Saturday, January 6, 2024

चिंगारी बन लड़ा नहीं जो

चिंगारी बन लड़ा नहीं जो, 
उसने कब इतिहास लिखा है?
अंधेरों में जला नहीं जो, 
उससे कब  प्रकाश खिला है?
किसी फूल के रसिया को, 
शुलों से नफरत नहीं चलेगा,
धूप छाँव पानी से बचकर, 
ना अड़हुल पर कुसुम खिलेगा।
ग्रीष्म मेघ वृष्टि बरखा से,
जो भिड़ते गाथा रचते,
शीत ताप से जो बच रहते ,
उनको कब मधुमास दिखा है?
चिंगारी बन लड़ा नहीं जो, 
उसने कब इतिहास लिखा है?

@अजय अमिताभ सुमन

Saturday, December 30, 2023

मुद्रा नियमित शिक्षण

येन केन धन अर्जन हीं हो ,
जब शिक्षा का लक्ष्य प्रधान,

मुद्रा नियमित शिक्षण और,
द्रव्यार्जन को मिलता सम्मान।

ज्ञान की वृद्धि बोध की शुद्धि ,
का शिक्षक को ध्यान नहीं,

प्रज्ञा दोष के निस्तारण का ,
शिक्षक को अभिज्ञान नहीं।

तब उस विद्यालय में कोई ,
बोध का दर्पण क्या होगा?

विद्यार्थी व्यवसाय  पिपासु ,
ज्ञान विवर्धन  क्या होगा?

 याद रहे गर देश में  शिक्षण,
 बना हुआ मजदूरी हो ,

 शक्ति संचय अति आवश्यक,
 शिक्षण गैर जरुरी हो।

तब राष्ट्र में बेहतर शिक्षक ,
अक्सर हीं हो जाते मौन ।

और राष्ट्र पर आती आपद ,
अभिवृद्धि हो जाती गौण।

 अजय अमिताभ सुमन

Sunday, December 17, 2023

सृष्टि की अभिदृष्टि कैसी?

मैं तो भव में पड़ा हुआ ,
भव सागर वन में जलता हूँ,
ये बिना आमंत्रण स्वर कैसा ,
अंतर में सुनता रहता हूँ?
जग हीं शेष है बचा हुआ.
चित्त के अंदर बाहर भी,
ना कोई है सत्य प्रकाशन ,
कोई तथ्य उजागर भी।
मेरे जीवन में जो कुछ भी,
अबतक देखा करता था,
अनुभव वो हीं चले निरंतर,
जो सीखा जग कहता था।
बात हुई कुछ नई नई पर ,
ये क्या किसने है बोला ?
अदृष्टित दृष्टि में कोई ,
प्रश्न वोही किसने खोला?
मेरे हीं मन की है सारी,
बाते कैसे जान रहा?
ढूंढ ढूंढ के प्रश्न निरंतर,
लाता जो अनजान रहा?
सृष्टि की अभिदृष्टि कैसी,
सृष्टि का अवसारण कैसा?
ये प्रश्न रहा क्यों है ऐसा,
अदृष्टित का सांसरण कैसा?

अजय अमिताभ सुमन

Sunday, December 10, 2023

जब भी अपनी दांत दिखाते

जाने किसकी बात मान के,
बुद्धि किसकी सही जान के?
क्या घुटी चख आए टीचर,
चश्मा आंख लगाए टीचर।
जब मास्टर जी कक्षा आए,
चश्मा नाकों आँख चढ़ाए।
तब टिंकू ने कान खुजाया,
टीचर जी को नाक दिखाया।
पूछा सर जी क्या करते हैं?
कमरे में चश्मा धरते हैं?
कक्षा में है घोर अंधेरा,
कड़ी धूप ना कोई सबेरा।
फिर कैसी ये आफत आई,
काला चश्मा आंख चढ़ाई?
ज्यों टिंकू ने प्रश्न उठाया,
मास्टर जी ने राज बताया।
बोले बच्चे तुम सब तेज,
आंखों से चमकाते मेज।
जब भी अपनी दांत दिखाते,
सूरज को औकात दिखाते।
तुमसे लाइट इतनी आती,
आंखों को है बहुत सताती।
तिसपे क्या है तेज दिमाग,
जलता जैसे कोई चिराग।
इसी आग से बचना पड़ता,
काला चश्मा रखना पड़ता।

