Sunday, September 18, 2022

सच्चाई लक्ष्मण रेखा की



आम बोल चाल की भाषा में जब वाद विवाद के दौरान कोई अपनी मर्यादा को लांघने लगता है, अपनी हदें पार करने लगता है तब प्रायः उसे लक्ष्मण रेखा नहीं पार करने की चेतावनी दी जाती है। 

आखिर ये लक्ष्मण रेखा है क्या जिसके बारे में बार बार चर्चा की जाती है? आम बोल चाल की भाषा में जिस लक्ष्मण रेखा का इस्तेमाल बड़े धड़ल्ले से किया जाता है, आखिर में उसकी सच्चाई क्या है? इस कहानी की उत्पत्ति कहां से होती है? ये कहानी सच है भी या नहीं, आइए देखते हैं?

किदवंती के अनुसार जब प्रभु श्रीराम अपनी माता कैकयी की इक्छानुसार अपनी पत्नी सीता और अपने छोटे भाई लक्ष्मण के साथ वनवास को गए तब रावण की बहन सुर्पनखा श्रीराम जी पर कामासक्त हो उनसे प्रणय निवेदन करने लगी।

जब श्रीराम जी ने उसका प्रणय निवेदन ये कहकर ठुकरा दिया कि वो अपनी पत्नी सीताजी के साथ रहते है  तब वो लक्ष्मण जी के पास प्रणय निवेदन लेकर जा पहुंची। जब लक्ष्मण जी ने भी उसका प्रणय निवेदन ठुकरा दिया तब क्रुद्ध हो सुर्पनखा ने सीताजी को मारने का प्रयास किया ।  सीताजी की जान बचाने के लिए मजबूरन लक्ष्मण को सूर्पनखा के नाक काटने पड़े।

लक्ष्मण जी द्वारा घायल लिए जाने के बाद सूर्पनखा  सर्वप्रथम राक्षस खर के पास पहुँचती है और अपने साथ हुई सारी घटनाओं का वर्णन करती है । 

सूर्पनखा के साथ हुए दुर्व्यवहार को जानने के बाद  राक्षस खर अपने भाई दूषण के साथ मिलकर प्रभु श्रीराम और लक्ष्मण जी पर आक्रमण कर देता है ।

लेकिन सूर्पनखा की आशा के विपरीत राक्षस खर अपने भाई दूषण के साथ श्रीराम और लक्ष्मण जी के साथ युद्ध करते हुए मारा जाता है । अब सूर्पनखा के पास और कोई चारा नहीं बचता है सिवाए इसके कि वो अपने भाई रावण से सहायता मांगे ।

इसके बाद घायल सुर्पनखा रावण के पहुंच कर प्रतिशोध लेने को कहती है। रावण अपने मामा मरीच के साथ षडयंत्र रचता है। रावण का मामा मारीच सोने के मृग का वेश बनाकर वन में रह रहे श्रीराम , सीताजी और लक्ष्मण जी के पास पहुंचता है।

सीताजी उस सोने के जैसे दिखने वाले मृग पर मोहित हो श्रीराम जी से उसे पकड़ने को कहती है। सीताजी के जिद करने पर श्रीराम उस सोने के बने मारीच का पीछा करते करते जंगल में बहुत दूर निकल जाते हैं।

जब श्रीराम उस सोने के मृग बने रावण के मामा मारीच को वाण मारते हैं तो मरने से पहले मारीच जोर जोर से हे लक्ष्मण और हे सीते चिल्लाता हैं। ये आवाज सुनकर सीता लक्ष्मण जी को श्रीराम जी की सहायता हेतु जाने को कहती है।

लक्ष्मण जी शुरुआत में तो जाने को तैयार नहीं होते हैं, परंतु सीताजी के बार बार  जिद करने पर वो जाने को मजबूर हो जाते हैं। लेकिन जाने से पहले वो कुटिया के चारो तरफ अपने मंत्र सिद्ध वाण से एक रेखा खींच देते हैं। 

वो सीताजी को ये भी कहते हैं कि श्रीराम और लक्ष्मण की अनुपस्थिति में ये रेखा उनकी रक्षा करेगा। अगर वो उस रेखा से बाहर नहीं निकलती हैं तो वो बिल्कुल सुरक्षित रहेगी।

जब लक्ष्मण जी बाहर चले जाते हैं तो योजनानुसार रावण सीताजी के पास सन्यासी का वेश बनाकर भिक्षा मांगने पहुंचता है। सीताजी भिक्षा लेकर आती तो हैं लेकिन लक्ष्मण जी द्वारा खींची गई उस रेखा से बाहर नहीं निकलती।

ये देखकर सन्यासी बना रावण भिक्षा लेने से इंकार कर देता हैं। अंत में सीताजी लक्ष्मणजी द्वारा खींची गई उस लकीर के बाहर आ जाती है और उनका रावण द्वारा अपहरण कर लिया जाता है।

लक्ष्मण जी द्वारा सीताजी की रक्षा के लिए खींची गई उसी तथाकथित लकीर को आम बोल चाल की भाषा में लक्ष्मण रेखा के नाम से जाना जाता है। इस कथा के अनुसार लक्ष्मण जी ने सीताजी की रक्षा के लिए जो लकीर खींच दी थी, अगर वो उसका उल्लंघन नहीं करती तो वो रावण द्वारा अपहृत नहीं की जाती।

महर्षि वाल्मिकी द्वारा रचित रामायण को तथ्यात्मक प्रस्तुतिकरण के संबंध में सबसे अधिक प्रमाणिक ग्रन्थ माना जाता हैं। आइए देखते हैं महर्षि वाल्मिकी द्वारा रचित वाल्मिकी रामायण में इस तथ्य को कैसे उल्लेखित किया गया है। वाल्मिकी रामायण  के आरण्यक कांड के पञ्चचत्वारिंशः सर्गः ( अर्थात 45 वें भाग) में इस घटना का विस्तार से वर्णन किया गया है।

इस घटना की शुरुआत मारीच के श्रीराम जी द्वारा वाण से घायल करने और मरने से पहले मारीच द्वारा सीता और लक्ष्मण को पुकारने और सीता द्वारा इस पुकार को सुनकर घबड़ाने से शुरू होती है। इसका वर्णन कुछ इस प्रकार से शुरू होता है।

जब जानकी जी ने उस वन में पति के कण्ठस्वर के सदृश स्वर में आर्त्तनाद सुना, तब वे लक्ष्मण से बोलीं कि, जा कर तुम श्रीराम चन्द्र जी को देखो तो ॥ १ ॥

न हि से हृदयं स्थाने जीवावतिष्ठते ।
क्रोशतः परमार्तस्य श्रुतः शब्दो मया भृशम् ॥ २ ॥

इस समय मेरा जी ठिकाने नहीं, चित्त न जाने कैसा हो रहा है , क्योंकि मैंने परम पीड़ित और अत्यन्त चिल्लाते हुए श्रीराम चन्द्र जी का शब्द सुना है ॥ २ ॥

आक्रन्दमानं तु वने भ्रातरं त्रातुमर्हसि ।
तं क्षिप्रमभिधाव त्वं भ्रातरं शरणैषिणम् ॥३॥

अतः तुम वन में जा कर इस प्रकार आर्त्तनाद करने वाले
अपने भाई की रक्षा करो और दौड़ कर शीघ्र जाओ क्योंकि उनको इस समय रक्षण की आवश्यकता है ॥ ३॥

रक्षसां वशमापनं सिंहानामिव गोषम् ।
न जगाम तथोक्तस्तुभ्रातुराज्ञाय शासनम् ॥४॥

जान पड़ता है, वे राक्षसों के वश में जा पड़े हैं, इसी से वे सिंहों के बीच में पड़े हुए बैल की तरह विकल हैं। सीता जी के इस कहने पर भी लक्ष्मण जी न गये, क्योंकि उनको उनके भाई श्रीरामचन्द्र जाते समय आश्रम में रह कर, सीता की रखवाली करने की आज्ञा दे गये थे ॥४॥

तमुवाच ततस्तत्र कुपिता जनकात्मजा ,
सौमित्र मित्ररूपेण भ्रातुस्त्वमसि त्वमसि शत्रुवत् ॥५॥

इस प्रकार हम देखते हैं कि जब घबड़ाकर सीताजी लक्ष्मण जी से श्रीराम चंद्र जी की रक्षा करने को कहती है, तब भी  लक्ष्मण जी नहीं जाते हैं। इसका कारण ये था कि श्रीराम जी ने लक्ष्मण जी को सीता जी की रक्षा करने की आज्ञा दे गए थे। 

अपनी बात को न मानते देख सीताजी क्रोध में आ जाती हैं वो लक्ष्मण जी को अनगिनत आरोप लगाने लगती हैं ताकि लक्ष्मण जी उनकी बात मानने को बाध्य हो जाएं। आगे देखते है क्या हुआ।

तब तो सीता जी ने क्रोध कर लक्ष्मण से कहा- हे लक्ष्मण , तुम अपने भाई के मित्ररूपी शत्रु हो ॥ ५ ॥ ( यदि ऐसा न होता तो ) तुम क्या उस महा तेजस्वी श्रीराम चन्द्र जी के दिन इसी प्रकार निश्चिन्त और स्थिर बैठे रहते । 

देखो जिन श्रीरामचन्द्र जी के अधीन में हो कर, तुम वन में आए हो, उन्हीं श्रीरामचन्द्र जी के प्राण जब संकट  में पड़े हैं, तब मैं यहाँ रह कर ही क्या करूँगी (अर्थात यदि तुम न जायोगे तो मैं जाऊँगी)। 

अब्रवीलक्ष्मणस्वस्तां सीतां मृगवधूमिव । पन्नगासुरगन्धर्वदेवमानुषराक्षसः ॥१०॥

अशक्यस्तव वैदेहि भर्ता जेतुं न संशयः ।
 दानवेषु च घोरेषु न स विद्येत शोभने ॥१२॥

देव देवमनुष्येषु गन्धर्वेषु पतत्रिषु ॥११॥ 
राक्षसेषु पिशाचेषु किन्नरेषु मृगेषु च ।

यो रामं प्रति युध्येत समरे वासवोपमम् । 
अवध्यः समरे राम्रो नैवं त्वं वक्तुमर्हसि ॥१३॥

जब जानकी जी ने प्राँखों में आंसू भर कर, यह कहा ।।८।। तब लगी के समान डरी हुई सीता जी से लक्ष्मण जी बोले कि, पन्नग, तुर, गन्धर्व, देवता, मनुष्य, राक्षस , कोई भी तुम्हारे पति (श्रीरामचन्द्र जी) को नहीं जीत सकता । इसमें कुछ भी सन्देह मत करना ।।१०।। 

हे सीते ! हे शोभने ! देवताओं, मनुष्यों, गन्ध, पक्षियों, राक्षसों, पिशाचों किन्नरों, मृगों, भयङ्कर वानरों में कोई भी ऐसा नहीं. जो इन्द्र के समान पराक्रमी श्रीराम चन्द्र के समाने रण क्षेत्र में खड़ा रह सके । युद्धक्षेत्र में श्री रामचन्द्र जी अजेय हैं। अतः तुमको ऐसा कहना उचित नहीं ||११|| १२||१३||

श्रीरामचन्द्र की अनुपस्थिति में, मैं तुम्हें इस वन में अकेली छोड़ कर नहीं जा सकता। बड़े बड़े बलवानों की भी यह शक्ति नहीं कि, वे श्रीराम चन्द्र।जी के बल को रोक सकें ॥१४॥
 
त्रिभिर्लेोकैः समुद्युक्तः सेश्वरैरपि सामरैः । 
हृदयं निर्वृतं तेऽस्तु सन्तापस्त्यज्यतामयम् ||१५|| 

