Thursday, February 8, 2018

अन्ना का चूस लिया गन्ना



Photo Credit: 4.bp.blogspot.com


        पहली बात तो मैं ये बता दूँ , ना तो मैं केजरीवाल जी का विरोधी हूँ और  ना अन्ना जी का समर्थक ।एक बात ये भी बता दूँ की इस लेख का जो शीर्षक है उसका लेखक भी मैं नहीं । इस लेख का लेखक दरअसल एक ऑटो वाला है जिसने हाल ही में ये बात कही थी, मजाकिया अंदाज में ।

     खैर उसने ये बात "अन्ना का चूस लिया गन्ना" इस परिप्रेक्ष्य में कहा था कि केजरीवालजी ने अपने राजनैतिक कैरियर के लिए अन्नाजी का उपयोग किया , उनका इस्तेमाल किया , फिर उपयोग करके उन्हें फेंक दिया । ये बात मेरे जेहन में भीतर तक घुस गयी । उस ऑटो वाले की बात मुझे बार बार चुभ रही थी।

     एक एक करके मुझे वो सारी पुरानी बातें  याद आने लगी । वो रामलीला मैदान याद आने लगा जहाँ मेरे जैसे हजारों लोग अन्ना जी के नाम पे पहुंचे थे।भींगते हुए पानी में अन्नाजी का घंटों तक अन्नाजी इन्तेजार किया था। यहाँ तक की मेरा सैमसंग का महँगा मोबाइल भी पानी में भींग कर खराब हो गया था। समकालीन सरकार के विरुद्ध जबरदस्त गुस्सा था मन में । अन्ना जी को जबरदस्ती तिहाड़ जेल में  डाल दिया।


     ये बात हम सब लोगों को आश्चर्य चकित कर रही थी कि एक बुढा आदमी देश के हितों की रक्षा के लिए इतने दिनों से भूखा पड़ा था। 

उन दिनों हमलोग अन्नाजी और किरण बेदी जी के नाम से हीं पहुंचे थे।केजरीवाल जी को कोई नहीं जान रहा था।कुमार विश्वास की कविताएँ हमें आंदोलित कर रही थी।

     अन्नाजी के उपवास के दबाव में पार्लियामेंट का सेशन बुलाया गया। मुझे ये भी याद आया कि कैसे अन्नाजी को जेल भेजा गया और कैसे अन्नाजी के समर्थन में सारा देश जाग उठा था ।देश का कोना कोना अन्नाजी क़ी ताकत क़ी दुहाई दे रहा था। लोकपाल की बाते चल रही थीं ।अन्नाजी में गांधीजी क़ी झलक दिखाई पड़ रही थी ।चारो तरफ "मैं भी अन्ना , तू भी अन्ना " कि आवाजें चल रही थी । फिर कैसे आम आदमी पार्टी की स्थापना की गयी । कैसे अरविन्द केजरीवाल जी ने अन्ना जी के असहमति के बावजूद आम आदमी पार्टी के स्थापना की घोषणा कर दी। घोषणा के वक्त मैं भी मौजूद था जंतर मंतर पे।

     लोगों को एक राजनितिक पार्टी दिखाई पड़ रही थी जो धर्म और जाति की राजनीति नहीं कर रही थी । ये आशा जगी मन में ये शायद भारत की वो पार्टी है जिसके लिए महात्मा गाँधी , सुभाष चन्द्र बोस , सरदार भगत सिंह, चन्द्र शेखर आज़ाद ने अपने प्राणों की आहुति दी थी ।अपने मैंने भी आम आदमी पार्टी के लिए ये कविता बनाई थी।

वादा किया जो मोदी ने ,
पूरा करेंगी आप।
दिल्ली से शुरुआत हो चुकी,
जनता करेगी राज।

जनता जाग चुकी है अब,
बस है ये आगाज़।
बंद करो अब हाथ वालो,
दिखाना सब्ज बाग़।

अब जाति धर्म नाम नाम पे, 
नहीं बिकेगी जनता।
नेताओं के मकड़ जाल में,
नहीं फसेगी जनता।

नहीं फसेगी जनता,
कि जन में अलख जगा रहे है।
अरविन्द सपने जो दिखा रहे हैं,
सच में निभा रहे हैं।

