Saturday, March 14, 2026

बोधिसत्व और मृत मूषक

 बहुत-बहुत प्राचीन काल की बात है। उस युग में संसार में अभी भगवान गौतम बुद्ध का अवतार नहीं हुआ था। किंतु उनके पूर्वजन्मों में वे बार-बार इस धरती पर जन्म लेते रहे। उन जन्मों में उन्हें “बोधिसत्त्व” के नाम से जाना जाता था। हर जन्म में बोधिसत्त्व बुद्धत्व की ओर निरंतर अग्रसर होते हुए लोककल्याण के महान कार्य करते थे। वे अपने आचरण, बुद्धिमत्ता, धैर्य और सदाचार से लोगों को मार्गदर्शन देते थे। कभी वे राजा बनकर, कभी व्यापारी बनकर, कभी साधारण नागरिक बनकर लोगों को यह सिखाते कि जीवन में सच्ची समृद्धि केवल बुद्धि, परिश्रम और सही अवसर की पहचान से ही प्राप्त होती है।

यह कथा उन्हीं पूर्वजन्मों में से एक की है। उस समय काशी का महान नगर बनारस अपनी समृद्धि, विद्या और व्यापार के लिए पूरे भारत में प्रसिद्ध था। गंगा नदी के तट पर बसा यह नगर सोने-चाँदी के आभूषणों, रेशमी वस्त्रों, सुगंधित फूलों और मिट्टी के बर्तनों का प्रमुख केंद्र था। सड़कें चौड़ी और स्वच्छ थीं। बाजारों में दिन-रात व्यापारियों की भीड़ लगी रहती थी। नगर के शासक थे राजा ब्रह्मदत्त, जो न्यायप्रिय और प्रजावत्सल थे।

इसी बनारस में स्वर्णकारों (सुनारों) का एक अत्यंत प्रतिष्ठित संघ था। इस संघ का प्रधान एक सम्मानित परिवार था। उसी कुल में बोधिसत्त्व का जन्म हुआ। बचपन से ही वे अत्यंत बुद्धिमान, दूरदर्शी और संकेतों को तुरंत समझने वाले थे। बड़े होते-होते वे संघ के प्रधान बन गए। लोग उन्हें प्यार से “छोटे गिल्डमास्टर” कहते थे। वे न केवल सोने-चाँदी का काम देखते थे, बल्कि आकाश के नक्षत्रों की गति, चंद्रमा-सूर्य की स्थिति और हवा की दिशा से शुभ-अशुभ का अनुमान लगा लेते थे। वे कहते थे, “प्रकृति हर क्षण संकेत देती है, बस समझने वाली आँख चाहिए।”

एक दिन छोटे गिल्डमास्टर राजा ब्रह्मदत्त से मिलने के लिए राजमार्ग से जा रहे थे। दोपहर का समय था। सूरज चमक रहा था। सड़क के किनारे धूल उड़ रही थी। अचानक उनकी नजर सड़क पर पड़े एक मरे हुए चूहे पर पड़ी। चूहा ताज़ा मरा हुआ लग रहा था – उसका शरीर अभी भी कोमल था। बोधिसत्त्व ने तुरंत आकाश की ओर देखा। नक्षत्रों की स्थिति को ध्यान से परखा। उनके चेहरे पर एक रहस्यमयी मुस्कान आ गई। उन्होंने धीरे से कहा –

“यदि कोई समझदार, परिश्रमी और अवसर को पहचानने वाला युवक इस मृत चूहे को उठा ले, तो वह इससे एक बड़ा व्यापार शुरू कर सकता है। कुछ ही वर्षों में वह अपना परिवार पाल सकता है, धन कमा सकता है और एक दिन नगर का प्रतिष्ठित नागरिक बन सकता है।”

यह बात सड़क के किनारे खड़ा एक युवक सुन रहा था। उसका नाम था वसुदेव (कथा में नाम नहीं था, इसलिए हम उसे वसुदेव कहते हैं)। वह एक अच्छे कुल का था, लेकिन पिता की मृत्यु के बाद परिवार की आर्थिक दशा अत्यंत दयनीय हो गई थी। माँ बीमार थी। बहन का विवाह बाकी था। घर में रोटी की कमी थी। वह रोज़ मजदूरी की तलाश में घूमता था। बोधिसत्त्व की बात सुनकर उसके मन में एक चिंगारी सी जल उठी। उसने सोचा –

“यह व्यक्ति छोटे गिल्डमास्टर हैं। वे बिना कारण कुछ नहीं कहते। नक्षत्रों का ज्ञान रखते हैं। अवश्य ही इसमें कुछ राज है।”

बिना देर किए उसने मृत चूहे को साफ कपड़े में लपेट लिया और सराय की ओर चल पड़ा। सराय में एक बिल्ली थी जो चूहों का शिकार करती थी। उसने चूहे को बिल्ली के मालिक को दिखाया। मालिक ने प्रसन्न होकर कहा, “यह ताज़ा चूहा है, मेरी बिल्ली को बहुत पसंद आएगा।” उसने एक छोटा-सा ताँबे का सिक्का दे दिया।