अगर तीनों लोक और समस्त देवताओं सहित इन्द्र इकट्ठे हो जाएँ , तो भी श्रीराम चन्द्र जी का सामना नहीं कर सकते । यतः तुम सन्ताप को दूर कर, आनन्दित हो ॥ १५ ॥ 

न च तस्य स्वरो व्यक्तं मायया केनचित्कृतः ॥१६॥
आगमिष्यति ते भर्ता शीघ्रं हत्वा मृगोत्तमम् ॥

उस उत्तम मृग को मार तुम्हारे पति शीघ्र आ जायगे । जो शब्द तुमने सुना है, वह श्रीरामचन्द्र जी का नहीं है, यह तो किसी का बनावटी शब्द है ॥१६॥

खरस्य निधनादेव जनस्थानवधं प्रति
राक्षसा विविधा वाचो विसृजन्ति महावने ॥१९॥

बल्कि गंधर्व नगर की तरह यह उस राक्षस की माया है। हे सीते ! महात्मा श्रीरामचन्द्र जी मुझको, तुम्हें धरोहर की तरह सौंप गये हैं । अतः हे वरारोहे ! मैं तुम्हें अकेला छोड़ कर जाना नहीं चाहता |  

हे वैदेही ! एक बात और है  जनस्थान निवासी खर आदि राक्षसों का वध करने से राक्षसों से हमारा वैर हो गया है । इस महावन में राक्षस लोग हम लोगों को धोखा देने के लिये भाँति भाँति की बोलियां बोला करते हैं ॥१७॥१८॥१६॥

सहारा वैदेहि न चिन्तयितुमर्हसि । 
लक्ष्मणेनैवमुक्ता सा क्रुद्धा संरक्तलोचना ।।२०।।

और साधुओं को पीड़ित करना राक्षसों का एक प्रकार का खेल है । अतः तुम किसी बात की चिन्ता मत करो। जब लक्ष्मण ने इस प्रकार कहा, तब  सीता जी के नेत्र क्रोध के मारे लाल हो गये ॥२०॥

लक्ष्मण जी सीताजी जी इन बातों को सुनकर भी विचलित नहीं होते। उन्हें अपने अग्रज श्रीराम जी की शक्ति पर अपार आस्था है। उल्टे वो सीताजी को समझाने की कोशिश करने लगते हैं। लक्ष्मण जी की कोशिश होती है कि जिस प्रकार उनकी आस्था श्रीराम जी में हैं उसी तरह का विश्वास सीताजी में भी स्थापित हो जाए। 

लक्ष्मण जी सीताजी ये भी समझाते हैं कि खर इत्यादि राक्षसों का वध करने से सारे राक्षस उनके विरुद्ध हो गए हैं। इस कारण तरह तरह की ध्वनि निकाल कर ऊनलोगों को परेशान करने की कोशिश कर रहे हैं। परंतु सीताजी पर  इसका ठीक विपरीत असर होता है। 

इन बातों को सुनकर सीताजी क्रोध में आ जाती हैं और उग्र होकर लक्ष्मण जी को अनगिनत बातें कहती हैं जिस कारण लक्ष्मण जी को मजबूरन सीताजी को अकेला छोड़कर जाना पड़ता है। वो आगे इस प्रकार कहते हैं।

मैं तो श्रीरामचन्द्र जी की आज्ञा मान, तुम्हें अकेली छोड़ कर, नहीं जाता था किन्तु हे बरानने , तुम्हारा मङ्गल हो , लो मैं श्रीरामचन्द्र के पास जाता हूँ ॥ ३३ ॥

रक्षन्तु त्वां विशालाक्षि समग्रा वनदेवताः। 
निमित्तानि हि घोराणि यानि प्रादुर्भवन्ति मे ॥३४॥

अपि त्वां सह रामेण पश्येयं पुनरागतः ॥३५॥ 

लक्ष्मणेनैवमुक्ता सा रुदन्ती जनकात्मजा । 
प्रत्युवाच ततो वाक्यं तीव्रं बाष्पपरिप्लुता ॥३६॥

हे विशालाचि ! समस्त वनदेवता तुम्हारी रक्षा करें। इस समय बड़े बुरे बुरे शकुन मेरे सामने प्रकट हो रहे हैं ॥ ३४ ॥ क्या मैं श्रीरामचन्द्र सहित लौट, फिर तुम्हें ( यहाँ ) देख सकूँगा ॥३५॥

विशालनयना जनकनन्दिनी को ऐसे व्यार्त्तभाव से, उदास हो रोते हुए देख, लक्ष्मण ने उनको समझाया बुझाया, किन्तु जानकी जे अपने देवर से फिर कुछ भी न कहा (अर्थात रूठ गयीं )॥ ४०॥

ततस्तु सीतामभिवाद्य लक्ष्मणः 
कृताञ्जलिः किञ्चिदभिप्रणम्य च।

अन्वीक्षमाणो बहुशश्च मैथिलीं जगाम रामस्य समीपमात्मवान् ॥४१॥

तदनन्तर जितेन्द्रिय लक्ष्मण जी हाथ जोड़ और बहुत झुक कर सीता जी को प्रणाम कर और बार बार सीता को देखते हुए श्रीरामचन्द्र के पास चल दिये ॥४१॥

तथा परुषमुक्तस्तु कुपितो राघवानुजः 
स विकाङ्क्षन्भृशं रामं प्रतस्थे न चिरादिव ॥१॥

इस प्रकार जानकी की कटूक्तियों से कुपित हो, लक्ष्मण जी वहां से जाने की बिलकुल इच्छा न रहते भी, श्रीराम चन्द्र जी के पास तुरन्त चल दिये ॥१॥

जब लक्ष्मण जी के बार बार समझाने पर भी सीता जी नहीं मानती, उल्टे लक्ष्मण जी को बुरा भला कहने लगती हैं तब लक्ष्मण जी के बार और कोई उपाय नहीं रह जाता हैं सिवाए इसके कि सीताजी की आज्ञानुसार वो प्रभु श्रीराम के पास पहुंचकर उनकी रक्षा करें । हालांकि उनके मन में शंका के अनगिनत बादल मंडराने लगते हैं फिर भी लक्ष्मण जी सीताजी को अकेले छोड़कर जाने को बाध्य हो जाते हैं । इसके बाद क्या होता है, आइए देखते हैं।

इतने में एकान्त अवसर पा, रावण ने सन्यासी का भेष बनाया और वह तुरन्त सीता के सामने जा पहुँचा ॥२॥

काषायसंवीतः शिखी छत्री उपानही । 
वामे चांसेऽवसज्ज्याथ शुभे यष्टिकमण्डलू ॥३॥ 

उस समय रावण स्वच्छ रुमा रङ्ग के कपड़े पहिने हुए था, उसके सिर पर चोटी थी, सिर पर छत्ता लगाये और पैरों में खड़ाऊ पहिने हुए था । उसके वाम कंधे पर त्रिदण्ड था और हाथ में कमण्डलु लिये हुए था ॥३॥

तदासाद्य दशग्रीवः क्षिमनन्तरमास्थितः । 
अभिचक्राम देहीं परिव्राजकरूपवृत् || २||

जब इस प्रकार रावण ने सीता जी की प्रशंसा की तब उस संन्यास वेषधारी रावण को आया हुआ देख, सीता जी ने उसका यथा विधि प्रातिथ्य किया ॥ ३२॥

सर्वैरतिथिसत्कारैः पूजयामास मैथिली
उपनीयासनं पूर्वं पाद्येनाभिनिमन्त्र्य च।

अब्रवीत्सिद्धमित्येव तदा तं सौम्यदर्शनम् ।। ३३ ।। 

सीता ने पहले उसे बैठने को आसन दिया,।फिर पैर धोने का जल दिया, फिर फल आदि भोज्य पदार्थ देते हुए कहा, यह सिद्ध किये हुए पदार्थ हैं ( अर्थात् भूंजे हुए अथवा पकाये हुए ) ॥ ३३ ॥

द्विजाति वेषेण समीक्ष्य मैथिली समागतं पात्र कुसुम्भ भ्धारिणम् । 
अशक्य मुद्वेष्टुमपायदर्शनं यद्ब्राह्मणवत्तदाऽङ्गना ॥ ३४ ॥

सीताजी को अकेले पाकर रावण सन्यासी का वेश बनाए हुए वहां पहुंचता है । रावण के सन्यासी वेश में स्वयं की प्रशंसा करते हुए देख सीताजी सर्वप्रथम उसका आदर करती हैं और खाने के लिए फल आदि भी प्रदान करती हैं। फिर सीताजी रावण से उसका परिचय जानना चाहती है। जब उत्तर में रावण अपना अभिमान भरा परिचय देता है। सीताजी जी प्रतिउत्तर में रावण को अपने पति श्रीराम चंद्र जी के अद्भुत पराक्रम का वर्णन करने लगती हैं।

अब आप अपना नाम, गोत्र और कुल ठीक ठीक बतलाइये और यह भी बतलाइये कि, आप अकेले इस दण्डकवन में क्यों फिरते हैं ॥ २४ ॥

एवं ब्रुवन्त्यां सीतायां रामपत्न्यां महाबलः ।
प्रत्युवाचोत्तरं तीव्रं रावणो राक्षसाधिपः ।। २५।। 

जब सीता जी ने ऐसे वचन कहे, तब महावली राक्षस नाथ रावण ने ये कठोर वचन कहे ॥ २५ ॥

येन वित्रासिता लोकाः सदेवासुरपन्नगाः ।
अहं स रावणो नाम सीते रक्षोगणेश्वरः || २६ ॥

हे सीते ! जिसके डर से देवताओं, असुरों और मनुष्यों सहित तीनों लोक थरथराते हैं, मैं वही राक्षसों का राजा रावण हूँ ॥ २६ ॥ 

सीता जी अपना परिचय देते हुए कहती जो सब शुभ लक्षणों से युक्त और वटवृक्ष की तरह सबको सदैव सुखदायी हैं, उन सत्यप्रतिज्ञ और महाभाग श्रीरामचन्द्र की मैं अनुगामिनी हूँ ३४ ॥

"कूपोदकं वटच्या युवतीनां स्तनद्वयम् । शीतकाले भवेत्युष्णमुष्णकाले च शीतलम् ॥" ]

महावाहुं महोरस्कं सिंहविक्रान्तगामिनम् नृसिंहं सिंहसङ्काशमहं राममनुव्रता ।। ३५ ।। 

महावाहु, चौड़ी छाती वाले, सिंह जैसी चाल चलने वाले, पुरुष सिंह, और सिंह से समान पराक्रमी श्रीरामचन्द्र की मैं अनुगामिनी हूँ || ३५ ॥

पूर्णचन्द्राननं रामं राजवत्सं जितेन्द्रियम्
पृथुकीर्त्ति महात्मानमहं राममनुव्रता ॥ ३६ ॥

मैं उन राजकुमार एवं जितेन्द्रिय श्रीराम की अनुगामिनी हूँ, जिनका मुख पूर्णमासी के चन्द्रमा के तुल्य है, जिनकी कीर्ति दिग दिगन्त व्यापिनी है और जो महात्मा हैं ॥ ३६॥

त्वं पुनर्जम्बुकः सिंहीं मामिच्छसि सुदुर्लभाम् 
नाहं शक्या त्वया स्प्रष्टुमादित्यस्य प्रथा यथा ॥ ३७ ॥ 

सो तू शृगाल के समान हो कर, सिंहनी के तुल्य मुझे चाहता है । किन्तु तू मुझे उसी प्रकार नहीं छू सकता, जिस प्रकार सूर्य की प्रभा को कोई नहीं छू सकता ॥ ३७॥ 

सीताजी रावण के अभिमान भरे शब्दों से डरती नहीं अपितु राम जी पराक्रम से उसे परिचय करवाते हुए उसे धमकाती भी है। स्वयं के लिए अपमान जनक शब्दों का प्रयोग होते देखा रावण क्रोध में आकर अपना रौद्र रूप प्रकट करता है और फिर सीताजी का बलपूर्वक अपहरण कर लेता है।

