Sunday, February 26, 2023

रोजी रोटी के क्या दाने


=====
एक व्यक्ति इस जीवन में आया है तो जीवन को चलाने के लिए जीवन पर्यंत उसे अथक प्रयास भी करने पड़ते हैं। लेकिन इस जीवन पर्यंत अथक परिश्रम करने के चक्कर में आदमी पूरा का पूरा घनचक्कर बन जाता है। इसी विषय वस्तु पर आधारित प्रस्तुत है हास्य व्ययंगात्मक कविता , रोजी रोटी के क्या दाने, खाने बिन खाने पछताने।
=====
रोजी रोटी के क्या दाने,
खाने बिन खाने पछताने।
=====
रोजी रोटी के चक्कर में,
साहब कैसे बीन बजाते,
भैंस चुगाली करती रहती,
राग भैरवी मिल सब गाते,
माथे पर ताले लग जाय, 
मंद बुद्धि बंदा बन जाय ,
और लोग बस देते ताने,
रोजी रोटी के क्या दाने,
खाने बिन खाने पछताने।
=====
रोजी रोटी चले हथौड़े,
हौले माथे सब बम फोड़े,
जो भी बाल बचे थे सर पे,
एक एक करके सब तोड़े,
कंघी कंघा काम न आए,
तेल ना कोई असर दिखाए,
है माथे चंदा उग आने,
रोजी रोटी के क्या दाने,
खाने बिन खाने पछताने।
=====
कभी सांप को रस्सी समझे,
कभी नीम को लस्सी समझे ,
जपते जपते रोटी रोटी,
क्या ना करता छीनखसोटी,
प्रति दिन होता यही उपाए,
किसी भांति रोटी आ जाए,
देखे रस्ते या अनजाने, 
रोजी रोटी के क्या दाने,
खाने बिन खाने पछताने।
=====
रोजी रोटी सब मन भाए,
ना खाए तो  जी ललचाए,
जो खाए तो जी जल जाए,
छुट्टी करने पर शामत है,
छुट्टी होने पर आफत है,
बिन वेतन ना शराफत है,
यही खुशी भी गम के ताने ,
रोजी रोटी के क्या दाने,
खाने बिन खाने पछताने।
=====
या दिल्ली हो या कलकत्ता,
सबसे ऊपर मासिक भत्ता,
आंखो पर चश्मा  खिलता है,
चालीस में अस्सी दिखता है,
वेतन का बबुआ ये चक्कर ,
पूरा का पूरा घनचक्कर,
कमर टूटी जो चले हिलाने,
रोजी रोटी के क्या दाने,
खाने बिन खाने पछताने।
=====
रोटी ऐसा दिन दिखलाती,
अनजाने में भी नचवाती,
फटी जेब फिर भी भगवाती,
रोजी के आपा धापी ने,
गुल खिलवाया ऐसा भी कि,
कहने को तो शहर चले थे,
पर साहब जा पहुंचे थाने,
रोजी रोटी के क्या दाने,
खाने बिन खाने पछताने।
=====
रोजी रोटी के क्या दाने,
खाने बिन खाने पछताने।
=====
अजय अमिताभ सुमन
सर्वाधिकार सुरक्षित 
=====

Sunday, February 5, 2023

ठंडी क्या आफत है भाई


ठंडी क्या आफत है भाई ,
सर पे टोपी बदन रजाई ,
भूले सारे  सैर सपाटा ,
गलियों में कैसा सन्नाटा,
दादी का कैसा खर्राटा, 
जैसे कोई धड़म पटाखा ,
पानी से तब हाथ कटे है , 
जब जब आटा हाथ सने है,
भिंडी लौकी कटे ना भाई ,
सर पे टोपी बदन रजाई ,
ठंडी क्या आफत है भाई।

भूल गए सब चादर वादर, 
कूलर भी ना रहा बिरादर,
क्या दुबले क्या मोटे तगड़े ,
एक एक कर सबको  रगड़े,
थर थर थर थर कंपते गात ,
और मुंह से निकले भाप , 
बाथ रूम को जब भी जाते,
बूंद बूंद से बच कर जाते, 
मौसम ने क्या ली अंगड़ाई,
सर पे टोपी बदन रजाई ,
ठंडी क्या आफत है भाई।

ऐ.सी.ने फुरसत पाई है, 
कूलर दीखते हरजाई है ,
बिस्तर बिस्तर छाई आलस, 
धूप बड़ी दिल देती ढाढ़स,   
कुहासा अम्बर को छाया ,
गरम चाय को जी ललचाया,
स्वेटर दास्ताने तन भाए ,
कि मन भर भर भर को चाहे ,
गरम पकौड़े ,गरम कढ़ाई ,
सर पे टोपी बदन रजाई ,
ठंडी क्या आफत है भाई।

सन सन सन हवा जो आती,
कानों को क्या खूब सताती ,
कट कट कट दांत बजे जब,
गरम आग पर हम तने  तब,
चाचा चाची काका काकी,
साथ बैठ कर घुर तपाते,
राग बजाते एक सुर में,
बैठे बैठे मिल सब गाते,
इससे बड़ी ना विपदा भाई,
सर पे टोपी बदन रजाई ,
ठंडी क्या आफत है भाई।

अजय अमिताभ सुमन:
सर्वाधिकार सुरक्षित 

Sunday, January 15, 2023

फिर से सतयुग भू पर लाओ


विधी न्याय संकल्प प्रलापित,
किंतु कैसा कल्प प्रकाशित?
दुर्योधन का राज चला है,
शकुनि पाशे को मचला है।

एकलव्य फिर हुआ उपेक्षित,
अंधे का साम्राज्य फला है।
जब पांचाली वस्त्र हरण हो,
अभिमन्यु के जैसा रण हो।

चक्रव्यूह कुचक्र रचा कर,
एक रथी का पुनः मरण हो।
धर्मराज पाशे के प्यासे,
लिप्त भोग के संचय में।

न्याय नीति का हुआ विस्मरण,
पड़े विदुर अति विस्मय में।
अधर्म हीं आज  रीत है,
न्याय तराजू मुद्रा क्रीत है।

भीष्म सत्य का छद्म प्रवंचन,
द्रोण माणिक पर करे हैं नर्तन।
धृष्ट्र राष्ट्र तो है हीं अंधे,
कुटिलों के हीं चलते धंधे।

फिर भी अबतक आस वही है ,
हाँ तुझपर विश्वास वही है।
हम  तेरे हीं  दर पर  जाते,
पर दुविधा में हम पड़ जाते।

क्योंकि पाप अनल्प बचा है,
ना कोई विकल्प बचा है।
नीति युक्त ना क्रियाकल्प है,
तिमिर घनेरा आपत्कल्प है।

दिग दिगंत पर अबला नारी,
नर पिशाच के हाथों हारी।
हास लिप्त हैं अत्याचारी,
दुःसंकल्प युक्त व्यभिचारी।

संशय तब संभावी होता,
निःसंदेह प्रभावी होता।
धर्मग्रंथ के अंकित वचनों,
का परिहास स्वभावी होता।

आखिर क्यों वचनों को मानें,
बात लिखी उसको सच जाने।
आस कहां  हम करें प्रतिष्ठित,
निज चित्त में ये प्रश्न अधिष्ठित।

जिस न्याय की बात बता कर,
सत्य हेतु विध्वंस रचा कर।
किए कल्प का जो अभियंत्रण , 
वही कल्प दे रहा निमंत्रण।

हे कृष्ण हे पार्थ सारथी,
सकल विश्व के परमारथी।
आर्त हृदय से धरा पुकारे,
धरा व्याप्त है आज स्वारथी।

नीति पुण्य का जब क्षय होगा,
और अधर्म का जब जय होगा।
तुम कहते थे तुम आओगे ,
कदाचार क्षय कर जाओगे।

कुत्सित आज आचार बड़ा है,
दु:शासन से आर्त धरा है।
कहाँ न्याय है कहाँ धर्म है?
दुराचार पथभ्रष्ट कर्म है।

क्या इतना नाकाफी तुझको,
दिखती  नाइंसाफी तुझको?
दुष्कर्मी व्यापार फला जब,
किसका इंतज़ार भला अब?

तेरे कहे धर्म क्षय कब होता,
पापाचार का कब जय होता?
और कितने दुष्कर्म फलेंगे,
तब जाके तेरे पांव  पड़ेंगे?