वसुदेव ने उस एक सिक्के से थोड़ा गुड़ खरीदा। फिर एक मिट्टी का घड़ा भरकर ठंडा पानी लाया। वह जंगल से फूल तोड़कर लौट रहे माली-मजदूरों के रास्ते पर एक पेड़ के नीचे बैठ गया। दोपहर का समय था। मजदूर पसीने से तर थे, प्यास से तड़प रहे थे। वसुदेव ने मुस्कराते हुए कहा, “भाइयो, थोड़ा गुड़ खाओ और ठंडा पानी पी लो। आज का श्रम तुम्हारा, कल का फल मेरा।”

मजदूरों को यह अपनापन बहुत भाया। वे बोले, “भाई, आज तुमने हमारी प्यास बुझाई।” प्रत्येक मजदूर ने कृतज्ञता में उसे एक-एक मुट्ठी ताज़े फूल दे दिए। फूलों की महक से पूरा स्थान सुगंधित हो गया।

अगले दिन वसुदेव उन फूलों को बाजार में बेचकर कुछ और सिक्के कमा लाया। उसने पहले से अधिक गुड़ और एक बड़ा घड़ा पानी लिया। फिर वही जगह पर बैठ गया। इस बार मजदूर और भी प्रसन्न हुए। उन्होंने कहा, “तुम सच्चे मित्र हो।” और उन्होंने उसे आधे खिले हुए फूलों वाले कई पौधे दे दिए। वसुदेव ने उन पौधों को घर ले जाकर लगाया। कुछ दिन बाद फूल खिले। उन्हें बेचकर उसकी कमाई बढ़कर आठ सिक्कों तक पहुँच गई। अब घर में माँ को दवा मिलने लगी। बहन के लिए कपड़े आने लगे।

कुछ समय बाद एक दिन भीषण तूफान आया। आसमान में काले बादल घिरे। तेज़ हवा चली। बिजली चमकी। राजा ब्रह्मदत्त के विशाल उद्यान में सैकड़ों सूखी डालियाँ, टहनियाँ, पत्ते और फूलों की टहनियाँ टूट-टूटकर गिर पड़ीं। उद्यान का माली परेशान था। उसने सोचा, “इन्हें हटाने में पूरे दिन लग जाएंगे। राजा नाराज़ होंगे।”

उसी समय वसुदेव वहाँ पहुँचा। उसने माली से कहा, “महाराज, यदि आप ये सारी लकड़ियाँ और पत्ते मुझे दे दें, तो मैं उद्यान को पूरी तरह साफ कर दूँगा।” माली ने तुरंत हामी भर दी।

वसुदेव पास के मैदान में खेल रहे बच्चों के पास गया। बच्चों को दिखाकर बोला, “देखो, आज तुम्हें खेलने के साथ-साथ गुड़ भी मिलेगा। ये टहनियाँ इकट्ठी करके उद्यान के द्वार पर ढेर लगा दो। जो सबसे बड़ा ढेर लगाएगा, उसे सबसे ज्यादा गुड़।” बच्चों ने खुशी-खुशी खेल-खेल में सारी लकड़ियाँ इकट्ठी कर दीं। एक विशाल ढेर लग गया।

उसी समय राजा का कुम्हार (बर्तन बनाने वाला) ईंधन की तलाश में था। उसने ढेर देखा और बोला, “इतनी अच्छी सूखी लकड़ी! मैं इसे खरीदता हूँ।” उसने सोलह सिक्के दिए और साथ में कुछ नए मिट्टी के बर्तन भी दे दिए। अब वसुदेव के पास कुल चौबीस सिक्के हो गए। उसकी खुशी का ठिकाना न था।

एक दिन नगर के द्वार के पास वसुदेव पानी का घड़ा लेकर बैठ गया। उसी समय पाँच सौ घास काटने वाले मजदूर जंगल से लौट रहे थे। वे धूल से सने, प्यास से व्याकुल थे। वसुदेव ने एक-एक को ठंडा पानी पिलाया और थोड़ा गुड़ भी दिया। मजदूरों ने कहा, “मित्र, तुमने हमारा जीवन बचाया। हम तुम्हारे लिए क्या कर सकते हैं?”