हे भीरु ! यदि तू मेरा तिरस्कार करेगी, तो पीछे तुझको वैसे ही पछताना पड़ेगा, जैसे उर्वशी अप्सरा राजा पुरूरवा के लात मार कर, पछतायी थी ॥१८॥

अङ्गुल्या न समो रामो मम युद्धे स मानुषः ।

तव भाग्येन सम्प्राप्तं भजस्व वरवर्णिनि ।।१९॥ 

राम मनुष्य है, वह युद्ध में मेरी एक अंगुली के वल के समान भी ( वलवान् ) नहीं है । (अर्थात् उसमें इतना भी बल नहीं, जितना मेरी एक अंगुली में है) अतः वह युद्ध में मेरा सामना कैसे कर सकता है। हे वरवर्णिनी ! इसे तू अपना सौभाग्य समझ कि, मैं यहाँ आया हूँ । अतः तू मुझे अङ्गीकार कर ॥ १६ ॥

एवमुक्ता तु वैदेही क्रुद्धा संरक्तलोचना । 
अब्रवीत्परुषं वाक्यं रहिते राक्षसाधिपम् ॥२०॥ 

रावण के ऐसे वचन सुन, सीता कुपित हो और लाल लाल नेत्र कर, उस निर्जन वन में रावण से कठोर वचन बोली ॥ २० ॥ 

कथं वैश्रवणं देवं सर्वभूतनमस्कृतम्
भ्रातरं व्यपदिश्य त्वमशुभं कर्तुमिच्छसि ॥२१॥

हे रावण ! तू सर्वदेवताओं के पूज्य कुवेर को अपना भाई बतला कर भी, ऐसा बुरा काम करने को ( क्यों ) उतारु हुआ है ? ॥२१॥

मैं प्रकाश में बैठा बैठा अपनी भुजाओं से इस पृथिवी को उठा सकता हूँ, और समुद्र को पी सकता हूँ और काल को संग्राम में मार सकता हूँ ॥३॥

अर्क रुन्ध्यां शरैस्तीक्ष्णैर्निर्भिन्द्यां हि महीतलम् । कामरूपिणमुन्मत्ते पश्य मां कामदं पतिम् ॥४॥ 

मैं अपने पैने बाणों से सूर्य की गति को रोक सकता हूँ और पृथिवी को विदीर्ण कर सकता हूँ । हे उन्मत्ते ! मुझ इच्छारूपधारी और मनोरथ पूर्ण करने वाले पति को देख । ( अर्थात् मुझे अपना पति बना ) ॥४॥

एवमुक्तवतस्तस्य सूर्यकल्पे शिखिप्रभे । क्रुद्धस्य 'हरिपर्यन्ते रक्ते नेत्र बभूवतुः ॥५॥

ऐसा कहते हुए रावण की पीली आँखे मारे क्रोध के प्रज्वलित भाग की तरह लाल हो गयीं ॥५॥ 
सद्यः सौम्यं परित्यज्य भिक्षुरूपं स रावणः । स्वं रूपं कालरूपार्थं भेजे वैश्रवणानुजः ॥६॥

उसी क्षण कुबेर के छोटे भाई रावण ने अपने उस संन्यासी भेष को त्याग, काल के समान भयङ्कर रूप धारण किया ॥६॥

इस प्रकार हम देखते हैं कि वाल्मिकी रामायण  के आरण्यक कांड के पञ्चचत्वारिंशः सर्गः ( अर्थात 45 वें भाग) में इस घटनाक्रम में लक्ष्मण द्वारा सीताजी की रक्षा करने के लिए किसी भी प्रकार की लकीर या रेखा को खींचने का वर्णन नहीं आता है।

जब सीताजी रावण से उसका परिचय पूछती हैं तो वो सन्यासी वेश में हीं अपना सम्पूर्ण परिचय देता है। रावण यहां पर सीता जी के किसी लकीर से बाहर आने का इंतजार नहीं करता, बल्कि सीताजी के पूछने पर सन्यासी वेश में हीं अपना परिचय दे देता है।

रावण द्वारा स्वयं को राक्षस राज बताए जाने का सीता जी पर कोई असर नहीं होता।  सीताजी का यहां साहसी व्यक्तित्व रूप प्रकाशित होता है। वो रावण से डरती नहीं अपितु उसे धमकाती भी हैं। ऐसी साहसी स्त्री के लिए भला किसी रेखा की जरूरत हो भी क्या सकती थी।

लक्ष्मण रेखा के खींचे जाने की कहानी कब , कहाँ , कैसे और क्यों प्रचलित हो गई इसके बांरे में ना तो ठीक ठीक जानकारी हीं प्राप्त है और ना हीं कोई ठीक ठीक से अनुमान हीं लगा सकता है। 

अब कारण जो भी रहा हो लेकिन ये बात तो तय हीं हैं कि किसी ने इसके बारे में तथ्यों को खंगाला नहीं । सुनी सुनी बातों को मानने से बेहतर तो ये है कि प्रमाणिक ग्रंथों में इसकी तहकीकात की जाय , और जहाँ तक तथ्यों के प्रमाणिकता का सवाल है , वाल्मीकि रामायण से बेहतर ग्रन्थ भला कौन सा हो सकता है ?

और जब हम लक्ष्मण रेखा के सन्दर्भ में वाल्मीकि रामायण की जाँच पड़ताल करते हैं तो ये तथ्य  निर्विवादित रूप से सामने निकल कर आता है कि लक्ष्मण  रेखा कभी अस्तित्व में आई हीं नहीं  थी।  

वाल्मिकी रामायण के अरण्यक कांड इस तरह की लक्ष्मण रेखा खींचने का कोई जिक्र हीं नहीं आता है। लक्ष्मण रेखा की घटना जो कि आम बोल चाल की भाषा में सर्वव्याप्त है दरअसल कभी अस्तित्व में था हीं नहीं। लक्ष्मण रेखा की वास्तविक सच्चाई ये है कि लक्ष्मण रेखा कभी खींची हीं नहीं गई।

अजय अमिताभ सुमन:सर्वाधिकार सुरक्षित

Sunday, September 11, 2022

वर्तमान से वक्त बचा लो [भाग6]

एक व्यक्ति का व्यक्तित्व उस व्यक्ति की सोच पर हीं निर्भर करता है। लेकिन केवल अच्छा विचार का होना हीं काफी नहीं है। अगर मानव कर्म न करे और केवल अच्छा सोचता हीं रह जाए तो क्या फायदा। बिना कर्म के मात्र अच्छे विचार रखने का क्या औचित्य? प्रमाद और आलस्य एक पुरुष के लिए सबसे बड़े शत्रु होते हैं। जिस व्यक्ति के विचार उसके आलस के अधीन होते हैं वो मनोवांछित लक्ष्य का संधान करने में प्रायः असफल हीं साबित होता है। प्रस्तुत है मेरी कविता "वर्तमान से वक्त बचा लो" का षष्ठम और अंतिम भाग।
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वर्तमान से वक्त बचा लो 
[भाग षष्ठम]
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क्या रखा है वक्त गँवाने 
औरों के आख्यान में,
वर्तमान से वक्त बचा लो 
तुम निज के निर्माण में।
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उन्हें सफलता मिलती जो 
श्रम करने को होते तत्पर,
उन्हें मिले क्या दिवास्वप्न में 
लिप्त हुए खोते अवसर?
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प्राप्त नहीं निज हाथों में 
निज आलस के अपिधान में,
वर्तमान से वक्त बचा लो 
तुम निज के निर्माण में।
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ना आशा ना विषमय तृष्णा 
ना झूठे अभिमान में,
बोध कदापि मिले नहीं जो 
तत्तपर  मत्सर पान में?
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मुदित भाव ले हर्षित हो तुम 
औरों के उत्थान में ,
वर्तमान से वक्त बचा लो 
तुम निज के निर्माण में।
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तुम सृष्टि की अनुपम रचना 
तुममें ईश्वर रहते हैं,
अग्नि वायु जल धरती सारे 
तुझमें हीं तो बसते हैं।
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ज्ञान प्राप्त हो जाए जग का 
निज के अनुसंधान में,
वर्तमान से वक्त बचा लो 
तुम निज के निर्माण में।
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क्या रखा है वक्त गँवाने 
औरों के आख्यान में,
वर्तमान से वक्त बचा लो 
तुम निज के निर्माण में।
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अजय अमिताभ सुमन:
सर्वाधिकार सुरक्षित

Monday, September 5, 2022

डर आजादी का

 


एक बाग में एक मोर और एक मैना रहते थे। दोनों में बड़ी गहरी दोस्ती थी। दिन हो या कि रात, काम हो या कि आराम, दोनों समय निकाल हीं लेते थे मिलने के लिए।

बरसात के मौसम में उनकी दोस्ती और रंग लाती थी। बादलों के मौसम में मोर अपने रंग बिरंगे पंख फैला कर नाचने लगता तो मैना गाने लगता। मौसम में चारों तरफ आनंद हीं आनंद फैल जाता।

उन्हीं दिनों उस बाग के मालिक का बेटा घूमने आया था। मोर और मैना की जुगल बंदी देख कर भाव विभोर हो उठा। अब तो वो बच्चा यदा कदा उन दोनों को देखने बाग आ हीं जाता।

इधर मोर तो बादल का गुलाम था। वो तो बादल के आसमान में छाने पर हीं नाचता। इस कारण बच्चे को काफी दिन इंतजार करना पड़ता। परंतु मैना बच्चे को खुश करने के लिए उसकी आवाज की हू ब हू नकल करने लगता।

मैना के अपने आवाज की इस तरह नकल करते देख बच्चा खुश हो गया। वो बार बार मैना को बोलता और मैना उसकी नकल करता। इस तरह मैना बच्चे के करीब होता गया और मोर से उसकी दूरी बढ़ती चली गई।

मोर बार बार मैना को समझाने की कोशिश करता कि वो दूसरों की आवाज की नकल करना छोड़ दे, परंतु मैना के कानों पर जूं नहीं रेंगती। मोर अपने स्वभाव पर चलता रहा और मैना नकल उतरने में लगा रहा।

समय बीतने के साथ बच्चा बड़ा हो गया। उसे पढ़ने के लिए शहर से दूर जाना पड़ा। वो मैना से इतना प्यार हो गया था कि वो उसके बिना अकेले रह हीं नहीं सकता था।

बच्चा अपने पिताजी से उस मैना को भी साथ ले जाने की जिद करने लगा। आखिर कितनी बार मना करता , था तो आखिर पिता हीं। लिहाजा उसके पिताजी ने मैना को भी अपने बच्चे के साथ कर दिया, परंतु पिंजरे में डालकर।

शहर में बच्चा अकेला था। तिस पर से पढ़ाई लिखाई का बोझ। अब अपनी पढ़ाई लिखाई का ध्यान रखता कि मैना का। पिंजड़े में मैना को कोई हानि नहीं पहुंचा सकता था। मैना के सुरक्षा का भी तो ध्यान रखना था।

दूसरे की नकल करने की कीमत चुकानी पड़ी मैना को। जब तक मैना को अपनी भूल का एहसास होता, तब तक काफी देर हो चुकी थी। अब पछताए क्या होत है जब चिड़िया चुग गई खेत। मन मसोस कर मैना को पिंजड़े में रहना पड़ा।

कहते हैं समय हर घाव को भर देता है। मैना के चले जाने पर मोर कुछ समय के लिए तो आंसू बहाता रहा। पर आखिर कितने दिनों तक। आंसू बहाते रहने से जीवन तो नहीं चलता।

