Saturday, June 25, 2022

वर्तमान से वक्त बचा लो तुम निज के निर्माण में[द्वितीय भाग]

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धर्म ग्रंथों के प्रति श्रद्धा का भाव रखना सराहनीय  हैं। लेकिन इन धार्मिक ग्रंथों के प्रति वैसी श्रद्धा का क्या महत्व जब आपके व्यवहार इनके द्वारा सुझाए गए रास्तों के अनुरूप नहीं हो? आपके धार्मिक ग्रंथ मात्र पूजन करने के निमित्त नहीं हैं? क्या हीं अच्छा हो कि इन ग्रंथों द्वारा सुझाए गए मार्ग का अनुपालन कर आप स्वयं हीं श्रद्धा के पात्र बन जाएं। प्रस्तुत है मेरी कविता "वर्तमान से वक्त बचा लो तुम निज के निर्माण में" का द्वितीय भाग। 
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क्या रखा है वक्त गँवाने 
औरों के आख्यान में,
वर्तमान से वक्त बचा लो 
तुम निज के निर्माण में।
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धर्मग्रंथ के अंकित अक्षर 
परम सत्य है परम तथ्य है,
पर क्या तुम वैसा कर लेते 
निर्देशित जो धरम कथ्य है?
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अक्षर के वाचन में क्या है 
तोते जैसे गान में?
वर्तमान से वक्त बचा लो 
तुम निज के निर्माण में।
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दिनकर का पूजन करने से 
तेज नहीं संचित होता ,
धर्म ग्रन्थ अर्चन करने से 
अक्ल नहीं अर्जित होता।
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मात्र बुद्धि की बात नहीं 
विवर्द्धन कर निज ज्ञान में,
वर्तमान से वक्त बचा लो 
तुम निज के निर्माण में।
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जिस ईश्वर की करते बातें 
देखो सृष्टि रचने में,
पुरुषार्थ कितना लगता है 
इस जीवन को गढ़ने में।
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कुछ तो गरिमा लाओ निज में 
क्या बाहर गुणगान में?
वर्तमान से वक्त बचा लो 
तुम निज के निर्माण में। 
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क्या रखा है वक्त गँवाने 
औरों के आख्यान में,
वर्तमान से वक्त बचा लो 
तुम निज के निर्माण में।
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अजय अमिताभ सुमन
सर्वाधिकार सुरक्षित 

Saturday, June 18, 2022

वर्तमान से वक्त बचा लो तुम निज के निर्माण में[प्रथम भाग]


अपनी समृद्ध ऐतिहासिक विरासत पर नाज करना किसको अच्छा नहीं लगता? परंतु इसका क्या औचित्य जब आपका व्यक्तित्व आपके पुरखों के विरासत से मेल नहीं खाता हो। आपके सांस्कृतिक विरासत आपकी कमियों को छुपाने के लिए तो नहीं बने हैं। अपनी सांस्कृतिक विरासत का महिमा मंडन करने से तो बेहतर ये हैं कि आप स्वयं पर थोड़ा श्रम कर उन चारित्रिक ऊंचाइयों को छू लेने का प्रयास करें जो कभी आपके पुरखों ने अपने पुरुषार्थ से छुआ था। प्रस्तुत है मेरी कविता "वर्तमान से वक्त बचा लो तुम निज के निर्माण में" का प्रथम भाग। 

वर्तमान से वक्त बचा लो 
तुम निज के निर्माण में
[प्रथम भाग]
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क्या रखा है वक्त गँवाने 
औरों के आख्यान में,
वर्तमान से वक्त बचा लो 
तुम निज के निर्माण में।
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पूर्व अतीत की चर्चा कर 
क्या रखा गर्वित होने में?
पुरखों के खड्गाघात जता 
क्या रखा हर्षित होने में?
भुजा क्षीण तो फिर क्या रखा 
पुरावृत्त अभिमान में?
वर्तमान से वक्त बचा लो 
तुम निज के निर्माण में।
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कुछ परिजन के सुरमा होने 
से कुछ पल हीं बल मिलता,
निज हाथों से उद्यम रचने 
पर अभिलाषित फल मिलता।
करो कर्म या कल्प गवां 
उन परिजन के व्याख्यान में,
वर्तमान से वक्त बचा लो 
तुम निज के निर्माण में।
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दूजों से निज ध्यान हटा 
निज पे थोड़ा श्रम कर लेते,
दूजे कर पाये जो कुछ भी 
क्या तुम वो ना वर लेते ?
शक्ति, बुद्धि, मेधा, ऊर्जा 
ना कुछ कम परिमाण में।
वर्तमान से वक्त बचा लो 
तुम निज के निर्माण में।
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क्या रखा है वक्त गँवाने 
औरों के आख्यान में,
वर्तमान से वक्त बचा लो 
तुम निज के निर्माण में।
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अजय अमिताभ सुमन:
सर्वाधिकार सुरक्षित 

