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Monday, August 29, 2022
जनतंत्र या युद्धतंत्र
Sunday, August 28, 2022
वर्तमान से वक्त बचा लो: पंचम भाग
विवाद अक्सर वहीं होता है, जहां ज्ञान नहीं अपितु अज्ञान का वास होता है। जहाँ ज्ञान की प्रत्यक्ष अनुभूति होती है, वहाँ वाद, विवाद या प्रतिवाद क्या स्थान ? आदमी के हाथों में वर्तमान समय के अलावा कुछ भी नहीं होता। बेहतर तो ये है कि इस अनमोल पूंजी को वाद, प्रतिवाद और विवाद में बर्बाद करने के बजाय अर्थयुक्त संवाद में लगाया जाए, ताकि किसी अर्थपूर्ण निष्कर्ष पर पहुंचा जा सके। प्रस्तुत है मेरी कविता "वर्तमान से वक्त बचा लो तुम निज के निर्माण में" का पंचम भाग।
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वर्तमान से वक्त बचा लो
पंचम भाग
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क्या रखा है वक्त गँवाने
औरों के आख्यान में,
वर्तमान से वक्त बचा लो
तुम निज के निर्माण में।
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अर्धसत्य पर कथ्य क्या हो
वाद और प्रतिवाद कैसा?
तथ्य का अनुमान क्या हो
ज्ञान क्या संवाद कैसा?
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प्राप्त क्या बिन शोध के
बिन बोध के अज्ञान में ?
वर्तमान से वक्त बचा लो
तुम निज के निर्माण में।
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जीवन है तो प्रेम मिलेगा
नफरत के भी हाले होंगे ,
अमृत का भी पान मिलेगा
जहर उगलते प्याले होंगे ,
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समता का तू भाव जगा
क्या हार मिले सम्मान में?
वर्तमान से वक्त बचा लो
तुम निज के निर्माण में।
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जो बिता वो भूले नहीं
भय है उससे जो आएगा ,
कर्म रचाता मानव जैसा
वैसा हीं फल पायेगा।
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यही एक है अटल सत्य
कि रचा बसा लो प्राण में ,
वर्तमान से वक्त बचा लो
तुम निज के निर्माण में।
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क्या रखा है वक्त गँवाने
औरों के आख्यान में,
वर्तमान से वक्त बचा लो
तुम निज के निर्माण में।
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अजय अमिताभ सुमन:
सर्वाधिकार सुरक्षित
Saturday, August 13, 2022
पलटू
इस सृष्टि में बदलाहटपन स्वाभाविक है। लेकिन इस बदलाहटपन में भी एक नियमितता है। एक नियत समय पर हीं दिन आता है, रात होती है। एक नियत समय पर हीं मौसम बदलते हैं। क्या हो अगर दिन रात में बदलने लगे? समुद्र सारे नियमों को ताक पर रखकर धरती पर उमड़ने को उतारू हो जाए? सीधी सी बात है , अनिश्चितता का माहौल बन जायेगा l भारतीय राजनीति में कुछ इसी तरह की अनिश्चितता का माहौल बनने लगा है। माना कि राजनीति में स्थाई मित्र और स्थाई शत्रु नहीं होते , परंतु इस अनिश्चितता के माहौल में कुछ तो निश्चितता हो। इस दल बदलू, सत्ता चिपकू और पलटूगिरी से जनता का भला कैसे हो सकता है? प्रस्तुत है मेरी व्ययंगात्मक कविता "मान गए भई पलटू राम"।
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तेरी पर चलती रहे दुकान,
मान गए भई पलटू राम।
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कभी भतीजा अच्छा लगता,
कभी भतीजा कच्चा लगता,
वोहीं जाने क्या सच्चा लगता,
ताऊ का कब नया पैगाम ,
अदलू, बदलू, डबलू राम,
तेरी पर चलती रहे दुकान।
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जहर उगलते अपने चाचा,
जहर निगलते अपने चाचा,
नीलकंठ बन छलते चाचा,
अजब गजब है तेरे काम ,
ताऊ चाचा रे तुझे प्रणाम,
तेरी पर चलती रहे दुकान।
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केवल चाचा हीं ना कम है,
भतीजा भी एटम बम है,
कल गरम था आज नरम है,
ये भी कम ना सलटू राम,
भतीजे को भी हो सलाम,
तेरी पर चलती रहे दुकान।
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मौसम बदले चाचा बदले,
