्वरसंयुक्तस्तव देहो नृपोत्तम । 

देव्या च राजशार्दूल दिव्यस्त्वं हि न मानुषः ॥ ८ ॥

नृप श्रेष्ठ ! इस प्रकार आपका शरीर देवी पार्वती के साथ साक्षात भगवान महेश्वर ने संघटित किया है । अतः राज सिंह ! आप मनुष्य नहीं, दिव्य पुरुष हैं ॥ ८ ॥   

इस प्रकार हम देखते हैं कि दुर्योधन के शरीर का पूर्वभाग-जो नाभि से ऊपर था , उसको भगवान शिव ने दानवों के आराधना करने पर वज्र का बनाया था और उसके शरीर के कमर से निचला भाग पार्वती देवी ने बनाया था , जो कि स्त्रियों के अनुकूल कोमल था।

दानव फिर दुर्योधन को आने वाले समय में इंद्र द्वारा छल से कर्ण के कवच कुंडल मांगे जाने की भी बात बताते हैं ।

शात्वैतच्छद्मना वज्री रक्षार्थ सव्यसाचिनः। 

कुण्डले कवचं चैव कर्णस्यापहरिष्यति ॥२२॥

इस बात को समझकर वज्र धारी इन्द्र अर्जुन की रक्षा के लिये छल करके कर्ण के कुण्डल और कवचका अपहरण कर लेंगे ॥ २२ ॥ 

तस्मादस्माभिरप्यत्र दैत्याः शतसहस्रशः। 

नियुक्ता राक्षसाश्चैव ये ते संशप्तका इति ॥ २३ ॥ 

प्रख्यातास्तेऽर्जुनं वीरं हनिष्यन्ति च मा शुचः। 

असपत्ना त्वयाहीयं भोक्तव्या वसुधा नृप ॥ २४ ॥

इसीलिये हमलोगों ने भी एक लाख दैत्यों तथा राक्षसों को इस काममें लगा रखा है, जो संशप्तक नाम से विख्यात हैं। वे वीर अर्जुनको मार डालेंगे । अतः आप शोक न करें। नरेश्वर ! आपको इस पृथ्वीका निष्कंटक राज्य भोगना है ॥ 

मा विषादं गमस्तस्मान्नैतत्त्वय्युपपद्यते। 

विनष्टे त्वयि चास्माकं पक्षो हीयेत कौरव ॥२५॥

अतः कुरुनन्दन ! आप विषाद न करें । यह आपको शोभा नहीं देता है। आपके नष्ट हो जाने पर तो हमारे पक्ष का ही नाश हो जायगा ॥ २५ ॥  

यच्च तेऽन्तर्गतं वीर भयमर्जुनसम्भवम् । 

तत्रापि विहितोऽस्माभिर्वधोपायोऽर्जुनस्य वै ॥ १९ ॥

वीर ! आपके भीतर जो अर्जुनका भय समाया हुआ है, वह भी निकाल देना चाहिये, क्योंकि हमलोगों ने अर्जुनके वध का उपाय भी कर लिया है ।। १९ ।।

हतस्य नरकस्यात्मा कर्णमूर्तिमुपाश्रितः । 

तद् वैरं संस्मरन् वीर योत्स्यते केशवार्जुनौ ॥ २० ॥

श्रीकृष्ण के हाथों जो नरकासुर मारा गया है, उसकी आत्मा कर्ण के शरीर में घुस गयी है। वीरवर ! वह (नरकासुर ) उस वैर को याद करके श्रीकृष्ण और अर्जुन से युद्ध करेगा |

इस प्रकार दुर्योधन को बहुत पहले हीं ज्ञात हो गया था कि कर्ण के साथ छल किया जायेगा । दुर्योधन को ये भी ज्ञात हो गया था कि कर्ण के शरीर में भगवान श्रीकृष्ण द्वारा मारे गए राक्षस नरकासुर का वास हो जायेगा जो दुर्योधन की तरफ से प्रचंड रूप से लड़ेगा।

इस प्रकार इस बात के लिए कर्ण को दोष नहीं दिया जा सकता कि इंद्र के द्वारा कवच कुंडल मांगे जाने पर उसने  दुर्योधन की हित का ध्यान दिए बिना कवच और कुंडल  इंद्र को समर्पित कर दिया।

अपितु दुर्योधन को स्वयं हीं भविष्य में घटने वाली इस बात से कर्ण को चेता देना चाहिए था। खैर कर्ण को ये बात पता चल हीं गई थी, क्योंकि उसके पिता सूर्य ने इस बात के लिए कर्ण को पहले हीं सावधान कर दिया था।

नरकासुर के बारे में पुराणों में लिखा गया है कि वो प्राग ज्योति नरेश था। इस क्षेत्र को आज कल आसाम के नाम से जाना जाता है।नरकासुर को वरदान प्राप्त था कि वो किसी नर द्वारा नहीं मारा जा सकता था।

इसी कारण भगवान श्री कृष्ण ने अपनी पत्नी सत्यभामा की सहायता से नरकासुर का वध किया था। दानव दुर्योधन को उसी नरकासुर के बारे में बताते हैं कि उसकी आत्मा कर्ण में प्रविष्ट होकर श्रीकृष्ण तथा अर्जुन से अपना बैर साधेगी। दानव दुर्योधन को आगे बताते हैं।

राजन् ! दैत्यों तथा राक्षसों के समुदाय क्षत्रिय योनि में उत्पन्न हुए हैं, जो आपके शत्रुओं के साथ पराक्रम पूर्वक युद्ध करेंगे। वे महाबली वीर दैत्य आपके शत्रुओं पर गदा, मुसल, शूल तथा अन्य छोटे-बड़े अस्त्र-शस्त्रों द्वारा प्रहार करेंगे || 

जब दानवों ने दुर्योधन को ये भी बताया कि उन्होंने उसकी सहायता के लिए लाखों दैत्यों और राक्षसों को लगा रखा है , तब उसका विश्वास लौट आया और उसने आमरण अनशन का विचार त्याग दिया।

इस प्रकार हम देखते हैं कि महाभारत के घोषणा पर्व में दुर्योधन के कमर से उपरी भाग के शरीर का वज्र से बना हुआ होने का कारण दानवों द्वारा शिव की आराधना के कारण बताया गया है जिसे भगवान शिव ने दानवों की उपासना करने पर बनाया था।

और दुर्योधन के शरीर का निचला भाग कोमल था क्योकि उसे माता पार्वती ने स्त्रियों को मोहने के लिए बनाया था । इस प्रकार हम देखते हैं कि माता गांधारी की दिव्य  दृष्टि के कारण नहीं अपितु भगवान शिव और माता पार्वती की कृपा के कारण , जो कि दानवों की तपस्या के कारण मिली थी, दुर्योधन का शारीर वज्र का बना था।

अजय अमिताभ सुमन: सर्वाधिकार सुरक्षित 

Monday, July 11, 2022

गुमान



खुद की धड़कन से अनजान, 
फिर किस बात का गुमान?