Saturday, June 11, 2022

दुर्योधन कब मिट पाया:भाग-38

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कौरव सेना को एक विशाल बरगद सदृश्य रक्षण प्रदान करने वाले गुरु द्रोणाचार्य का जब छल से वध कर दिया गया तब कौरवों की सेना में निराशा का भाव छा गया। कौरव पक्ष के महारथियों के पाँव रण क्षेत्र से उखड़ चले। उस क्षण किसी भी महारथी में युद्ध के मैदान में टिके रहने की क्षमता नहीं रह गई थी । शल्य, कृतवर्मा, कृपाचार्य, शकुनि और स्वयं दुर्योधन आदि भी भयग्रस्त हो युद्ध भूमि छोड़कर भाग खड़े हुए। सबसे आश्चर्य की बात तो ये थी कि महारथी कर्ण भी युद्ध का मैदान छोड़ कर भाग खड़ा हुआ।
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धरा   पे   होकर   धारा शायी 
गिर पड़ता जब  पीपल  गाँव,
जीव  जंतु  हो  जाते ओझल 
तज  के इसके  शीतल छाँव।
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जिस तारिणी के बल पे केवट
जलधि   से   भी   लड़ता   है,
अगर  अधर में छिद  पड़े  हों 
कब  नौ चालक   अड़ता  है?
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जिस योद्धक के शौर्य  सहारे
कौरव   दल  बल   पाता  था,
साहस का वो स्रोत तिरोहित
जिससे   सम्बल  आता  था।
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कौरव  सारे  हुए थे  विस्मित 
ना  कुछ क्षण को सोच सके,
कर्म  असंभव  फलित  हुआ 
मन कंपन  निःसंकोच  फले। 
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रथियों के सं  युद्ध त्याग  कर 
भाग    चला    गंधार     पति,
शकुनि का तन कंपित भय से 
आतुर   होता    चला   अति। 
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वीर  शल्य  के  उर  में   छाई 
सघन भय और गहन निराशा,
सूर्य पुत्र  भी  भाग  चला  था 
त्याग पराक्रम धीरज  आशा।
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द्रोण के सहचर  कृपाचार्य के 
समर  क्षेत्र  ना   टिकते  पाँव,
हो  रहा   पलायन   सेना  का 
ना दिख पाता था  कोई ठाँव।
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अश्व   समर    संतप्त    हुए  
अभितप्त हो चले रण  हाथी,
कौरव के प्रतिकूल बह चली 
रण  डाकिनी ह्रदय  प्रमाथी।
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अजय अमिताभ सुमन
सर्वाधिकार सुरक्षित 

Saturday, June 4, 2022

मेरे गाँव में होने लगा है शामिल थोड़ा शहर[द्वितीय भाग]


हाल फिलहाल में मेरे द्वारा  की गई मेरे गाँव की यात्रा के दौरान मेने जो  बदलाहट अपने गाँव की फिजा में देखी , उसका काव्यात्मक वर्णन मेने अपनी कविता "मेरे गाँव में होने लगा है शामिल थोड़ा शहर" के प्रथम भाग में की थी। ग्रामीण इलाकों के शहरीकरण के अपने फायदे हैं तो कुछ नुकसान भी। जहाँ गाँवों में इंफ्रास्ट्रक्चर बेहतर हो रहा है, छोटी छोटी  औद्योगिक इकाइयाँ बढ़ रही हैं, यातायात के बेहतर संसाधन उपलब्ध हो रहे हैं तो दूसरी ओर शहरीकरण के कारण ग्रामीण इलाको में जल की कमी, वायु प्रदुषण, ध्वनि प्रदूषण आदि सारे दोष जो कि शहरों में पाया जाता है , ग्रामीण इलाकों में भी पाया जाने लगा है , और मेरा गाँव भी इसका अपवाद नहीं रहा। शहरीकरण के परिणामों  को रेखांकित करती हुई प्रस्तुत है मेरी इस कविता "मेरे गाँव में होने लगा है शामिल थोड़ा शहर" का द्वितीय भाग।
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मेरे गाँव में होने लगा है 
शामिल थोड़ा शहर
[द्वितीय  भाग]
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मेरे गाँव में होने लगा है  
शामिल थोड़ा शहर,
फ़िज़ा में बढ़ता धुँआ है 
और थोड़ा सा जहर।
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हर गली हर नुक्कड़ पे 
खड़खड़ आवाज  है,
कभी शांति जो छाती थी 
आज बनी ख्वाब है।
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जल शहरों की आफत  
देहात का भी कहर,
मेरे गाँव में होने लगा है  
शामिल थोड़ा शहर।
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जो कुंओं से कूपों  से  
मटकी भर लाते थे,
जो खेतों में रोपनी  के  
वक्त गुनगुनाते थे।
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वो ही  तोड़ रहे पत्थर  
दिन रात सारे  दोपहर, 
मेरे गाँव में होने लगा है  
शामिल  थोड़ा शहर।
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भूँजा सत्तू ना लिट्टी ना 
चोखे की दुकान है,
पेप्सी कोला हीं मिलते 
जब आते मेहमान हैं।
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मजदूर हो किसान हो 
या कि हो खेतिहर ,
मेरे गाँव में होने लगा है  
शामिल थोड़ा शहर।
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आँगन की तुलसी अब  
सुखी है काली है,
है उड़हुल में जाले ना  
गमलों में लाली है।
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केला भी झुलसा सा  
ईमली भी कटहर ,
मेरे गाँव में होने लगा है  
शामिल  थोड़ा शहर।
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बच्चे सब छप छप कर  
पोखर में गाँव,
खेतिहर के खेतों में      
नचते थे पाँव।
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अब नदिया भी सुनी सी  
पोखर भी नहर,
मेरे गाँव में होने लगा है  
शामिल  थोड़ा शहर।
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विकास का असर क्या है   
ये भी है जाना, 
बिक गई मिट्टी बन    
ईट ये पहचाना,
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पक्की हुई मड़ई   
गायब हुए हैं खरहर ,
मेरे गाँव में होने लगा है  
शामिल थोड़ा शहर।
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फ़िज़ा में बढ़ता धुँआ है 
और थोड़ा सा जहर,
मेरे गाँव में होने लगा है  
शामिल थोड़ा शहर।
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अजय अमिताभ सुमन:
सर्वाधिकार सुरक्षित 
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Saturday, May 28, 2022