फिर दिखाई पड़ने लगता है आज का दिन । केजरीवाल का साथ एक एक करके सारे लोगो ने छोड़ दिया । योगेन्द्र यादव , प्रशांत भूषण , यहाँ तक की किरण बेदी जी तो केजरीवाल जी के विरूद्ध चुनाव के मैदान में उतर गयी । कुमार विश्वास भी यदा कदा कविताओं के माध्यम से अपने विरोध प्रदर्शित करते रहे हैं । केजरीवालजी आज दिल्ली के सी.एम. मनीष सिसोदियाजी जी दिल्ली के डिप्टी सी.एम. और अन्नाजी राजनैतिक हासिये पे ।

     आज केजरीवाल जी काफी मुसलमान भाइयों की टोपी पहनते है तो कभी पंजाब में जाकर सिख भाइयों की पगड़ी पहनते है । लोकपाल बिल की बात ठंडे बसते में चली गयी . वो ही धर्मगत और जातिगत राजनीति पे उतर गयी है आम आदमी पार्टी ।

     मैं सोचता हूँ आज जो कुछ भी हुआ है , अगर अन्नाजी का आंदोलन नहीं हुआ होता , तो क्या आज ये हो पाता ? क्या केजरीवाल जी आज दिल्ली के सी.एम और मनीष सिसोदियाजी जी दिल्ली के डिप्टी सी.एम. बन पाते ? क्या लोग केजरीवालजी और मनीष सिसोदियाजी को जान पाते?

     आज के दिन अन्नाजी भले हीं याद नहीं आते हो , पर ये बात भूलनेवाली नहीं है कि सत्तर से ज्यादा उम्र का एक आदमी कैसे देश कि भलाई के अपनी जान क़ी बाजी लगा देता है । मायावतीजी ने भी अपने राजनैतिक गुरु कांशीराम को अमर बना दिया। अब कांशीरामजी को दुनिया जानती है । यदि केजरीवालजी उस ऑटो रिक्शावाले क़ी बात को सच में गलत साबित करना चाहते है तो ये बेहतर होता क़ी अन्नाजी क़ी याद में दिल्ली में कोई हॉस्पिटल , स्कूल , कॉलेज आदि बनवा दे ताकि लोग अन्नाजी के कंट्रीब्यूशन को भूलें नहीं । नहीं तो  उस ऑटो रिक्शावाले जैसे कई लोग केजरीवालजी पे ये लांछन जरूर लगते रहेंगे कि केजरीवाल जी अन्ना हजारे जी का उपयोग अपने राजनैतिक भविष्य को बनाने के लिए किया और तब तक उस ऑटो रिक्शावाले की ये बात मेरे मन में खटकती रहेगी कि केजरीवाल जी ने  "अन्ना का चूस लिया गन्ना".।
अजय अमिताभ सुमन :सर्वाधिकार सुरक्षित 

Friday, February 2, 2018

शह और मात


मेरा खेल है मुझे खेलने दो तुम अपनी चाल,
मेरे हाथी है मेरे ऊंट तुम करते क्यों हो सवाल?

मेरा घोड़ा मरा यहाँ पे ,हो तुम क्यों परेशान?
मेरा खेल है, मेरी चाल है, घोड़े का बलिदान।

मेरा जीवन है और मुझे है यदि स्वर्ग की चाह,
मेरा मरण ही पहली पग पे, मांगे स्वर्ग की राह।

तुम्हे चाहिए जीत हमारी, है आभार तुम्हारा,
पर तेरे निर्देश से बाधित, होता खेल हमारा।

तुम ज्ञानी हो, तुम मानी हो , इसका मुझको ज्ञान,
पर चींटी का भी तो होता, है अपना स्वाभिमान।

मेरा देश है, मेरा वेश है, मेरी जीत और हार,
मेरी राह है ,मेरा जीवन, सबकुछ है स्वीकार।

मेरी चाल पे किंचित ना हो, तुम भी यूँ हैरान,
हार की गलियों से ही चलकर बनते लोग महान।


अजय अमिताभ सुमन
सर्वाधिकार सुरक्षित

ओ वैज्ञानिक किस बात का है तुझको अभिमान?


ओ वैज्ञानिक किस बात का है तुझको अभिमान?
एक लक्ष्य अति दुष्कर दुर्लभ कठिन अति संधान।
जैसा है व्यवहार मनुज का, क्या वैसा है भाव?
कैसा है मन मस्तिष्क इसका, कैसा है स्वभाव?