कान्हा आखिर कब आओगे?
बात कही जो कर पाओगे।
अति त्रस्त हम हमें बचाओ ,
धर्म पताका फिर फहराओ।

नीति न्याय का जो आलापन,
था उसका कुछ लो  संज्ञापन।
वचनों में संकल्प दिखाओ,
फिर से सतयुग भूपर लाओ।

अजय अमिताभ सुमन

Sunday, January 8, 2023

चीन और महाभारत


यदि कोई आपसे कहे कि महाभारत काल में चीन भी भारत का अंग था , तो क्या आप इस बात पर भरोसा कर सकेंगे? लेकिंन महाभारत में इस बात का जिक्र आता है कि स्वयं भगवान श्रीकृष्ण इस बात की पुष्टि करते हैं कि चीन का सम्राट युद्धिष्ठिर के राजसूय यज्ञ में उनकी अधीनता स्वीकार करते हुए आया था। यहाँ तक कि राजा मान्धाता भी इस बात की पुष्टि करते हैं चीन भारत का अंग था। महाभारत के आदि पर्व , सभा पर्व , वन पर्व , उद्योग पर्व , भीष्म पर्व और शांति पर्व में चीन का जिक्र आता है। आइये एक एक कर  सारे घटनाक्रमों को देखते हैं । 

चीन का सर्वप्रथम जिक्र महाभारत के आदि पर्व में आता है । आदि पर्व के चैत्र रथ पर्व में इस बात का जिक्र आता है कि अर्जुन से चैत्र रथ नामक गन्धर्व का युद्ध होता है। जब गन्धर्व ही अर्जुन से हार हो जाती है तब वो अर्जुन से मित्रता करके अनेक कहानियां बताता है । इसी घटना क्रम में अर्जुन को ताप्ती नंदन कहकर संबोधित करता है , तो इसी दौरान विश्वामित्र और वशिष्ठ के बीच लड़ाई का भी जिक्र करता है । जब गन्धर्व विश्वामित्र और वशिष्ठ के बीच की लड़ाई का वर्णन करता है तब बताता है कि कैसे नंदिनी गाय ने क्रुद्ध होकर अनेक देशों को जन्म दिया और उनमें से एक चीन भी था । इस घटनाक्रम को विस्तारपूर्वक देखते हैं।

चीन का वर्णन महाभारत में दूसरी बार सभा पर्व के दिग्विजय पर्व में आता जब अर्जुन भारतवर्ष के उत्तर भाग स्थित प्रदेशों का दौरा करते हैं और इन प्रदेशों को जीतते चले जाते हैं। इसी क्रम में अर्जुन का प्रागज्योतिनरेश राजा भागदत्त के साथ युद्ध का वर्णन है। जब राजा भागदत के प्रदेश का वर्णन किया किया है वहीं पर इसके सीमावर्ती प्रदेशों में एक चीन का भी वर्णन किया गया है।

चीन का तीसरी बार जिक्र स्वयं भगवान श्रीकृष्ण के मुख से किया है जो कि वन पर्व के इंद्र लोक गमन पर्व में उद्धृत है। कौरवों द्वारा जुए में हार जाने के बाद जब पांडव वन में जाने को बाध्य हो जाते हैं तब भगवान श्रीकृष्ण उनसे मिलने आते हैं। यहां पर श्रीकृष्ण बताते है कि कैसे राजसूय यज्ञ में चीन का राजा भी  युद्धिष्ठिर के रसोइ में आया था। छल द्वारा धर्मराज का राज्य छीन लिया गया था इसी कारण श्रीकृष्ण आगे प्रतिज्ञा भी करते हैं कि वो पांडवों को उनका छीना हुआ राज्य वापस दिला देंगे।

चीन का चौथी बार जिक्र उद्योग पर्व के भगवदयान पर्व  में आता है। जब श्रीकृष्ण संधि का प्रस्ताव लेकर जाने वाले होते हैं तब भीम उन्हें आगाह करते हैं। दुर्योधन की क्रोधपूर्ण वृत्ति से आगाह करते हुए श्रीकृष्ण से कटु बातें नहीं करने की सलाह भी देते हैं। अपनी बात को देखने के लिए भीम श्रीकृष्ण को 16 राजवंशों का नाम भी बताते हैं और ये भी चेताते  हैं कि कैसे उन वंशों के राजाओं द्वारा पूरे वंश का सर्वनाश किया गया। इसी प्रक्रम में भीम द्वारा चीन के एक राजवंश का वर्णन किया गया है। 

चीन का पांचवी बार जिक्र भीष्म पर्व के भूमि पर्व में आता है जब धृतराष्ट्र के पूछने पर संजय  दुर्योधन द्वारा अधीन पूरे भारतवर्ष का वर्णन करते है। यहीं पर  पर संजय पुरे भारत वर्ष का वर्णन करते हैं और चीन को दुर्योधन द्वारा शासित प्रदेशों में से एक प्रदेश बताते हैं।

चीन का छठी बार जिक्र महाभारत के शांति पर्व के राजधार्मनुशासन पर्व  में आता है। युद्ध खत्म होने के बाद जब भीष्म पितामह अपने शरीर का त्याग नहीं करते हैं और सूर्य के उत्तरायण होने का इंतजार करते हैं तब युद्धिष्ठिर उनसे जाकर जीवन की शिक्षा लेते हैं । इसी प्रक्रम में जब युद्धिष्ठिर भीष्म पितामह  से राजधर्म के बारे में पूछते हैं , तब भीष्म उन्हें राजा मान्धाता और इंद्र के बीच हुए संवाद का वर्णन करते हैं। इसी संवाद में राजा मांधाता द्वारा चीन को अपने द्वारा शासित प्रदेशों में से एक बताया गया है।

यद्यपि महाभारत के वनपर्व के अजगर पर्व की एक और घटना है जहां पर राजा सुबाहु के हिम प्रदेश का वर्णन आता है, फिर भी चीन शब्द का इस्तेमाल नहीं किया गया है। पांडवों के गंद मादन , बदरिकाश्रम , सुबहुनगर में प्रवेश का वर्णन किया है । बाद  की घटनाओं में भीम के पूर्वज राजा नाहुष द्वारा, जो कि एक अजगर बन गए थे, भीम को जकड़ने तथा युधिष्ठिर द्वारा उस अजगर बने नाहुष के प्रश्नों का उत्तर देने के बाद भीम के बंधन मुक्त होने का वर्णन किया गया है। इसी क्रम में  सुबाहु के हिम प्रदेश का वर्णन है जिसे कुछ अन्य किताबों में चीन के नाम से संबोधित किया गया है।

इस प्रकार हम देखते हैं कि चीन का वर्णन महाभारत में लगभग 7 स्थानों पर वर्णन आता है। इन उल्लेखों से एक बात तो साफ जाहिर हो जाता है कि न केवल भगवान श्रीकृष्ण, भीम , अर्जुन, चित्र रथ नामक गंधर्व, संजय, भीष्म पितामह, युधिष्ठिर बल्कि राजा मांधाता और इंद्र इन सबको चीन के बारे में जानकारी थी। इन उल्लेखों से ये भी साबित होता है कि चीन कभी ना कभी वृहद भारत का हिस्सा रहा था और इसकी सीमा केवल चीन ही नहीं, अपितु आज के पाकिस्तान, अफगानिस्तान, यवन ,ईरान , उज़्बेकिस्तान आदि स्थानों तक फैला हुआ था।

अजय अमिताभ सुमन 

Saturday, December 24, 2022

किवाड़ खा गई


=====
सबूत भी गवाह भी
किवाड़ खा गई,
जालिम ये दीमक सारी,  
मक्कार खा गई।
=====
हराम की थी  रातें, 
छिपी सी मुलाकातें ,
किसने खिलाये क्या गुल,
गुमनाम सारी बातें।
=====
आस्तीन में छुपे हुए, 
गद्दार खा गई ,
जालिम ये दीमक सारी, 
मक्कार खा गई।
=====
जिस रोड के थे चर्चे , 
जिस पर हुए थे खर्चे ,
लायें कहाँ से उसको , 
लिख लिख भरे थे पर्चे।
=====
कि झूठ पर फले सब , 
रोजगार खा गई,
जालिम ये दीमक सारी,  
मक्कार खा गई।
=====
फाइल में बन पड़ी थी , 
चौपाल की जो बातें,
ना ब्रिज वो दिखती है , 
बस नाम की हीं बातें।
=====
दफ्तर के  काले चिट्ठे ,
कारोबार खा गई,
जालिम ये दीमक सारी,  
मक्कार खा गई।
=====
अजय अमिताभ सुमन
=====

Sunday, December 18, 2022

खबर हादसे की


खबर का मुख्य उद्देश्य समाज में विश्वास , आस्था और भाईचारे की नींव को मजबूत करना होता है ना रोष , नफरत और दहशत की अग्नि को फैलाना । परंतु क्या वर्तमान समय में पत्रकारिता के संदर्भ यही बात कही जा सकती है ? यदि कोई हादसा , घटना या दुर्घटना समाज के बड़े तबके में सनसनी पैदा करने में सक्षम नहीं है तब भी क्या वो आजकल अखबार में छप जाने के काबिल हो सकती है? पत्रकारिता का ध्येय येन केन प्रकारेण स्वयं के उत्थान के लिए चटपटी खबरें बनाना और फैलाना नहीं अपितु  राष्ट्र के हित में कटु सत्य को सामने लाना है होता है जो कि वर्तमान समय में लगभग लुप्तप्राय हीं है। नकारात्मक पत्रकारिता पर व्ययंगात्मक रूप से चोट पहुंचाती हुई प्रस्तुत है मेरी कविता "खबर हादसे की"।

ना माथे पर शिकन कोई,
ना रूह में कोई भय है,
ना दहशत हीं फैली ,
ना हिंसा परलय है
हादसा हुआ तो है,
लहू भी बहा मगर,
खबर भी बन जाए,
अभी ना तय है,
माहौल भी नरम है,
अफवाह ना गरम है,
आवाम में अमन है, 
कोई रोष ना भरम है,
बिखरा नहीं चमन है , 
अभी आंख तो नरम है
थोड़ी बात तो बढ़ जाए,
थोड़ी आग तो लग जाए,
रहने दो खबर बाकी,
रहने दो असर बाकी, 
लोहा जो कुछ गरम हो,
असर तभी चरम हो,
ठहरो कि कुछ पतन हो ,
कुछ राख में वतन हो, 
अभी खाक क्या मिलेगा,
खबर में कुछ भी दम हो,
अखबार में आ जाए,
अभी ना समय है,
सही ना समय है,
सही ना समय है।

अजय अमिताभ सुमन

Sunday, December 4, 2022

गदा हनुमान जी की



हनुमान जी का चरित्र आम जन मानस में एक प्रभु श्री राम भक्त, ज्ञानी और अति शक्तिशाली योद्धा के रूप में व्याप्त है। उन्हें पूज्यनीय ऐसे हीं नहीं माना जाता है।

एक शक्तिशाली योद्धा के रूप में उनके पास हथियार की परिकल्पना करना कोई अतिशयोक्ति नहीं हैं।जाहिर सी बात है जब बात उनके पराक्रम को करनी हो तो उनके महान शक्तिशाली गदा को कोई कैसे भूल सकता है। 

लगभग हरेक कथाओं में हनुमान जी को गदा के साथ हीं दिखाया जाता है। अगर उनके पास गदा था तो उन्होंने युद्ध के समय गदा का प्रयोग किया हीं होगा। 

अगर उनके पास गदा होगी तो रावण के साथ भीषण युद्ध में उसका इस्तेमाल जरुर किया होगा । देखने वाली बात ये है कि वाल्मिकी रचित रामायण में महावीर जी द्वारा गदा के प्रयोग करने का जिक्र आता है कि नहीं?