इतिहास गवाह है , पत्थर की कंदराओं में रहने वाला आदिम पुरुष ने अतुलनीय उपलब्धि हासिल की है। समय के साथ साथ न केवल उसने स्वयं को बदलते हुए मौसम के अनुसार ढाला अपितु समय की मांग के अनुसार पेड़ों पर जो उसने अपना बसेरा बनाया था , उसका त्याग कर जमीन पर उतर आया।

एक चौपाए से दो पैरों पर खड़े होने की दास्तान , मुठ्ठी में लकड़ी पकड़ सकने की शक्ति का विकास , पहिए की खोज और अग्नि का नियंत्रित उपयोग इसके महत्वपूर्ण खोजों में से एक है।

पत्थरों के टुकड़ों पे जीने वाला, कच्चा मांस खाने वाला आदि पुरुष, जल से डरने वाला आदि पुरुष , चांद, सूरज, आंधी , तूफान से डरने वाला आदमी समय बीतने के साथ  समंदर की गहराइयों में उतर गया।

कभी चांद की पूजा करने वाला मानव चांद पर चढ़ गया, आसमान के बादलों की गड़गड़ाहट से डरने वाला आदमी अब बादलों को चीरकर प्रतिदिन हीं यात्रा कर रहा है। कितना अद्भुत विकास रहा है आदिम पुरुष का।

पहले हर समस्या को भगवान के आश्रय डालने वाला आदमी आज खुद ईश्वर के अनुसंधान में जुटा पड़ा है।पूरी सृष्टि के जन्म की गुत्थी को सुलझाने में व्यस्त है आज आदमी।

कितनी भारी विडंबना है। चांद, तारों, ग्रहों की खोज करने वाला आदमी आज खुद से अनजान है। हंसी के पीछे छुपाए हुए दर्द को , प्रशंसा के पीछे छुपी हुई वैमनस्य की भावना को समझने में आज भी नाकाम है आदमी। 

आकाश में उड़ान भरने वाले आदमी के हौसले कब और क्यों जमीन पर अचानक गिर पड़ते हैं, गगनचुंबी इमारतों में रहनेवाले आदमी के लिए क्यों महल भी कम पड़ते हैं?

इस विकास पर कैसा घमंड? पलक छपकते हीं इस दुनिया के दूसरे कोने पर बैठे आदमी से बात करने में सक्षम आदमी क्यों एक हीं कमरे में बैठे साथी के बीच दिलों के दूरियों को पाट नहीं पाता?

गणित की अनगिनत गुत्थियों को सुलझाने वाले आदमी के पास अभी भी क्यों इस बात का जवाब नहीं है कि एक हीं व्यक्ति किसी के लिए अति प्रेम का वस्तु होता है तो दूसरे के लिए वोही घृणा का पात्र कैसे बन जाता है?

इस विकास पर किस तरह का अभिमान, कि आदमी को आज भी इस बात का ज्ञान नहीं कि आदमी स्वयं में क्या है? क्या ये विडंबना नहीं है कि पूरी दुनिया को जानने की कोशिश करने वाला आदमी आज भी खुद से अनजान है।

खुद की सांसों की नाप लेने में असक्षम आदमी दुनिया की माप लेने में व्यस्त है और इस बात का अभिमान भी है। कितनी आश्चर्य की बात है?

अजय अमिताभ सुमन:सर्वाधिकार सुरक्षित 

न्याय सम्राट अशोक का

कुछ साल पहले की बात है। दिल्ली हाई कोर्ट के एक माननीय न्यायधीश रिटायर हो रहे थे। दिल्ली हाई कोर्ट बार एसोसिएशन की तरफ से उनके सम्मान में एक पार्टी आयोजित की गई थी। जब माननीय न्यायाधीश महोदय अपने कार्यकाल का अनुभव प्रस्तुत कर रहे थे तो बातों बातों में उन्होंने एक कहानी सुनाई। ये कहानी बहुत हीं प्रासंगिक है। ये कहानी सम्राट अशोक से संबंधित है।

सम्राट अशोक यदा कदा रात को वेश बदलकर अपने राज्य का दौरा करते थे। वेश बदलकर राज्य का दौरा करने का मकसद ये था कि वो जान सकें कि उनके राज्य में उनके आधीन राज्याधिकारी प्रजा के साथ किस तरह का व्यवहार कर रहे हैं?एक बार रात को वो अपना वेश बदल कर बाहर निकले। जब राज्य का दौरा कर वो वापस अपने महल में आए तो महल के दरवाजे पर खड़े दो द्वारपालों ने उन्हें रोक लिया। 

जब सम्राट अशोक ने अपना परिचय दिया तब भी दोनों द्वारपाल नहीं माने। उन दोनों द्वारपालो ने सम्राट अशोक को बताया कि उनकी नियुक्ति अभी नई नई हुई है। वो सम्राट अशोक को नहीं पहचानते। इसलिए सम्राट अशोक को थोड़ी देर इंतजार करने के लिए कहा।

एक द्वारपाल अपने उच्च अधिकारी से मिलने चला गया ताकि उचित आदेश ले कर आगे की कार्यवाही पूरा कर सके। रात्रि का पहर था, उच्च अधिकारी सो रहा था , इसलिए उसे जगाकर लाने में देरी हो रही थी।इधर सम्राट अशोक लंबे समय तक महल के दरवाजे के बाहर खड़े खड़े परेशान हो रहे थे। जब उन्होंने जबरदस्ती महल के भीतर जाने की कोशिश की तो द्वारपाल ने उन्हें धक्का दे दिया।

गुस्से में आकर सम्राट अशोक ने उस द्वारपाल की हत्या कर दी। जबतक उच्च अधिकारी दूसरे द्वारपाल के साथ महल के दरवाजे पर आया तबतक सम्राट अशोक के हाथ में रक्तरंजित तलवार और द्वारपाल का प्राणहीन शहरी पड़ा था। अगले दिन द्वारपाल की मृत्यु का समाचार चारो तरफ फैल गया। महल के एक एक अधिकारी को ज्ञात हो गया की द्वारपाल की हत्या सम्राट अशोक के हाथों हो गई है।

नियमानुसार सम्राट अशोक को हीं मामले की शुरुआत करनी थी। उस हत्या के मामले में तहकीकात करनी थी।लिहाजा उन्होंने उसी उच्च अधिकारी को मामले की तहकीकात करने की जिम्मेदारी सौंपी। सम्राट अशोक के पास असीमित ताकत थी। वो मामले को रफा दफा भी कर सकते थे। लेकिन उन्होंने असीमित शक्ति के साथ साथ अपनी जिम्मेदारी भी समझी। उन्हें पता था कि वो ही उच्च अधिकारी सही गवाही दे सकता है, इसलिए उसी को चुना।

जब मामले की तहकीकात कर लेने के बाद उच्च अधिकारी ने दरबार लगाने की मांग की , तब सम्राट अशोक ने नियत समय दरबार लगाया।उस भरे दरबार में उच्च अधिकारी ने पूरी घटना का वर्णन किया। और बताया कि उस द्वारपाल का हत्यारा सम्राट अशोक हीं है। हालांकि उस वध में सम्राट अशोक के साथ साथ अनेपक्षित परिस्थियां भी जिम्मेदार थी। सम्राट अशोक ने बड़ी विनम्रता के साथ उस आरोप को स्वीकार किया।

इस कहानी को सुनाकर माननीय न्यायाधीश ने बताया कि आजीवन उन्होंने अपने कोर्ट को वैसे हीं चलाया। ऐसा देखा जाता है कि मामले की सुनवाई के दौरान कुछ माननीय न्यायधीश अनावश्यक टिप्पणियां करते रहते है। एडवोकेट और पार्टी को अनावश्यक रूप से डांटते रहते हैं।ये उचित नहीं। एक न्यायाधीश के।सहिष्णु होना बहुत जरूरी है। यदि माननीय न्यायधीश डर का माहौल कर दे तो फिर एक तानाशाह और न्यायधीश में अंतर क्या रह पाएगा।

