एक बार कोर्ट में ज़ोरदार बहस चल रही थी। एक तरफ का वकील साहब तो ऐसे चिल्ला रहे थे मानो वो कोयल नहीं, पूरा स्पीकर सिस्टम हों – "माई लॉर्ड! ये अन्याय है! ये ज़ुल्म है! ये... ये... बर्दाश्त के बाहर है!!" आवाज़ इतनी तेज़ कि कोर्ट की दीवारें भी काँप रही थीं।
पहला वकील थोड़ा शांत हुआ, लेकिन अंदर से सोचा – "अरे, कोयल तो मीठा गाती है, मैं तो गरज रहा हूँ!"
वो रुके, थोड़ा ड्रामैटिक पॉज़ लिया और बोले,"अगर कोयल चालाकी से बाज़ के घोंसले के पास जाकर बार-बार 'कूहू-कूहू' करे, और बाज़ को इतना तंग कर दे कि बाज़ गुस्से में अपना शिकार छोड़कर कोयल का पीछा करने लगे... तो शिकार कोयल नहीं, पर दूसरे पक्षी उठा ले जाते हैं!"
कोर्ट रूम में ठहाका लग गया। पहला वकील साहब अब सोच में पड़ गए – "अरे, ये तो मेरे साथ ही हो रहा है! मैं चिल्ला रहा हूँ, और ये चुपचाप मेरी दलीलों की कमज़ोरियाँ निकाल रहे हैं!"
जज साहब हँसते हुए बोले, "बहुत खूब! तो साहब लोग, न कोयल बनिए जो सिर्फ़ गाए, न ऐसे बाज़ बनिए जो गुस्से में अपना शिकार गँवा दें। बस चालाक कोयल और समझदार बाज़ का कॉम्बिनेशन बनिए – मीठी आवाज़ में मज़बूत तर्क दीजिए।"
मोरल ऑफ़ द स्टोरी: कोर्ट में न ज़्यादा कोयल बनो, न गुस्सैल बाज़। थोड़ा कोयल का मीठापन + थोड़ा बाज़ का फोकस = जीत पक्की!
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