जब हनुमान जी के साथ अकम्पन का युद्ध होता है, तब वो वृक्ष का उपयोग करते है। एक वृक्ष को हथियार के रूप में चलाकर अकमपन का वध करते हैं।

रावण और हनुमान जी के साथ जब युद्ध होता है तब रावण के द्वारा चलाए गए हथियार के प्रतिउत्तर में वो उसे जोर से थप्पड़ मारते हैं।

एक समय रावण द्वारा लक्ष्मण घायल कर दिए जाते हैं। फिर रावण जब लक्ष्मण जी को उठाने की कोशिश करता है तब हनुमान जी उसे जोर से घुसा मारकर हटा देते हैं।

इसी प्रकार निकुंभ नामक राक्षस का वध उसके सर को अपने हाथों द्वारा मरोड़कर कर देते है। तो दूसरी ओर मेघनाद के साथ युद्ध में हनुमान जी एक शिलाखंड का प्रयोग करते हैं।

 वाल्मिकी रामायण में हनुमान जी द्वारा राम रावण युद्ध में भाग लेने की इन घटनाओं का निरीक्षण करते हैं तो हम पाते हैं कि कहीं भी हनुमान जी गदा के प्रयोग करने की बात सामने नहीं आती है। 
 
लगभग हर जगह वो अपने हाथों ,मुक्कों, पेड़ , शिला , पहाड़  और अपनी शारीरिक शक्ति का ही प्रयोग करते दिखते हैं। 

उनके द्वारा कहीं भी गदा के इस्तेमाल करने का वर्णन नहीं है।इन सब बातों से ये प्रतीति होती हैं कि हनुमान जी के पास कोई गदा थी हीं नहीं। 

जाहिर सी बात है , जो योद्धा अपनी शिशु अवस्था में हीं सूर्य को फल समझ कर आकाश में 400 योजन की छलांग लगा सकता था , उसे भला किसी गदा की जरूरत हो भी कैसे सकती थी ?

अजय अमिताभ सुमन:सर्वाधिकार सुरक्षित 

Sunday, November 20, 2022

दुर्योधन कब मिट पाया :भाग :41


=====
दुर्योधन ने अपने अनुभव पर आधारित जब इस सत्य का उद्घाटन किया कि अश्वत्थामा द्वारा लाए गए वो पांच कटे हुए नर मुंड पांडवों के नहीं है, तब अश्वत्थामा को ये समझने में देर नहीं लगी कि वो पाँच कटे हुए नरमुंड पांडवों के पुत्रों के हैं। इस तथ्य के उदघाटन होने पर एक पल को तो अश्वत्थामा घबड़ा जाता है,  परंतु अगले ही क्षण उसे ये बात धीरे धीरे समझ में आने लगती है कि भूल उससे नहीं अपितु उन पांडवों से हुई थी जिन्होंने अश्वत्थामा जैसे प्रबल शत्रु को हल्के में ले लिया था। भले हीं अश्वत्थामा के द्वारा भूल चूक से पांडवों के स्थान पर उनके पुत्रों का वध उसके हाथों से हो गया था , लेकिन उसके लिए ये अनपेक्षित और अप्रत्याशित फल था जिसकी उसने कल्पना भी नहीं की थी। प्रस्तुत है मेरी कविता "दुर्योधन कब मिट पाया का इकतालिसवां भाग।
=====
मृदु मस्तक पांडव के कैसे,
इस   भांति   हो  सकते  हैं?
नहीं किसी योद्धासम दृष्टित्,
तरुण तुल्य हीं  दीखते हैं।
=====
आसां ना संधान  लक्ष्य हे,
सुनो  शूर  हे रजनी  नाथ,
अरिशीर्ष ना हैं निश्चित हीं,     
ले आए जो अपने   साथ।
=====
संशय के वो क्षण थे कतिपय , 
कूत मात्र ना  बिना  आधार ,
स्वअनुभव प्रत्यक्ष आधारित,
उदित मात्र ना वहम विचार।
=====
दुर्योधन का कथन सत्य था, 
वही तथ्य    था   सत्यापित।
शत्रु का ना हनन हुआ निज,
भाग्य  अन्यतस्त्य स्थापित।
=====
द्रोण पुत्र को ज्ञात हुआ जब,
उछल पड़ा था भू  पर  ऐसे ,
जैसे  आन पड़ी  विद्युत हो,
उसके हीं मस्तक पर जैसे।
=====
क्षण को पैरों के नीचे की
अवनि कंपित  जान पड़ी ,
दिग दृष्टित निजअक्षों के जो,
शंकित शंकित भान पड़ी।
=====
यत्किंचित पांडव जीवन में
कतिपय भाग्य प्रबल  होंगे,
या उसके  हीं कर्मों के फल,
दोष  गहन  सबल होंगे।
=====
या उसकी प्रज्ञा  को  घेरे,  
प्रतिशोध  की  ज्वाला थी,
लक्ष्यभेद ना कर पाया था,
किस्मत में  विष प्याला थी।
=====
ऐसी भूल हुई  थी  उससे ,
क्षण को ना विश्वास हुआ,
भूल चूक  सी  लगती थी,  
दोष बोध अभिज्ञात हुआ।
=====
पलभर  को  हताश हुआ था,
पर संभला  अगले   पल   में ,
जो कल्पित भी ना कर पाया,
प्राप्त हुआ उसको फल में।
=====
धर्मराज ने उस क्षण  कैसे,  
छल का था व्यापार किया, 
सही हुआ वो जिंदा है  ना,
सरल मरण संहार   हुआ।
=====
पिता नहीं तो पुत्र सही,
उनके दुष्कर्म फलित होंगे,
कर्म फलन तो होना था पर,
ज्ञात नहीं  त्वरित होंगे।
=====
अजय अमिताभ सुमन:
सर्वाधिकार सुरक्षित
=====

Sunday, November 13, 2022

दुर्योधन कब मिट पाया:भाग:40



दुर्योधन बड़ी आशा के साथ अश्वत्थामा के हाथों से पांच कटे हुए सर को अपने हाथ लेता है और इस बात की पुष्टि के लिए कि कटे हुए वो पांच सरमुंड पांडवों के हीं है, उसे अपने हाथों से दबाता है। थोड़े हीं प्रयास के बाद जब वो पांचों सरमुंड दुर्योधन की हाथों में एक पपीते की तरह फुट पड़ते हैं तब दुर्योधन को अश्वत्थामा के द्वारा की गई गलती का एहसास होता है। दुर्योधन भले हीं पांडवों के प्रति नफरत की भावना से भरा हुआ था तथापि उनकी शारीरिक शक्ति से अनभिज्ञ नहीं था। उसे ये तो ज्ञात था हीं कि भीम आदि के सर इतने कोमल नहीं हो सकते जिसे इतनी आसानी से फोड़ दिया जाए। ये बात तो दुर्योधन को समझ में आ हीं गया था कि अश्वत्थामा के हाथों पांचों पांडव नहीं अपितु कोई अन्य हीं मृत्यु को प्राप्त हुए थे।

=====

अति शक्ति संचय कर ,

दुर्योधन ने हाथ बढ़ाया,

कटे हुए नर मस्तक थे जो ,

उनको हाथ दबाया।

=====

शुष्क कोई पीपल के पत्तों

जैसे टूट पड़े थे वो,

पांडव के सर हो सकते ना

ऐसे फुट पड़े थे जो ।

=====

दुर्योधन के मन में क्षण को

जो थी थोड़ी आस जगी,

मरने मरने को हतभागी

था किंचित जो श्वांस फली।

=====

धुल धूसरित हुए थे सारे,

स्वप्न दृश ज्यो दृश्य जगे ,

शंका के अंधियारे बादल

आ आके थे फले फुले।

=====

माना भीम नहीं था ऐसा

मेरे मन को वो भाये ,

और नहीं खुद पे मैं उसके,

पड़ने देता था साए।

=====

माना उसकी मात्र प्रतीति

मन को मेरे जलाती थी,

देख देख ना सो पाता था

दर्पोंन्नत जो छाती थी।

=====

पर उसके घन तन के बल से,

है परिचय कुछ मैं मानू,

इतनी बार लड़ा हूँ उससे

थोड़ा सा तो पहचानू।

=====

क्या भीम का सर ऐसे भी

हो सकता इतना कोमल?

और पार्थ ये हारा कैसे,

मचा हुआ हो अयोमल?

=====

अश्वत्थामा मित्र तुम्हारी

शक्ति अजय का ज्ञान मुझे,

जो कुछ भी तुम कर सकते हो

उसका है अभिमान मुझे।

=====

पर युद्धिष्ठिर और नकुल है

वासुदेव के रक्षण में,

किस भांति तुम जीत गए

जीवन के उनके भक्षण में?