उन्होंने आगे कहा कि न्यायधीश तो ऐसा होना चाहिए कि आम आदमी उसके पास आकर अपनी बात खुलकर रख रखे। यहां तक कि उसके खिलाफ भी बोल सके।एक न्यायधीश ईश्वर नहीं होता। फिर भी यदि ईश्वर के हाथों भी गलती हो जाती है तो फिर एक न्यायधीश की क्या औकात? एक न्यायधीश को न्यायिक प्रक्रिया के दौरान अनावशक टिप्पणी करने से बचना चाहिए। और यदि अनावश्यक टिप्पणी करते हैं तो जनता की बीच उठी आवाज को सुनने को क्षमता भी होनी चाहिए।

माननीय न्यायाधीश ईश्वर तो होते नहीं। आखिर हैं तो ये भी एक इंसान हीं। यदि आप ईश्वर की तरह शक्ति और सम्मान चाहते हो तो। ईश्वर की तरह व्यवहार भी करो। हालांकि गलतियां ईश्वर से भी तो हो जाती है। तो ईश्वर की तरह असीमित धीरज भी तो रखो।कोई भी न्याय व्यवस्था से ऊपर नहीं हो सकता। यहां तक कि न्यायधीश भी। कौन नहीं जानता भगवान शिव को भी अपने वरदान के कारण हीं भस्मासुर से भयभीत होकर भागना पड़ा था। असीमित शक्ति बिना किसी जिम्मेदारी के अत्यंत घातक सिद्ध होती है।

उन्होंने आगे कहा, अपने न्यायिक जीवन में उन्होंने सम्राट अशोक के उसी न्याय व्यवस्था को अपनाया। अदालती।करवाई के दौरान अनावश्यक टिप्पणियों से बचने की कोशिश करना और यदि अनचाहे उनसे  इस तरह की  टिप्पणी हो गई हो तो उसके खिलाफ आती प्रतिरोधात्मक स्वर को धैर्य के साथ सुनना। 

अजय अमिताभ सुमन:सर्वाधिकार सुरक्षित

तुझे शर्म नहीं आती?

जून का अंतिम महीना चल रहा था । मौसम विभाग ने आने वाले दो तीन दिनों के भीतर मानसून के आने की सम्भावना व्यक्त की थी । चिलचिलाती गर्मी से तो राहत मिल गई थी , परन्तु आकाश में छाये बादल वातावरण की गर्मी को बाहर नहीं जाने दे रहे थे । इस कारण उमस बहुत ज्यादा हो चली थी । तिस पर से नमी ने बुरा हाल कर रखा था । कूलर और ए.सी.का भी असर कम हो चला था।

शाम को जब नाश्ता करने के लिए ऑफिस से बाहर  निकला तो इसी उमस भरी गर्मी से पाला पड़ा । पसीना सूखने का नाम हीं नहीं ले रहा था । चिपचिपाहट से परेशानी और बढ़ चली थी।

वो तो भला हो ए. सी. और काम के प्रेशर का , कि दिन कब बित जाता है , पता हीं नहीं चलता । काम करते करते शाम को भूख तो लग हीं जाती थी । घर से लाया हुआ खाना लंच में हीं निबट जाता था । लिहाजा पापी पेट की क्षुधा को आप्त करने के लिए बाहर निकलना हीं पड़ता था ।

सड़कों  के किनारों पर मक्के के भुने हुए दाने बेचते हुए अनगिनत रेड़ी वाले मिल जाते थे । शाम का नाश्ता मक्के के भुने हुए दाने हीं हो चले । पेट और मन दोनों की क्षुधा को कुछ क्षण के लिए आप्त करने के लिए पर्याप्त थे।

ग्राहक को पास आते देखकर रेड़ी वालों में होड़ सी मच गयी । एक तो गर्मी ऊपर से रेड़ी वालों का शोर , शराबा । मै आगे बढ़ता हीं चला गया । थोड़ी दूर पर एक रेड़ी वाला बड़े शांत भाव से बैठा हुआ दिखाई पड़ा । उसे कोई हड़बड़ी नहीं थी शायद।

उसके पास के मक्के काफी अच्छी गुणवत्ता के दिखाई पड़े । और उसपर से वो शोर भी नहीं मचा रहा था । उसे अपने भुट्टे की गुणवत्ता पर भरोसा था शायद। इधर शोर मचाते हुए अन्य रेड़ी वालों से थोड़ी चिढ़ भी हो गई थी। लिहाजा मैंने उसी से मक्का लेने का फैसला किया। भुट्टे का आर्डर देकर मै खड़ा हो गया। 

भुट्टे वाला भुट्टे को गर्म करते हुए मुझसे पूछा , भाई साहब , ये जो महाराष्ट्र में जो हो रहा है , उसके बारे में क्या सोचते हैं ? उद्धव ठाकरे की सरकार ठीक उसी तरह से चली गई जिस तरह लगभग ढाई साल पहले बी.जे. पी. की सरकार गई थी । इतिहास दुहरा रहा है अपने आपको । है ना ये बड़ी आश्चर्य जनक बात?

उसने शायद मुझसे सहमति भरे उत्तर की अपेक्षा रखी थी। मुझे जोरो की भूख लगी थी । मैंने कहा , अरे भाई अब सरकार किसकी आती है , किसकी जाती , इससे तुझको क्या ? तुझे तो भुट्टा ही भूनना है । अपना जो काम है करो ना । इधर उधर दिमाग क्यों लगाते हो?देश और राज्य का सारा बोझ तुम हीं उठा लोगे क्या? मैंने तिरछी नजरों से उसे देखते हुए कहा।

मेरी बात उसको चुभ गई थी शायद । उसने तुनकते हुए कहा , भाई साहब , ये तो प्रजातंत्र है , एक चायवाला भी प्रधानमंत्री बन सकता है । उसपर से क्या एक नागरिक को राजनैतिक रूप से सचेत रहने का अधिकार है या नहीं ? आस पास की जो घटनाएं घट रही हैं देश में, उसके बारे में पता तो चल हीं जाता है।

मैं समझ गया। मुझे भी अपनी बात कुछ उचित नहीं लगी। उसको शांत करने के लिए समझने हुए मैंने कहा , मैंने कहा मना किया है । जानकारी भी होनी चाहिए और एक निश्चित राय भी रखनी चाहिए। परन्तु इससे तुमको क्या ? इस बात का ध्यान रखो, पैसा तो तुम्हें भुट्टा बेचने से हीं आ रहा है ना तुम्हे। काम तो यही करना है तुझे । इसी में अपना दिल लगाओ। यही उचित है तुम्हारे लिए।

उसने कहा , अभी भुट्टा भुन रहा हूँ , कोई जरुरी तो नहीं , जीवन भर यही करता रहूँगा । ग्रेजुएट हूँ । शोर्टहैण्ड  भी सीख रहा हूँ । कहीं न कहीं तो नौकरी लग हीं जाएगी । और नहीं तो किसी कोर्ट में हीं जाकर अपनी दुकान लगाकर बैठ जाऊंगा । गुजारे लायक तो कमा हीं लूँगा ।

गरीब पैदा हुआ हूँ । इसमें मेरे क्या दोष है ? मेरे उपर अपने भाईयों की  जिम्मेदारी भी  है इसीलिए ऐसा करना पड़ रहा है ।  परन्तु समस्याएँ किसको नहीं होती ? मुझे तो आगे बढ़ना हीं है मुझे । उसने अपनी बात को जारी रखते हुए कहा।

उसके आत्मविश्वास पर मुझे ख़ुशी भी हुई और अफ़सोस भी । तबतक उसने भुट्टा गरम कर दिया था । मैंने उसे पैसा लिया और भुट्टा लेकर आगे बढ़ने लगा । पर एक बात मुझे अबतक कचोट रही थी । इस तरह का पढ़ा लिखा लड़का क्या कर रहा था वहाँ पर । 

आखिकार मुझसे रहा नहीं गया । चलते चलते मैंने उससे पूछ हीं लिया , तुझे शर्म नहीं आती , ग्रेजुएट होकर इस तरह भुट्टा बेचने पर ?