अधरों पे मुस्कान प्रक्षेपित जब दिल में व्याघात,
अतिप्रेम करे परिलक्षित जब करना हो आघात।
चुपचाप सा बैठा नर जब दिखता है गुमनाम,
सीने में किंचित मचल रहे होते भीषण तूफान।

सत्य भाष पे जब भी मानव देता अतुलित जोर,
समझो मिथ्या हुई है हावी और सत्य कमजोर।
स्वयं में है आभाव और करे औरों का उपहास,
अंतरमन में कंपन व्यापित , बहिर्दर्शित विश्वास।

और मानव के अकड़ की जो करनी हो पहचान,
कर दो स्थापित उसके कर में कोई शक्ति महान।
संशय में जब प्राण मनुज के, भयाकान्त अतिशय,
छद्म संबल साहस का तब नर देता परिचय।

करो वैज्ञानिक तुम अन्वेषित ऐसा कोई ज्ञान,
मनुज-स्वभाव की हो पाए सुनिश्चित पहचान
तबतक ज्ञान अधुरा तेरा और मिथ्या अभिमान ,
पूर्ण नहीं जबतक कर पाते मानव अनुसंधान।

 
अजय अमिताभ सुमन:सर्वाधिकार सुरक्षित






ये कैसा विधान विधी का कैसा ये संयोग?






जिसे मानते सुख का उपवन और आकांक्षित प्रीत,
वो ही बिछुड़न पे दुख का कारण बन जाता है मीत.
मंगल, मोहन, पावन , शितवन और मधुर श्री राम,
पर उनके वनवास के कारण, दशरथ त्यागे प्राण.

प्रेम मधुरस काम अकांक्षी सज्ज सोलहों श्रृंगार,
पर कोमल अधरों से भी होते कितने तकरार।
दुर्योधन का चिर निमंत्रण द्रौपदी  का  इनकार,
फिर उसके परिहास से जनित भीषण नर संहार। 

मन तो चाहे प्रेम का मधुवन ढूंढे सुख की छाँव,
पर दुख की भी बदली आती छिपती नंगे पाँव.
मछली को ले खीच के लाती  है आंटे की चाह.
उसे ज्ञात क्या बनी आखेट वो चली मौत की राह.
 
माँ सीता के हरण का कारण, वो सोने का लोभ.
मृगनयनी  ने जनित किया था विश्वामित्र में क्षोभ. 
कैसा ये विधान विधी का कैसा ये संयोग?
कोमल कलियों में छिपे हुए होते काँटों के योग.


अजय अमिताभ सुमन :सर्वाधिकार सुरक्षित 







नायक कौन?


नायक  कौन ?
क्या राम , क्या रावण ?
क्या अर्जुन , क्या कर्ण ?
क्या भीम , दुर्योधन ?
कठिन प्रश्न ?
उत्तर गहन।

 नायक   ,
ना राम , ना रावण.
ना अर्जुन ,  ना कर्ण.
ना भीम ,  ना दुर्योधन ।

 नायक ,
त्रस्त या तुष्ट,
विजेता से ,
इतिहासकार की कलम।


अजय अमिताभ सुमन
सर्वाधिकार सुरक्षित  




मैंने देखा था एक सपना


मैंने देखा था एक सपना , कहना चाहूँ तुम जरा सुनना।
सपने में देखी एक दादी, दिखती थी बड़ी सीदी सादी।
उस दादी के अजब हिसाब, बंद पड़ी थी एक किताब।
देख के  दादी  पेड़ा  लडडू, घूम गई जैसे कोई लटटू

तब कहूँ क्या हुआ जनाब, खुल गयी वो बन्द किताब।
आया फिर एक बड़ा भूचाल ,दादी का मुंह हुआ विशाल।
बैठी सुरसा जीभ निकाले, खोल के अपने मुख के ताले।
बनी  हुई थी एक पहाड़, अहिरावण सी थी वो दहाड़।

लोग समोसा लाते भर कर,ट्रक भी लाते और हेलीकाप्टर।
डाले मुख में पुआ  पूूड़ी, पर दादी की क्षुुुधा अधूरी।
एक बार मे खाती ऐसे, मूषक हजम हो सर्पमुख जैसे।
उस भुखिया की गजब  दहाड़, जीभ निकाले मुख को फाड़।

ज्यों प्रज्वलित दिनकर चंड, दादी की थी क्षुधा प्रचंड।
छोले हेतु लगती दौड़, खाती कहती थोड़ा और।
सच मे दिखती थी विकराल,बहुत बड़ा सा हुआ बवाल।
कि डर के मारे टूटा सपना,कहना चाहूँ तुम जरा सुनना।


अजय अमिताभ सुमन: सर्वाधिकार सुरक्षित




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