दुर्योधन कब मिट पाया:भाग:37

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महाभारत युद्ध के समय द्रोणाचार्य की उम्र लगभग चार सौ साल की थी। उनका वर्ण श्यामल था, किंतु सर से कानों तक छूते दुग्ध की भाँति श्वेत केश उनके मुख मंडल की शोभा बढ़ाते थे। अति वृद्ध होने के बावजूद वो युद्ध में सोलह साल के तरुण की भांति हीं रण कौशल का प्रदर्शन कर रहे थे। गुरु द्रोण का पराक्रम ऐसा था कि उनका वध ठीक वैसे हीं असंभव माना जा रहा था जैसे कि सूरज का धरती पर गिर जाना, समुद्र के पानी का सुख जाना। फिर भी जो अनहोनी थी वो तो होकर हीं रही। छल प्रपंच का सहारा लेने वाले दुर्योधन का युद्ध में साथ देने वाले गुरु द्रोण का वध छल द्वारा होना स्वाभाविक हीं था।
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उम्र चारसौ श्यामलकाया
शौर्योगर्वित उज्ज्वल भाल,
आपाद मस्तक दुग्ध दृश्य
श्वेत प्रभा समकक्षी बाल।
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वो युद्धक थे अति वृद्ध पर
पांडव जिनसे चिंतित थे,
गुरुद्रोण सेअरिदल सैनिक
भय से आतुर कंपित थे।
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उनको वधना ऐसा जैसे
दिनकर धरती पर आ जाए,
सरिता हो जाए निर्जल कि
दुर्भिक्ष मही पर छा जाए।
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मेरुपर्वत दौड़ पड़े अचला
किंचित कहीं इधर उधर,
देवपति को हर ले क्षण में
सूरमा कोई कहाँ किधर?
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ऐसे हीं थे द्रोणाचार्य रण
कौशल में क्या ख्याति थी,
रोक सके उनको ऐसे कुछ
हीं योद्धा की जाति थी।
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शूरवीर कोई गुरु द्रोण का
मस्तक मर्दन कर लेगा,
ना कोई भी सोच सके
प्रयुत्सु गर्दन हर लेगा।
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किंतु जब स्वांग रचा द्रोण
का मस्तक भूमि पर लाए,
धृष्टद्युम्न हर्षित होकर जब
समरांगण में चिल्लाए।
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पवनपुत्र जब करते थे रण
भूमि में चंड अट्टाहस,
पांडव के दल बल में निश्चय
करते थे संचित साहस।
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गुरु द्रोण के जैसा जब
अवरक्षक जग को छोड़ चला,
जो अपनी छाया से रक्षण
करता था मग छोड़ छला।
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तब वो ऊर्जा कौरव दल में
जो भी किंचित छाई थी,
द्रोण के आहत होने से
निश्चय अवनति हीं आई थी।
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अजय अमिताभ सुमन
सर्वाधिकार सुरक्षित

Saturday, May 21, 2022

मेरे गाँव में होने लगा है शामिल थोड़ा शहर" का प्रथम भाग


इस सृष्टि में कोई भी वस्तु  बिना कीमत के नहीं आती, विकास भी नहीं। अभी कुछ दिन पहले एक पारिवारिक उत्सव में शरीक होने के लिए गाँव गया था। सोचा था शहर की दौड़ धूप वाली जिंदगी से दूर एक शांति भरे माहौल में जा रहा हूँ। सोचा था गाँव के खेतों में हरियाली के दर्शन होंगे। सोचा था सुबह सुबह मुर्गे की बाँग सुनाई देगी, कोयल की कुक और चिड़ियों की चहचहाहट  सुनाई पड़ेगी। आम, महुए, अमरूद और कटहल के पेड़ों पर उनके फल दिखाई पड़ेंगे। परंतु अनुभूति इसके ठीक विपरीत हुई। शहरों की प्रगति का असर शायद गाँवों पर पड़ना शुरू हो गया है। इस कविता के माध्यम से मैं अपनी इन्हीं अनुभूतियों को साझा कर रहा हूँ।
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मेरे गाँव में होने लगा है,
शामिल थोड़ा शहर,
फ़िज़ा में बढ़ता धुँआ है ,
और थोड़ा सा जहर।
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मचा हुआ है सड़कों  पे ,
वाहनों का शोर,
बुलडोजरों की गड़गड़ से,
भरी हुई भोर।
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अब माटी की सड़कों पे ,
कंक्रीट की नई लहर ,
मेरे गाँव में होने लगा है,
शामिल थोड़ा शहर।
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मुर्गे के बांग से होती ,
दिन की शुरुआत थी,
तब घर घर में भूसा था ,
भैसों की नाद थी।
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अब गाएँ भी बछड़े भी ,
दिखते ना एक प्रहर, 
मेरे गाँव में होने लगा है ,
शामिल थोड़ा शहर।
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तब बैलों के गर्दन में ,
घंटी गीत गाती थी ,
बागों में कोयल तब कैसा ,
कुक सुनाती थी।
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अब बगिया में कोयल ना ,
महुआ ना कटहर,  
मेरे गाँव में होने लगा है ,
शामिल थोड़ा शहर।
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पहले सरसों के दाने सब ,
खेतों में छाते थे,
मटर की छीमी पौधों में ,
भर भर कर आते थे।
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अब खोया है पत्थरों में ,
मक्का और अरहर,
मेरे गाँव में होने लगा है  ,
शामिल थोड़ा शहर।
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महुआ के दानों  की  ,
खुशबू  की बात  क्या,
आमों के मंजर वो ,
झूमते दिन रात क्या।
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अब सरसों की कलियों में ,
गायन ना वो लहर,
मेरे गाँव में होने लगा है  ,
शामिल थोड़ा शहर।
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वो पानी में छप छप ,
कर  गरई पकड़ना , 
खेतों के जोतनी में,
हेंगी  पर   चलना।
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अब खेतों के रोपनी में ,
मोटर और  ट्रेक्टर,
मेरे गाँव में होने लगा है ,
शामिल थोड़ा शहर। 
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फ़िज़ा में बढ़ता धुँआ है ,
और थोड़ा सा जहर।
मेरे गाँव में होने लगा है,
शामिल थोड़ा शहर। 
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अजय अमिताभ सुमन
सर्वाधिकार सुरक्षित