भतीजे भी कम ना बदले,
पकड़े गर्दन गले भी पड़ले।
क्या बच्चा क्या चाचा जान,
ये भी वो भी पलटू राम,
इनकी चलती रहे दुकान।
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कभी ईधर को प्यार जताए,
कभी उधर पर कुतर कर खाए,
कब किसपे ये दिल आ जाए,
कभी ईश्क कभी लड़े धड़ाम,
रिश्ते नाते सब कुर्बान,
तेरी पर चलती रहे दुकान।
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थूक चाट के बात बना ले,
जो मित्र था घात लगा ले,
कुर्सी को हीं जात बना ले,
कुर्सी से हीं दुआ सलाम,
मान गए भई पलटू राम,
तेरी पर चलती रहे दुकान।
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अहम गरम है भरम यही है,
ना आंखों में शरम कहीं है,
सबकुछ सत्ता धरम यही है,
क्या वादे कैसी है जुबान ,
कुर्सी चिपकू बदलू राम,
तेरी पर चलती रहे दुकान।
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चाचा भतीजा की जोड़ी कैसी,
बुआ और बबुआ के जैसी,
लपट कपट कर झटक हो वैसी,
ताक पे रख कर सब सम्मान,
धरम करम इज्जत ईमान,
तेरी पर चलती रहे दुकान।
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अदलू, बदलू ,झबलू राम,
मान गए भई पलटू राम।
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अजय अमिताभ सुमन
सर्वाधिकार सुरक्षित
Saturday, July 16, 2022
कैसे बना दुर्योधन का शरीर वज्र का
महाभारत के अंतिम पल में जब भीम और दुर्योधन के बीच निर्णायक युद्ध चल रहा था तब भीम की अनगिनत कोशिशों के बावजूद दुर्योधन के शरीर को कोई भी हानि नहीं पहुंच रही थी। भीम द्वारा दुर्योधन के शरीर पर गदा से बार बार प्रहार करने के बावजूद दुर्योधन का शरीर जस का तस बना हुआ था। इसका कारण ये था कि दुर्योधन के शरीर के कमर से ऊपर का हिस्सा वज्र की भांति मजबूत था।
जब भीम दुर्योधन को किसी भी प्रकार हरा नहीं पा रहे थे तब भगवान श्रीकृष्ण द्वारा निर्देशित किए जाने पर युद्ध की मर्यादा का उल्लंघन करते हुए छल द्वारा भीम ने दुर्योधन की जांघ पर प्रहार किया जिस कारण दुर्योधन घायल हो गिर पड़ा और अंततोगत्वा उसकी मृत्यु हो गई। प्रश्न ये उठता है कि आम मानव का शरीर तो वज्र का बना नहीं होता , फिर दुर्योधन का शरीर वज्र का कैसे बन गया था? उसका शरीर वज्रधारी किस प्रकार बना?
आम किदवंती है कि जब महाभारत का युद्ध अपने अंतिम दौर में चल रहा था और कौरवों में केवल दुर्योधन हीं बच गया था तब कौरवों की माता गांधारी ने अपने बचे हुए एकमात्र पुत्र दुर्योधन की जान बचाने के लिए उससे कहा वो उनके सामने निर्वस्त्र होकर आ जाये।
किदवंती ये कहती हैं की दुर्योधन की माता गांधारी सत्यवती नारी थी। जब उनको ये ज्ञात हुआ कि उनके पति घृतराष्ट्र अंधे हैं, तो उन्होंने भी अपनी आंखों पर पट्टी बांध लिया।
उनकी सतित्त्व के कारण उनकी आंखों में दिव्य शक्ति आ गई थी। उनकी आंखों में इतनी ऊर्जा समाई हुई थी कि उनकी दृष्टि जिसपर भी पड़ती, वो वज्र की भांति मजबूत हो जाता। माता गांधारी अपनी इसी दिव्य शक्ति का उपयोग कर दुर्योधन का शरीर वज्र का बनाना चाहती थी।
इसी उद्देश्य से माता गांधारी ने दुर्योधन को अपने सामने पूर्ण रूप से निर्वस्त्र होकर आने को कहा था ताकि दुर्योधन का शरीर पूर्ण रूप से वज्र की तरह मजबूत हो जाए और उसपर किसी भी भांति के अस्त्रों या शस्त्रों का प्रभाव न हो सके।
ऐसा माना जाता है की अपनी माता की बात मानकर दुर्योधन नग्न अवस्था में हीं अपनी माता गांधारी से मिलने चल पड़ा था। परन्तु मार्ग में ही दुर्योधन की मुलाकात श्रीकृष्ण से हुई। श्रीकृष्ण ने दुर्योधन के साथ इस तरीके से मजाक किया कि दुर्योधन पूर्ण नग्न अवस्था में अपनी माता के पास नहीं जा सका।
ऐसा कहा जाता है कि जब अपनी माता की आज्ञानुसार दुर्योधन जा रहा था तो भगवान श्रीकृष्ण ने उसे रास्ते में हीं रोक लिया और दुर्योधन से मजाक करते हुए कहा कि माता गांधारी के पास इस तरह नग्न अवस्था में मिलने क्यों जा रहे हो ? तुम कोई छोटे से बच्चे तो हो नहीं, फिर इस तरह का व्यवहार क्यों?