खाना खाने के लिए श्रम करना जरूरी था हीं। जीने के लिए बाहर निकलना था हीं मोर को। पापी पेट की क्षुधा सब कुछ भूलवा देती है। मोर अपने जीवन में व्यस्त हो चला। धीरे धीरे सब कुछ सामान्य हो गया।

इधर मैना भी समय बदलने के साथ साथ बदलता चला गया। शुरू शुरू में जो पिंजड़े में बंधे रहना उसे भी खराब लगता था। आजादी के दिन उसे याद आते थे। मोर के साथ बिताए गए दिन याद आते थे।

बादलों के आसमान में छाने पर मोर का अपना पंख प्रकार नाचना और उसका गाना , वाह क्या लम्हे हुआ करते थे। जब पूरा आसमान हीं उन दोनों का घर हुआ करता था। ना कोई रोकने वाला, ना कोई रोकने वाला।

अब पिंजड़े की दीवार के भीतर हीं उसकी पूरी दुनिया सिमट गई थी। मैना को एहसास हो चला था कि पुराने दिन तो लौटकर आने वाले नहीं। लिहाजा क्यों नहीं पिंजड़े के जीवन को हीं अपना लिया जाए।

लिहाजा पुराने दिनों को भूलकर अब नए जीवन की अच्छाइयों पर ध्यान देने लगा। अब बिना परिश्रम के मैना को समय पर खाना मिलता। अब वो किसी भी मांसाहारी पशु के हाथों नहीं मारा जा सकता था। समय बितने के सारी पिंजड़े के भीतर अब वो काफी सुरक्षित महसूस करता था।

और इसके बदले उसे करना हीं क्या था, बस अपने मालिक के कहने पर पूंछ हिलाना और उसके दोस्तों के सामने उनकी आवाज की नकल करना। और बदले में उसे मिलता था अपने मालिक का प्यार और प्रशंसा। आखिर उसे और क्या चाहिए था।

समय मानों पंख लगाकर उड़ रहा था। देखते हीं देखते उस बच्चे की पढ़ाई पूर्ण हो गई। डिग्री हासिल करने के बाद उसे अपने घर लौटना हीं था। जब वह अपने घर लौटा तो उस मैना को भी अपने साथ लाया।

बहुत दिनों के बाद मोर ने अपने दोस्त की आवाज सुनी तो उसकी खुशी का ठिकाना नहीं रहा । वो तुरंत अपने मालिक के घर पहुंचा तो उसने देखा कि मैना उस बच्चे के आवाज की नकल कर उसे हंसा रहा था।

मोर छुप कर रात होने का इंतजार करने लगा ताकि वो मैना से अकेले में मिल सके। रात्रि होने पर जब मालिक का बच्चा सोने को चला गया तब मौका पाकर मोर मैना के पास पहुंच गया हाल चाल लेने।

इतने दिनों के बाद जब मैना अपने मित्र से मिला तो खुशी के मारे दोनों के आंखों से आंसू निकल पड़े। एक दूसरे का हाल चाल लेने के बाद मैना ने मोर से पूछा कि आखिर मालिक के बच्चे ने उसे हीं इस पिंजड़े में क्यों बंद कर रखा है, मोर को क्यों नहीं?

मोर ने कहा, देखो भाई मैं पहले भी कहता था , दूसरों की नकल मत करो, खास कर आदमी की तो कतई नहीं पर तुम माने कहां। मैं तो बस मौसम का गुलाम रहा। पर तुमने तो आदमी के आवाज की नकल उतरनी शुरू कर दी।

आदमी की फितरत से बिल्कुल अनजान तुम उस बच्चे के पीछे भागते हीं रहे। और ये आदमी तो है हीं ऐसे। अकेले रहने की हिम्मत नहीं और जिसके साथ भी रहता है उसी को अपना गुलाम बना लेता है।

आदमी समाज की, देश की, धर्म की , जात की, इतिहास की, परिवार की और न जाने किस किस की गुलामी पसंद करता है और दूसरों को भी ऐसे हीं जीने को बाध्य कर देता है। जो भी इसे पसंद आता है उसे अपने हिसाब से नियंत्रित करने लगता है।

कहने को तो आदमी आजादी के लिए लड़ाई करता है परंतु असल लड़ाई आजादी की नहीं, दरअसल आदमी की लड़ाई अपने ढंग से गुलामी करने और गुलामी करवाने की होती है।

देखो भाई मैना, मोर ने आगे बताया, आदमी आजादी की नहीं बल्कि खुद के द्वारा बनाई गई जंजीर में जीना चाहता है। तुमने आदमी की नकल की, आदमी ने तुम्हारे लिए भी खुद की बनाई हुई पिंजड़े की लकीर खींच दी।

खैर छोड़ो भी इन सारी बातों को। मोर ने आगे उत्साहित होकर मैना से कहा, चलो अब समय आ गया है आदमी की खींची गई लकीर को मिटाने का। चलो दोस्त, पूरा आसमान फिर से प्रतीक्षा कर रहा है तुम्हारी।

ये कहते हुए मोर ने पिंजड़े के दरवाजे को खोला और मैना को अपने साथ चलने के लिए कहा। सोचा था मैना इस स्वर्णिम अवसर को हाथ से नहीं जाने देगा। सोचा था फिर दोनों साथ साथ खुले आसमान के नीचे गा सकेंगे।

परंतु ये क्या, मोर की आशा के विपरीत मैना ने हिचकिचाते हुए पिंजड़े के दरवाजे को बंद कर दिया । जो सोचा था वैसा हुआ नहीं । एक हीं दिन में मोर ने बेइंतहां खुशी और बेइंतहां हताशा दोनों की अनुभूति कर ली। मैना ने अपने पंखों को समेटते हुए मोर को वापस लौट जाने को कहा।

मैना ने कहा, भाई इतने दिनों तक पिंजड़े में रहने के कारण अब उड़ने की आदत चली गई है। दूसरी बात ये है कि पिंजड़े में खाना पीना भी बड़े आराम से मिल जाता है। मैं तो यहीं खुश हूं भाई। तुम लौट जाओ बाग में। और हां कभी कभी आते रहना मिलने के लिए।

मन मसोसते हुए मोर बाग में लौट गया। मोर को हंसी आ रही थी। उसको साफ साफ दिखाई पड़ रहा था कि इतने दिनों तक आदमी के साथ रहने के कारण शायद मैना को भी आदमी वाला रोग लग गया है। आदमी की नकल करते करते शायद मैना की अकल भी आदमी के जैसे हीं हो गई थी।

आदमी ना तो अकेले रह हीं सकता है और ना हीं औरों को अकेले रहने देता है । मैना भी आदमी की तरह आजादी से डरने लगा है। खुले आसमान में उड़ने के लिए आखिरकार आसमानों के खतरे भी तो उठाने पड़ते हैं।

अजय अमिताभ सुमन:सर्वाधिकार सुरक्षित

Saturday, September 3, 2022

अंधे का बेटा अंधा

द्रौपदी के चीर हरण के अनेक कारणों में से एक कारण द्रौपदी द्वारा दुर्योधन का मजाक उड़ाए जाने को बताया गया है। 

महाभारत की कहानी पर आधारित अनगिनत टेलीविज़न सीरियल और फ़िल्में अनगिनत भाषाओँ में बनाई गई हैं और इन सारी कहानियों में द्रौपदी द्वारा दुर्योधन के मजाक उड़ाए जाने को दिखाया गया है।

कहानियों में ये दिखाया जाता है कि जब युद्धिष्ठिर राजसूय यज्ञ करते हैं तो अपने महल में अनगिनत राजाओं को आमंत्रित करते हैं । 

उनके आमंत्रण पर दुर्योधन भी मय द्वारा निर्मित पांडवों के महल को देखने पहुँचता है । मय द्वारा निर्मित पांडवों का वो महल बहुत हीं खुबसूरत था । उसमे बहुमूल्य रत्नों और शीशे का खुबसूरत प्रयोग किया गया था । 

वहाँ पे पर दरवाजों कहीं कहीं इस तरह का बनाया गया था कि दूर से तो खुला प्रतीत होता था , परन्तु वास्तव में वो बंद होता था। कहीं कहीं दरवाजा बंद प्रतीत होता था , परन्तु वो वास्तव में वहां पर दरवाजा होता हीं नहीं था ।

इसी प्रकार फर्श पर कहीं कहीं आभूषणों की इतनी खुबसूरत नक्काशी की गई थी कि जहाँ पानी नहीं था , वहाँ पानी प्रतीत होता था । तो कहीं पर पानी के ऊपर इतनी अच्छी कलाकृति और रंगों का प्रयोग किया गया था कि वहां पानी नहीं अपितु फर्श की प्रतीति होती थी।

आगे की घटनाक्रम ये दिखाया जाता है कि दुर्योधन दृष्टि भ्रम के कारण महल के दीवारों से जा टकराता है तो पानी से भरे हुए तालाब को फर्श समझकर उसमें जा गिरता है और इसी समय द्रौपदी उसका मजाक उड़ाते उसे अंधे का बेटा अँधा कहती है ।

द्रौपदी के चीर हरण के दौरान दुर्योधन और कर्ण के द्वारा द्रौपदी के लिए अपमानजनक शब्दों के प्रयोग के पीछे द्रौपदी द्वारा दुर्योधन का मजाक उड़ाये जाने को बताया जाता है। ऐसा तर्क दिया दिया जाता है कि दुर्योधन ने द्रौपदी से अपने अपमान का बदला लेने के लिए किया था। 

लेकिन यदि हम महाभारत ग्रन्थ का अध्ययन करते हैं तो कुछ और हीं सत्य दृष्टिगोचित होता दिखाई पड़ता है। आश्चर्य की बात तो ये है कि महाभारत पर तथाकथित रूप से फिल्म बनाने वाले और टेलीविज़न सीरियल बनाने वाले ये दावा तक कर डालते हैं कि कहानी को प्रस्तुत करने में काफी सारी मेहनत की गई गई है ? 

लेकिन क्या वास्तव में उनका दावा वास्तव में महाभारत ग्रन्थ में लिखी गई तथ्यों पर आधारित है , या कि महाभारत ग्रन्थ में लिखी गई तथ्यों के विपरीत है, आईये देखते है । महाभारत ग्रन्थ के अनुसार जो घटनाएँ इस परिप्रेक्ष्य में वर्णित ही गई वो कुछ इस प्रकार हैं ।  

इस घटना का जिक्र महाभारत ग्रन्थ के सभा पर्व: के सप्तचत्वारिंशोऽध्यायः (अर्थात् 47 अध्याय के श्लोक संख्या 1 से श्लोक संख्या 15 में दुर्योधन के दृष्टि भ्रम का शिकार होना और लज्जित होकर हस्तिनापुर वापस लौट जाने की घटना का वर्णन किया गया है । 

इस अध्याय का शीर्षक कुछ इस प्रकार है :दुर्योधन का मय निर्मित सभा भवन को देखना और पग पग पर भ्रम के कारण उपहास का पात्र बनना तथा युधिष्ठिर के वैभव को देखकर उसका चिन्तित होना।

वैशम्पायन उवाच: वसन् दुर्योधनस्तस्यां सभायां पुरुषर्षभ। 
शनैर्ददर्श तां सर्वा सभां शकुनिना सह ॥ 1 ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं:नरश्रेष्ठ जनमेजय : राजा दुर्योधन ने उस सभा भवन में निवास करते समय शकुनि के साथ धीरे-धीरे उस सारी सभा का निरीक्षण किया ॥ 1 ॥

तस्यां दिव्यानभिप्रायान् ददर्श कुरुनन्दनः | 
न दृष्टपूर्वा ये तेन नगरे नागसाहये ॥ 2 ॥

कुरु नन्दन दुर्योधन उस सभा में उन दिव्य अभिप्राय( दृश्यों ) को देखने लगा, जिन्हें उसने हस्तिनापुर में पहले कभी नहीं देखा था ॥ 2 ॥