उसके उत्तर ने मुझे निरुत्तर कर दिया ।

भुट्टे वाले ने कहा , भाई साहब किसी को धोखा दिया नहीं  , झूठ बोला नहीं और मेरे उपर लोन भी नहीं है , फिर काहे का शर्म ? मेहनत और ईमानदारी से हीं तो कमा रहा हूँ , कोई गलत काम तो नहीं कर रहा । लोगो को चुना तो नहीं लगा रहा ?

ऑफिस में काम करते वक्त उसकी बातें यदा कदा मुझे सोचने पर मजबूर कर हीं देती हैं ,   किसी को धोखा दिया नहीं  , झूठ बोला नहीं और मेरे उपर लोन भी नहीं है , फिर काहे का शर्म ? 

उसके उत्तर ने मुझे कुछ बेचैन सा कर दिया। क्या ऑफिस में ऊँचे ओहदे पर बैठा आदमी हर आदमी झूठ नहीं बोलता , धोखा नहीं देता , बेईमानी नहीं करता ? और यदि करता है तो फिर उसे शर्म क्यों नहीं आती ?

दूसरों की बात तो छोड़ो , महत्वपूर्ण बात तो ये थी  क्या मैंने अपने जीवन में  कभी झूठ नहीं बोला ,  किसी को धोखा नहीं दिया , कभी बेईमानी नहीं की ? और अगर की तो क्या कभी शर्म आई मुझे ? और उत्तर तो स्पष्टत्या नकारात्मक ही था।

मैंने शायद उसको आंकने में भूल कर दी थी । हालाँकि इस भूल में भी मैंने जीवन का एक सबक तो सिख हीं लिया । किसी को उसके काम और ओहदे से मापना हमेशा सही नहीं होता । एक व्यक्ति की चारित्रिक मजबूती उसको सही तरीके से परिभाषित करती है ।

किसी दुसरे को उपदेश देने से पहले ये जरुरी हो जाता है की आप स्वयम को आईने में एक बार जरुर देख लें । उपदेश , जो कि आप किसी और को प्रदान कर रहें हैं , कहीं उसकी जरुरत आपको तो नहीं ?   

अजय अमिताभ सुमन :सर्वाधिकार सुरक्षित 

Saturday, July 9, 2022

वर्तमान से वक्त बचा लो तुम निज के निर्माण में[तृतीय भाग ]

प्रतिकूल परिस्थितियों के लिए संसार को कोसना सर्वथा व्यर्थ है। संसार ना तो किसी का दुश्मन है और ना हीं किसी का मित्र। संसार का आपके प्रति अनुकूल या प्रतिकूल बने रहना बिल्कुल आप पर निर्भर करता है। महत्वपूर्ण बात ये है कि आप स्वयं के लिए किस तरह के संसार का चुनाव  करते हैं। प्रस्तुत है मेरी कविता "वर्तमान से वक्त बचा लो तुम निज के निर्माण में" का तृतीय भाग।
=======
वर्तमान से वक्त बचा लो 
तुम निज के निर्माण में
तृतीय भाग 
=======
क्या रखा है वक्त गँवाने 
औरों के आख्यान में,
वर्तमान से वक्त बचा लो 
तुम निज के निर्माण में।
=======
स्व संशय पर आत्म प्रशंसा 
अति अपेक्षित  होती है,
तभी आवश्यक श्लाघा की 
प्रज्ञा अनपेक्षित सोती है।
=======
दुर्बलता हीं तो परिलक्षित 
निज का निज से गान में,
वर्तमान से वक्त बचा लो 
तुम निज के निर्माण में।
=======
जो कहते हो वो करते हो 
जो करते हो वो बनते हो,
तेरे वाक्य जो तुझसे बनते 
वैसा हीं जीवन गढ़ते हो।
========
सोचो प्राप्त हुआ क्या तुझको 
औरों के अपमान में,
वर्तमान से वक्त बचा लो 
तुम निज के निर्माण में।
=========
तेरी जिह्वा, तेरी बुद्धि , 
तेरी प्रज्ञा और  विचार,
जैसा भी तुम धारण करते 
वैसा हीं रचते संसार।
=========
क्या गर्भित करते हो क्या 
धारण करते निज प्राण में,
वर्तमान से वक्त बचा लो 
तुम निज के निर्माण में।
=========
क्या रखा है वक्त गँवाने 
औरों के आख्यान में,
वर्तमान से वक्त बचा लो 
तुम निज के निर्माण में।
=========
अजय अमिताभ सुमन:
सर्वाधिकार सुरक्षित

Tuesday, July 5, 2022

राजनैतिक जगत के कॉरपोरेट मंत्र

 

राजनीति और कॉरपोरेट जगत के काम करने के तरीके में एक समानता है। राजनीति हो या कि कॉरपोरेट घराने , दोनों के सफलता का राज यही है कि शीर्ष पर आसीन लोग सबको अपने साथ ले कर चल सकने में सक्षम है या नहीं?

इसके लिए ये जरूरी है कि मैनेजमेंट के शीर्ष पर रहने वाले व्यक्तियों के दरवाजे स्वयं के साथ काम करने वालों के लिए खुले हो।

अकड़ कर रहने से कोई बड़ा नहीं हो जाता। आपका बड़ा होना इस बात पर निर्भर करता है कि पार्टी का एक साधारण सा कार्यकर्ता आपसे बिना रोक टोक के मिल सकता है या नहीं?

यदि नेता अपने साथ काम करने वालों की बजाय कुछ गिने चुने खुशामद करने वालों के बीच हीं घिरे रहना पसंद करने लगे, तो इसका क्या दुष्परिणाम हो सकता है, राजनीति में घटने वाली आजकल की घटनाओं से ये साफ जाहिर होता है।

ठीक यही बात कॉरपोरेट घरानों पर भी लागू होती है। खुशामद करने वाले और जी हुजूरी करने वाले सदस्यों की बात सुनने के अलावा यदि प्रतिरोध का स्वर ऊंचा करने वालों की बातों को न सुना जाए तो इसमें उस घराने का हित कतई नहीं होता।

एक संस्था की मजबूती इस बात पर निर्भर करती है कि भीतर से उठते हुए असंतोष के स्वर को समझने में वो कितनी सक्षम है?