जब दुर्योधन ने पूरी बात बताई तब श्रीकृष्ण जी ने उसको अपने कमर के निचले हिस्से को पत्तों से ढक लेने के लिए कहा । इससे माता की आज्ञा का पालन भी हो जाएगा और दुर्योधन जग हंसाई से भी बच जायेगा। दुर्योधन को श्रीकृष्ण की बात उचित हीं लगी।
दुर्योधन भगवान श्रीकृष्ण की छल पूर्ण बातों का शिकार हो गया। श्रीकृष्ण की सलाह अनुसार उसने अपने कमर के निचले हिस्से को पत्तों से ढँक लिया और उसी अवस्था में माता फिर गांधारी के समक्ष उपस्थित हुआ।
उसके बाद दुर्योधन की माता ने जैसे हीं अपने नेत्र खोले, उनकी दृष्टि दुर्योधन के नग्न शरीर पर पड़ी जिसकी वजह से उसका शरीर वज्र के समान कठोर हो गया। परंतु उसके जांघ मजबूत नहीं हो सके क्योकि उसकी माता गांधारी की दृष्टि पत्तों के कारण कमर के निचले भाग पर नहीं पड़ सकी। इस कारण उसके कमर का निचला भाग कमजोर रह गया । इस तरह की कहानी हर जगह मिलती है।
किन्तु जब हम महाभारत का अध्ययन करते हैं , तो दूसरी हीं बात निकल कर आती है । पांडवों के वनवास के दौरान जब दुर्योधन को चित्रसेन नामक गंधर्व ने बंदी बना लिया था और फिर अर्जुन ने चित्रसेन से युद्ध कर दुर्योधन को छुड़ा लिया था , तब दुर्योधन आत्म ग्लानि से भर गया और आमरण अनशन पर बैठ गया।
इस बात का वर्णन महाभारत में घोषयात्रा पर्व के विपक्षाशदधिकद्विशततमोऽध्यायः में मिलता है। घोषणा पर्व में इस बात का जिक्र आता है कि दुर्योधन के आमरण अनशन पर बैठ जाने के बाद उसको कर्ण , दु:शासन और शकुनी आदि उसे अनेक प्रकार से समझाने की कोशिश करते हैं फिर भी दुर्योधन नहीं मानता।
दुर्योधन की ये अवस्था देखकर दानव घबरा जाते है कि अगर दुर्योधन मृत्यु को प्राप्त हो जाता है तो उनका पक्ष इस दुनिया में कमजोर हो जायेगा। इस कारण वो दुर्योधन को पाताल लोक ले जाते है और उसको नाना प्रकार से समझाने की कोशिश करते हैं । इसका जिक्र कुछ इस प्रकार आता है। दानव दुर्योधन से कहते हैं:
भोः सुयोधन राजेन्द्र भरतानां कुलोहह ।
शूरैः परिवृतो नित्यं तथैव च महात्मभिः ॥ १ ॥
अकार्षीः साहस मिदं कस्मात् प्रायोपवेशनम् ।
आरमत्यागी हाधोयाति वाच्यतां चायशस्करीम्॥२॥
दानव बोले-भारतवंश का भार वहन करने वाले महाराज दुर्योधन ! आप सदा शूरवीरों तथा महामना पुरुषों से घिरे रहते हैं। फिर आपने यह आमरण उपवास करने का साहस क्यों किया है? आत्म हत्या करने वाला पुरुष तो अधो गतिको प्राप्त होता है और लोक में उसकी निन्दा होती है, जो अवश फैलाने वाली है॥
न हि कार्यविरुडेपु बहुपापेषु कर्मसु ।
मूलघातिपुसश्यन्ते बुद्धिमन्तो भवविधाः ॥ ३ ॥
जो अभी कार्यों के विरुद्ध पढ़ते हों, जिनमें बहुत पाप भरे हो तथा जो अपना विनाश करनेवाले हो, ऐसे आत्महत्या आदि अक्षम विचार आप-जैसे बुद्धिमान पुरुष को शोभा नहीं देता ॥३॥
नियच्छनां मति राजन धर्मार्थसुखनाशिनीम्।
श्रूयतां तु प्रभो तश्यं दिव्यतां चारमनो नृप।