Sunday, May 15, 2022

दुर्योधन कब मिट पाया:भाग-36



द्रोण को सहसा अपने पुत्र अश्वत्थामा की मृत्यु के समाचार पर विश्वास नहीं हुआ। परंतु ये समाचार जब उन्होंने धर्मराज के मुख से सुना तब संदेह का कोई कारण नहीं बचा। इस समाचार को सुनकर गुरु द्रोणाचार्य के मन में इस संसार के प्रति विरक्ति पैदा हो गई। उनके लिये जीत और हार का कोई मतलब नहीं रह गया था। इस निराशा भरी विरक्त अवस्था में गुरु द्रोणाचार्य  ने अपने अस्त्रों और शस्त्रों  का त्याग कर दिया और  युद्ध के मैदान में ध्यानस्थ होकर बैठ गए। आगे क्या हुआ देखिए मेरी दीर्घ कविता दुर्योधन कब मिट पाया के छत्तीसवें भाग में।

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भीम के हाथों मदकल,
अश्वत्थामा मृत पड़ा, 
धर्मराज ने  झूठ कहा,
मानव या कि गज मृत पड़ा।
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और कृष्ण ने उसी वक्त पर ,
पाञ्चजन्य  बजाया  था,
गुरु द्रोण को धर्मराज ने  ,
ना कोई सत्य बताया था।
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अर्द्धसत्य भी  असत्य से ,
तब घातक  बन जाता है,
धर्मराज जैसों की वाणी से ,
जब छन कर आता है।
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युद्धिष्ठिर के अर्द्धसत्य  को ,
गुरु द्रोण ने सच माना,
प्रेम पुत्र से करते थे कितना ,
जग ने ये पहचाना।
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होता  ना  विश्वास कदाचित  ,
अश्वत्थामा  मृत पड़ा,
प्राणों से भी जो था प्यारा ,
यमहाथों अधिकृत पड़ा।
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मान पुत्र  को मृत द्रोण का  ,
नाता जग से छूटा था,
अस्त्र शस्त्र त्यागे  थे वो ना ,
जाने  सब ये झूठा था।
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अगर पुत्र इस धरती पे  ना ,
युद्ध जीतकर क्या होगा,
जीवन का भी मतलब कैसा ,
हारजीत का क्या होगा?
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यम के द्वारे हीं जाकर किंचित ,
मैं फिर मिल पाऊँगा,
शस्त्र  त्याग कर बैठे शायद ,
मर कामिल हो पाऊँगा।
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धृष्टदयुम्न  के हाथों  ने  फिर  ,
कैसा वो  दुष्कर्म  रचा,
गुरु द्रोण को वधने में ,
नयनों  में ना कोई शर्म  बचा।
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शस्त्रहीन ध्यानस्थ द्रोण का ,
मस्तकमर्दन कर छल से,
पूर्ण किया था कर्म  असंभव ,
ना कर पाता जो बल से।
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अजय अमिताभ सुमन
सर्वाधिकार सुरक्षित