दूसरी बात , संस्था को अपने मूलभूत वैचारिक सिद्धानों से कभी समझौता नहीं करना चाहिए। हरेक राजनैतिक पार्टी का आधार कुछ आधार भूत सिद्धांत होते हैं।

काम करने के कुछ विशेष तरीके होते हैं हर संस्था के। एक विशेष लक्ष्य और लक्ष्य प्राप्त करने हेतु अपनाए गए तरीकों में हरेक संस्था अलग होती है।

कभी कभी ऐसे मौके आते हैं जब सैद्धांतिक रूप से मतभेद रखने वाले पार्टियों के साथ सहयोग तात्कालिक रूप से लाभदायक सिद्ध होते हैं। परंतु इसके दूरगामी परिणाम हमेशा पार्टी के हितों के विरुद्ध हीं साबित होते हैं।

यही बात कॉरपोरेट घरानों पर भी लागू होती है। हरेक कॉरपोरेट घरानों के काम करने के कुछ अपने विशेष तरीके और अपने मूलभूत आधार होते हैं। सबके अपने अपने कुछ मूलभूत सिद्धांत और वैचारिक आधार होते हैं।

इन सिद्धांतों का त्याग करके नए सहयोगी ढूंढने में कोई फायदा नहीं । याद रहे ये काम करने के ये वो हीं तरीके है जिस कारण एक संस्था का अस्तित्व इतने लंबे समय तक बना हुआ है। फिर मूलभूत सैद्धांतिक आधार से समझौता कर बनाए गए संबंध लंबे समय तक चल नहीं पाते ।

राजनीति में मिली जुली सरकारों का बनना और बिखरना और क्या साबित करता है? आखिकार राजनीति भी तो व्यक्तियों द्वारा हीं चलाई जाती रही है। दो भिन्न भिन्न प्रकार के पहियों पे चलने वाली गाड़ी आखिर कितने दिनों तक चल सकती है?

हरेक राजनैतिक पार्टी युवा पीढ़ी का बढ़ावा देना पसंद करती है। परंतु गर्म जोश के साथ साथ पुरानी पीढ़ी का साथ भी अति आवश्यक होता है सफलता के लिए।

जिस प्रकार देश , काल और परिस्थिति के अनुसार कभी त्वरित फैसले लेने जरूरी होते हैं तो कभी कभी किसी कदम के उठाने से पहले लंबे और गंभीर सोच विचार की जरूरत होती है।

एक हथियार का मजबूत होना जरूरी होता है परंतु इससे ज्यादा महत्वपूर्ण ये कि हथियार से लक्ष्य का संधान करने वाले हाथ कितने सधे हुए है?

और यहां पे ये जरूरी हो जाता है कि उन हाथों ने बार बार इन तरह की परिस्थितियों का सामना किया है कि नहीं? उन हाथों को पर्याप्त अनुभव है या नहीं?

पुरानी पीढ़ी के अनुभव और नई पीढ़ी के जोश के बीच सामंजस्य स्थापित किए बिना ना तो कोई राजनैतिक पार्टी हीं आगे बढ़ सकती है और ना हीं कोई कॉरपोरेट घराना।

अक्सर ये देखा देता है कि सत्ता के नशे में संस्था के शीर्ष स्थानों पर विराजमान नेता सदस्यों से राय लिए बिना अपने फैसले थोपने लगते हैं। यदि सदस्यों पर फैसले लादने हैं तो थोड़ी बहुत उनकी भागीदारी भी बहुत जरूरी है।

यदि एक संस्था सदस्यों के कार्य के प्रति लगन की अपेक्षा करती है तो संस्था की भी जवाबदेही भी तो अपने कार्यकर्ता के प्रति होनी चाहिए। और ये काम अपने सदस्यों को निर्णय लेने की प्रक्रिया में शामिल किए बिना नहीं हो सकता।

याद रहे एक संस्था का सफल या असफल होना इस बात पर निर्भर करता है कि उस संस्था में काम करने वाला हरेक सदस्य उस संस्था के प्रति कितना समर्पित है?

और अंतिम परंतु महत्वपूर्ण बात , बड़बोलेपन से बचना। राजनैतिक रूप से बड़बोलापन न तो केवल आपके नए नए प्रतिद्वंद्वियों को जन्म देता है, अपितु आपको कहीं ना कहीं अहंकारी भी साबित करता है।

ठीक यही बात कॉरपोरेट घरानों पर भी लागू होती है। किसी दूसरे के खिलाफ बोलकर या किसी और को नीचा दिखाकर आप स्वयं बड़े नहीं हो जाते।

बेहतर तो ये है कि बड़े बड़े बोल बोलने के स्थान पर आपके कर्म हीं आपकी आवाज हो । मितवादी और कर्म करनेवाले कहीं असफल नहीं होते, फिर चाहे ये राजनीति हो या कि कॉरपोरेट घराने।

अजय अमिताभ सुमन:सर्वाधिकार सुरक्षित

Thursday, June 30, 2022

जब महारथी कर्ण भीम से डर गए


इस बात में कोई संशय नहीं कि महारथी कर्ण एक महान योद्धा थे और एक बार उन्होंने महाभारत युद्ध के दौरान भीमसेन को एक बार हराया भी था. परन्तु महाभारत युद्ध के दौरान एक ऐसा भी पल आया था , जब महारथी कर्ण में मन में भीमसेन का पराक्रम देख कर भय समा गया था . महाभारत महाग्रंथ के कर्ण पर्व के चतुरशीतितमोध्याय अर्थात अध्याय संख्या 84  के श्लोक संख्या 1 से श्लोक संख्या 14 में इस घटना का विस्तार से वर्णन आता है .

ये अध्याय भीमसेन द्वारा दु:शासन के वध के बाद घटी घटनाओं का वर्णन करता . भीम सेन ने दु:शासन के वध के दौरान बहुत हीं रौद्र रूप धारण कर लिया था . भीम सेन ने दु:शासन का सीना फाड़कर उसका लहू भी पी लिया था.

इस अध्याय में भीमसेन द्वारा दुर्योधन के अन्य 10 भाइयों का वध और तदुरोपरांत भीमसेन का ये रौद्र रूप देखकर कर्ण के मन में भय के समा जाने का जिक्र आता है . खासकर कर्ण की इस भयातुर दशा का स्पष्ट रूप से वर्णन श्लोक संख्या 7 और 8 आता है . इसके बाद के श्लोकों में शल्य द्वारा कर्ण को समझाने की बात का वर्णन किया गया है .

“स॒ बार्यमाणो विशिखेः समन्तात्‌ तैमेहारथें: ॥  भीमः क्रोघाप्मिरक्ताक्षः कुछः काल इवावभौ ।4॥“
उन महारथियों के चलाये हुए बा्णो द्यारा चारों ओर से रोके जाने पर भीमसेनकी आँखें क्रोध से लाल  हो गयीं और वे कुपित हुए. कालके समान प्रतीत होने लगे.

तांस्तु भल्लैमंदावेगैदशभिदंश भारतान्‌॥  डुक्‍्माडदान्‌ रुक्‍्मपुझैः पाथों निस्ये यमक्षयम्‌।5॥

कुन्तीकुमार भीमने सोनेके पंखबाले महान्‌ वेगशाली दस भल्लों द्वारा खुवर्णमय आन्ग्दों से विभूषित उन दर्सों मरत-बंशी राजकुमारों को यमछोक पहुँचा दिया.

इतेषु तेषु बीरेषु प्रदुद्राव बल तव॥  पश्यतः खूतपुश्रस्य पाण्डवस्य भयार्दितम्‌।6 ॥

उन वीरोंके मारे जानेपर पाण्डु पुत्र भीम सेनके भय से पीड़ित हो आपकी सारी सेना सूत पुत्रके देखते-देखते माग चली.