यशःप्रतापपीयी शां हर्षवर्धनीम् ॥ ४॥
निर्मार्ण च शरीरमा तातो धैर्यमवाप्नुहि ॥ ५ ॥
प्रभो ! एक रहस्य की बात सुनिये । नरेश्वर राजन ! आपका यह आत्म हत्या सम्बन्धी विचार धर्म , अर्थ पराक्रम का नाश करने वाला तथा शत्रुओ का हर्ष बढ़ाने वाला है ।
दुर्योधन को फिर भी निराश होते देख दानव आगे बताते हैं कि दानवों ने अति श्रम करके दुर्योधन का वज्रधारी शरीर भगवान शिव की आराधना करके प्राप्त किया था।
पूर्वकायश्च पूर्वस्ते निर्मितो वज्रसंचयैः ॥ ६ ॥
राजन् ! पूर्वकाल में हमलोगों ने तपस्या द्वारा भगवान शंकर की आराधना करके आपको प्राप्त किया था । आपके शरीर का पूर्वभाग-जो नाभि से ऊपर है वज्र समूहसे बना हुआ है ।। ६ ॥
अस्त्रैरभेद्यः शस्त्रैश्चाप्यधः कायश्च तेऽनघ ।
कृतः पुष्पमयो देव्या रूपतः स्त्रीमनोहरः॥ ७ ॥
वह किसी भी अस्त्र-शस्त्र से विदीर्ण नहीं हो सकता। अनघ ! उसी प्रकार आपका नाभि से नीचे का शरीर पार्वती देवी ने पुष्प मय बनाया है, जो अपने रूप-सौन्दर्यसे स्त्रियों के मनको मोहने वाला है ।। ७ ॥
एवमीश्वरसंयुक्तस्तव देहो नृपोत्तम ।
देव्या च राजशार्दूल दिव्यस्त्वं हि न मानुषः ॥ ८ ॥
नृप श्रेष्ठ ! इस प्रकार आपका शरीर देवी पार्वती के साथ साक्षात भगवान महेश्वर ने संघटित किया है । अतः राज सिंह ! आप मनुष्य नहीं, दिव्य पुरुष हैं ॥ ८ ॥
इस प्रकार हम देखते हैं कि दुर्योधन के शरीर का पूर्वभाग-जो नाभि से ऊपर था , उसको भगवान शिव ने दानवों के आराधना करने पर वज्र का बनाया था और उसके शरीर के कमर से निचला भाग पार्वती देवी ने बनाया था , जो कि स्त्रियों के अनुकूल कोमल था।
दानव फिर दुर्योधन को आने वाले समय में इंद्र द्वारा छल से कर्ण के कवच कुंडल मांगे जाने की भी बात बताते हैं ।
शात्वैतच्छद्मना वज्री रक्षार्थ सव्यसाचिनः।
कुण्डले कवचं चैव कर्णस्यापहरिष्यति ॥२२॥
इस बात को समझकर वज्र धारी इन्द्र अर्जुन की रक्षा के लिये छल करके कर्ण के कुण्डल और कवचका अपहरण कर लेंगे ॥ २२ ॥
तस्मादस्माभिरप्यत्र दैत्याः शतसहस्रशः।
नियुक्ता राक्षसाश्चैव ये ते संशप्तका इति ॥ २३ ॥
प्रख्यातास्तेऽर्जुनं वीरं हनिष्यन्ति च मा शुचः।
असपत्ना त्वयाहीयं भोक्तव्या वसुधा नृप ॥ २४ ॥
इसीलिये हमलोगों ने भी एक लाख दैत्यों तथा राक्षसों को इस काममें लगा रखा है, जो संशप्तक नाम से विख्यात हैं। वे वीर अर्जुनको मार डालेंगे । अतः आप शोक न करें। नरेश्वर ! आपको इस पृथ्वीका निष्कंटक राज्य भोगना है ॥
मा विषादं गमस्तस्मान्नैतत्त्वय्युपपद्यते।
विनष्टे त्वयि चास्माकं पक्षो हीयेत कौरव ॥२५॥
अतः कुरुनन्दन ! आप विषाद न करें । यह आपको शोभा नहीं देता है। आपके नष्ट हो जाने पर तो हमारे पक्ष का ही नाश हो जायगा ॥ २५ ॥
यच्च तेऽन्तर्गतं वीर भयमर्जुनसम्भवम् ।
तत्रापि विहितोऽस्माभिर्वधोपायोऽर्जुनस्य वै ॥ १९ ॥
वीर ! आपके भीतर जो अर्जुनका भय समाया हुआ है, वह भी निकाल देना चाहिये, क्योंकि हमलोगों ने अर्जुनके वध का उपाय भी कर लिया है ।। १९ ।।
