Monday, May 4, 2026

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परदा-ए-फ़सूँ 

दुनिया ये तेरी-मेरी, फ़रक फ़क़त के यूँ है,
ना आरज़ू हुनूज़ है, ना कोई जुस्तजू है।

किसे इल्ज़ाम दें हम,तू बाँटता रहा तक़दीर,
किसी के हाथों गुल है, किसी के हाथों ख़ूँ है।

तेरी  रहनुमाई कैसी  ये कैसा इम्तिहाँ है,
तेरी दुनिया में या रब कहीं दिल बे-सुकूँ है।

तेरे दस्तूर-ओ-फ़नूँ को समझ पाएँ तो कैसे,
यहाँ हर सच के पीछे कोई परदा-ए-फ़सूँ है।

तेरे होने पे यक़ीं भी है, शिकायत भी मगर ये,
कहीं मंदिर में ख़ामोशी, कहीं मस्जिद में जुनूँ है।
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अब चलो चले पूरी करें अपने-अपने शौक,
तू पैदा कर नस्लें आदम, मैं मुकर्रर अपनी मौत।
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रेत पर बैठकर क्या लिखते हो
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पहचान

रिश्तों की उम्र अक्सर लफ़्ज़ों से कम रही,
मुश्किल बहुत है दिल का निगेहबान होना।

सोने के तख़्त वाले भी तन्हा मिले यहाँ,
आसान कब रहा है बहुत धनवान होना।

जो प्यार बाँटता है वही अस्ल में बड़ा,
बेकार है  फ़क़त यूँ ही सुल्तान होना।

हर शख़्स भागता है उजालों की चाह में,
लेकिन  कहाँ मयस्सर है चरागाँ होना।

लोग पूछते हैं मुझसे मजहब का नाम,
नाकाफी है शायद मेरा इंसान होना।

अजय अमिताभ सुमन 
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अंधेरों की कोशिश थी बड़ी रात करने की,
पर हमने ठानी थी सूरज से बात करने की।

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बाजार में ऐसे हीं मैं टिका नहीं,
अपने किरदार से बस डिगा नहीं।

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झूठ के बाजार में मिला नहीं ,
माजरा ये क्या है,हिला नहीं।

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जाने कैसे कैसे मिले हैं खिताब,
माथे पे शराफत और नीयत में दाग।

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लफ़्ज़ों में अपनापन पर सीने में तेजाब,
आसान नहीं समझना आदमी का सुराग

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इंसान की ये फ़िरतत,है अच्छी खराब भी,
दिल भी है ,दर्द भी है, दांत भी दिमाग़ भी 

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हवाओं पर कोई सवाल हूँ मैं
खुद ही एक मिसाल हूँ मैं?
हाल,खयाल,कमाल,हाल,जंजाल

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सुराग


तेरी कोशिशें नाकाम मुझमें ढूँढ क्या लोगे तुम,
अब तक तो मैं हीं ना रहा मुझमें क्या लोगे तुम।
वक़्त के आईने में इक टूटा हुआ हूँ लम्हा ,
बिखरे हुए अक्स का वजूद क्या लोगे तुम।
ख़ुद से ही जुदा होकर जो शख़्स दूर गया हो,
इस फ़ासले का कोई उसूल क्या लोगे तुम।
कई-कई जन्मों का बिखरा हुआ एक सुराग़ हूँ,
इस धुँध में सच का भी रुख़ क्या लोगे तुम।
मैं ख़ुद ही अपने होने का हासिल नहीं समझा,
मेरे वजूद का मुझसे सबूत क्या लोगे तुम।

अजय अमिताभ सुमन

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मज़दूर

मेहनत जिसकी धूप में जलती रही भरपूर,
पसीने की हर बूँद से लिखता रहा जो नूर।
भूख, ग़रीबी, रोग ने कर डाला है मजबूर,
छाँव मिली न उम्र भर, किस्मत से है दूर।
रोटी की इक आस में जो झुकता बे-दस्तूर,
राहों पे ताउम्र फकत जलता रहा मज़दूर।

अजय अमिताभ सुमन

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कफ़न

स्वतंत्रता का नवल पौधा, रक्त से निज सींचकर,
था उगाया वीर ने, कफ़न स्वयं शीश पर।
अमर ज्वाला-सा जला, अन्याय की दीवार में,
जयघोष गूँज उठा, रणभूमि की पुकार में।

लहू की धार बह चली, धरती हुई गुलाल-सी,
गगन थर्राने लगा, रण-ध्वनि हुई धमाल-सी।
वीर सपूत हँस पड़ा, तीरों के उस घाव पर,
वतन की जीत हो चाहे प्राण ले जाए हर।"

अजय अमिताभ सुमन

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दवा नहीं मिलतीहर शख़्स यहाँ अपनी ही कहानी में गुम,
किसी और के दर्द की दवा नहीं मिलती।

रिश्तों की धूप में साये तो बहुत देखे,
छाँव में भी मगर वो हवा नहीं मिलती।

हम ढूँढ़ते फिरते हैं शहरों में सुकूँ की झलक,
इस भीड़ भरे जहाँ में वो फ़ज़ा नहीं मिलती।

जबतक न जले ‘मैं’ की शमा दिल के दरीचे में,
उस नूर की राहों में मगर वफ़ा नहीं मिलती।

जो फ़ना की राह पे उतरे, वही पा ले बक़ा,
वरना इस सफ़र में कोई अता नहीं मिलती।

अजय अमिताभ सुमन

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चिराग़ और आफ़ताब

उतना ही फ़र्क़ है चिराग़ और आफ़ताबों में,
जितना कि एक कलम और हज़ारों किताबों में।
चिराग़ बस एक कोने की तन्हाई मिटा पाता,
आफ़ताब रौशनी भर देता है तमाम हिसाबों में।
कलम से इंक़लाब की तहरीर जन्म लेती है,
किताबें उम्र गुज़ार देती हैं उन्हीं जवाबों में।
जो जल के ख़ुद को ख़त्म करे, वही सूरज कहलाए,
वरना लोग उलझे रहते हैं बस नक़ाबों में।
असर का फ़ैसला वक़्त करता है ऐ दोस्त,
फ़र्क़ दिख ही जाता है चेहरों और ख़्वाबों में।

अजय अमिताभ सुमन

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