वसुदेव मुस्कराया और बोला, “अभी कुछ नहीं। जब जरूरत पड़ेगी, मैं स्वयं तुमसे कहूँगा। आज बस मेरी कृतज्ञता स्वीकार करो।”

इसी बीच वसुदेव ने नगर के एक स्थल-व्यापारी और एक समुद्री व्यापारी से गहरी मित्रता कर ली। वे उसे अपना छोटा भाई मानने लगे।

एक दिन स्थल-व्यापारी ने रहस्य बताते हुए कहा, “कल सुबह एक घोड़े का व्यापारी पाँच सौ घोड़े लेकर नगर में आ रहा है। घोड़ों को पानी और घास की बहुत जरूरत होगी।”

वसुदेव तुरंत घास काटने वाले पाँच सौ मजदूरों के पास पहुँचा। उसने विनती की, “भाइयो, आज हर व्यक्ति मुझे एक-एक गट्ठर घास दे दो। जब तक मेरी घास बिक न जाए, तुम अपनी घास बाजार में मत बेचना।” मजदूरों ने पुराना उपकार याद किया और तुरंत मान लिया। उन्होंने पाँच सौ गट्ठर घास वसुदेव के घर पहुँचा दी।

अगले दिन घोड़े का व्यापारी आया। पूरे नगर में घास का नामोनिशान नहीं था। अंत में उसे वसुदेव के पास जाना पड़ा। व्यापारी ने कहा, “मुझे तुरंत घास चाहिए, वरना घोड़े भूखे मर जाएंगे।” वसुदेव ने शांत स्वर में कहा, “एक हजार स्वर्ण मुद्राएँ दोगे तो सारी घास ले जाओ।” व्यापारी ने तुरंत एक हजार स्वर्ण मुद्राएँ गिनकर दे दीं। वसुदेव की आँखों में आँसू आ गए। उसकी मेहनत रंग ला रही थी।

कुछ दिन बाद समुद्री व्यापारी मित्र ने खबर दी, “बंदरगाह पर एक विशाल जहाज आया है। उसमें नीलम, मोती, रेशम और सुगंधित द्रव्य भरे हैं। माल बहुत कीमती है।”

वसुदेव ने तुरंत योजना बनाई। उसने नगर के सबसे सुंदर रथ को किराए पर लिया। सुनहरे कपड़े पहने। चार सेवकों को साथ लिया। ठाठ-बाट से बंदरगाह पहुँचा। वहाँ उसने जहाज के मालिक से बात की और उधार पर पूरा जहाज खरीद लिया। अपनी मुहर वाली सोने की अंगूठी गिरवी रख दी। फिर पास में एक भव्य तंबू लगवाया। चारों ओर रंग-बिरंगी झंडियाँ लगवाईं। सेवकों को आदेश दिया, “जब कोई व्यापारी आए, तो उसे तीन सेवकों के साथ क्रम से मेरे पास ले आना।”

नगर में जहाज के आने का समाचार फैला। लगभग सौ बड़े-बड़े व्यापारी माल खरीदने के लिए दौड़े। लेकिन उन्हें बताया गया कि एक युवा व्यापारी ने पहले ही अग्रिम धन देकर जहाज का पूरा अधिकार ले लिया है। सभी वसुदेव के तंबू में आए। प्रत्येक व्यापारी ने जहाज में हिस्सा पाने के लिए एक-एक हजार स्वर्ण मुद्राएँ अग्रिम दीं। फिर सबने मिलकर पूरा अधिकार खरीदने के लिए और उतनी ही राशि दी। इस प्रकार वसुदेव के पास दो लाख स्वर्ण मुद्राएँ जमा हो गईं।

अब वह बनारस लौटा। उसके मन में कृतज्ञता की लहर उठी। वह एक लाख स्वर्ण मुद्राएँ लेकर छोटे गिल्डमास्टर (बोधिसत्त्व) के घर पहुँचा। बोधिसत्त्व ने मुस्कराते हुए पूछा, “बेटा, इतनी विशाल संपत्ति कैसे प्राप्त हुई?”

वसुदेव ने सिर झुकाकर विनम्रता से कहा, “गुरुदेव, यह सब आपकी एक ही वाक्य का फल है। मैंने केवल उसी का पालन किया।” और फिर उसने पूरी कथा विस्तार से सुनाई – मृत चूहे से शुरू करके घास, जहाज, दो लाख स्वर्ण मुद्राओं तक की पूरी यात्रा।

बोधिसत्त्व ने उसकी बुद्धिमत्ता, परिश्रम, धैर्य और अवसर की सही पहचान देखी। मन ही मन सोचा, “ऐसा योग्य युवक किसी और के हाथ नहीं जाना चाहिए।” उन्होंने अपनी एकमात्र योग्य पुत्री का विवाह वसुदेव से कर दिया और अपनी सारी संपत्ति, संघ का प्रधान पद तथा घर-बार सब उसे सौंप दिया। कुछ वर्ष बाद जब बोधिसत्त्व का देहांत हुआ, तब वसुदेव ही स्वर्णकारों के संघ का नया प्रधान बन गया। वह नगर का सम्मानित नागरिक बना। उसकी माँ, बहन सब सुखी थीं।

इस प्रकार बोधिसत्त्व ने अपने उस जन्म में सारे संसार को यह अमर शिक्षा दी कि –

“बुद्धि, परिश्रम और अवसर की सही पहचान से मनुष्य छोटी-से-छोटी वस्तु को भी महान संपत्ति और सफलता का कारण बना सकता है।”

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