स कदाचित् सभामध्ये धार्तराष्ट्रो महीपतिः। 
स्फाटिकं स्थलमासाद्य जलमित्यभिशङ्कया ॥ 3-4 ॥

एक दिन की बात है, राजा दुर्योधन उस सभा भवन में घूमता हुआ स्फटिक मणिमय स्थल पर जा पहुँचा और वहाँ जल की आशंका से उसने अपना वस्त्र ऊपर उठा लिया। इस प्रकार बुद्धि मोह हो जा नेसे उसका मन उदास हो गया और वह उस स्थान से लौटकर सभा में दूसरी ओर चक्कर लगाने लगा ॥ 3-4 ॥

ततः स्थले निपतितो दुर्मना व्रीडितो नृपः। 
निःश्वसन् विमुखश्चापि परिचक्राम तां सभाम् ॥ 5 ॥

तदनन्तर वह स्थल में ही गिर पड़ा, इससे वह मन ही मन दुखी और लज्जित हो गया तथा वहाँ से हटकर लम्बी साँसें लेता हुआ सभा भवन में घूमने लगा ॥ 5 ॥

ततः स्फाटिकतोयां वै स्फाटिकाम्बुजशोभिताम् ।
वापी मत्वा स्थलमिव सवासाः प्रापतजले ॥ 6 ॥

तत्पश्चात स्फटिकमणि के समान स्वच्छ जल से भरी और स्फटिक मणिमय कमलों से सुशोभित बावली को स्थल मानकर वह वस्त्र सहित जल में गिर पड़ा ॥ 6 ॥

जले निपतितं दृष्टा भीमसेनो महाबलः । 
जहास जहसुश्चैव किंकराश्च सुयोधनम् ॥ 7 ॥

उसे जल में गिरा देख महाबली भीमसेन हँसने लगे ॥ 7 ॥ 

वासांसि च शुभान्यस्मै प्रददू राजशासनात् । 
तथागतं तु तं दृष्ट्वा भीमसेनो महाबलः ॥ 8 ॥

उनके सेवकों ने भी दुर्योधन की हँसी उड़ायी तथा राजाज्ञा से उन्होंने दुर्योधन को सुन्दर वस्त्र दिये ॥ 8 ॥ 

अर्जुनश्च यमौ चोभी सर्वे ते प्राहसंस्तदा । 
नामर्षयत् ततस्तेषामवहासममर्षणः ॥ 9 ॥

दुर्योधन की यह दुरवस्था देख महाबली भीमसेन, अर्जुन और नकुल सहदेव सभी उस समय जोर जोर से हँसने लगे। दुर्योधन स्वभाव से ही अमर्षशील था, अतः वह उनका उपहास न सह सका ॥ 9 ॥

आकारं रक्षमाणस्तु न स तान् समुदैक्षत,
पुनर्वसनमुत्क्षिप्य प्रतरिष्यन्निव स्थलम् ॥ 10 ॥

वह अपने चेहरे के भाव को छिगये रखने के लिये उनकी ओर दृष्टि नहीं डालता था। फिर स्थल में ही जल का भ्रम हो जाने से वह कपड़े उठाकर इस प्रकार चलने लगा, मानो तैरने की तैयारी कर रहा हो ॥ १० ॥

आरुरोह ततः सर्वे जहसुश्च पुनर्जनाः । 
द्वारं तु पिहिताकारं स्फाटिकं प्रेक्ष्य भूमिपः ।
प्रविशन्नाहतो मूर्ध्नि व्याघूर्णित इव स्थितः ॥ 11 ॥

इस प्रकार जब वह ऊपर चढ़ा, तब सब लोग उसकी भ्रान्ति पर हँसने लगे । उसके बाद राजा दुर्योधन ने एक स्फटिक मणि का बना हुआ दरवाजा देखा, जो वास्तव में बंद था, तो भी खुला दीखता था। उसमें प्रवेश करते ही उसका सिर टकरा गया और उसे चक्कर सा आ गया॥11॥

तादृशं च परं द्वारं स्फाटिकोरुकपाटकम् । 
विघट्टयन कराभ्यां तु निष्क्रम्याग्रे पपात ह ॥ 12 ॥

ठीक उसी तरह का एक दूसरा दरवाजा मिला, जिसमें स्फटिक मणि के बड़े बड़े किंवाड़ लगे थे । यद्यपि वह खुला था, तो भी दुर्योधन ने उसे बंद समझकर उस पर दोनों हाथों से धक्का देना चाहा। किंतु धक्के से वह स्वयं द्वार के बाहर निकलकर गिर पड़ा ॥ 12 ॥

द्वारं तु वितताकारं समापेदे पुनश्च सः । 
तद्वत्तं चेति मन्वानो द्वारस्थाना दुपारमत् ॥ 13 ॥

आगे जाने पर उसे एक बहुत बड़ा फाटक और मिला, परंतु कहीं पिछले दरवाजों की भाँति यहाँ भी कोई अप्रिय घटना न घटित हो इस भय से वह उस दरवाजे के इधर से ही लौट आया ॥ १३ ॥

एवं प्रलम्भान् विविधान प्राप्य तत्र विशाम्पते । 
पाण्डवेयाभ्यनुज्ञातस्ततो अप्रहृऐन मनसा दुर्योधनो नृपः ॥ 14 ॥ 
राजसूये महाकतौ प्रेक्ष्य तामद्भुतामृद्धिं जगाम गजसाह्वयम् ॥ 15॥

राजन, इस प्रकार बार बार धोखा खाकर राजा दुर्योधन राजसूय महायज्ञ में पाण्डवों के पास आयी हुई अद्भुत समृद्धि पर दृष्टि डालकर पाण्डु नन्दन युधिष्ठिर की आज्ञा ले अप्रसन्न मन से हस्तिनापुर को चला गया ॥ 14-15 ॥

इस प्रकार हम देखते हैं कि दुर्योधन के दृष्टि भ्रम का शिकार होने पर दुर्योधन का मजाक न केवल भीम हीं उड़ाते हैं, बल्कि उनके साथ साथ अर्जुन, नकुल और सहदेव भी दुर्योधन पर हंसते है ।

सबसे अपमान जनक बात तो ये थी कि भीम, अर्जुन, नकुल और सहदेव के साथ साथ इन पांडवों के सेवक भी दुर्योधन को पानी में गिरा हुआ देखकर उसपर हंसने लगते है।

द्रौपदी का दुर्योधन को पानी में गिरा हुआ देखकर उसपर हंसना तथा उसको अंधे का बेटा अंधा कहकर मजाक उड़ाने का जिक्र कहीं भी नहीं आता है। ये कहानी बिल्कुल कोरी कल्पित है तथा इसका सत्य से कोई लेना नहीं है । 

तो फिर सवाल ये उठता है कि इस असत्य घटना को फैलाया किसने? यदि द्रौपदी ने दुर्योधन को अंधे का बेटा अंधा कहकर मजाक नहीं उड़ाया था, तो फिर इस बात को बताया किसने? इस असत्य और झूठी बात को फैलाया किसने?

इसका उत्तर शायद द्रौपदी के चीरहरण की घटना में छिपा हुआ है। ये सर्व ज्ञात है कि कर्ण ने द्रौपदी के चीरहरण की घटना के समय द्रौपदी को वैश्या कहकर संबोधित किया था और दुर्योधन ने उस अबला को निर्वस्त्र कर देने का आदेश दिया था।

कर्ण की दुश्मनी तो अर्जुन से थी, फिर उसने द्रौपदी के लिए इस तरह के अपमानजनक शब्दों का प्रयोग क्यों किया? दुर्योधन की घृणा पांडवों से थी तो फिर द्रौपदी के लिए इस तरह का अपमान जनक व्यवहार क्यों?

शायद दुर्योधन और कर्ण के इन निकृष्ट कदमों को उचित ठहराने के लिए ये मिथ्या फैलाई गई हो। जबकि ध्यान से देखा जाए तो पांडव , कौरव और कर्ण सारे के सारे पुरुषवादी प्रवृत्ति के शिकार हैं।

जहां पांडव द्रौपदी को एक वस्तु समझकर आपस में बांट लेते हैं, तो भीष्म पितामह अंबा, अंबिका और अंबालिका का अपहरण एक वस्तु की तरह कर लेते हैं। 

वहीं पर दुर्योधन अपने मित्र कर्ण की सहायता से भानुमति का अपहरण कर लेता है, तो कृष्ण के पुत्र सांब दुर्योधन की बेटी का अपहरण कर लेते है।

पूरे महाभारत में स्त्री का उपयोग मात्र संतानोत्पत्ति के लिए किया जाता रहा है। धृत्तराष्ट्र, पांडु, विदुर, और पांचों पांडवों का जन्म इसी बात को तो साबित करता है।

शायद इसी पुरुषवादी प्रवृत्ति के शिकार महाभारत के ये दोनों पात्र दुर्योधन और कर्ण द्रौपदी के लिए इतना अपमानजनक व्यवहार मात्र उसे वस्तु की तरह समझकर हीं करते हैं।

और शायद पांडव भी द्रौपदी को जुए में हारे हुए एक वस्तु की तरह हीं समझकर दुर्योधन के इस कदम का विरोध नही करते। अगर पांडव द्रौपदी न समझकर एक पत्नी की तरह का व्यवहार करते तो यूं चुपचाप नहीं बैठते।

जहां पर द्रौपदी का सरेआम भरी सभा में अपमान किया जा रहा था वहां पर भीष्म पितामह, गुरु द्रोणाचार्य, कृपाचार्य, धृतराष्ट्र आदि सारे बैठे हुए थे, लेकिन किसी ने इसका विरोध क्यों नहीं किया?कारण स्पष्ट है, उन सबके लिए द्रौपदी जुए में हारी गई एक वस्तु अलावा कुछ भी नहीं थी।

महाभारत में वर्णित इन घटनाओं से ये साफ जाहिर हो जाता है कि पुरुषवादी प्रवृत्ति ने हीं द्रौपदी के बारे में इस भ्रम को फैलाया था कि द्रौपदी ने दुर्योधन को अंधे का बेटा अंधा कहकर मजाक उड़ाया था, जबकि वास्तविकता तो ये है कि द्रौपदी ने ऐसा कभी नहीं कहा था।

वास्तविकता तो ये है कि दुर्योधन को पानी में गिरा हुआ देखकर द्रौपदी ने नहीं, अपितु भीम, अर्जुन, नकुल, सहदेव और उनके सहचरों ने दुर्योधन का मजाक उड़ाया था।

आश्चर्य की बात तो ये है कि इस झूठी बात को अबतक सत्य मानकर फैलाया जाता रहा और द्रौपदी पर झूठे आरोप लगाए जाते रहे। क्या द्रौपदी का चीरहरण काफी नहीं था उस पात्र को व्यथित करने के लिए कि उसपर इस तरह के झूठे आरोप लगाए गए?