=====

तिमिर घोर अंधेरा छाया

निश्चित कोई भूल हुई है,

निश्चय हीं किस्मत में मेरे

धँसी हुई सी शूल हुई है।

=====

दीर्घ स्वांस लेकर दुर्योधन

हौले से फिर डोला,

चूक हुई है द्रोणपुत्र,

निज भाग्य मंद है बोला।

=====

अजय अमिताभ सुमन:

सर्वाधिकार सुरक्षित

=====


Sunday, November 6, 2022

दूसरी सुर्पनखा:राक्षसी अधोमुखी



लक्ष्मण जी द्वारा राक्षसी सुर्पनखा के नाक और कान काटने की घटना सर्वविदित है। सुर्पनखा राक्षसराज लंकाधिपति रावण की बहन थी। जब प्रभु श्रीराम अपनी माता कैकयी की जिद पर अपनी पत्नी सीता और अपने छोटे भाई लक्ष्मण के साथ वनवास को गए तब वनवास के दौरान सुर्पनखा श्रीराम जी और लक्ष्मण जी पर कामासक्त हो उनसे प्रणय निवेदन करने लगी।

परंतु श्रीराम जी ने उसका प्रणय निवेदन ये कहकर ठुकरा दिया कि वो अपनी पत्नी सीताजी के साथ रहते है । रामजी ने कहा कि लक्ष्मण जी बिना पत्नी के अकेले हैं इसलिए यदि वो चाहे तो लक्ष्मण जी पास अपना प्रणय निवेदन लेकर जा सकती है। 

तत्पश्चात सुर्पनखा लक्ष्मण जी के पास प्रणय निवेदन लेकर जा पहुंची। जब लक्ष्मण जी ने भी उसका प्रणय निवेदन ठुकरा दिया तब क्रुद्ध होकर सुर्पनखा ने सीताजी को मारने का प्रयास किया। सीताजी की जान बचाने के लिए मजबूरन लक्ष्मण जी को सूर्पनखा के नाक काटने पड़े। सुर्पनखा से सम्बन्धित ये थी घटना जिसका वर्णन वाल्मिकी रामायण के आरण्यक कांड में किया गया है।

वाल्मिकी रामायण में एक और राक्षसी का वर्णन किया गया है जिसके नाक और कान लक्ष्मण जी ने सुर्पनखा की तरह हीं काटे थे। सुर्पनखा और इस राक्षसी के संबंध में बहुत कुछ समानताएं दिखती है। दोनों की दोनों हीं राक्षसियां  लक्ष्मण जी  पर मोहित होती है और दोनों की दोनों हीं राक्षसियां लक्ष्मण जी से प्रणय निवेदन करती हैं । लक्ष्मण जी न केवल दोनों के प्रणय निवेदन को अस्वीकार करते हैं अपितु उनके नाक और कान भी काटते हैं। 

परंतु दोनों घटनाओं में काफी कुछ समानताएं होते हुए भी काफी कुछ असमानताएं भी हैं। लक्ष्मण जी द्वारा सुर्पनखा और इस राक्षसी के नाक और कान  काटने का वर्णन वाल्मिकी रामायण के आरण्यक कांड में किया गया है। हालांकि सुर्पनखा का जिक्र सीताजी के अपहरण के पहले आता है, जबकि उक्त राक्षसी का वर्णन सीताजी के अपहरण के बाद आता है। आइए देखते हैं, कौन थी वो राक्षसी?

सीताजी को अपहृत कर अपनी राजधानी लंका ले जाते हुए राक्षसराज  रावण का सामना पक्षीराज जटायु से होता है। जटायु रावण के हाथो घायल होकर मृत्यु को प्राप्त हो जाता है और उसका अंतिम जल संस्कार श्रीराम के हाथों द्वारा संपन्न होता है। 

पक्षीराज जटायु का अंतिम जल संस्कार संपन्न करने के बाद  जब श्रीराम और लक्ष्मण पश्चिम दिशा की तरफ घने जंगलों में आगे को बढ़ते हैं तो उनका सामना मतंग मुनि के आश्रम के आस पास  उक्त राक्षसी होता है। इसका घटना का जिक्र वाल्मिकी रामायण के आरण्यक कांड के उनसठवें सर्ग अर्थात 59 वें सर्ग में कुछ इस प्रकार होता है।

[आरण्यकाण्ड:]
[एकोनिसप्ततितम सर्ग:अर्थात उनसठवाँ सर्ग]

श्लोक संख्या 1-2

तस्मै प्रस्थितो रामलक्ष्मणौ । 
अवेक्षन्तौ वने सीतां पश्चिमां जग्मतुर्दिशम् ॥1॥

पक्षिराज [ यहां पक्षीराज का तात्पर्य जटायु से है]  की जल क्रियादि पूरी कर, श्रीरामचन्द्र और लक्ष्मण वहाँ से रवाने हो, वन में सीता को ढूंढते हुए पश्चिम दिशा की ओर चले ॥1॥

तौ दिशं दक्षिणां गत्वा शरचापासिधारिणौ । 
अमिता पन्थानं प्रतिजग्मतुः ॥2॥

फिर धनुष वाण खड्ड हाथों में ले दोनों भाई उस मार्ग से जिस पर पहले कोई नहीं चला था, चल कर, पश्चिम दक्षिण के कोण
की ओर चले ॥ 2 ॥

श्लोक संख्या 3-5

अनेक प्रकार के घने झाड़, वृक्षवल्ली, लता आदि होने के कारण वह रास्ता केवल दुर्गम हो नहीं था, बल्कि भयंकर  भी था ॥ 3॥

व्यतिक्रम्य तु वेगेन व्यालसिंहनिषेवितम्। 
सुभीमं तन्महारण्यं व्यतियातौ महाबलौ ॥ 4॥

इस मार्ग को तय  कर, वे अत्यन्त बलवान दोनों राजकुमार, ऐसे स्थान में पहुँचे, जहाँ पर अजगर सर्प और सिंह रहते थे । इस महा भयंकर  महारण्य को भी उन दोनों ने पार किया ॥4॥

ततः परं जनस्थानात्रिक्रोशं गम्य राघवौ । 
क्रौञ्चारण्यं विविशतुर्गहनं तो महौजसौ ॥5॥

तदनन्तर चलते चलते वे दोनों बड़े पराक्रमी राजकुमार जन स्थान से तीन कोस दूर, क्रौञ्ज नामक एक जङ्गल में पहुँचे ॥ 5॥

वाल्मिकी रामायण के आरण्यकाण्ड के उनसठवाँ सर्ग के श्लोक संख्या 1 से श्लोक संख्या 5 तक श्रीराम जी द्वारा जटायु के अंतिम संस्कार करने के बाद सीताजी की खोज में पश्चिम दिशा में जाने का वर्णन किया गया है, जहां पर वो दोनों भाई अत्यंत हीं घने जंगल पहुंचे जिसका नाम क्रौञ्ज था।  

फिर श्लोक संख्या 6 से श्लोक संख्या 10 तक श्रीराम जी और लक्ष्मण जी द्वारा उस वन को पार करने और मतंग मुनि के आश्रम के समीप जाने का वर्णन किया गया है । वो जंगल बहुत हीं भयानक था  तथा अनगिनत जंगली पशुओं और जानवरों से भरा हुआ था। 

यहीं पर श्लोक संख्या 11 से श्लोक संख्या 11 से श्लोक संख्या 18 तक इस राक्षसी का वर्णन आता है जिसके नाक और कान लक्ष्मण जी ने काट डाले थे। तो इस राक्षसी के वर्णन की शुरुआत कुछ इस प्रकार से होती है।

श्लोक संख्या 10-12.

दोनों दशरथनन्दनों ने वहाँ पर एक पर्वत कन्दरा देखी । वह पाताल की तरह गहरी थी और उसमें सदा अंधकार छाया रहता था ॥10॥

आसाद्य तौ नरव्याघ्रौ दर्यास्तस्या विदूरतः । 
ददृशाते महारूपां राक्षसी विकृताननाम् ॥11॥

उन दोनों पुरुषसिंहों ने, उस गुफा के समीप जा कर एक भयङ्कर रूप वाली विकरालमुखी राक्षसी को देखा ॥12॥

भवदामल्पसत्त्वानां वीभत्सां रौद्रदर्शनाम् । 
लम्बोदरीं तीक्ष्णदंष्ट्रां कलां परुषत्वचम् ॥12॥

वह छोटे जीव जन्तुओं के लिये बड़ी डरावनी थी। उसका रूप बड़ा घिनौना था । वह देखने में बड़ी भयंकर  थी, क्योंकि उसकी डाढ़े बड़ी पैनी थीं और पेट बड़ा लंबा था । उसकी खाल बड़ी कड़ी थी ॥12॥

श्लोक संख्या 13-14.

भक्षयन्तीं मृगान्भीमान्त्रिकटां मुक्तमूर्धजाम् ।
प्रेक्षेतां तौ ततस्तत्र भ्रातरौ रामलक्ष्मणौ ॥13॥

वह बड़े बड़े मृगों को खाया करती थी, वह विकट रूप वाली और सिर के बालों को खोले हुए थी । ऐसी उस राक्षसी को उन दोनों भाइयों ने देखा ॥13॥

सा समासाद्य तौ वीरों व्रजन्तं भ्रातुरग्रतः ।
एहि रंस्यात्युक्त्वा समालम्बत' लक्ष्मणम् ॥14॥

वह राक्षसी इन दोनों भाइयों को देख और आगे चलते हुए लक्ष्मण को देख, बोली- आइए हम दोनों विहार करें, तदनन्तर उसने लक्ष्मण का हाथ पकड़ लिया ॥14।।

श्लोक संख्या 15-16.

