Saturday, March 14, 2026

मुल्क की हिफ़ाज़त

हुक्मरान  चलते  है चाल जब सियासत में,

जंग में थकती ना आँखें कौम की ईबादत में।

[Eco]

बारूद से लिखी जाती है सरहदों की दास्ताँ,

कौन जीता  कौन  हारा  जंग में बग़ावत में।

[Bridge]

काग़ज़ों पे अमन की मुहर लग जाए तो क्या,

बदलते नहीं हालात बस एक ही हिदायत में।

[Eco]

नाम  इंसानियत का रहता ज़ुबाँ पे बेशक,

इंसान जलते रहते  पर हर नई रिवायत में।

[Bridge]

दुश्मनी क्या दोस्ती क्या तख़्त बड़ा सख़्त है,

मुद्दा तो तख्त को क्या मिल रहा इनायत में।

[Eco]

इतिहास फिर लिखेगा किसकी थी ये ग़लती,

कौन था जो खो गया मुल्क की हिफ़ाज़त में।

No comments:

Post a Comment

My Blog List

Followers

Total Pageviews