अजय अमिताभ सुमन:सर्वाधिकार सुरक्षित

Monday, August 29, 2022

जनतंत्र या युद्धतंत्र

मनुष्य और पशु में अनेक अंतर हैं। इनमें से एक महत्वपूर्ण अंतर यह भी है कि जानवर अपने समाज के समग्र कल्याण के बारे में सोच नहीं सकता, जबकि मानव न केवल सोच सकता हैं अपितु और इस सोच की दिशा में कार्य भी कर सकता है।

जबकि पशु का जीवन उसकी पशु वृत्ति से हीं संचालित होता है। इस सृष्टि में जो अपने को सबसे योग्य साबित कर पाता है , वो हीं जीने के योग्य माना जाता है । इन परिस्थितियों में पशु वृत्ति एक पशु के अस्तित्व के लिए महत्वपूर्ण कड़ी भी साबित होती है। 

लेकिन इसका दूसरा पहलु ये भी है कि अपनी इसी सोच के कारण एक जानवर संतानोत्तपत्ति और क्षुधा के अलावा कुछ और सोच नहीं सकता । संतान उत्त्पन्न करना, खाना के मारना और खाने के लिए मर जाना, यही मुख्य केंद्र बिंदु होता है जानवर के जीवन का।

जबकि ज्यादा से ज्यादा लोगो के जीवन बनाने की सोंच ने मानव को बेहतर से बेहतर व्यवस्था को अपनाने को मजबूर किया । मानव की इसी सोच ने उसे घुम्मकड़ और खानाबदोश जीवन शैली का त्याग कर सामंती सभ्यता को अपनाने के लिए प्रेरित किया।

 सबकी भलाई ज्यादा से ज्यादा हो सके, अपनी इसी सोच के कारण मानव ने फिर सामंतवादी व्यवस्था के स्थान पर राजतंत्र को अपना लिया ताकि एक सुव्यवस्थित और सुनियांत्रित राजव्यस्था द्वारा ज्यादा से ज्यादा लोगों की सुरक्षा और ज्यादा से ज्यादा जनकल्याण हो सके।

जब राजशाही व्यवस्था व्यवस्था द्वारा सत्ता एक व्यक्ति के हाथों केन्द्रित हो गई और समग्र जनकल्याण के लक्ष्य को हासिल करने में सक्षम ना हो सकी तब मानव ने राजशाही का त्याग कर लोकतांत्रिक व्यवथा का वरण कर लिया। वर्तमान समय में लोकतांत्रिक व्यवस्था हीं विश्व के अधिकांश देशों में प्रचलित है। 

इतिहास गवाह है, मानव ने न केवल समग्र जनकल्याण की परिकल्पना की अपितु एक ऐसे समाज के निर्माण के लिए कड़ी मेहनत भी जो आम लोगों के कल्याण के लिए बेहतर विकल्प प्रदान कर सके। लोकतांत्रिक व्यव्यथा मानव के इसी सोच का परिणाम है।

लोकतांत्रिक व्यवस्था के मूल में आम जनता का कल्याण हीं होता है । जनतंत्र के मुलभूत विचार को संयुक्त राज्य अमरीका के महान राष्ट्रपतियों में से एक राष्ट्रपति श्री अब्राहम लिंकन के शब्दों में संक्षेपित कर प्रस्तुत किया जा सकता है। 

श्री अब्राहम लिंकन ने एक बार कहा था, "लोकतंत्र लोगों का, लोगों के लिए और लोगों द्वारा शासन है"। इसका तात्पर्य है कि लोकतंत्र सरकार वो एक प्रणाली है जिसमें आम जनता के कल्याण को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जाती है।

आम आदमी अपने जन प्रतिनिधियों को इस उम्मीद के साथ वोट देते हैं कि वो आम आदमी की दशा और दिशा में सुधार के लिए उत्कृष्ट कानून बनाएंगे। एक आम आदमी में ये आशा होती है कि जन प्रतिनिधि ऐसे कार्य करेंगे ताकि इनकी स्थिति में सुधार हो। इसी सोच और इसी दृष्टिकोण के साथ ये जन प्रतिनिधि कार्य करेंगे, ऐसी उम्मीद होती है आम आदमी की ।

 लेकिन क्या वास्तव में ऐसा ही हो रहा है ? देखने वाली बात ये है कि राजनैतिक पार्टियाँ और जनता द्वारा चुने गए जन प्रतिनिधी जनता की उम्मीदों पर खड़े उतर रहे हैं या नहीं ? हाल फिलहाल की राजनैतिक घटनाएं कुछ और हीं संकेत कर रहीं हैं।

इस लोकतांत्रिक व्यवस्था में ये अपेक्षा की जाती है की जन प्रतिनिधि अपने कामों को आधार बना कर हीं जनता का वोट मांगेंगे। परंतु हम जो देख रहे हैं, वह यह है कि इन राजनीतिक नेताओं और दलों को आम जनता के हितों की कोई परवाह नहीं है।

हाल फिलहाल में पश्चिम बंगाल , बिहार, उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, दिल्ली इत्यादि राज्यों में जो भी राजनैतिक घटनाएं दृष्टिगोचित हो रहीं है , वो कुछ ऐसा हीं परिलक्षित कर रही हैं। एक बात तो स्पष्ट है केंद्र और राज्य सरकारों के बीच तालमेल का स्पष्ट आभाव दिख रहा है । 

पश्चिम बंगाल में चुनावों के बाद वृहद पैमाने पर भड़की हुई हिंसा, उत्तर प्रदेश में चुनावी रैलियों के दौरान जन प्रतिनिधियों द्वारा एक दूसरे के खिलाफ अमर्यादित भाषा का उपयोग आखिर क्या साबित करता है? 

कभी कभी तो लगता है कि ये राजनैतिक पार्टियाँ एक दुसरे की दुश्मन हैं । राजनैतिक मंचों पर गला फाड़ फाड़ के एक दुसरे के व्यक्तित्व का मजाक उड़ना , और इस प्रक्रिया में किसी भी हद तक चले जाना इन लोगो की फितरत बनती जा रही है ।

किसी एक राजनैतिक पार्टी को कटघरे में खड़ा करना अनुचित है। महाराष्ट्र में जिस तरह शिव सेना टूटकर भारतीय जनता से मिलकर सरकार बनाती है तो बिहार में बिल्कुल विपरीत घटना क्रम दिखाई पड़ता है। 

बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार फिर भारतीय जनता पार्टी से अपना पल्ला झाड़कर आर. जे. डी. के साथ मिल जाते हैं तो सरकार के बदलने के साथ साथ हीं संजय राउत का जेल के अंदर जाना और दिल्ली में आम आदमी पार्टी पर रेड पड़ना। अजीब तरह की राजनीति दिखाई पड़ रही है इस देश में।  

ऐसा लगता है लोगों द्वारा चुने जाने के बाद, ये नेता अपने मिशन से बिल्कुल भटक जा रहे हैं । आज कल जब हम टी.वी. पर इन नेताओं द्वारा किए गए राजनीतिक डिबेट को देखते है तो हमें दिखाई पड़ता हीं क्या है, केवल अमर्यादित आरोपों और प्रत्यारोपों के सिवा।  

तमाम नेता और राजनैतिक पार्टियां आपस में लड़ने और एक-दूसरे को बेवकूफ बनाने की होड़ में लगी हुई हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि इन राजनेताओं का मुख्य लक्ष्य चुनाव जीतना हीं रह गया है। ऐसा प्रतीत हो रहा है कि केंद्र और राज्य सरकारें एक दुसरे के साथ नहीं अपितु अपने अपने विकास करने के लिए उत्सुक है । 

राजनैतिक चुनाव और युद्ध में कोई अंतर दिखाई नही पड़ रहा है। कहते हैं कि युद्ध और प्रेम में सबकुछ जायज है। परंतु आज कल का जो राजनैतिक माहौल बन पड़ा है , ऐसा लगता है कि शायद अब ये कहना उचित होगा कि युद्ध, प्रेम, राजनीति और चुनाव में सबकुछ जायज है। 

देश में राजनैतिक पार्टियों द्वारा सरकारी तंत्र जैसे कि सी . बी.आई. और ई. डी.का दुरुपयोग, जाति और धर्म के नाम पर हिंसा करने और जन प्रतिनिधियों द्वारा आम जनता में हिंसात्मक प्रवृत्ति को फ़ैलाने की कोशिश और क्या साबित करती है? 

आम आदमी पार्टी का मुख्य मुद्दा आम आदमी का कल्याण ही रहा है। लेकिन जिस तरह शराब के दुकानों को धडदल्ले से शराब बेचने की छूट दिल्ली में दी जा रही थी उससे जनता का किस तरह से भला हो रहा था, ये बिल्कुल समझ से बाहर है। 

अभी अभी 28 अगस्त को कोर्ट की ऑर्डर के तहत ट्विन टावर को ध्वस्त किया गया। कोर्ट के आर्डर के कारण भस्म हो गया भ्रष्टाचार का आलीशान भवन । लेकिन ट्विन टावर का ध्वस्त होना इस बात को फिर से साबित करता है कि भष्टाचार की जड़े हमारे जनतांत्रिक मूल्यों को बिल्कुल दीमक की तरह चाट रही हैं। 

ये तो अच्छा है कोर्ट ने लोकतांत्रिक ताने बाने को बचाये रखने में अबतक महत्वपूर्ण भूमिका अदा की हैं । लेकिन महत्वपूर्ण सवाल है कि क्या केवल कोर्ट की हीं जिम्मेवारी है कि वो लोकतांत्रिक मूल्यों को बचा कर रखे ?

फिर आम जनता द्वारा चुने हुए इन जन प्रतिनिधियों का क्या औचित्य ? क्या राजनैतिक पार्टियाँ और जन प्रतिनिधि निज स्वार्थ की पूर्ति हेतु हीं काम करते रहेंगे , जैसे कि आजकल के राजनैतिक परिदृश्य में दृष्टिगोचित हो रहा है । 

जनकल्याण की भावना का स्थान स्व पार्टी कल्याण ने ले लिया है और निहित स्वार्थ के लिए राजनैतिक पार्टियां और जनप्रतिनिधी किसी भी हद तक जाने को ऐसे तैयार बैठे हुए है, जैसे कि देश में जनतंत्र नहीं अपितु युद्धतंत्र हीं हैं।

यह देश में बहुत ही दुखद परन्तु सच्ची स्थिति है। ऐसा प्रतीत होता है कि शासन की वर्तमान शैली पूरी तरह से पशु प्रवृत्ति पर हावी है। जिस पशु प्रवृत्ति से आगे बढ़कर मानव ने बेहतर से बेहतर शासन प्रणाली को अपनाया , अब वो सारे के सारे मानवीय मूल्य धराशायी प्रतीत हो रहे हैं । 

केंद्र की सरकार हो या की राज्य की सरकारें, सारी की सारी सरकारें युद्ध की प्रवृत्ति से संचालित हो रही है। जिसको जहाँ मौका मिल रहा है , एक दुसरे को हानि पहुँचाने से चुक नहीं रहे हैं । ऐसा प्रतीत होता है कि शासन का मूल रूप अब लोकतंत्र के बजाय युद्धतंत्र है। 

सवाल यह है कि शासन के इस मौजूदा स्वरूप से कैसे लड़ा जाए? इस प्रवृत्ति को मिटाने का लोकतांत्रिक तरीका क्या हो सकता है? आखिर कैसे इन राजनैतिक पार्टियों को जन प्रतिनिधियों को समझाया जाये जनतांत्रिक शासन व्यवस्था का आधार जनता का कल्याण है , ना कि खुद का कल्याण ।

प्रजातान्त्रिक व्यवस्था के मूल में जनता हीं होती है तो इस प्रश्न का जवाब जनता को हीं देना होगा। इस समस्या का समाधान भी आम जनता को हीं निकलना होगा ? लेकिन कब और कैसे , ये तो भविष्य हीं बता पायेगा। लेकिन हमारे पास इसका समाधान निकलने तक इंतजार करने के अलावा कोई और विकल्प बचा हीं क्या है?

अजय अमिताभ सुमन: सर्वाधिकार सुरक्षित

Sunday, August 28, 2022

वर्तमान से वक्त बचा लो: पंचम भाग

 

विवाद अक्सर वहीं होता है, जहां ज्ञान नहीं अपितु अज्ञान का वास होता है। जहाँ ज्ञान की प्रत्यक्ष अनुभूति  होती है, वहाँ  वाद, विवाद या प्रतिवाद क्या स्थान ?  आदमी के हाथों में  वर्तमान समय के अलावा कुछ भी नहीं होता। बेहतर तो ये है कि इस अनमोल पूंजी को  वाद, प्रतिवाद और विवाद में बर्बाद करने के बजाय अर्थयुक्त संवाद में लगाया जाए, ताकि किसी अर्थपूर्ण निष्कर्ष पर पहुंचा जा सके। प्रस्तुत है मेरी कविता "वर्तमान से वक्त बचा लो तुम निज के निर्माण में" का पंचम भाग।

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वर्तमान से वक्त बचा लो

पंचम भाग 

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क्या रखा है वक्त गँवाने 

औरों के आख्यान में,

वर्तमान से वक्त बचा लो 

तुम निज के निर्माण में।

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अर्धसत्य पर कथ्य क्या हो

 वाद और प्रतिवाद कैसा?