संजय उस पुरे युद्ध का वृतांत धृतराष्ट्र को सुना रहे थे . श्लोक 4 से श्लोक 6 तक भीम सेन द्वारा धृतराष्ट्र के दस पुर्तों का वध का वर्णन है . इसके बाद कैसे कर्ण के मन में भय समा जाता है , इसका वृतांत आता है .

ततः कर्णों मद्दाराज प्रविवेश महव्‌ भयम्‌ ॥ इष्ठा भीमस्य विक्रान्तमन्तकस्य प्रजाखिव ।7 ॥
महाराज ! जैसे प्रजा बर्ग पर यमराज का बल काम करता है, उसी प्रकार मीमसेन का वह पराक्रम देखकर कर्ण के मन में महान्‌ भय समा गया.

तस्य त्वाकारभावज्ञ: शल्य समिति शोभनः ॥  उवाच वचन कर्ण प्राप्तकालम रिदमम ।8 ॥
युद्धमें शोमा पानेवाले शल्य कर्ण की आकृति देखकर ही उसके मनका भाव समझ गये; अतः शत्रु दमन कर्ण से  यह समयोचित बचन बोले.

मा व्यथां कुरु राधेय नेथं त्वय्युपपद्यते ॥  एते द्ववन्ति राजानो भीमसेनभयार्दिताः ।9॥
दुर्योधनश्च सम्मूढो भ्रातृव्यलनकरशितः ॥ 10 ॥

“राधानन्दन | तुम खेद न करो) तुम्हें यह शोमा नहीं देता है । ये राजा लोग भीमसेन के भय से पीड़ित हो भागे जा रहे हैं। अपने भाइयों की मृत्युसे दुःखित हो राजा दुर्योधन भी किंकर्तव्यविमूढ़ हो गया है ॥ 9-10 ॥ 

इस प्रकार भीम का पराक्रम देखकर कर्ण के मन में महान  भय समा जाने पर शल्य उसे नाना प्रकार से प्रोत्साहित करने लगते हैं . शब्द महान भय का इस्तेमाल किया गया है इस श्लोक में . इस श्लोक का इस्तेमाल ये स्पष्ट रूप से जाहिर करता है कि कर्ण निश्चित रूप से भीम का पराक्रम देखकर भयातुर हो गए होंगे .

हालाँकि शल्य के समझाने और प्रोत्साहित करने के बाद उनके मन से भय का भाव मिट गया और वो फिर से युद्ध के मैदान में डट गए थे . परन्तु आश्चर्य की बात तो ये है कि कर्ण जैसा महारथी भी भीम के पराक्रम से भयग्रस्त हो गए थे . 

तो ये थी वो घटना  , जहाँ पे इस बात का जिक्र आता है कि कैसे महाभारत युद्ध के दौरान महारथी कर्ण भीम का पराक्रम देखकर डर गए थे . एक जिक करने वाली बात ये है कि महाभारत युद्ध के दौरान कर्ण का पराक्रम देखकर युद्धिष्ठिर भी भयाग्रस्त हो गए थे और एक बार अर्जुन भी विचलित हो गए थे . परन्तु अर्जुन का कर्ण से डरने या भीम सेन का कर्ण से डरने का जिक्र नहीं आता है .

अजय अमिताभ सुमन : सर्वाधिकार सुरक्षित


Tuesday, June 28, 2022

पहली मुलाकात:कर्ण की दुर्योधन से

महाभारत पर आधारित टेलीविजन सीरियलों और अनगिनत मूवी में ऐसा दिखाया जाता रहा है कि दुर्योधन की मुलाकात कर्ण से सर्वप्रथम युद्ध क्रीड़ा के मैदान में हुई थी। गुरु द्रोणाचार्य पर भी ये आरोप लगाया जाता रहा है कि उन्होंने कर्ण को धनुर्विद्या सिखाने से मना कर दिया था, क्योंकि कर्ण सूतपुत्र थे। जबकि वास्तविकता तो कुछ और हीं है।

ना तो कर्ण की मुलाकात दुर्योधन से सर्वप्रथम युद्ध क्रीड़ा के मैदान में हुई थी और ना हीं गुरु द्रोणाचार्य ने कर्ण को कभी धनुर्विद्या सिखाने से मना किया था। महाभारत के आदिपर्व में जिक्र आता है कि कर्ण और दुर्योधन एक दूसरे को बचपन से हीं जानते थे।


बचपन में जब भीम दुर्योधन के भाइयों को तंग करते थे तो दुर्योधन ने चिढ़कर भीम को विष पिला दिया । इसका परिणाम ये हुआ कि भीम मृत्यु के करीब पहुंच गए। ये और बात है कि भीम के शरीर में वृक नामक अग्नि थी जिस कारण वह जीवित बच गए।

"यद्यपि वह विष बड़ा तेज था तो भी उनके लिये कोई बिगाड़ न कर सका | भयंकर शरीरवाले भीमसेनके उदरमें वृक नामकी अग्नि थी; अतः वहाँ जाकर वह विष पच गया || 39 ॥"

महाभारत महाग्रंथ के आदि पर्व महाभाग के संभव पर्व उपभाग के अष्टाविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः अर्थात अध्याय संख्या 128 के 39 वें श्लोक में इस बात का वर्णन है कि कैसे भीम मरने से बच गए।


"एवं दुर्योधनः कर्णः शकुनिश्चापि सौबलः ।
अनेकैरभ्युपायै स्ताञ्जिघांसन्ति स्म पाण्डवान् ॥ 40 ॥

इस प्रकार दुर्योधन, कर्ण तथा सुबलपुत्र शकुनि अनेक 
उपायो द्वारा पाण्डवों को मार डालना चाहते थे ॥ 40 ॥"

महाभारत महाग्रंथ के आदि पर्व महाभाग के संभव पर्व उपभाग के अष्टाविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः अर्थात अध्याय संख्या 128 के 40 वें श्लोक में इस दुर्योधन और कर्ण के बचपन से हीं चिर परिचित सम्बन्ध का वर्णन है।

यहीं पर आदिपर्व के संभवपर्व के 40 वें श्लोक में वर्णन है कि दुर्योधन, कर्ण था सबलुपुत्र शकुनि आदि अनेक उपायों से पांडवों को मार डालना चाहते थे। इस श्लोक के दुर्योधन के साथ कर्ण का जिक्र शकुनि से पहले आता है । ये साबित करता है कि कर्ण के दुर्योधन के साथ घनिष्ठ संबंध बचपन से हीं थे।

गुरु द्रोणाचार्य पर ये भी आरोप लगाया जाता है कि उन्होंने उन्होंने कर्ण को धनुर्विद्या सिखाने से मना कर दिया था, क्योंकि कर्ण सूतपुत्र थे। उनपे ये भी आरोप लगाया जाता रहा है कि वो केवल राजपुत्रों को हीं शिक्षा प्रदान कर रहे थे। ये दोनों बातें हीं मिथ्या है।

महाभारत महाग्रंथ के आदि पर्व महाभाग के संभव पर्व उपभाग के एकत्रिंशदधिकशततमोऽध्याय अर्थात अध्याय संख्या 131 के श्लोक संख्या में इस बात का वर्णन है कि कर्ण भी बाकि अन्य क्षत्रिय राज कुमारों के साथ गुरु द्रोणाचार्य से शिक्षा ग्रहण कर रहा था ।