हतस्य नरकस्यात्मा कर्णमूर्तिमुपाश्रितः ।
तद् वैरं संस्मरन् वीर योत्स्यते केशवार्जुनौ ॥ २० ॥
श्रीकृष्ण के हाथों जो नरकासुर मारा गया है, उसकी आत्मा कर्ण के शरीर में घुस गयी है। वीरवर ! वह (नरकासुर ) उस वैर को याद करके श्रीकृष्ण और अर्जुन से युद्ध करेगा |
इस प्रकार दुर्योधन को बहुत पहले हीं ज्ञात हो गया था कि कर्ण के साथ छल किया जायेगा । दुर्योधन को ये भी ज्ञात हो गया था कि कर्ण के शरीर में भगवान श्रीकृष्ण द्वारा मारे गए राक्षस नरकासुर का वास हो जायेगा जो दुर्योधन की तरफ से प्रचंड रूप से लड़ेगा।
इस प्रकार इस बात के लिए कर्ण को दोष नहीं दिया जा सकता कि इंद्र के द्वारा कवच कुंडल मांगे जाने पर उसने दुर्योधन की हित का ध्यान दिए बिना कवच और कुंडल इंद्र को समर्पित कर दिया।
अपितु दुर्योधन को स्वयं हीं भविष्य में घटने वाली इस बात से कर्ण को चेता देना चाहिए था। खैर कर्ण को ये बात पता चल हीं गई थी, क्योंकि उसके पिता सूर्य ने इस बात के लिए कर्ण को पहले हीं सावधान कर दिया था।
नरकासुर के बारे में पुराणों में लिखा गया है कि वो प्राग ज्योति नरेश था। इस क्षेत्र को आज कल आसाम के नाम से जाना जाता है।नरकासुर को वरदान प्राप्त था कि वो किसी नर द्वारा नहीं मारा जा सकता था।
इसी कारण भगवान श्री कृष्ण ने अपनी पत्नी सत्यभामा की सहायता से नरकासुर का वध किया था। दानव दुर्योधन को उसी नरकासुर के बारे में बताते हैं कि उसकी आत्मा कर्ण में प्रविष्ट होकर श्रीकृष्ण तथा अर्जुन से अपना बैर साधेगी। दानव दुर्योधन को आगे बताते हैं।
राजन् ! दैत्यों तथा राक्षसों के समुदाय क्षत्रिय योनि में उत्पन्न हुए हैं, जो आपके शत्रुओं के साथ पराक्रम पूर्वक युद्ध करेंगे। वे महाबली वीर दैत्य आपके शत्रुओं पर गदा, मुसल, शूल तथा अन्य छोटे-बड़े अस्त्र-शस्त्रों द्वारा प्रहार करेंगे ||
जब दानवों ने दुर्योधन को ये भी बताया कि उन्होंने उसकी सहायता के लिए लाखों दैत्यों और राक्षसों को लगा रखा है , तब उसका विश्वास लौट आया और उसने आमरण अनशन का विचार त्याग दिया।
इस प्रकार हम देखते हैं कि महाभारत के घोषणा पर्व में दुर्योधन के कमर से उपरी भाग के शरीर का वज्र से बना हुआ होने का कारण दानवों द्वारा शिव की आराधना के कारण बताया गया है जिसे भगवान शिव ने दानवों की उपासना करने पर बनाया था।
और दुर्योधन के शरीर का निचला भाग कोमल था क्योकि उसे माता पार्वती ने स्त्रियों को मोहने के लिए बनाया था । इस प्रकार हम देखते हैं कि माता गांधारी की दिव्य दृष्टि के कारण नहीं अपितु भगवान शिव और माता पार्वती की कृपा के कारण , जो कि दानवों की तपस्या के कारण मिली थी, दुर्योधन का शारीर वज्र का बना था।
अजय अमिताभ सुमन: सर्वाधिकार सुरक्षित
Monday, July 11, 2022
गुमान
न्याय सम्राट अशोक का
तुझे शर्म नहीं आती?