अजय अमिताभ सुमन 

Sunday, December 3, 2023

कुछ तो लॉयर हैं चंडुल

केस थे मेरे  सब निपटा के, 
कोर्ट का गाउन बैंड हटा के,
टी कैंटीन में मांगा चाय, 
लॉयर मित्र ने पूछा हाय।
पूछा ग्यारह अभी बजा है,
कोट बैंड सब किधर चला है?
चाय चर्चा पर मेरी बात,
दबे हुए निकले जज्बात।
अंग्रेजों का है ये चोला,
अच्छा हीं जो मैने खोला।
ठंड बहुत पड़ती हैं यू.के. 
बात यही कहता है जी.के.।
भारत का मौसम ना ठंडा, 
फिर गाउन का कैसा फंडा?
ये तो अच्छी बात हुई है, 
सर पे विग ना चढ़ी हुई है।
जात फिरंगी की क्यों माने?
निज पहचान से रहें बेगाने?
मेरे मित्र ने चिढ़ के बोला, 
सबको एक तराजू तोला?
बैरिस्टर विग साथ नहीं है,
कुछ के माथे नाथ नहीं है।
बैरिस्टर विग की कुछ गाथा,
दूर करे सच में कुछ  व्यथा ।
जिनके सर चंदा उग आते,
बैरिस्टर विग राज छुपाते।
फिर विग को क्यों कहें फिजूल?
कुछ तो लॉयर हैं चंडुल।

अजय अमिताभ सुमन

Wednesday, November 29, 2023

बह रही है ज्ञान गंगा

बह रही है ज्ञान गंगा, तू भी इसमें हाथ धो लेहै

 तेरी खिदमत में कितने, डिग्री की दुकान खोले

भेद नहीं करती ये गंगा, कला व विज्ञानं में
कोई मेहनत की जरुरत, है नहीं स्नान में
ले ले प्रतिष्ठा डूब दे दे गंग के प्रधान बोले
है तेरी खिदमत में कितने, डिग्री की दुकान खोले
गंग तट पर भीर बहुत है पर न तू घबराना
खोल पाप की गठरी वही पञ्च डूब दे आना
जा के विमला गंग तरन की थोरी सि सामान लेले
है तेरी खिदमत में कितने, डिग्री की दुकान खोले
जब प्रतिष्ठा की डिग्रीया तेरे हाथ आएगी
माँ शारदे तेरी प्रगति देख कर जल जाएगी
बहुत कर चुकी फेल वो सबको अब तो थोरा वो भी रोले
है तेरी खिदमत में कितने, डिग्री की दुकान खोले;

पंकज बनगमिया

Sunday, November 26, 2023

क्यों पढ़ा नहीं भूगोल?


पापा पूछे रिंकू बेटा, 

मचा हुआ क्या खेल?


गणित परीक्षा में कर आया, 

तू क्यों अव्वल फेल?


रिंकू बोला अजब कहानी, 

पर पापा मुझको बतलानी,


टीचर से रिश्ता मेरा ,

ऐसा वैसा कैसा समझानी।


प्रश्न पत्र में टीचर ने थे, 

ऐसे प्रश्न बिठाए,


काम ना आती अपनी बुद्धि , 

कैसे जुगत भिड़ाए।


गुस्से में हमने भी आकर , 

क्या क्या था लिख डाला,


एक प्रश्न के चार थे उत्तर , 

सबका सब टिक डाला।


गणित पत्र में वही प्रश्न थे , 

उनको जो भाता था,


उत्तर में लिख डाले मैंने , 

जो मुझको आता था।


मैथ के पेपर में धरती का , 

नक्शा डाला गोल,


टीचर की हीं गलती थी क्यों, 

पढ़ा नहीं भूगोल?