Saturday, May 7, 2022

अखबार-ए-खास

समाज के बेहतरी की दिशा में आप कोई कार्य करें ना करे परन्तु कार्य करने के प्रयासों का प्रचार जरुर करें। आपके झूठे वादों , भ्रमात्मक वायदों , आपके  प्रयासों की रिपोर्टिंग अखबार में होनी चाहिए। समस्या खत्म करने की दिशा में गर कोई करवाई ना की गई हो तो राह में आने वाली बाधाओं का भान आम जनता को कराना बहुत जरुरी है। आपके कार्य बेशक हातिमताई की तरह नहीं हो लेकिन आपके चाहनेवालों की नजर में आपको हातिमताई बने हीं रहना है।  कुल मिलाकर ये कहा जा सकता है कि सारा मामला मार्केटिंग का रह गया है । जो अपनी  बेहतर ढंग से मार्केटिंग कर पाता है वो ही सफल हो पाता है, फिर चाहे वो राजनीति हो या कि व्यवसाय।
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वाह भैया क्या बात हो गए, 
अखबार-ए-सरताज हो गए।
कल तक भईया फूलचंद थे, 
आज हातिम के बाप हो गए।
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गढ्ढे में हीं रोड पड़ा था, 
पानी बदबू सड़ा पड़ा था,
नाली से पानी जो बहता ,
सड़कों पे सलता हीं रहता। 
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चलना मुश्किल हुआ बड़ा था, 
भईया को ना फिक्र पड़ा था।
नाक दबा के भईया चलते, 
पानी से बच बच कर रहते।
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पर चुनाव के दिन जब आते, 
कचड़े भईया के मन भाते,
टोपी धर सर हाथ कुदाल , 
जर्नलिस्ट लाते तत्काल ।
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झाड़ू वाड़ू लगा लगा के, 
कूड़े कचड़े हटा हटा के,
खुर्पी वुर्पी चला चला के, 
ठीक पोज़ में दिखा दिखा के।
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फ़ोटो खूब खिचाते भईया, 
सबपे छा जाते तब भईया,
पंद्रह लाख दे देंगे पैसे , 
फ्री वाई फाई के हीं जैसे,
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रोजगार की बातें करते, 
झाड़ू जाके चौक लगाते।
वादे कर आते फिर ऐसे,
जनता के मन भाते वैसे। 
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अपने मन की बात बताते,
अखबारों में न्यूज़ छपाते ।
सपने सब्ज दिखलाते भईया , 
जनता को भरमाते भईया,
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अच्छे हैं भईया जतलाकर ,
पार्टी को ये सब दिखलाकर।
जन प्रत्याशी  खास हो गए, 
वाह भैया क्या बात हो गए।
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अखबार-ए-सरताज हो गए, 
कल तक भईया फूलचंद थे,
आज हातिम के बाप हो गए, 
वाह भैया क्या बात हो गए।
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अजय अमिताभ सुमन:
सर्वाधिकार सुरक्षित

Saturday, April 30, 2022

दुर्योधन कब मिट पाया:भाग:35


किसी व्यक्ति के जीवन का लक्ष्य जब मृत्यु के निकट पहुँच कर भी पूर्ण  हो जाता है  तब उसकी  मृत्यु उसे ज्यादा परेशान नहीं कर पाती। अश्वत्थामा भी दुर्योधनको एक शांति पूर्ण  मृत्यु  प्रदान  करने  की  ईक्छा से उसको स्वयं  द्वारा  पांडवों के मारे जाने का समाचार  सुनाता है, जिसके  लिए दुर्योधन ने आजीवन कामना की  थी । युद्ध भूमि में   घायल   पड़ा    दुर्योधन   जब  अश्वत्थामा के मुख से पांडवों के  हनन की बात सुनता है तो  उसके  मानस   पटल  पर सहसा अतित के वो  दृश्य  उभरने लगते हैं जो गुरु द्रोणाचार्य के वध होने के वक्त घटित हुए थे।  अब आगे क्या हुआ , देखते हैं मेरी दीर्घ कविता "दुर्योधन कब मिट पाया" के इस 35 वें भाग में।   
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जिस मानव का सिद्ध मनोरथ
मृत्यु     क्षण      होता    संभव, 
उस मानव का हृदय आप्त ना
हो   होता        ये      असंभव। 
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ना   जाने किस   भाँति आखिर
पूण्य   रचा    इन  हाथों       ने ,
कर्ण   भीष्म  न  कर  पाए  वो
कर्म   रचा    निज     हाथों ने।
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मुझको भी विश्वास ना होता
है  पर   सच    बतलाता  हूँ,
जिसकी   चिर   प्रतीक्षा  थी
तुमको  वो बात सुनाता  हूँ।
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तुमसे  पहले  तेरे  शत्रु का 
शीश विच्छेदन कर धड़ से,
कटे मुंड  अर्पित  करता हूँ,
अधम शत्रु का निजकर से।
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सुन मित्र की बातें दुर्योधन के
मुख     पे    मुस्कान    फली,
मनो वांछित   सुनने  को   हीं
किंचित उसमें थी जान बची।
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कैसी  भी  थी  काया  उसकी  
कैसी   भी    वो    जीर्ण  बची ,
पर मन के अंतर तम  में  तो 
अभिलाषा  कुछ  क्षीण  बची।
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क्या  कर  सकता  अश्वत्थामा
कुरु  कुंवर  को   ज्ञात    रहा,
कैसे    कैसे    अस्त्र     शस्त्र  
अश्वत्थामा    को   प्राप्त  रहा।
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उभर   चले  थे  मानस पट पे
दृश्य   कैसे   ना    मन   माने ,
गुरु  द्रोण  के  वधने  में  क्या
धर्म  हुआ   था    सब   जाने।
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लाख  बुरा  था  दुर्योधन  पर 
सच  पे   ना   अभिमान रहा ,
धर्मराज  सा   सच पे सच में
ना  इतना    सम्मान    रहा।
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जो छलता था दुर्योधन पर
ताल थोक कर हँस हँस के,
छला गया छलिया के जाले
में उस दिन  फँस फँस  के।
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अजय अमिताभ सुमन
सर्वाधिकार सुरक्षित

Monday, April 25, 2022

किस राह के हो अनुरागी

 