उवाच चैनं वचनं सौमित्रिमुपगृह्य सा । 
अहं त्वयोमुखी नाम लाभस्ते त्वमसि प्रियः ॥15॥

वह लक्ष्मण जी को चिपटा कर कहने लगी- मेरा अधोमुखी नाम है , तुम मुझे बड़े प्रिय हो । बड़े भाग्य से तुम मुझे मिले हो ।।15॥

नाथ पर्वतकूटेषु नदीनां पुलिनेषु च ।
आयुःशेषमिमं वीर त्वं मया सह रंस्यसे ।।16॥ 

हे नाथ ,दुर्गम पर्वतों में और नदियों के तटों पर जीवन के शेष दिनों तक मेरे साथ तुम विहार करना ॥16॥

श्लोक संख्या 17-18.

एवमुक्तस्तु कुपितः खड्गमुद्धृत्य लक्ष्मणः ।
कर्णनासौ स्तनौ चास्या निचकर्तारिसूदनः ॥ 17॥ 

उसके ऐसे वचन सुन, लक्ष्मण जी ने कुपित हो और म्यान से तलवार निकाल उसके नाक, कान और स्तनों को काट डाला ॥ 17॥

कर्णनासे निकृत्ते तु विश्वरं सा विनद्य च । 
यथागतं प्रदुद्राव राक्षसी भीमदर्शना ।।18।। 

जब उसके कान और नाक काट डाले गये, तब वह भयङ्कर राक्षसी भर नाद करती जिधर से आयी थी उधर ही को भाग खड़ी हुई ॥18॥

तो ये दूसरी राक्षसी जिसका नाम अधोमुखी था उसके नाक और कान भी लक्ष्मण जी ने काटे थे। हालांकि इस राक्षसी के नाम के अलावा और कोई जिक्र नहीं आता है वाल्मिकी रामायण में। जिस तरह से सुर्पनखा के खानदान के बारे में जानकारी मिलती है , इस तरह की जानकारी अधोमुखी राक्षसी के बारे में नहीं मिलती।  उसके माता पिता कौन थे, उसका खानदान क्या था, उसके भाई बहन कौन थे इत्यादि, इसके बारे में वाल्मिकी रामायण कोई जानकारी नहीं देता है। 

हालांकि उसकी शारीरिक रूप रेखा के बारे ये वर्णन किया गया है कि वो अधोमुखी राक्षसी  दिखने में बहुत हीं कुरूप थी और पहाड़ के किसी कंदरा में रहती थी। चूंकि वो घने जंगलों में हिंसक पशुओं के बीच रहती थी इसलिए उसके लिए हिंसक होना, मृग आदि का खाना कोई असामान्य बात नहीं थी जिसका वर्णन वाल्मिकी रामायण में किया गया है ।  

उसके निवास स्थल के बारे में निश्चित हीं रूप से अंदाजा लगाया जा सकता है । उसका निवास स्थल निश्चित रूप से हीं बालि के साम्राज्य किष्किंधा नगरी के आस पास हीं प्रतीत होती है।  ये घटना मतंग मुनि के आश्रम के आस पास हीं हुई होगी। मतंग मुनि सबरी के गुरु थे जिनका उद्धार राम जी ने किया थे । ये मतंग मुनि वो ही थे जिनके श्राप के कारण बालि इस जगह के आस पास भी नहीं फटकता था। 

जब बालि ने दुदुंभी नामक राक्षस का वध कर उसके शरीर को मतंग मुनि के आश्रम के पास फेंक दिया था तब क्रुद्ध होकर मतंग मुनि ने बालि को ये श्राप दिया था कि अगर बालि इस आश्रम के आस पास आएगा तो मृत्यु को प्राप्त हो जायेगा। इसी कारण बालि वहां नहीं आता था। 

यही कारण था कि जब बालि अपने छोटे भाई सुग्रीव से क्रोधित हो गया तब  सुग्रीव अपनी जान बचाने के लिए मतंग मुनि के आश्रम के पास हीं रहते थे। जाहिर सी बात है , ये घटना बालि के साम्राज्य किष्किंधा नगरी के आस पास हीं घटित हुई प्रतीत होती है।

इस घटना को ध्यान से देखते हैं तो ज्ञात होता है कि लक्ष्मण जी अपने भाई राम जी से आगे चल रहे हैं। ये एक छोटे भाई का उत्तम चरित्र दिखाता है। जब सीताजी और रामजी साथ थे तो हमेशा उनके पीछे आदर भाव से चलते थे और जब सीताजी के अपहरण के कारण राम जी अति व्यथित हैं तो उनके आगे रहकर ढाल की तरह उनकी रक्षा करते हैं।

कोई यह जरूर कह सकता है कि सुर्पनखा के नाक और कान तब काटे गए थे जब उसने सीताजी को मारने का प्रयास किया परंतु यहां पर तो अधोमुखी ने केवल प्रणय निवेदन किया था। परंतु ध्यान देने वाली बात ये है कि ये घटना  सीताजी के अपहरण और जटायु के वध के बाद घटित होती है। जाहिर सी बात है लक्ष्मण जी अति क्षुब्धवस्था में थे।

जब एक व्यक्ति अति क्षुब्धवस्था में हो, जिसकी भाभी का बलात अपहरण कर लिया गया हो, जिसके परम हितैषी जटायु का वध कर दिया गया हो, और जो स्वभाव से हीं अति क्रोधी हो, इन परिस्थितियों में कोई जबरदस्ती प्रणय निवेदन करने लगे तो परिणाम हो भी क्या सकता था? तिस पर प्रभु श्रीराम जी भी लक्ष्मण जी को मना करने की स्थिति में नहीं थे। इसीलिए ये घटना घटित हुई होगी।

यहां पर ये दिखाई पड़ता है कि प्रभु श्रीराम की दिशा निर्देश लक्ष्मण जी को शांत करने के लिए अति आवश्यक थी। चूंकि श्रीराम जी अपनी पत्नी सीताजी के अपहृत हो जाने के कारण अत्यंत दुखी होंगे और लक्ष्मण जी के क्रोध को शांत करने हेतु कोई निर्देश न दे पाए होंगे,  यही कारण होगा कि राक्षसी अधोमुखी द्वारा मात्र प्रणय निवेदन करने पर हीं लक्ष्मण जी ने उसके नाक और कान काट डाले। तो ये थी राक्षसी अधोमुखी जिसके नाक और कान लक्ष्मण जी ने राक्षसी सुर्पनखा की तरह हीं काटे थे।

अजय अमिताभ सुमन:सर्वाधिकार सुरक्षित

Sunday, October 30, 2022

दुर्योधन कब मिट पाया:भाग:39



=====
दुर्योधन को गुरु द्रोणाचार्य की मृत्यु के उपरांत घटित होने वाली वो सारी घटनाएं याद आने लगती हैं  कि कैसे अश्वत्थामा ने कुपित होकर पांडवों पर वैष्णवास्त्र का प्रयोग कर दिया था। वैष्णवास्त्र के सामने प्रतिरोध करने पर वो अस्त्र और भयंकर हो जाता और प्राण ले लेता। उससे  बचने का एक हीं उपाय था कि उसके सामने झुक जाया जाए, इससे वो शस्त्र शांत होकर लौट जाता। केशव के समझाने पर भीम समेत सारे पांडव उस शस्त्र के सामने झुक गए। भले हीं पांडवों की जान श्रीकृष्ण के हस्तक्षेप के कारण बच गई हो एक बात तो निर्विवादित हीं थी कि अश्वत्थामा के समक्ष सारे पांडवों ने घुटने तो टेक हीं दिए थे। प्रस्तुत है मेरी दीर्घ कविता “दुर्योधन कब मिट पाया का उनचालिसवां भाग।        
=====
मृत पड़ने  पर गुरु द्रोण के 
कैसा महांधकार  मचा था,
कृपाचार्य रण त्यागे दुर्योधन 
भी निजबल हार चला था।
=====
शल्य चित्त ना दृष्टि गोचित 
ओज शौर्य ना  कोई आशा,
और कर्ण भी भाग चला था
त्याग दीप्ति बल  प्रत्याशा। 
=====
खल शकुनि के कृतवर्मा के
समर क्षेत्र ना टिकते पाँव,
सेना  सारी भाग चली  थी,
ना परिलक्षित कोई  ठांव।
=====
इधर मचा था दुर्योधन मन  
गहन निराशा घनांधकार ,
उधर द्रोणपुत्र कर स्थापित 
खड़ग धनुष और प्रत्याकार।
=====
पर जब ज्ञात हुआ उसको, 
क्यों इहलोक  से चले गए ,
द्रोण पुत्र के पिता द्रोण वो 
तनय स्नेह  में  छले  गए।
=====
क्रोध से भरकर द्रोणपुत्र ने 
विकट  शस्त्र  बुलाया  था,
वैष्णवास्त्र अभिमंत्रण कैसा 
वो प्रत्यस्त्र चलाया था। 
=====
अग्निवर्षा होती थी नभ में  
नहीं  कोई  टिक पाता था,
जड़ बुद्धि हीं भीम डटा था
बात  नहीं पतियाता था।
=====
वो तो केशव आ पहुंचे थे 
अगर नहीं आ पाते तो  ?
बच पाते क्या पांडव बंधु
ना उपचार  सुझाते  वो?
=====
द्रोण पुत्र की प्रलयग्नि के  
सम्मुख ना कोई भारी था, 
नतमस्तक हो प्राण बचे वो
समय अमंगल कारी  था।
=====
दुर्योधन के मानस पट पर 
दृश्य उभर सब आते थे ,
भीषण शस्त्र चलाने गुरु 
द्रोण पुत्र को  आते थे।
=====
इसीलिए तो द्रोण पुत्र की  
बातों पर मुस्कान फली,
दुर्योधन हर्षित था सुनकर 
अच्छा था जो जान बची।
=====
जरा देखूँ  तो द्रोण पुत्र ने 
कैसा अद्भुत काम किया ?
क्या सच में हीं पांडवजन को 
उसने है निष्प्राण किया?   
===== 
अजय अमिताभ सुमन:
सर्वाधिकार सुरक्षित
===== 