"वृष्णयश्चान्धकाश्चैव नानादेश्याश्च पार्थिवाः |
सूतपुत्रश्च राधेयो गुरुं द्रोणमियात् तदा ॥ 11 ॥

वृष्णिवंशी तथा अन्धकवंशी क्षत्रिय, नाना देशों के
राजकुमार तथा राधानन्दन सूतपुत्र कर्ण – ये सभी 
आचार्य द्रोणके पास (अस्त्र - शिक्षा लेने के लिये )आये ॥ 11 ॥"

गुरु द्रोणाचार्य कर्ण को कौरवों और पांडवों के साथ साथ हीं शिक्षा प्रदान कर रहे थे। उनके पास न केवल कौरव और पांडव , राधा पुत्र कर्ण अपितु वृष्णिवंशी तथा अन्धकवंशी क्षत्रिय आदि राजकुमार भी शिक्षा के लिए गुरु द्रोणाचार्य के पास आए थे।

"स्पर्धमानस्तु पार्थेन सूतपुत्रोऽत्यमर्पणः |
दुर्योधनं समाश्रित्य सोऽवमन्यत पाण्डवान् ॥ 12 ॥

सूतपुत्र कर्ण सदा अर्जुनसे लाग-डाँट रखता और 
अत्यन्त अमर्ष में भरकर दुर्योधनका सहारा ले
 पाण्डव का अपमान किया करता था ॥12 ॥"
 
ये बात और है कि कर्ण बचपन के समय से हीं अर्जुन से ईर्ष्या रखता था और दुर्योधन के साथ मिलकर पांडवों का अपमान किया करता था। इसका कारण गुरु द्रोणाचार्य का पांडवों, विशेषकर अर्जुन के प्रति स्नेह था।

बड़े आश्चर्य की बात ये है कि महाभारत के आदि पर्व में , जहाँ पे कर्ण और दुर्योधन का जिक्र सर्वप्रथम आता है , उसका आधार हीं पांडवों के प्रति ईर्ष्या का भाव है । उन दोनों की मित्रता का आधार हीं पांडवों के प्रति बैर था । हालाँकि दोनों के अपने अपने कारण थे इस इर्ष्या के।

कर्ण का जिक्र भी महाभारत के आदिपर्व के संभव उप पर्व में पांडवों के साथ वैमनस्य के साथ हीं आता है। जाहिर सी बात थी , कर्ण के प्रतिभा तो थी परन्तु उसे बराबर का सम्मान और मौका नहीं मिल रहा था। बार बार अपमान की भावना से ग्रस्त हुए व्यक्ति के ह्रदय में आग नहीं तो और क्या हो सकती है ?

ये बात तो तय है कि दुर्योधन की पहली मुलाकात कर्ण से उस युद्ध कीड़ा के मैंदान में नहीं बल्कि काफी पहले हीं हो गई थी। बचपन से दोनों एक दुसरे के परिचित थे और साथ साथ हीं द्रोणाचार्य से शिक्षा भी ग्रहण कर रहे थे ।

हालाँकि आदि पर्व में इस बात का जिक्र नहीं आता कि कर्ण गुरु द्रोणाचार्य को छोड़कर गुरु परशुराम के पास कब पहुँच गया ? कारण जो भी रहा हो , ये बात तो निश्चित हीं जान पड़ती है कि कर्ण और दुर्योधन बचपन से हीं चिर परिचित थे।

अजय अमिताभ सुमन: सर्वाधिकार सुरक्षित

Saturday, June 25, 2022

वर्तमान से वक्त बचा लो तुम निज के निर्माण में[द्वितीय भाग]

=====
धर्म ग्रंथों के प्रति श्रद्धा का भाव रखना सराहनीय  हैं। लेकिन इन धार्मिक ग्रंथों के प्रति वैसी श्रद्धा का क्या महत्व जब आपके व्यवहार इनके द्वारा सुझाए गए रास्तों के अनुरूप नहीं हो? आपके धार्मिक ग्रंथ मात्र पूजन करने के निमित्त नहीं हैं? क्या हीं अच्छा हो कि इन ग्रंथों द्वारा सुझाए गए मार्ग का अनुपालन कर आप स्वयं हीं श्रद्धा के पात्र बन जाएं। प्रस्तुत है मेरी कविता "वर्तमान से वक्त बचा लो तुम निज के निर्माण में" का द्वितीय भाग। 
=====
क्या रखा है वक्त गँवाने 
औरों के आख्यान में,
वर्तमान से वक्त बचा लो 
तुम निज के निर्माण में।
=====
धर्मग्रंथ के अंकित अक्षर 
परम सत्य है परम तथ्य है,
पर क्या तुम वैसा कर लेते 
निर्देशित जो धरम कथ्य है?
=====
अक्षर के वाचन में क्या है 
तोते जैसे गान में?
वर्तमान से वक्त बचा लो 
तुम निज के निर्माण में।
=====
दिनकर का पूजन करने से 
तेज नहीं संचित होता ,
धर्म ग्रन्थ अर्चन करने से 
अक्ल नहीं अर्जित होता।
=====
मात्र बुद्धि की बात नहीं 
विवर्द्धन कर निज ज्ञान में,
वर्तमान से वक्त बचा लो 
तुम निज के निर्माण में।
=====
जिस ईश्वर की करते बातें 
देखो सृष्टि रचने में,
पुरुषार्थ कितना लगता है 
इस जीवन को गढ़ने में।
=====
कुछ तो गरिमा लाओ निज में 
क्या बाहर गुणगान में?
वर्तमान से वक्त बचा लो 
तुम निज के निर्माण में। 
=====
क्या रखा है वक्त गँवाने 
औरों के आख्यान में,
वर्तमान से वक्त बचा लो 
तुम निज के निर्माण में।
=====
अजय अमिताभ सुमन
सर्वाधिकार सुरक्षित 

Saturday, June 18, 2022

वर्तमान से वक्त बचा लो तुम निज के निर्माण में[प्रथम भाग]


अपनी समृद्ध ऐतिहासिक विरासत पर नाज करना किसको अच्छा नहीं लगता? परंतु इसका क्या औचित्य जब आपका व्यक्तित्व आपके पुरखों के विरासत से मेल नहीं खाता हो। आपके सांस्कृतिक विरासत आपकी कमियों को छुपाने के लिए तो नहीं बने हैं। अपनी सांस्कृतिक विरासत का महिमा मंडन करने से तो बेहतर ये हैं कि आप स्वयं पर थोड़ा श्रम कर उन चारित्रिक ऊंचाइयों को छू लेने का प्रयास करें जो कभी आपके पुरखों ने अपने पुरुषार्थ से छुआ था। प्रस्तुत है मेरी कविता "वर्तमान से वक्त बचा लो तुम निज के निर्माण में" का प्रथम भाग। 