अजय अमिताभ सुमन 

Sunday, November 19, 2023

परम तत्व का हूँ अनुरागी

ना पद मद मुद्रा परित्यागी,
परम तत्व का पर अनुरागी।

इस जग का इतिहास रहा है,
चित्त चाहत का ग्रास रहा है।

अभिलाषा अकराल गहन है,
मन है चंचल दास रहा है।

सरल नहीं भव सागर गाथा, 
मूलतत्व की जटिल है काथा।

परम ब्रह्म चिन्हित ना आशा, 
किंतु मैं तो रहा हीं प्यासा।  

मृगतृष्णा सा मंजर जग का,
अहंकार खंजर सम रग का।

अक्ष समक्ष है कंटक मग का, 
किन्तु मैं कंट भंजक पग का।

पोथी ज्ञान मन मंडित करता,
अभिमान चित्त रंजित करता।

जगत ज्ञान मन व्यंजित करता, 
आत्मज्ञान भ्रम खंडित करता।

हर क्षण हूँ मैं धन का लोभी,
चित्त का वसन है तन का भोगी।

ये भी सच अभिलाषी पद का ,
जानूं मद क्षण भंगुर जग का।

पद मद हेतु श्रम करता हूँ,
सर्व निरर्थक भ्रम करता हूँ।

जग में हूँ ना जग वैरागी ,
पर जग भ्रम खंडन का रागी।

देहाशक्त मैं ना हूँ त्यागी,
परम तत्व का पर अनुरागी।

अजय अमिताभ सुमन 

Saturday, November 11, 2023

मृदा मात्र गुबार नहीं हूँ

पंचमहाभूत सार नहीं हूँ, 
मृदा मात्र गुबार नहीं हूँ।

माता गर्भाशय अभ्यन्तर,
भ्रूण स्थापित रहा निरंतर।

झूले में मैं हीं खिलता था, 
कदम बढ़ाते गिर पड़ता था। 

मुझमें हीं थी हँसी ठिठोली,
बाल्य काल के वो हमजोली।

मैं हीं तो था तरुणाई में,
यौवन की उस अंगड़ाई में। 

दिवा स्वप्न मन को आते थे,
उड़न खटोले तन भाते थे।

प्रौढ़ उम्र में तन के ताने,
बुढ़ापे में शकल ठिकाने।

बचपन से पचपन तक अबतक,
बदल रहा तन मेरा अबतक।

भ्रूण वृद्ध मन का सपना है,
रूप रंग तन का गहना है।

ये तन मन हीं मात्र नहीं हूँ,
बदल रहा जो गात्र नहीं हूँ।

तन मन से अति दूर तदनंतर,
मैं अबदला रहा अनंतर।

अजय अमिताभ सुमन 

Saturday, November 4, 2023

अनुसंधान सत का

कलतक जो जीवन जाना था,
है जीवन क्या अनजाना था। 
छद्म तथ्य  से  लड़ते लड़ते,
पथ  अन्वेषण  करते करते,
दिवस साल अतीत हुए कब,
हफ्ते मास व्यतीत  हुए जब,
जाना जो अब तक जाना था,
वो सत ना था पहचाना  था।
इस जग का तो कथ्य यही है,
जग  अंतर  नेपथ्य यही है,
जिसकी यहाँ प्रतीति होती ,
ह्रदय रूष्ट कभी प्रीति होती।
नयनों को  दिखता जो पग में,
कहाँ कभी टिकता वो जग में।
जग परिलक्षित बस माया है,
स्वप्न दृश्य सम भ्रम काया है,
मरू  में  पानी  दृष्टित  जैसे,
चित्त  में  सृष्टि  सृष्टित  वैसे,
जग भ्रम है अनुमान हो कैसे?
सत का  अनुसंधान  हो कैसे?

अजय अमिताभ सुमन 

Sunday, October 29, 2023

गर भिन्नता स्वीकार ना हो


क्या भला हो देश का गर भिन्नता स्वीकार ना हो।

देश के उत्थान में व्यवधान है बाधा गरीबी।

धर्म जाति भिन्नता ना , विघ्न है ब्याधा गरीबी।

किन्तु इसका ज्ञान हो हाँ ,मेधा का अपमान हो ना।

धर्म जाति  प्रान्त आदि , एकता प्रतिमान हों हाँ।

ज्ञान, बुद्धि, प्रज्ञा शुद्धि, आ सभी में हम जगाएँ।

सूत्र हो अभिन्नता का ,साथ डग मिलकर बढ़ाएँ।   

इस वतन के देशवासी, प्रांत भिन्न वेश भाषा भाषी,

रूप जाति रंग भिन्न अब आ कहें पर एक हैं सब?