Sunday, October 23, 2022

दुर्योधन कब मिट पाया:भाग:26


विपरीत परिस्थितियों में एक पुरुष का किंकर्तव्यविमूढ़ होना एक समान्य बात है । मानव यदि चित्तोन्मुख होकर समाधान की ओर अग्रसर हो तो राह दिखाई पड़ हीं जाती है। जब अश्वत्थामा को इस बात की प्रतीति हुई कि शिव जी अपराजेय है, तब हताश तो वो भी हुए थे। परंतु इन भीषण परिस्थितियों में उन्होंने हार नहीं मानी और अंतर मन में झाँका तो निज चित्त द्वारा सुझाए गए मार्ग पर समाधान दृष्टि गोचित होने लगा । प्रस्तुत है दीर्घ कविता “दुर्योधन कब मिट पाया ” का छब्बीसवां भाग।

शिव शम्भू का दर्शन जब हम तीनों को साक्षात हुआ?
आगे कहने लगे द्रोण के पुत्र हमें तब ज्ञात हुआ,
महा देव ना ऐसे थे जो रुक जाएं हम तीनों से,
वो सूरज क्या छुप सकते थे हम तीन मात्र नगीनों से?

ज्ञात हमें जो कुछ भी था हो सकता था उपाय भला,
चला लिए थे सब शिव पर पर मसला निरुपाय फला।
ज्ञात हुआ जो कर्म किये थे उसमें बस अभिमान रहा,
नर की शक्ति के बाहर हैं महा देव तब भान रहा।

अग्नि रूप देदिव्यमान दृष्टित पशुपति से थी ज्वाला,
मैं कृतवर्मा कृपाचार्य के सन्मुख था यम का प्याला।
हिमपति से लड़ना क्या था कीट दृश जल मरना था ,
नहीं राह कोई दृष्टि गोचित क्या लड़ना अड़ना था?

मुझे कदापि क्षोभ नहीं था शिव के हाथों मरने का,
पर एक चिंता सता रही थी प्रण पूर्ण ना करने का।
जो भी वचन दिया था मैंने उसको पूर्ण कराऊँ कैसे?
महादेव प्रति पक्ष अड़े थे उनसे प्राण बचाऊँ कैसे?

विचलित मन कम्पित बाहर से ध्यान हटा न पाता था,
हताशा का बादल छलिया प्रकट कभी छुप जाता था।
निज का भान रहा ना मुझको कि सोचूं कुछ अंदर भी ,
उत्तर भीतर छुपा हुआ है झांकूँ चित्त समंदर भी।

कृपाचार्य ने पर रुक कर जो थोड़ा ज्ञान कराया ,
निजचित्त का अवबोध हुआ दुविधा का भान कराया।
युद्ध छिड़े थे जो मन में निज चित्त ने मुक्ति दिलाई ,
विकट विघ्न था पर निस्तारण हेतु युक्ति सुझाई।

अजय अमिताभ सुमन:सर्वाधिकार सुरक्षित

ये पूजा ये गायन क्या है?


त्यागी जैसा दिखने का भाव कोई छोटी मोटी वासना नहीं है। इस त्यागी जैसे दिखने के भाव का त्याग करना बड़ी बाधा है, जिसपर साधक अक्सर ध्यान नहीं देते। परिणामस्वरूप त्याग का वो भाव, जो कि ईश्वर की प्राप्ति की दिशा में उठाया जाने वाला पहला कदम है, ईश्वर की प्राप्ति में सबसे बड़ी बाधा बन जाता है। ऐसा व्यक्ति भले हीं धनवान बन जाए, ज्ञान, मान, सम्मान, अभिमान आदि की प्राप्ति कर ले, परंतु उसे ईश्वर की प्राप्ति कभी नहीं हो सकती। 
=====
ये पूजा ये गायन क्या है?
=====
ये पूजा ये गायन क्या है, 
ईश्वर का गीतायन क्या है?
अहम आदि का भान कहीं है, 
त्यागी का अभिमान कहीं है।
साधक में सम्मान कहीं है, 
भक्त अति धनवान कहीं है।
पूजन का बस छद्म प्रदर्शन, 
पर दिल में भगवान नहीं है।
नारद सा गर भाव नही तो ,
उस नर के नारायण क्या हैं।
ईश्वर का गीतायन क्या है? 
ये पूजा ये गायन क्या है?
=====
ईशभक्त परायण क्या हैं, 
ईश्वर का गीतायन क्या है?
नामों का खटराग कहीं है, 
श्रद्धा है ना साज नहीं है,
उर में प्रभु की आग नहीं है, 
प्रेम कोई अनुराग नहीं है, 
माथे चंदन कमर जनेऊ , 
मानस पे प्रभुराग नहीं है,
फिर हाथों में माला लेके,
मंदिर का ये वायन क्या है?
ईश्वर का गीतायन क्या है? 
ये पूजा ये गायन क्या है?
=====
बिन मीरा बादरायण क्या है,
ईश्वर का गीतायन क्या है?
अधरों पे हीं राम कहीं हैं, 
पर दिल में तो राम नहीं है,
ईश नाम पे चित्त में कोई, 
थिरकन ना अनुसाम नहीं है।
नर्तन कीर्तन हाथ कमंडल ,
काम वसन का ग्राम यहीं है।
चित्त में ना रहते महादेव फिर,
डमरू क्या भवायन क्या है?
ईश्वर का गीतायन क्या है? 
ये पूजा ये गायन क्या है? 
=====
अजय अमिताभ सुमन: 
सर्वाधिकार सुरक्षित

Sunday, October 16, 2022

निषाद राज एकलव्य


महाभारत में अर्जुन , भीम , भीष्म पितामह , गुरु द्रोणाचार्य , कर्ण , जरासंध , शिशुपाल अश्वत्थामा आदि पराक्रमी योद्धाओं के पराक्रम के बारे में अक्सर चर्चा होती रहती है। किसी भी साधारण पुरुष के बारे में पूछें तो इनके बारे में ठीक ठाक जानकारी मिल हीं जाती है।

एक कर्ण को छोड़कर बाकि जितने भी उक्त महारथी थे उनको अपने समय उचित सम्मान भी मिला था । यद्यपि कर्ण को समाज में उचित सम्मान नहीं मिला था तथापि उसे अपने  अपमान के प्रतिशोध लेने का भरपूर मौका भी मिला था ।   
 
भीष्म पितामह और गुरु द्रोणाचार्य की तरह कुरुराज दुर्योधन ने कर्ण को कौरव सेना का सेनापति भी नियुक्त किया था।  महार्षि वेदव्यास ने भीष्म पितामह और गुरु द्रोणाचार्य की तरह हीं महाभारत के एक अध्याय को कर्ण में नाम पर समर्पित किया था और इसे कर्ण पर्व के नाम से भी जाना जाता है।

इन सबकी मृत्यु कब और कैसे हुई , इसकी जानकारी हर जगह मिल हीं जाएगी , परन्तु महाभारत का एक और महान  योद्धा जिसे भगवान श्रीकृष्ण ने  कर्ण , जरासंध , शिशुपाल आदि जैसे महारथियों के समकक्ष माना , उसे महाभारत ग्रन्थ के महज कुछ पन्नों में समेट दिया गया । आइये देखते हैं कि महाभारत का वो महावीर और महा उपेक्षित योद्धा कौन था ?

महाभारत ग्रन्थ के द्रोणपर्व के घटोत्कचवध पर्व में इस महायोद्धा का वर्णन जरासंध आदि महारथियों के साथ आता है । जब अर्जुन भगवान श्रीकृष्ण से ये पूछते हैं कि उन्होंने  पांडवों की सुरक्षा के लिए कौन कौन से उपाय किये , तब अध्याय एकाशीत्यधिकशततमोऽध्यायः ,अर्थात अध्याय संख्या 181 में भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को जरासंध आदि योद्धाओं के वध के बारे में बताते हैं । श्लोक संख्या 1 की शुरुआत कुछ इस प्रकार से होती हैं  ।

अर्जुन उवाच कथमस्मद्धितार्थ ते कैश्च योगैर्जनार्दन। 
जरासंधप्रभृतयो घातिताः पृथिवीश्वराः ॥1॥

अर्जुन ने पूछा जनार्दन, आपने हम लोगों के हित के लिये कैसे किन किन उपायों से जरासंध आदि राजाओं का वध कराया है ? ॥1॥

श्रीवासुदेव उवाच जरासंधश्चेदिराजो नैषादिश्च महाबलः। 
यदि स्युर्न हताः पूर्वमिदानी स्युर्भयंकराः ॥2॥

भगवान श्रीकृष्ण ने कहा: हे अर्जुन , अगर जरासंघ, शिशुपाल और महाबली एकलव्य आदि ये पहले ही मारे न गये होते तो इस समय बड़े भयंकर सिद्ध होते ॥2॥