वर्तमान से वक्त बचा लो 
तुम निज के निर्माण में
[प्रथम भाग]
==========
क्या रखा है वक्त गँवाने 
औरों के आख्यान में,
वर्तमान से वक्त बचा लो 
तुम निज के निर्माण में।
==========
पूर्व अतीत की चर्चा कर 
क्या रखा गर्वित होने में?
पुरखों के खड्गाघात जता 
क्या रखा हर्षित होने में?
भुजा क्षीण तो फिर क्या रखा 
पुरावृत्त अभिमान में?
वर्तमान से वक्त बचा लो 
तुम निज के निर्माण में।
==========
कुछ परिजन के सुरमा होने 
से कुछ पल हीं बल मिलता,
निज हाथों से उद्यम रचने 
पर अभिलाषित फल मिलता।
करो कर्म या कल्प गवां 
उन परिजन के व्याख्यान में,
वर्तमान से वक्त बचा लो 
तुम निज के निर्माण में।
==========
दूजों से निज ध्यान हटा 
निज पे थोड़ा श्रम कर लेते,
दूजे कर पाये जो कुछ भी 
क्या तुम वो ना वर लेते ?
शक्ति, बुद्धि, मेधा, ऊर्जा 
ना कुछ कम परिमाण में।
वर्तमान से वक्त बचा लो 
तुम निज के निर्माण में।
==========
क्या रखा है वक्त गँवाने 
औरों के आख्यान में,
वर्तमान से वक्त बचा लो 
तुम निज के निर्माण में।
==========
अजय अमिताभ सुमन:
सर्वाधिकार सुरक्षित 

Saturday, June 11, 2022

दुर्योधन कब मिट पाया:भाग-38

===================
कौरव सेना को एक विशाल बरगद सदृश्य रक्षण प्रदान करने वाले गुरु द्रोणाचार्य का जब छल से वध कर दिया गया तब कौरवों की सेना में निराशा का भाव छा गया। कौरव पक्ष के महारथियों के पाँव रण क्षेत्र से उखड़ चले। उस क्षण किसी भी महारथी में युद्ध के मैदान में टिके रहने की क्षमता नहीं रह गई थी । शल्य, कृतवर्मा, कृपाचार्य, शकुनि और स्वयं दुर्योधन आदि भी भयग्रस्त हो युद्ध भूमि छोड़कर भाग खड़े हुए। सबसे आश्चर्य की बात तो ये थी कि महारथी कर्ण भी युद्ध का मैदान छोड़ कर भाग खड़ा हुआ।
=================
धरा   पे   होकर   धारा शायी 
गिर पड़ता जब  पीपल  गाँव,
जीव  जंतु  हो  जाते ओझल 
तज  के इसके  शीतल छाँव।
=================
जिस तारिणी के बल पे केवट
जलधि   से   भी   लड़ता   है,
अगर  अधर में छिद  पड़े  हों 
कब  नौ चालक   अड़ता  है?
=================
जिस योद्धक के शौर्य  सहारे
कौरव   दल  बल   पाता  था,
साहस का वो स्रोत तिरोहित
जिससे   सम्बल  आता  था।
================
कौरव  सारे  हुए थे  विस्मित 
ना  कुछ क्षण को सोच सके,
कर्म  असंभव  फलित  हुआ 
मन कंपन  निःसंकोच  फले। 
=================
रथियों के सं  युद्ध त्याग  कर 
भाग    चला    गंधार     पति,
शकुनि का तन कंपित भय से 
आतुर   होता    चला   अति। 
================
वीर  शल्य  के  उर  में   छाई 
सघन भय और गहन निराशा,
सूर्य पुत्र  भी  भाग  चला  था 
त्याग पराक्रम धीरज  आशा।
================
द्रोण के सहचर  कृपाचार्य के 
समर  क्षेत्र  ना   टिकते  पाँव,
हो  रहा   पलायन   सेना  का 
ना दिख पाता था  कोई ठाँव।
================
अश्व   समर    संतप्त    हुए  
अभितप्त हो चले रण  हाथी,
कौरव के प्रतिकूल बह चली 
रण  डाकिनी ह्रदय  प्रमाथी।
================
अजय अमिताभ सुमन
सर्वाधिकार सुरक्षित 

Saturday, June 4, 2022

मेरे गाँव में होने लगा है शामिल थोड़ा शहर[द्वितीय भाग]


हाल फिलहाल में मेरे द्वारा  की गई मेरे गाँव की यात्रा के दौरान मेने जो  बदलाहट अपने गाँव की फिजा में देखी , उसका काव्यात्मक वर्णन मेने अपनी कविता "मेरे गाँव में होने लगा है शामिल थोड़ा शहर" के प्रथम भाग में की थी। ग्रामीण इलाकों के शहरीकरण के अपने फायदे हैं तो कुछ नुकसान भी। जहाँ गाँवों में इंफ्रास्ट्रक्चर बेहतर हो रहा है, छोटी छोटी  औद्योगिक इकाइयाँ बढ़ रही हैं, यातायात के बेहतर संसाधन उपलब्ध हो रहे हैं तो दूसरी ओर शहरीकरण के कारण ग्रामीण इलाको में जल की कमी, वायु प्रदुषण, ध्वनि प्रदूषण आदि सारे दोष जो कि शहरों में पाया जाता है , ग्रामीण इलाकों में भी पाया जाने लगा है , और मेरा गाँव भी इसका अपवाद नहीं रहा। शहरीकरण के परिणामों  को रेखांकित करती हुई प्रस्तुत है मेरी इस कविता "मेरे गाँव में होने लगा है शामिल थोड़ा शहर" का द्वितीय भाग।
========
मेरे गाँव में होने लगा है 
शामिल थोड़ा शहर
[द्वितीय  भाग]
=======
मेरे गाँव में होने लगा है  
शामिल थोड़ा शहर,
फ़िज़ा में बढ़ता धुँआ है 
और थोड़ा सा जहर।
=======
हर गली हर नुक्कड़ पे 
खड़खड़ आवाज  है,
कभी शांति जो छाती थी 
आज बनी ख्वाब है।
=======
जल शहरों की आफत  
देहात का भी कहर,
मेरे गाँव में होने लगा है  
शामिल थोड़ा शहर।
=======
जो कुंओं से कूपों  से  
मटकी भर लाते थे,
जो खेतों में रोपनी  के  
वक्त गुनगुनाते थे।
=======
वो ही  तोड़ रहे पत्थर  
दिन रात सारे  दोपहर, 
मेरे गाँव में होने लगा है  
शामिल  थोड़ा शहर।
=======
भूँजा सत्तू ना लिट्टी ना 
चोखे की दुकान है,
पेप्सी कोला हीं मिलते 
जब आते मेहमान हैं।
=======
मजदूर हो किसान हो 
या कि हो खेतिहर ,
मेरे गाँव में होने लगा है  
शामिल थोड़ा शहर।
=======
आँगन की तुलसी अब  
सुखी है काली है,
है उड़हुल में जाले ना  
गमलों में लाली है।
=======
केला भी झुलसा सा  
ईमली भी कटहर ,
मेरे गाँव में होने लगा है  
शामिल  थोड़ा शहर।
=======
बच्चे सब छप छप कर  
पोखर में गाँव,
खेतिहर के खेतों में      
नचते थे पाँव।
=======
अब नदिया भी सुनी सी  
पोखर भी नहर,
मेरे गाँव में होने लगा है  
शामिल  थोड़ा शहर।
=======
विकास का असर क्या है   
ये भी है जाना, 
बिक गई मिट्टी बन    
ईट ये पहचाना,
=======
पक्की हुई मड़ई   
गायब हुए हैं खरहर ,
मेरे गाँव में होने लगा है  
शामिल थोड़ा शहर।
=======
फ़िज़ा में बढ़ता धुँआ है 
और थोड़ा सा जहर,
मेरे गाँव में होने लगा है  
शामिल थोड़ा शहर।
=======
अजय अमिताभ सुमन:
सर्वाधिकार सुरक्षित 
========

My Blog List

Followers

Total Pageviews