Saturday, July 9, 2022
वर्तमान से वक्त बचा लो तुम निज के निर्माण में[तृतीय भाग ]
Tuesday, July 5, 2022
राजनैतिक जगत के कॉरपोरेट मंत्र
राजनीति और कॉरपोरेट जगत के काम करने के तरीके में एक समानता है। राजनीति हो या कि कॉरपोरेट घराने , दोनों के सफलता का राज यही है कि शीर्ष पर आसीन लोग सबको अपने साथ ले कर चल सकने में सक्षम है या नहीं?
इसके लिए ये जरूरी है कि मैनेजमेंट के शीर्ष पर रहने वाले व्यक्तियों के दरवाजे स्वयं के साथ काम करने वालों के लिए खुले हो।
अकड़ कर रहने से कोई बड़ा नहीं हो जाता। आपका बड़ा होना इस बात पर निर्भर करता है कि पार्टी का एक साधारण सा कार्यकर्ता आपसे बिना रोक टोक के मिल सकता है या नहीं?
यदि नेता अपने साथ काम करने वालों की बजाय कुछ गिने चुने खुशामद करने वालों के बीच हीं घिरे रहना पसंद करने लगे, तो इसका क्या दुष्परिणाम हो सकता है, राजनीति में घटने वाली आजकल की घटनाओं से ये साफ जाहिर होता है।
ठीक यही बात कॉरपोरेट घरानों पर भी लागू होती है। खुशामद करने वाले और जी हुजूरी करने वाले सदस्यों की बात सुनने के अलावा यदि प्रतिरोध का स्वर ऊंचा करने वालों की बातों को न सुना जाए तो इसमें उस घराने का हित कतई नहीं होता।
एक संस्था की मजबूती इस बात पर निर्भर करती है कि भीतर से उठते हुए असंतोष के स्वर को समझने में वो कितनी सक्षम है?
दूसरी बात , संस्था को अपने मूलभूत वैचारिक सिद्धानों से कभी समझौता नहीं करना चाहिए। हरेक राजनैतिक पार्टी का आधार कुछ आधार भूत सिद्धांत होते हैं।
काम करने के कुछ विशेष तरीके होते हैं हर संस्था के। एक विशेष लक्ष्य और लक्ष्य प्राप्त करने हेतु अपनाए गए तरीकों में हरेक संस्था अलग होती है।
कभी कभी ऐसे मौके आते हैं जब सैद्धांतिक रूप से मतभेद रखने वाले पार्टियों के साथ सहयोग तात्कालिक रूप से लाभदायक सिद्ध होते हैं। परंतु इसके दूरगामी परिणाम हमेशा पार्टी के हितों के विरुद्ध हीं साबित होते हैं।
यही बात कॉरपोरेट घरानों पर भी लागू होती है। हरेक कॉरपोरेट घरानों के काम करने के कुछ अपने विशेष तरीके और अपने मूलभूत आधार होते हैं। सबके अपने अपने कुछ मूलभूत सिद्धांत और वैचारिक आधार होते हैं।
इन सिद्धांतों का त्याग करके नए सहयोगी ढूंढने में कोई फायदा नहीं । याद रहे ये काम करने के ये वो हीं तरीके है जिस कारण एक संस्था का अस्तित्व इतने लंबे समय तक बना हुआ है। फिर मूलभूत सैद्धांतिक आधार से समझौता कर बनाए गए संबंध लंबे समय तक चल नहीं पाते ।
राजनीति में मिली जुली सरकारों का बनना और बिखरना और क्या साबित करता है? आखिकार राजनीति भी तो व्यक्तियों द्वारा हीं चलाई जाती रही है। दो भिन्न भिन्न प्रकार के पहियों पे चलने वाली गाड़ी आखिर कितने दिनों तक चल सकती है?