दुर्योधन उन श्रेष्ठ रथियों से अपनी सहायता के लिये अवश्य प्रार्थना करता और वे हमसे सर्वदा द्वेष रखने के कारण निश्चय ही वो कौरवों का पक्ष लेते ॥3॥ 

ते हि वीरा महेष्वासाः कृतास्त्रा दृढयोधिनः। 
धार्तराष्ट्रां चमूं कृत्स्नां रक्षेयुरमरा इव ॥4॥ 

वे वीर महाधनुर्धर, अस्त्रविद्या के ज्ञाता तथा दृढ़ता पूर्वक युद्ध करनेवाले थे,  अतः दुर्योधन की सारी सेना की देवताओं के समान रक्षा कर सकते थे ॥4॥

सूतपुत्रो जरासंधश्चेदिराजो निषादजः।
सुयोधनं समाश्रित्य जयेयुः पृथिवीमिमाम् ॥5॥

सूतपुत्र कर्ण, जरासंध, चेदिराज शिशुपाल और निषादनन्दन एकलव्य ये चारों मिलकर यदि दुर्योधन का पक्ष लेते तो इस पृथ्वी को अवश्य ही जीत लेते ॥5॥ 

योगैरपि हता यैस्ते तन्मे शृणु धनंजय । 
अजय्या हि विना योगैमधे ते दैवतैरपि ॥6॥

धनंजय , वे जिन उपायों से मारे गये हैं, उन्हें मैं  बतलाता  हूँ, मुझसे सुनो। बिना उपाय किये तो उन्हें युद्ध में देवता भी नहीं जीत सकते थे ॥6॥

एकैको हि पृथक् तेषां समस्तां सुरवाहिनीम् । 
योधयेत् समरे पार्थ लोकपालाभिरक्षिताम् ॥7॥

कुन्तीनन्दन ,  उनमें से अलग अलग एक-एक वीर ऐसा था, जो लोकपालों से सुरक्षित समस्त देवसेना के साथ समराङ्गण में अकेला ही युद्ध कर सकता था॥7॥

इस प्रकार हम देखते हैं कि अध्याय 181 के श्लोक संख्या 1 से श्लोक संख्या 7 तक भगवान श्रीकृष्ण पांडव के 4 महारथी शत्रुओ के नाम लेते हैं जिनके नाम कुछ इस प्रकार है  कर्ण, जरासंध, चेदिराज शिशुपाल और निषादनन्दन एकलव्य। 

यहाँ पर भगवान श्रीकृष्ण ने निषादनन्दन एकलव्य का नाम कर्ण, जरासंध, चेदिराज शिशुपाल जैसे महावीरों के साथ लिया है और आगे ये भी कहा है कि ये चारों मिलकर यदि दुर्योधन का पक्ष लेते तो इस पृथ्वी को अवश्य ही जीत लेते। 

फिर एक एक करके इन सब शत्रुओ के वध के  उपाय के बारे में बताते हैं । श्लोक संख्या 8 से श्लोक संख्या 16 तक भीम द्वारा महाबली जरासंध के साथ मल्लयुद्ध तथा फिर भीम द्वारा जरासंध के वध के में बताते हैं । 

जरासंध के वध के बारे में एक महत्वपूर्ण बात यह निकलकर आती है कि भीम के साथ उसके युद्ध होने के कछ दिनों पहले उसका श्रीकृष्ण के बड़े भाई  बलराम के साथ भी युद्ध हुआ था जिसमे कि जरासंध का गदा टूट गया था। जरासंध अपने उस गदा के साथ लगभग अपराजेय हीं था।

अगर भीम को जरासंध के साथ उस गदा के साथ युद्ध करना पड़ता तो वो उसे कभी जीत नहीं  सकते थे। जरासंध के गदा विहीन होने के कारण हीं श्रीकृष्ण द्वारा सुझाए गए तरीके का अनुसरण करने पर भीम जरासंध का वध कर पाते हैं । आगे के श्लोक संख्या 17 से श्लोक 21 तक निषादनन्दन एकलव्य के पराक्रम और फिर आगे शिशुपाल के बारे में भगवान श्रीकृष्ण चर्चा करते हैं।
 
त्वद्धितार्थ च नैषादिरअष्ठेन वियोजितः। 
द्रोणेनाचार्यकं कृत्वा छद्मना सत्यविक्रमः ॥ 17॥

तुम्हारे हित के लिये ही द्रोणाचार्य ने सत्य पराक्रमी एकलव्य का आचार्यत्व करके छल पूर्वक उसका अँगूठा कटवा दिया था ॥17॥

स तु बद्धा१लित्राणो नेषादिदृढविक्रमः। 
अतिमानी वनचरो बभौ राम इवापरः ॥18॥

सुदृढ़ पराक्रम से सम्पन्न अत्यन्त अभिमानी एकलव्य जब हाथों में दस्ताने पहनकर वन में विचरता, उस समय दूसरे परशुराम के समान जान पड़ता था॥18॥

एकलव्यं हि साङ्गुष्ठमशका देवदानवाः ।
सराक्षसोरगाः पार्थ विजेतुं युधि कर्हिचित् ॥19॥ 

भगवान श्रीकृष्ण एकलव्य के बचपन में घटी उस घटना का जिक्र करते हैं जब छल द्वारा गुरु द्रोणाचार्य ने उससे उसका अंगूठा मांग लिया था। शायद यही कारण है कि कृष्ण एकलव्य के बारे में बताते हैं कि वो हाथ में दस्ताने पहनकर वन में विचरता था। अंगूठा कट जाने के कारण एकलव्य शायद अपने हाथों को बचाने के लिए ऐसा करता होगा।

एकलव्य के बचपन की कहानी कुछ इस प्रकार है। निषाद पुत्र एकलव्य गुरु द्रोणाचार्य से शिक्षा ग्रहण करना चाहता था , परन्तु जाति व्यवस्था की बेड़ियों में जकड़े  हुए सामाजिक व्यवस्था के आरोपित किए गए बंधन के कारण गुरु द्रोणाचार्य ने एकलव्य को अस्त्र और शस्त्रों का ज्ञान देने से मना  कर दिया था।

एक बार गुरु द्रोणाचार्य अपने शिष्यों कौरवों और पांडवों  के साथ वन में भ्रमण करने को निकले तो उनके साथ साथ पांडवों का  पालतू कुत्ता भी चल रहा था। वो कुत्ता इधर उधर घूमते हुए वन में उस जगह जा पहुंचा जहां एकलव्य अभ्यास कर रहा था। एकलव्य को धनुर्विद्या का अभ्यास करते देख वो जोर जोर से भौंकने लगा।

घटना यूं घटी थी कि गुरु द्रोणाचार्य के मना करने पर एकलव्य ने हार नहीं मानी और गुरु द्रोणाचार्य की मूर्ति बनाकर , उन्हीं को अपना गुरु बना लिया और धनुर्विद्या का अभ्यास करने लगा। उस समय जब एकलव्य अभ्यास कर रहा था तो पांडवों का वो ही पालतू कुत्ता बार बार भौंक कर उसके अभ्यास में विघ्न पैदा करने लगा। 

मजबूर होकर एकलव्य ने उस कुत्ते की मुख में वाणों की ऐसी वर्षा कर दी कि कुत्ते का मुख भी बंद हो गया और कुत्ते को कोई चोट भी नहीं पहुंची । उसकी ऐसी प्रतिभा देखकर सारे पांडव जन , विशेषकर अर्जुन बहुत चिंतित हुए क्योकि उस तरह वाणों के चलाने की निपुणता तो अर्जुन में भी नहीं थी ।

जब ये बात गुरु द्रोणाचार्य को पता चली तो उन्होंने एकलव्य से गुरु दक्षिणा में उसका अंगूठा मांग लिया क्योंकि एकलव्य ने गुरु द्रोणाचार्य की प्रतिमा स्थापित कर उन्हीं को अपना गुरु मान कर धनुर्विद्या का अभ्यास कर रहा था । एकलव्य की भी महानता इस बात से भी झलकती है कि गुरु के कहने पर उसने अपना अंगूठा हँसते हँसते गुरु द्रोणाचार्य को दान में दे दिया । 

एक तरफ तो वो गुरु थे जो सामाजिक व्यवस्था की जकड़न के कारण एकलव्य को शिक्षा देने से मना कर देते हैं तो दूसरी तरफ वो ही शिष्य एकलव्य है जो उसी गुरु के मांगने पर हंसते हंसते अपना अंगूठा दान कर देता है। शायद यही कारण था कि श्रीकृष्ण निषाद नन्दन को सत्यनिष्ठ योद्धा की संज्ञा से पुकारते हैं।

एकलव्य का ये अंगूठा दान महाभारत में कर्ण द्वारा किए गए कवच कुंडल दान की याद दिलाता है। जिस प्रकार कर्ण के अंगूठा मांगने पर भगवान इंद्र का नाम कलंकित हुआ तो ठीक इसी प्रकार एकलव्य द्वारा किए गए अंगूठा दान ने गुरु द्रोणाचार्य के जीवन पर एक ऐसा दाग लगा दिया जिसे वो आजीवन धो नहीं पाए।

ये वो ही निषादराज एकलव्य था जिसके पराक्रम के बारे में श्रीकृष्ण जी आगे कहते हैं कि  सुदृढ़ पराक्रम से सम्पन्न अत्यन्त अभिमानी एकलव्य जब हाथों में दस्ताने पहनकर वन में विचरता, उस समय दूसरे परशुराम के समान जान पड़ता था। भगवान श्रीकृष्ण द्वारा जिस योद्धा की तुलना परशुराम जी से की जा रही हो , उसके परक्राम के बारे में अनुमान लगाना कोई मुश्किल कार्य नहीं । श्रीकृष्ण अर्जुन को आगे भी एकलव्य के पराक्रम के बारे में कुछ इस प्रकार बताते है । 