ईश्वर किसी एक धर्म , किसी एक पंथ या किसी एक मार्ग का गुलाम नहीं। अपने धर्म को सर्वश्रेष्ठ मानने से ज्यादा अप्रासंगिक मान्यता कोई और हो हीं नहीं सकती । परम तत्व को किसी एक धर्म या पंथ में बाँधने की कोशिश करने वालों को ये ज्ञात होना चाहिए कि ईश्वर इतना छोटा नहीं है कि उसे किसी स्थान , मार्ग , पंथ , प्रतिमा या किताब में बांधा जा सके। वास्तविकता तो ये है कि ईश्वर इतना विराट है कि कोई किसी भी राह चले सारे के सारे मार्ग उसी की दिशा में अग्रसित होते हैं।


किस राह के हो अनुरागी ,
देहासक्त हो या कि त्यागी?
जीवन का क्या हेतु परंतु ,
चित्त में इसका भान रहे ,
किंचित कोई परिणाम रहे,
किंचित कोई परिणाम रहे।

है प्रयास में अणुता तो क्या,
ना राह में ऋजुता तो क्या?
प्रभु की अभिलाषा में किंतु ,
ना हो लघुता ध्यान रहे ,
किंचित कोई परिणाम रहे,
किंचित कोई परिणाम रहे।

कितनी प्रज्ञा धूमिल हुई है ?
अंतस्यंज्ञा घूर्मिल हुई है ?
अंतर पथ अवरोध पड़ा ,
कैसा किंतु अनुमान रहे ,
किंचित कोई परिणाम रहे,
किंचित कोई परिणाम रहे।

बुद्धि शुद्धि या तय कर लो ,
वाक्शुद्धि चित्त लय कर लो ,
दिशा भ्रांत हो बैठो ना मन,
संशुद्धि संधान रहे ,
किंचित कोई परिणाम रहे,
किंचित कोई परिणाम रहे।

कर्मयोग कहीं राह सही है ,
भक्ति की कहीं चाह बड़ी है,
जिसकी जैसी रही प्रकृत्ति ,
वैसा हीं निदान रहे।
किंचित कोई परिणाम रहे,
किंचित कोई परिणाम रहे।

अजय अमिताभ सुमन:
सर्वाधिकार सुरक्षित

Sunday, April 17, 2022

सत्य भाष

सत्य भाष पर जब भी मानव,
देता रहता अतुलित जोर।
समझो मिथ्या हुई है हावी,
और हुआ है सत कमजोर।

अजय अमिताभ सुमन

Friday, April 15, 2022

क्यों सत अंतस दृश्य नहीं

सृष्टि के कण कण में व्याप्त होने के बावजूद परम तत्व, ईश्वर  या सत , आप उसे जिस भी नाम से पुकार लें, एक मानव की अंतर दृष्टि में क्यों नहीं आता? सुख की अनुभूति प्रदान करने की सम्भावना से परिपूर्ण होने के बावजूद ये संसार , जो कि परम ब्रह्म से ओत प्रोत है , आप्त है ,व्याप्त है, पर्याप्त है, मानव को अप्राप्त क्यों है? सत जो कि मानव को आनंद, परमानन्द से ओत प्रोत कर सकता है, मानव के लिए संताप देने का कारण कैसे बन जाता है?  इस गूढ़ तथ्य पर विवेचन करती हुई  प्रस्तुत है मेरी कविता "क्यों सत अंतस दृश्य नहीं?"

क्यों सत अंतस दृश्य नहीं,
क्यों भव उत्पीड़क ऋश्य मही?   
कारण है जो भी सृष्टि में, 
जल, थल ,अग्नि या वृष्टि में।
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जो है दृष्टि में दृश्य मही, 
ना वो सत सम सादृश्य कहीं। 
ज्यों मीन रही है सागर में, 
ज्यों मिट्टी होती गागर में।
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ज्यों अग्नि में है ताप फला, 
ज्यों वायु में आकाश चला।
ज्यों कस्तूरी ले निज तन में, 
ढूंढे मृग इत उत घन वन में। 
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सत गुप्त कहाँ अनुदर्शन को, 
नर सुप्त किन्तु विमर्शन को।
अभिदर्शन का कोई भान नहीं, 
सत उद्दर्शन का ज्ञान नहीं।
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नीर भांति लब्ध रहा तन को,
पर ना उपलब्ध रहा मन को।
सत आप्त रहा ,पर्याप्त रहा, 
जगव्याप्त किंतु अनवाप्त रहा।
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ना ऐसा भी है कुछ जग में, 
सत से विचलित हो जो जग में।
सत में हीं सृष्टि दृश्य रही,
सत से कुछ भी अस्पृश्य नहीं।
.................
मानव ये जिसमे व्यस्त रहा,
कभी तुष्ट रुष्ट कभी त्रस्त रहा।
माया साया मृग तृष्णा थी, 
नर को ईक्छित वितृष्णा थी।
................. 
किस भांति माया को जकड़े , 
छाया को हाथों से पकड़े?
जो पार अवस्थित ईक्छा के, 
वरने को कैसी दीक्षा ले?
.................. 
मानव शासित प्रतिबिम्ब देख, 
किंतु सत सत है बिम्ब एक।
मानव दृष्टि में दर्पण है, 
ना अभिलाषा का तर्पण है।
..................
फिर सत परिदर्शन कैसे हो , 
दर्पण में क्या अभिदर्शन हो ?
इस भांति सत विमृश्य रहा, 
अपरिभाषित अदृश्य रहा।
...................
अजय अमिताभ सुमन: 
सर्वाधिकार सुरक्षित