हरेक राजनैतिक पार्टी युवा पीढ़ी का बढ़ावा देना पसंद करती है। परंतु गर्म जोश के साथ साथ पुरानी पीढ़ी का साथ भी अति आवश्यक होता है सफलता के लिए।
जिस प्रकार देश , काल और परिस्थिति के अनुसार कभी त्वरित फैसले लेने जरूरी होते हैं तो कभी कभी किसी कदम के उठाने से पहले लंबे और गंभीर सोच विचार की जरूरत होती है।
एक हथियार का मजबूत होना जरूरी होता है परंतु इससे ज्यादा महत्वपूर्ण ये कि हथियार से लक्ष्य का संधान करने वाले हाथ कितने सधे हुए है?
और यहां पे ये जरूरी हो जाता है कि उन हाथों ने बार बार इन तरह की परिस्थितियों का सामना किया है कि नहीं? उन हाथों को पर्याप्त अनुभव है या नहीं?
पुरानी पीढ़ी के अनुभव और नई पीढ़ी के जोश के बीच सामंजस्य स्थापित किए बिना ना तो कोई राजनैतिक पार्टी हीं आगे बढ़ सकती है और ना हीं कोई कॉरपोरेट घराना।
अक्सर ये देखा देता है कि सत्ता के नशे में संस्था के शीर्ष स्थानों पर विराजमान नेता सदस्यों से राय लिए बिना अपने फैसले थोपने लगते हैं। यदि सदस्यों पर फैसले लादने हैं तो थोड़ी बहुत उनकी भागीदारी भी बहुत जरूरी है।
यदि एक संस्था सदस्यों के कार्य के प्रति लगन की अपेक्षा करती है तो संस्था की भी जवाबदेही भी तो अपने कार्यकर्ता के प्रति होनी चाहिए। और ये काम अपने सदस्यों को निर्णय लेने की प्रक्रिया में शामिल किए बिना नहीं हो सकता।
याद रहे एक संस्था का सफल या असफल होना इस बात पर निर्भर करता है कि उस संस्था में काम करने वाला हरेक सदस्य उस संस्था के प्रति कितना समर्पित है?
और अंतिम परंतु महत्वपूर्ण बात , बड़बोलेपन से बचना। राजनैतिक रूप से बड़बोलापन न तो केवल आपके नए नए प्रतिद्वंद्वियों को जन्म देता है, अपितु आपको कहीं ना कहीं अहंकारी भी साबित करता है।
ठीक यही बात कॉरपोरेट घरानों पर भी लागू होती है। किसी दूसरे के खिलाफ बोलकर या किसी और को नीचा दिखाकर आप स्वयं बड़े नहीं हो जाते।
बेहतर तो ये है कि बड़े बड़े बोल बोलने के स्थान पर आपके कर्म हीं आपकी आवाज हो । मितवादी और कर्म करनेवाले कहीं असफल नहीं होते, फिर चाहे ये राजनीति हो या कि कॉरपोरेट घराने।
अजय अमिताभ सुमन:सर्वाधिकार सुरक्षित
Thursday, June 30, 2022
जब महारथी कर्ण भीम से डर गए
इस बात में कोई संशय नहीं कि महारथी कर्ण एक महान योद्धा थे और एक बार उन्होंने महाभारत युद्ध के दौरान भीमसेन को एक बार हराया भी था. परन्तु महाभारत युद्ध के दौरान एक ऐसा भी पल आया था , जब महारथी कर्ण में मन में भीमसेन का पराक्रम देख कर भय समा गया था . महाभारत महाग्रंथ के कर्ण पर्व के चतुरशीतितमोध्याय अर्थात अध्याय संख्या 84 के श्लोक संख्या 1 से श्लोक संख्या 14 में इस घटना का विस्तार से वर्णन आता है .
ये अध्याय भीमसेन द्वारा दु:शासन के वध के बाद घटी घटनाओं का वर्णन करता . भीम सेन ने दु:शासन के वध के दौरान बहुत हीं रौद्र रूप धारण कर लिया था . भीम सेन ने दु:शासन का सीना फाड़कर उसका लहू भी पी लिया था.
इस अध्याय में भीमसेन द्वारा दुर्योधन के अन्य 10 भाइयों का वध और तदुरोपरांत भीमसेन का ये रौद्र रूप देखकर कर्ण के मन में भय के समा जाने का जिक्र आता है . खासकर कर्ण की इस भयातुर दशा का स्पष्ट रूप से वर्णन श्लोक संख्या 7 और 8 आता है . इसके बाद के श्लोकों में शल्य द्वारा कर्ण को समझाने की बात का वर्णन किया गया है .