कुन्तीकुमार, यदि एकलव्य का अँगूठा सुरक्षित होता  तो देवता, दानव, राक्षस और नाग, ये सब मिलकर भी  युद्ध में उसे कभी परास्त नहीं कर सकते थे ॥19॥

किमुमानुषमात्रेण शक्यःस्यात् प्रतिवीक्षितुम्। 
दृढमुष्टिः कृती नित्यमस्यमानो दिवानिशम् ॥20॥

फिर कोई मनुष्य मात्र तो उसकी ओर देख ही कैसे सकता था ? उसकी मुट्ठी मजबूत थी,  वह अस्त्र-विद्या का विद्वान था और सदा दिन-रात बाण चलाने का अभ्यास करता था ॥20॥

त्वद्धितार्थ तु स मया हतः संग्राममूर्धनि ।
चेदिराजश्च विक्रान्तः प्रत्यक्षं निहतस्तव ॥21॥

तुम्हारे हित के लिये मैंने ही युद्ध के मुहाने पर उसे मार डाला था । पराक्रमी चेदिराज शिशुपाल तो तुम्हारी आँखों के सामने ही मारा गया था ॥21॥

इसी एकलव्य के बारे में श्रीकृष्ण जी कहते हैं कि यदि एकलव्य का अँगूठा सुरक्षित होता  तो देवता, दानव, राक्षस और नाग, ये सब मिलकर भी  युद्ध में उसे कभी परास्त नहीं कर सकते थे। एक अंगूठा कट जाने के बाद भी एकलव्य की तुलना भगवान श्रीकृष्ण परशुराम जी से करते हैं। ये सोचने वाली बात है अगर उसका अंगूठा सुरक्षित होता तो किस तरह की प्रतिभा का प्रदर्शन करता।

 उसकी योग्यता का अनुमान इस बात से भी  लगाया जा सकता है उस महायोद्धा एकलव्य का वध भगवान श्रीकृष्ण को करना पड़ता है। भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को आगे बताते हैं कि  महाभारत युद्ध शुरू होने के ठीक पहले उन्होंने स्वयं निषाद पुत्र एकलव्य का वध कर दिया थे।

इस प्रकार हम देखते हैं कि इतने बड़े विशाल ग्रन्थ में महज 4 श्लोकों में हीं निषाद नन्दन एकलव्य के पराक्रम और उसके वध के बारे में जानकारी दी गई है। कर्ण के लिए तो एक अध्याय कर्ण पर्व के रूप में समर्पित है तो वहीं पर महाभारत के द्रोणपर्व के घटोत्कचवध पर्व में मात्र चार श्लोकों में हीं इस महान धनुर्धारी महापराक्रमी योद्धा को निपटा दिया गया है ।

अगर आप किसी से भी जरासंध , शिशुपाल या कर्ण के पराक्रम और उनकी मृत्यु  के बारे में पूछे तो उनके बारे में सारी जानकारी बड़ी आसानी से मिल जाती है परन्तु अंगूठा दान के बाद एकलव्य का क्या हुआ , उसका वध भगवान श्रीकृष्ण ने क्यों ,  कैसे और कहाँ किया , कोई जानकारी नहीं मिलती।

हालांकि कुछ किदवंतियों के अनुसार एकलव्य को भगवान श्रीकृष्ण का मौसेरा भाई बताया जाता है। ऐसा माना जाता है कि गुरु द्रोणाचार्य द्वारा अंगूठा दान के बाद एकलव्य अर्जुन और अन्य पांडवों से ईर्ष्या रखने लगा था।

महाभारत युद्ध होने से पहले जब जरासंध ने भगवान श्रीकृष्ण पर आक्रमण किया तब एकलव्य जरासंध का साथ दे रहा था। इसी कारण भगवान श्रीकृष्ण ने एकलव्य का वध किया था। परंतु ये किदवंती हीं है। महाभारत के अध्याय संख्या 181 में इन बातों का कोई जिक्र नहीं आता हैं।

अगर इन बातों में कुछ सच्चाई होती तो जब भगवान श्रीकृष्ण एकलव्य के बारे में चर्चा करते हैं तो इन घटनाओं का जिक्र जरूर करते। कारण जो भी रहा हो , ये बात तो निश्चित रूप से कहा जा सकता है निषादराज पांडवों से ईर्ष्या करता था  तथा भगवान श्रीकृष्ण के हाथों हीं उसका वध हुआ था।

देखने वाली बात ये है कि कर्ण और अर्जुन दोनों ने महान गुरुओ से शिक्षा ली थी। एक तरफ अर्जुन गुरु द्रोणाचार्य का प्रिय शिष्य था जो उनकी छत्र छाया में आगे बढ़ा था।

तो दूसरी तरफ कर्ण ने भगवान परशुराम से अस्त्र और शस्त्रों की शिक्षा ली थी। एकलव्य की महानता इस बात से साबित होती है कि उसको किसी भी गुरु का दिशा निर्देश नहीं मिला था। 

निषाद राज एकलव्य स्वयं के अभ्यास द्वारा हीं कुशल योद्धा बना था। स्वयं के अभ्यास द्वारा एकलव्य ने ऐसी महानता और निपुणता हासिल कर ली थी जिसकी कल्पना ना तो अर्जुन कर सकता था और ना हीं कर्ण।

एकलव्य वो महान योद्धा था जिसकी तुलना खुद भगवान श्रीकृष्ण कर्ण , जरासंध , शिशुपाल , परशुराम इत्यादि के साथ करते हैं और एकलव्य को इनके समकक्ष मानते है , उसकी वीरता और पराक्रम के बारे में मात्र 4 श्लोक? इससे बड़ी उपेक्षा और हो हीं क्या सकती है ?

एकलव्य जैसे असाधारण योद्धा की मृत्यु के बारे में केवल एक श्लोक में वर्णन , क्या इससे भी ज्यादा कोई किसी योद्धा की  उपेक्षा कर सकता है?  कर्ण को महाभारत का भले हीं उपेक्षित पात्र माना जाता रहा हो परन्तु मेरे देखे एकलव्य , जिसने बचपन में अर्जुन और कर्ण से बेहतर प्रतिभा का प्रदर्शन किया और वो भी बिना किसी गुरु के , उससे ज्यादा उपेक्षित पात्र और कोई नहीं। 

अजय अमिताभ सुमन : सर्वाधिकार सुरक्षित 

Sunday, October 9, 2022

भगवान बताएं कैसे?[भाग-1]


कहते हैं कि ईश्वर ,जो कि त्रिगुणातित है, अपने मूलस्व रूप में आनंद हीं है, इसीलिए तो उसे सदचित्तानंद के नाम से भी जाना जाता है। इस परम तत्व की एक और विशेषता इसकी सर्वव्यापकता है यानि कि चर, अचर, गोचर , अगोचर, पशु, पंछी, पेड़, पौधे, नदी , पहाड़, मानव, स्त्री आदि ये सबमें व्याप्त है। यही परम तत्व इस अस्तित्व के अस्तित्व का कारण है और परम आनंद की अनुभूति केवल इसी से संभव है। परंतु देखने वाली बात ये है कि आदमी अपना जीवन कैसे व्यतित करता है? इस अस्तित्व में अस्तित्वमान क्षणिक सांसारिक वस्तुओं से आनंद की आकांक्षा लिए हुए निराशा के समंदर में गोते लगाता रहता है। अपनी अतृप्त वासनाओं से विकल हो आनंद रहित जीवन गुजारने वाले मानव को अपने सदचित्तानंद रूप का भान आखिर हो तो कैसे? प्रस्तुत है मेरी कविता "भगवान बताएं कैसे :भाग-1"?
=====
भगवान बताएं कैसे?
[भाग-1] 
=====
क्षुधा प्यास में रत मानव को ,
हम भगवान बताएं कैसे?
परम तत्व बसते सब नर में ,
ये पहचान कराएं कैसे?
=====
ईश प्रेम नीर गागर है वो, 
स्नेह प्रणय रतनागर है वो,
वही ब्रह्मा में विष्णु शिव में , 
सुप्त मगर प्रतिजागर है वो।
पंचभूत चल जग का कारण ,
धरणी को करता जो धारण, 
पल पल प्रति क्षण क्षण निष्कारण,
कण कण को जनता दिग्वारण ,
नर इक्षु पर चल जग इच्छुक,
ये अभिज्ञान कराएं कैसे? 
परम तत्व बसते सब नर में ,
ये पहचान कराएं कैसे?
=====
कहते मिथ्या है जग सारा , 
परम सत्व जग अंतर्धारा, 
नर किंतु पोषित मिथ्या में , 
कभी छद्म जग जीता हारा,
सपन असल में ये जग है सब ,
परम सत्य है व्यापे हर पग ,
शुष्क अधर पर काँटों में डग ,
राह कठिन अति चोटिल है पग,   
और मानव को क्षुधा सताए , 
फिर ये भान कराएं कैसे?
परम तत्व बसते सब नर में ,
ये पहचान कराएं कैसे?
=====
क्षुधा प्यास में रत मानव को ,
हम भगवान बताएं कैसे?
परम तत्व बसते सब नर में ,
ये पहचान कराएं कैसे?
=====
अजय अमिताभ सुमन:
सर्वाधिकार सुरक्षित
=====

My Blog List

Followers

Total Pageviews