धर्म जाति तोड़ने का अब यहाँ हथियार ना हो।

क्या भला हो देश का गर भिन्नता स्वीकार ना हो।


अजय अमिताभ सुमन

Saturday, October 21, 2023

स्वीकारोक्ति :एक राजपूत की:

निज जाति गुणगान ये सारा ,
क्यूं कर मैंने ना स्वीकारा।
राजपूत हूं बात सही है, 
पर मुझमें वो बात नही है।

क्या वीर थे वो सेनानी, 
क्षत्रियों की अमिट कहानी।
महाराणाप्रताप कुंवरसिंह 
क्या थे योद्धा स्वअभिमानी।

प्रभु राम जीवन अध्याय , 
प्राण जाय पर वचन न जाय।
आज समय की मांग नहीं है 
सत्यनिष्ठ कोई बन पाय।

शोणित में अंगार नहीं है 
सीने में हुंकार नहीं है।
राजपूत के वचनों में जो 
होता था वो धार नहीं है।

नियति का जो कालचक्र है 
सर्वप्रथम अब हुआ अर्थ है।
वर्तमान की चाह अलग कि 
शौर्य पराक्रम वृथा व्यर्थ है।

निज वाणी पर टिक रह जाना 
आज समय की मांग नहीं है।
वादे पर हीं मर मिट जाना, 
आज समय की मांग नहीं है।

आज वक्त कहता ये मुझसे , 
शत्रु मित्र की बात नहीं है।
एक आचरण श्रेयकर अब तो,
अर्थ संचयन बात सही है।

अर्थ संचयन करता रहता , 
निज वादे पे टिके न रहता।
राजपूत जो धारण करते 
ओज तेज ना रहा हमारा।
निज जाति सम्मान था प्यारा, 
पर इसकारण ना स्वीकारा।

अजय अमिताभ सुमन

Saturday, October 14, 2023

काम,क्रोध,भोग आदि मोक्ष भी परमार्थ है

काम,क्रोध,भोग आदि मोक्ष भी परमार्थ है


कृष्ण में अभिव्यक्ति है शक्ति की भक्ति की,

कर्म से आसक्ति तो फल से भी विरक्ति की।

राधा के कान्हा तो शकुनि के छलिया हैं,

काल दुर्योधन के  मुरली के रसिया हैं। 

कल्मष विकर्म आदि पातक प्रतिकूल वो,

धर्म कर्म मर्म  आदि जिनके अनुकूल हो।

सृष्टि की क्रिया प्रतिक्रिया के चक्र हैं,

सृष्टि के कर्ता भी कारक पर अक्र हैं।

साम,दाम,दंड, भेद ,विषदंत आवेग आदि,

लोभ का संवेग ना हीं मोह संवेग व्याधि।

युद्ध हो समक्ष गर जो शस्त्रों में दक्ष हैं,

पक्ष ना विपक्ष में ना कोई समकक्ष है।

आगत जो काल भी है , काल जो व्यतीत भी,

चल रहा जो आज भी है , गुजरा अतीत भी।

मन की चंचलता में, चित्त के अवधारण में,

सृष्टि की सृजना  संरक्षण  संहारण में।

रूप रंग देह धारी दृश्य दृष्टित भिन्न वो,

सृष्टि की भिन्नता से भिन्न अवच्छिन्न वो।

कृष्ण सर्व सत्व आदि  तत्व अनेकार्थ हैं,

काम,क्रोध,भोग आदि मोक्ष भी परमार्थ है।      


अजय अमिताभ सुमन 

Saturday, October 7, 2023

तेरा यूं मुकर जाना

 होगा क्या मुकरोगे,तुम जो किसी बात पे?

बिगड़ेगा तेरा क्या इतनी सी बात पे?

कहते तो ठीक हो पर याद जभी आओगे,

जेहन में बरबस बरबाद याद आओगे।

याद रह जायेगा ,तेरा यूँ बदलना,

कि करके वो वादा, वादे पे मुकरना।

किया किसपे भरोसा ये शिकवा रहेगा,

इस खोटे से रिश्ते झूठे से जज्बात पे।

गर ना सुधर जाते हो इतनी सी बाते पे,

गर तुम मुकर जाते हो इतनी सी बाते पे। 


अजय अमिताभ सुमन 

Saturday, September 30, 2023

इम्तिहान

इम्तिहान


खुदा ये तू भी तेरा जहान क्या है? 

सफर ये कैसा तेरा इम्तिहान क्या हैं? 

कि दुनिया भी है तेरी और बंदे भी तेरे, 

और पूछते तुझीसे  पहचान क्या है? 


अजय अमिताभ सुमन 

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