Sunday, April 10, 2022

साँप की हँसी होती कैसी

जब देश के किसी हिस्से में हिंसा की आग भड़की हो , अपने हीं देश के वासी अपना घर छोड़ने को मजबूर हो गए हो  और जब अपने हीं देश मे पराये बन गए इन बंजारों की बात की जाए तो क्या किसी व्यक्ति के लिए ये हँसने या आलोचना करने का अवसर हो सकता है? ऐसे व्यक्ति को जो इन परिस्थितियों में भी विष वमन करने से नहीं चूकते  क्या इन्हें  सर्प की उपाधि देना अनुचित है ? ऐसे हीं महान विभूतियों के चरण कमलों में सादर नमन करती हुई प्रस्तुत है मेरी व्ययंगात्मक कविता "साँप की हँसी होती कैसी"?

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साँप की हँसी होती कैसी,
शोक मुदित पिशाच के जैसी।
जब देश पे दाग लगा हो,
रक्त पिपासु काग लगा हो।
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जब अपने हीं भाग रहे हो,
नर अंतर यम जाग रहे हो।
नारी के तन करते टुकड़े,
बच्चे भय से रहते अकड़े।
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जब अपने घर छोड़ के भागे,
बंजारे बन फिरे अभागे।
और इनकी बात चली तब,
बंजारों की बात चली जब।
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तब कोई जो हँस सकता हो,
विषदंतों से डंस सकता हो।
जिनके उर में दया नहीं हो,
ममता करुणा हया नहीं हो।
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जो नफरत की समझे भाषा,
पीड़ा में वोटों की आशा।
चंड प्रचंड अभिशाप के जैसी,
ऐसे नरपशु आप के जैसी।
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अजय अमिताभ सुमन
सर्वाधिकार सुरक्षित

Sunday, April 3, 2022

बुद्ध और आपमें कौन सही

भगवान बुद्ध और महात्मा गांधी आम लोगों के बीच अहिंसा का प्रचार करते थे। महात्मा गांधी ने एक बार कहा था कि जब कोई आपको थप्पड़ मारता है तो आप जवाबी कार्रवाई करने के बजाय आप अपना दूसरा गाल भी आगे कर दें। महात्मा गांधी प्रत्येक के भीतर वास करने वाले ईश्वर में दृढ़ता से विश्वास करते थे। उनका मानना था यदि आप अपने स्वयं के अहिंसक विश्वासों में विश्वास करते हैं तो आप अपने विरोधी को मित्र में बदल सकते हैं।

उनकी सत्य और अहिंसा की वाही नीति थी, जिसने पूरी भारतीय आबादी को झकझोर कर रख दिया और अंततः उन्होंने भारत की स्वतंत्रता के आन्दोलन का नेतृत्व किया। भगवान बुद्ध और गांधी जी नक्शे कदम पर चलना आज भी प्रासंगिक है? क्या दयालु और करुणावान बनकर आज भी किया जा सकता है ?

गौतम बुद्ध ने दिखाया कि कैसे प्रेम, दया और अहिंसा का मार्ग किसी व्यक्ति के हृदय को बदल सकता है। अंगुलिमाल एक क्रूर डाकू था। वह घने जंगल में रहता था और सभी आने जाने वालों को आतंकित किया करता था। वह अपने वन क्षेत्र में आने वाले सभी लोगों को लूटता था, और उन्हें मारकर उनकी उंगली काटकर माला में डाल देता था। उसके भय से लोगों ने उस क्षेत्र में यात्रा करना बंद कर दिया था ।

जब भगवान बुद्ध ने यह सुना तो उन्होंने उस वन में जाने का निश्चय किया जहां अंगुलिमाल ठहरा हुआ था । उनके सभी शिष्यों ने उन्हें उस क्षेत्र में प्रवेश करने से रोकने की कोशिश की जहां अंगुलिमाल रहता था , लेकिन बुद्ध ने उनकी बात नहीं मानी और जंगल के उस क्षेत्र में आगे बढ़ते रहे जहाँ पे अंगुलिमाल रहता था ।

जब अंगुलिमाल गौतम बुद्ध से मिला तो वो गौतम बुद्ध के व्यक्तित्व से निकले प्रेम और स्नेह की आभा से प्रभावित हुए बिना नहीं रह सका। उनकी मात्र उपस्थिति से अंगुलिमाल का हृदय बदल गया और उसने न केवल गौतम बुद्ध को नमन किया, बल्कि अपनी मृत्यु तक बुद्ध द्वारा सुझाए गए करुणा और प्रेम के मार्ग का अनुसरण किया।

महात्मा गांधी ने अपने पूरे जीवन में न केवल अहिंसा, प्रेम और करुणा का उपदेश दिया, बल्कि वे इसके जीवंत उदाहरण भी बने। समस्या यह है कि बुद्ध या गांधी द्वारा सुझाया गया मार्ग प्रशंसनीय तो है, लेकिन इसे अपने जीवन में अमल में लाना अत्यंत कठिन है।

एक सामान्य व्यक्ति के पास उतनी आध्यात्मिक ऊंचाई नहीं होती जितनी कि बुद्ध या गांधी की थी। उनमें एक अलग आभा थी। उनकी मौजूदगी ही किसी का भी दिल बदलने के लिए काफी थी। अहिंसा का मार्ग बुद्ध या गांधी जैसे व्यक्तियों पर लागू हो सकता है। लेकिन आम व्यक्ति के लिए क्या रास्ता है?