“स॒ बार्यमाणो विशिखेः समन्तात् तैमेहारथें: ॥ भीमः क्रोघाप्मिरक्ताक्षः कुछः काल इवावभौ ।4॥“
उन महारथियों के चलाये हुए बा्णो द्यारा चारों ओर से रोके जाने पर भीमसेनकी आँखें क्रोध से लाल हो गयीं और वे कुपित हुए. कालके समान प्रतीत होने लगे.
तांस्तु भल्लैमंदावेगैदशभिदंश भारतान्॥ डुक््माडदान् रुक््मपुझैः पाथों निस्ये यमक्षयम्।5॥
कुन्तीकुमार भीमने सोनेके पंखबाले महान् वेगशाली दस भल्लों द्वारा खुवर्णमय आन्ग्दों से विभूषित उन दर्सों मरत-बंशी राजकुमारों को यमछोक पहुँचा दिया.
इतेषु तेषु बीरेषु प्रदुद्राव बल तव॥ पश्यतः खूतपुश्रस्य पाण्डवस्य भयार्दितम्।6 ॥
उन वीरोंके मारे जानेपर पाण्डु पुत्र भीम सेनके भय से पीड़ित हो आपकी सारी सेना सूत पुत्रके देखते-देखते माग चली.
संजय उस पुरे युद्ध का वृतांत धृतराष्ट्र को सुना रहे थे . श्लोक 4 से श्लोक 6 तक भीम सेन द्वारा धृतराष्ट्र के दस पुर्तों का वध का वर्णन है . इसके बाद कैसे कर्ण के मन में भय समा जाता है , इसका वृतांत आता है .
ततः कर्णों मद्दाराज प्रविवेश महव् भयम् ॥ इष्ठा भीमस्य विक्रान्तमन्तकस्य प्रजाखिव ।7 ॥
महाराज ! जैसे प्रजा बर्ग पर यमराज का बल काम करता है, उसी प्रकार मीमसेन का वह पराक्रम देखकर कर्ण के मन में महान् भय समा गया.
तस्य त्वाकारभावज्ञ: शल्य समिति शोभनः ॥ उवाच वचन कर्ण प्राप्तकालम रिदमम ।8 ॥
युद्धमें शोमा पानेवाले शल्य कर्ण की आकृति देखकर ही उसके मनका भाव समझ गये; अतः शत्रु दमन कर्ण से यह समयोचित बचन बोले.
मा व्यथां कुरु राधेय नेथं त्वय्युपपद्यते ॥ एते द्ववन्ति राजानो भीमसेनभयार्दिताः ।9॥
दुर्योधनश्च सम्मूढो भ्रातृव्यलनकरशितः ॥ 10 ॥
“राधानन्दन | तुम खेद न करो) तुम्हें यह शोमा नहीं देता है । ये राजा लोग भीमसेन के भय से पीड़ित हो भागे जा रहे हैं। अपने भाइयों की मृत्युसे दुःखित हो राजा दुर्योधन भी किंकर्तव्यविमूढ़ हो गया है ॥ 9-10 ॥
इस प्रकार भीम का पराक्रम देखकर कर्ण के मन में महान भय समा जाने पर शल्य उसे नाना प्रकार से प्रोत्साहित करने लगते हैं . शब्द महान भय का इस्तेमाल किया गया है इस श्लोक में . इस श्लोक का इस्तेमाल ये स्पष्ट रूप से जाहिर करता है कि कर्ण निश्चित रूप से भीम का पराक्रम देखकर भयातुर हो गए होंगे .
हालाँकि शल्य के समझाने और प्रोत्साहित करने के बाद उनके मन से भय का भाव मिट गया और वो फिर से युद्ध के मैदान में डट गए थे . परन्तु आश्चर्य की बात तो ये है कि कर्ण जैसा महारथी भी भीम के पराक्रम से भयग्रस्त हो गए थे .
तो ये थी वो घटना , जहाँ पे इस बात का जिक्र आता है कि कैसे महाभारत युद्ध के दौरान महारथी कर्ण भीम का पराक्रम देखकर डर गए थे . एक जिक करने वाली बात ये है कि महाभारत युद्ध के दौरान कर्ण का पराक्रम देखकर युद्धिष्ठिर भी भयाग्रस्त हो गए थे और एक बार अर्जुन भी विचलित हो गए थे . परन्तु अर्जुन का कर्ण से डरने या भीम सेन का कर्ण से डरने का जिक्र नहीं आता है .
अजय अमिताभ सुमन : सर्वाधिकार सुरक्षित
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