स्वामी रामकृष्ण परमहंस अपने शिष्यों की आध्यात्मिक आवश्यकताओं के आधार पर उनके साथ अलग व्यवहार करते थे। स्वामी प्रेमानंद बहुत मृदुभाषी थे और कभी भी किसी से बहस नहीं करते थे क्योंकि उन्होंने स्वामी रामकृष्ण परमहंस की इस शिक्षा को आत्मसात कर लिया था कि ईश्वर सबके हृदय में निवास करता है। प्रेमानंद ने कभी किसी को नाराज नहीं किया।

एक बार काली मंदिर में एक बिच्छू मिला । रामकृष्ण परमहंस ने प्रेमानंद को बुलवाकर बिच्छू को मारकर बाहर फेंकने का निर्देश दिया। परन्तु प्रेमानंद जी ने बिच्छू को जीवित छोड़ दिया और उसे घास में फेंक दिया। इससे रामकृष्ण क्रोधित हो गए। उन्होंने प्रेमानंद को सलाह दी कि यदि भगवान बिच्छू के रूप में प्रकट होते हैं, तो उनके साथ अलग तरह से व्यवहार किया जाना चाहिए। आप जहरीले सांपों और बिच्छुओं से प्यार नहीं कर सकते।

यह कहानी हमें सिखाती है कि संभावित खतरनाक स्थिति से कैसे निपटा जाए। जब कोई बाघ, शेर और सांपों से घिरे जंगल में फंसे हो, तो क्या अहिंसा और प्रेम का मार्ग चुन सकता है? अगर कोई बाघ, शेर और सांप से प्यार करने लगे तो उसका परिणाम क्या हो सकता है ये आसानी से समझा जा सकता है ।

सवाल ये नहीं है कि ये आदर्श जो की भगवान बुद्ध और महात्मा गाँधी जी द्वारा सुझाये गए अपने आप में उपयोगी है या नहीं ? सवाल ये है कि क्या ये आपके अध्यात्मिक और मानसिक विकास के लिए सहयोगी है ? क्या आप इन शिक्षाओं का अनुपालन करने में समर्थ है ?

महात्मा गांधी और गौतम बुद्ध की शिक्षाओं पर चलकर कोई अपना जीवन नहीं जी सकता। वे लोग ऐसी स्थिति में जीवित रह सकते थे क्योंकि उनकी आभा इतनी मजबूत थी कि ये जानवर भी बुद्ध को नुकसान पहुंचाने के लिए कुछ नहीं कर सकते थे।

ऐसा कहा जाता है कि महर्षि रमण बाघों के साथ रहते थे। उन्होंने सांपों से भी दोस्ती की। लेकिन, क्या एक सामान्य मनुष्य के लिए ऐसे गुण विकसित करना संभव है? अहिंसा, प्रेम और सहानुभूति के रास्ते पर चलना चाहिए, लेकिन सभी परिस्थितियों में नहीं, जैसा कि ये महान लोग चला करते हैं।

उन्होंने अपना समय ऐसी आध्यात्मिक ऊंचाइयों को विकसित करने और पोषित करने में लगाया। उस ऊंचाई तक पहुंचे बिना उनकी नकल करना खतरनाक है। बुद्ध के मार्ग को समझना सीखना चाहिए और जितना हो सके उस पर चलने का प्रयास करना चाहिए। लेकिन उसका अक्षरशः पालन तब तक नहीं करना चाहिए जब तक व्यक्ति उस शिखर पर नहीं पहुंच जाता।

Saturday, April 2, 2022

क्या क्या काम बताओगे तुम

मर्यादा पालन करने की शिक्षा लेनी हो तो प्रभु श्रीराम से बेहतर कोई उदाहरण नहीं हो सकता। कौन सी ऐसी मर्यादा थी जिसका पालन उन्होंने नहीं किया ? जनहित को उन्होंने  हमेशा निज हित सर्वदा उपर रखा। परंतु कुछ संस्थाएं उनके नाम का उपयोग निजस्वार्थ सिद्धि हेतू कर रही हैं। निजहित को जनहित के उपर रखना उनके द्वारा अपनाये गए आदर्शो के विपरीत है। राम नाम का उपयोग निजस्वार्थ सिद्धि हेतु करने की प्रवृत्ति  के विरुद्ध प्रस्तुत है मेरी कविता "क्या क्या काम बताओगे तुम"।

क्या क्या काम बताओगे तुम, 
राम नाम पे राम नाम पे?
अपना काम चलाओगे तुम, 
राम नाम पे राम नाम पे?
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डीजल का भी दाम बढ़ा है,
धनिया ,भिंडी भाव चढ़ा है।
कुछ तो राशन सस्ता कर दो ,
राम नाम पे, राम नाम पे।
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कहने को तो छोटी रोटी, 
पर खुद पर जब आ जाये।
सिंहासन ना चल पाता फिर , 
राम नाम पे राम नाम पे।
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पूजा भक्ति बहुत भली पर, 
रोजी रोटी काम दिखाओ।
क्या क्या  चुप कराओगे तुम ,
राम नाम पे राम नाम पे।
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माना जनता बहली जाती,
कुछ दिन काम चलाते जाओ।
पर कब तक तुम फुसलाओगे,
राम नाम पे राम नाम पे?
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अजय अमिताभ सुमन:
सर्वाधिकार सुरक्षित

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