तथ्य का अनुमान क्या हो 

ज्ञान क्या संवाद कैसा?

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प्राप्त क्या बिन शोध के 

बिन बोध के अज्ञान में ? 

वर्तमान से वक्त बचा लो 

तुम निज के निर्माण में।

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जीवन है तो प्रेम मिलेगा 

नफरत के भी हाले होंगे ,

अमृत का भी पान मिलेगा 

जहर उगलते प्याले होंगे ,

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समता का तू भाव जगा 

क्या हार मिले सम्मान में?

वर्तमान से वक्त बचा लो 

तुम निज के निर्माण में।

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जो बिता वो भूले नहीं 

भय है उससे जो आएगा ,

कर्म रचाता मानव जैसा 

वैसा हीं फल पायेगा।

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यही एक है अटल सत्य 

कि रचा बसा लो प्राण में , 

वर्तमान से वक्त बचा लो 

तुम निज के निर्माण में।

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क्या रखा है वक्त गँवाने 

औरों के आख्यान में,

वर्तमान से वक्त बचा लो 

तुम निज के निर्माण में।

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अजय अमिताभ सुमन:

सर्वाधिकार सुरक्षित 

Saturday, August 13, 2022

पलटू



इस सृष्टि में बदलाहटपन स्वाभाविक है। लेकिन इस बदलाहटपन में भी एक नियमितता है। एक नियत समय पर हीं दिन आता है, रात होती है। एक नियत समय पर हीं मौसम बदलते हैं। क्या हो अगर दिन रात में बदलने लगे? समुद्र सारे नियमों को ताक पर रखकर धरती पर उमड़ने को उतारू हो जाए? सीधी सी बात है , अनिश्चितता का माहौल बन जायेगा l भारतीय राजनीति में कुछ इसी तरह की अनिश्चितता का माहौल बनने लगा है। माना कि राजनीति में स्थाई मित्र और स्थाई शत्रु नहीं होते , परंतु इस अनिश्चितता के माहौल में कुछ तो निश्चितता हो। इस दल बदलू, सत्ता चिपकू और पलटूगिरी से जनता का भला कैसे हो सकता है? प्रस्तुत है मेरी व्ययंगात्मक कविता "मान गए भई पलटू राम"। 

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तेरी पर चलती रहे दुकान,

मान गए भई पलटू राम।

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कभी भतीजा अच्छा लगता,

कभी भतीजा कच्चा लगता,

वोहीं जाने क्या सच्चा लगता,

ताऊ का कब  नया पैगाम ,

अदलू, बदलू, डबलू  राम,

तेरी पर चलती रहे दुकान।

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जहर उगलते अपने चाचा,

जहर निगलते अपने चाचा,

नीलकंठ बन छलते चाचा,

अजब गजब है तेरे काम ,

ताऊ चाचा रे तुझे  प्रणाम,

तेरी पर चलती रहे दुकान।

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केवल चाचा हीं ना कम है,

भतीजा भी एटम बम है,

कल गरम था आज नरम है,

ये भी कम ना सलटू राम,

भतीजे को भी हो सलाम,

तेरी पर चलती रहे दुकान।

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मौसम बदले चाचा बदले,

भतीजे भी कम ना बदले,

पकड़े गर्दन गले भी पड़ले।

क्या बच्चा क्या चाचा जान,

ये भी वो भी पलटू राम,

इनकी चलती रहे दुकान।

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कभी ईधर को प्यार जताए,

कभी उधर पर कुतर कर खाए,

कब किसपे ये दिल आ जाए, 

कभी ईश्क कभी लड़े धड़ाम,

रिश्ते नाते सब कुर्बान,

तेरी पर चलती रहे दुकान।

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थूक चाट के बात बना ले,

जो  मित्र था घात लगा ले,

कुर्सी को हीं जात बना ले,

कुर्सी से हीं दुआ सलाम,

मान गए भई पलटू राम,

तेरी पर चलती रहे दुकान।

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अहम गरम है भरम यही है,

ना आंखों में शरम कहीं है,

सबकुछ सत्ता धरम यही है,

क्या वादे कैसी है जुबान ,

कुर्सी चिपकू बदलू राम,

तेरी पर चलती रहे दुकान।

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चाचा भतीजा की जोड़ी कैसी,

बुआ और बबुआ के जैसी,

लपट कपट कर झटक हो वैसी,

ताक पे रख कर सब सम्मान,

धरम करम इज्जत  ईमान,

तेरी पर चलती रहे दुकान।

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अदलू, बदलू ,झबलू राम,

मान  गए भई पलटू राम।

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अजय अमिताभ सुमन

सर्वाधिकार सुरक्षित 


Saturday, July 16, 2022

कैसे बना दुर्योधन का शरीर वज्र का


महाभारत के अंतिम पल में जब भीम और दुर्योधन के बीच  निर्णायक युद्ध चल रहा था तब भीम की अनगिनत कोशिशों के बावजूद दुर्योधन के शरीर को कोई भी हानि नहीं पहुंच रही थी। भीम द्वारा दुर्योधन के शरीर पर गदा से बार बार प्रहार करने के बावजूद दुर्योधन का शरीर जस का तस बना हुआ था।  इसका कारण ये था कि दुर्योधन के शरीर के कमर से ऊपर का हिस्सा वज्र की भांति मजबूत था।

जब भीम दुर्योधन को किसी भी प्रकार हरा नहीं पा रहे थे तब भगवान श्रीकृष्ण द्वारा निर्देशित किए जाने पर युद्ध की मर्यादा का उल्लंघन करते हुए छल द्वारा भीम ने  दुर्योधन की जांघ पर प्रहार किया जिस कारण दुर्योधन घायल हो गिर पड़ा और अंततोगत्वा उसकी मृत्यु हो गई। प्रश्न ये उठता है कि आम मानव का शरीर तो वज्र का बना नहीं होता , फिर  दुर्योधन का शरीर वज्र का कैसे बन गया था? उसका शरीर वज्रधारी किस प्रकार बना?

आम किदवंती है कि जब महाभारत का युद्ध अपने अंतिम  दौर में चल रहा था और कौरवों में केवल दुर्योधन हीं बच गया था तब कौरवों की माता गांधारी ने अपने बचे हुए एकमात्र पुत्र दुर्योधन की जान बचाने के लिए उससे कहा वो उनके सामने निर्वस्त्र होकर आ जाये।

किदवंती ये कहती हैं की दुर्योधन की माता गांधारी सत्यवती नारी थी। जब उनको ये ज्ञात हुआ कि उनके पति घृतराष्ट्र अंधे हैं, तो उन्होंने भी अपनी आंखों पर पट्टी बांध लिया।

उनकी सतित्त्व के कारण उनकी आंखों में दिव्य शक्ति आ गई थी। उनकी आंखों में इतनी ऊर्जा समाई हुई थी कि उनकी दृष्टि जिसपर भी पड़ती, वो वज्र की भांति मजबूत हो जाता। माता गांधारी अपनी इसी दिव्य शक्ति का उपयोग कर दुर्योधन का शरीर वज्र का बनाना चाहती थी। 

इसी उद्देश्य से माता गांधारी ने दुर्योधन को अपने सामने पूर्ण रूप से निर्वस्त्र होकर आने को कहा था ताकि दुर्योधन का शरीर पूर्ण रूप से वज्र की तरह मजबूत हो जाए और उसपर किसी भी भांति के अस्त्रों या शस्त्रों का प्रभाव न हो सके। 

ऐसा माना जाता है की अपनी माता की बात मानकर दुर्योधन नग्न अवस्था में हीं अपनी माता गांधारी से मिलने चल पड़ा था। परन्तु मार्ग में ही दुर्योधन की मुलाकात श्रीकृष्ण से हुई। श्रीकृष्ण ने दुर्योधन के साथ इस तरीके से मजाक किया कि दुर्योधन पूर्ण नग्न अवस्था में अपनी माता के पास नहीं जा सका।

ऐसा कहा जाता है कि जब अपनी माता की आज्ञानुसार दुर्योधन जा रहा था तो  भगवान श्रीकृष्ण ने उसे रास्ते में हीं रोक लिया और दुर्योधन से मजाक करते हुए  कहा  कि माता गांधारी के पास इस तरह नग्न अवस्था में मिलने क्यों जा रहे हो ? तुम कोई छोटे से बच्चे तो हो नहीं, फिर इस तरह का व्यवहार क्यों?

जब दुर्योधन ने पूरी बात बताई तब श्रीकृष्ण जी ने उसको अपने कमर के निचले हिस्से को पत्तों से ढक लेने के लिए कहा । इससे माता की आज्ञा का पालन भी हो जाएगा और दुर्योधन जग हंसाई  से भी बच जायेगा। दुर्योधन को श्रीकृष्ण की बात उचित हीं लगी।

दुर्योधन भगवान श्रीकृष्ण की छल पूर्ण बातों का शिकार हो गया।  श्रीकृष्ण की सलाह अनुसार उसने अपने कमर के निचले हिस्से को पत्तों से ढँक लिया और उसी अवस्था में माता फिर गांधारी के समक्ष उपस्थित हुआ। 

उसके बाद दुर्योधन की माता ने जैसे हीं अपने नेत्र खोले, उनकी दृष्टि दुर्योधन के नग्न शरीर पर पड़ी जिसकी वजह से उसका शरीर वज्र के समान कठोर हो गया। परंतु उसके जांघ मजबूत नहीं हो सके क्योकि उसकी माता  गांधारी की दृष्टि पत्तों के कारण कमर के निचले भाग पर नहीं पड़ सकी। इस कारण उसके कमर का निचला भाग कमजोर रह गया । इस तरह की कहानी हर जगह मिलती है।

किन्तु जब हम महाभारत का अध्ययन करते हैं , तो दूसरी हीं बात निकल कर आती है । पांडवों के वनवास के दौरान जब दुर्योधन को चित्रसेन नामक गंधर्व ने बंदी बना लिया था और फिर अर्जुन ने चित्रसेन से युद्ध कर दुर्योधन को छुड़ा लिया था , तब दुर्योधन आत्म ग्लानि से भर गया और आमरण अनशन पर बैठ गया।

इस बात का वर्णन महाभारत में घोषयात्रा पर्व के विपक्षाशदधिकद्विशततमोऽध्यायः में मिलता है। घोषणा पर्व में इस बात का जिक्र आता है कि दुर्योधन के आमरण अनशन पर बैठ जाने के बाद उसको कर्ण , दु:शासन और शकुनी आदि उसे अनेक प्रकार से समझाने की कोशिश करते हैं फिर भी दुर्योधन नहीं मानता।

दुर्योधन की ये अवस्था देखकर दानव घबरा जाते है कि अगर दुर्योधन मृत्यु को प्राप्त हो जाता है तो  उनका पक्ष इस दुनिया में कमजोर हो जायेगा। इस कारण वो दुर्योधन को पाताल लोक ले जाते है और उसको नाना प्रकार से समझाने की कोशिश करते हैं । इसका जिक्र कुछ इस प्रकार आता है। दानव दुर्योधन से कहते हैं:

भोः सुयोधन राजेन्द्र भरतानां कुलोहह । 

शूरैः परिवृतो नित्यं तथैव च महात्मभिः ॥ १ ॥ 

अकार्षीः साहस मिदं कस्मात् प्रायोपवेशनम् । 

आरमत्यागी हाधोयाति वाच्यतां चायशस्करीम्॥२॥

दानव बोले-भारतवंश का भार वहन करने वाले महाराज दुर्योधन ! आप सदा शूरवीरों तथा महामना पुरुषों से घिरे रहते हैं। फिर आपने यह आमरण उपवास करने का साहस क्यों किया है? आत्म हत्या करने वाला पुरुष तो अधो गतिको प्राप्त होता है और लोक में उसकी निन्दा होती है, जो अवश फैलाने वाली है॥ 

न हि कार्यविरुडेपु बहुपापेषु कर्मसु । 

मूलघातिपुसश्यन्ते बुद्धिमन्तो भवविधाः ॥ ३ ॥

जो अभी कार्यों के विरुद्ध पढ़ते हों,  जिनमें बहुत पाप भरे हो तथा जो अपना विनाश करनेवाले हो, ऐसे आत्महत्या आदि अक्षम विचार आप-जैसे बुद्धिमान पुरुष को शोभा नहीं देता ॥३॥ 

नियच्छनां मति राजन धर्मार्थसुखनाशिनीम्।

श्रूयतां तु प्रभो तश्यं दिव्यतां चारमनो नृप। 

यशःप्रतापपीयी शां हर्षवर्धनीम् ॥ ४॥

निर्मार्ण च शरीरमा तातो धैर्यमवाप्नुहि ॥ ५ ॥

प्रभो ! एक रहस्य की बात सुनिये । नरेश्वर राजन ! आपका यह आत्म हत्या सम्बन्धी विचार धर्म , अर्थ पराक्रम का नाश करने वाला तथा शत्रुओ का हर्ष बढ़ाने वाला है । 

दुर्योधन को फिर भी निराश होते देख दानव आगे बताते हैं कि दानवों ने अति श्रम करके दुर्योधन का वज्रधारी शरीर भगवान शिव की आराधना करके प्राप्त किया था।  

पूर्वकायश्च पूर्वस्ते निर्मितो वज्रसंचयैः ॥ ६ ॥

राजन् ! पूर्वकाल में हमलोगों ने तपस्या द्वारा भगवान शंकर की आराधना करके आपको प्राप्त किया था । आपके शरीर का पूर्वभाग-जो नाभि से ऊपर है वज्र समूहसे बना हुआ है ।। ६ ॥ 

अस्त्रैरभेद्यः शस्त्रैश्चाप्यधः कायश्च तेऽनघ । 

कृतः पुष्पमयो देव्या रूपतः स्त्रीमनोहरः॥ ७ ॥

वह किसी भी अस्त्र-शस्त्र से विदीर्ण नहीं हो सकता। अनघ ! उसी प्रकार आपका नाभि से नीचे का शरीर पार्वती देवी ने पुष्प मय बनाया है, जो अपने रूप-सौन्दर्यसे स्त्रियों के मनको मोहने वाला है ।। ७ ॥ 

एवमीश्वरसंयुक्तस्तव देहो नृपोत्तम । 

देव्या च राजशार्दूल दिव्यस्त्वं हि न मानुषः ॥ ८ ॥

नृप श्रेष्ठ ! इस प्रकार आपका शरीर देवी पार्वती के साथ साक्षात भगवान महेश्वर ने संघटित किया है । अतः राज सिंह ! आप मनुष्य नहीं, दिव्य पुरुष हैं ॥ ८ ॥   

इस प्रकार हम देखते हैं कि दुर्योधन के शरीर का पूर्वभाग-जो नाभि से ऊपर था , उसको भगवान शिव ने दानवों के आराधना करने पर वज्र का बनाया था और उसके शरीर के कमर से निचला भाग पार्वती देवी ने बनाया था , जो कि स्त्रियों के अनुकूल कोमल था।

दानव फिर दुर्योधन को आने वाले समय में इंद्र द्वारा छल से कर्ण के कवच कुंडल मांगे जाने की भी बात बताते हैं ।

शात्वैतच्छद्मना वज्री रक्षार्थ सव्यसाचिनः। 

कुण्डले कवचं चैव कर्णस्यापहरिष्यति ॥२२॥

इस बात को समझकर वज्र धारी इन्द्र अर्जुन की रक्षा के लिये छल करके कर्ण के कुण्डल और कवचका अपहरण कर लेंगे ॥ २२ ॥ 

तस्मादस्माभिरप्यत्र दैत्याः शतसहस्रशः। 

नियुक्ता राक्षसाश्चैव ये ते संशप्तका इति ॥ २३ ॥ 

प्रख्यातास्तेऽर्जुनं वीरं हनिष्यन्ति च मा शुचः। 

असपत्ना त्वयाहीयं भोक्तव्या वसुधा नृप ॥ २४ ॥

इसीलिये हमलोगों ने भी एक लाख दैत्यों तथा राक्षसों को इस काममें लगा रखा है, जो संशप्तक नाम से विख्यात हैं। वे वीर अर्जुनको मार डालेंगे । अतः आप शोक न करें। नरेश्वर ! आपको इस पृथ्वीका निष्कंटक राज्य भोगना है ॥ 

मा विषादं गमस्तस्मान्नैतत्त्वय्युपपद्यते। 

विनष्टे त्वयि चास्माकं पक्षो हीयेत कौरव ॥२५॥

अतः कुरुनन्दन ! आप विषाद न करें । यह आपको शोभा नहीं देता है। आपके नष्ट हो जाने पर तो हमारे पक्ष का ही नाश हो जायगा ॥ २५ ॥  

यच्च तेऽन्तर्गतं वीर भयमर्जुनसम्भवम् । 

तत्रापि विहितोऽस्माभिर्वधोपायोऽर्जुनस्य वै ॥ १९ ॥

वीर ! आपके भीतर जो अर्जुनका भय समाया हुआ है, वह भी निकाल देना चाहिये, क्योंकि हमलोगों ने अर्जुनके वध का उपाय भी कर लिया है ।। १९ ।।

हतस्य नरकस्यात्मा कर्णमूर्तिमुपाश्रितः । 

तद् वैरं संस्मरन् वीर योत्स्यते केशवार्जुनौ ॥ २० ॥

श्रीकृष्ण के हाथों जो नरकासुर मारा गया है, उसकी आत्मा कर्ण के शरीर में घुस गयी है। वीरवर ! वह (नरकासुर ) उस वैर को याद करके श्रीकृष्ण और अर्जुन से युद्ध करेगा |

इस प्रकार दुर्योधन को बहुत पहले हीं ज्ञात हो गया था कि कर्ण के साथ छल किया जायेगा । दुर्योधन को ये भी ज्ञात हो गया था कि कर्ण के शरीर में भगवान श्रीकृष्ण द्वारा मारे गए राक्षस नरकासुर का वास हो जायेगा जो दुर्योधन की तरफ से प्रचंड रूप से लड़ेगा।

इस प्रकार इस बात के लिए कर्ण को दोष नहीं दिया जा सकता कि इंद्र के द्वारा कवच कुंडल मांगे जाने पर उसने  दुर्योधन की हित का ध्यान दिए बिना कवच और कुंडल  इंद्र को समर्पित कर दिया।

अपितु दुर्योधन को स्वयं हीं भविष्य में घटने वाली इस बात से कर्ण को चेता देना चाहिए था। खैर कर्ण को ये बात पता चल हीं गई थी, क्योंकि उसके पिता सूर्य ने इस बात के लिए कर्ण को पहले हीं सावधान कर दिया था।

नरकासुर के बारे में पुराणों में लिखा गया है कि वो प्राग ज्योति नरेश था। इस क्षेत्र को आज कल आसाम के नाम से जाना जाता है।नरकासुर को वरदान प्राप्त था कि वो किसी नर द्वारा नहीं मारा जा सकता था।

इसी कारण भगवान श्री कृष्ण ने अपनी पत्नी सत्यभामा की सहायता से नरकासुर का वध किया था। दानव दुर्योधन को उसी नरकासुर के बारे में बताते हैं कि उसकी आत्मा कर्ण में प्रविष्ट होकर श्रीकृष्ण तथा अर्जुन से अपना बैर साधेगी। दानव दुर्योधन को आगे बताते हैं।

राजन् ! दैत्यों तथा राक्षसों के समुदाय क्षत्रिय योनि में उत्पन्न हुए हैं, जो आपके शत्रुओं के साथ पराक्रम पूर्वक युद्ध करेंगे। वे महाबली वीर दैत्य आपके शत्रुओं पर गदा, मुसल, शूल तथा अन्य छोटे-बड़े अस्त्र-शस्त्रों द्वारा प्रहार करेंगे || 

जब दानवों ने दुर्योधन को ये भी बताया कि उन्होंने उसकी सहायता के लिए लाखों दैत्यों और राक्षसों को लगा रखा है , तब उसका विश्वास लौट आया और उसने आमरण अनशन का विचार त्याग दिया।

इस प्रकार हम देखते हैं कि महाभारत के घोषणा पर्व में दुर्योधन के कमर से उपरी भाग के शरीर का वज्र से बना हुआ होने का कारण दानवों द्वारा शिव की आराधना के कारण बताया गया है जिसे भगवान शिव ने दानवों की उपासना करने पर बनाया था।

और दुर्योधन के शरीर का निचला भाग कोमल था क्योकि उसे माता पार्वती ने स्त्रियों को मोहने के लिए बनाया था । इस प्रकार हम देखते हैं कि माता गांधारी की दिव्य  दृष्टि के कारण नहीं अपितु भगवान शिव और माता पार्वती की कृपा के कारण , जो कि दानवों की तपस्या के कारण मिली थी, दुर्योधन का शारीर वज्र का बना था।

अजय अमिताभ सुमन: सर्वाधिकार सुरक्षित 

Monday, July 11, 2022

गुमान



खुद की धड़कन से अनजान, 
फिर किस बात का गुमान?

इतिहास गवाह है , पत्थर की कंदराओं में रहने वाला आदिम पुरुष ने अतुलनीय उपलब्धि हासिल की है। समय के साथ साथ न केवल उसने स्वयं को बदलते हुए मौसम के अनुसार ढाला अपितु समय की मांग के अनुसार पेड़ों पर जो उसने अपना बसेरा बनाया था , उसका त्याग कर जमीन पर उतर आया।

एक चौपाए से दो पैरों पर खड़े होने की दास्तान , मुठ्ठी में लकड़ी पकड़ सकने की शक्ति का विकास , पहिए की खोज और अग्नि का नियंत्रित उपयोग इसके महत्वपूर्ण खोजों में से एक है।

पत्थरों के टुकड़ों पे जीने वाला, कच्चा मांस खाने वाला आदि पुरुष, जल से डरने वाला आदि पुरुष , चांद, सूरज, आंधी , तूफान से डरने वाला आदमी समय बीतने के साथ  समंदर की गहराइयों में उतर गया।

कभी चांद की पूजा करने वाला मानव चांद पर चढ़ गया, आसमान के बादलों की गड़गड़ाहट से डरने वाला आदमी अब बादलों को चीरकर प्रतिदिन हीं यात्रा कर रहा है। कितना अद्भुत विकास रहा है आदिम पुरुष का।

पहले हर समस्या को भगवान के आश्रय डालने वाला आदमी आज खुद ईश्वर के अनुसंधान में जुटा पड़ा है।पूरी सृष्टि के जन्म की गुत्थी को सुलझाने में व्यस्त है आज आदमी।

कितनी भारी विडंबना है। चांद, तारों, ग्रहों की खोज करने वाला आदमी आज खुद से अनजान है। हंसी के पीछे छुपाए हुए दर्द को , प्रशंसा के पीछे छुपी हुई वैमनस्य की भावना को समझने में आज भी नाकाम है आदमी। 

आकाश में उड़ान भरने वाले आदमी के हौसले कब और क्यों जमीन पर अचानक गिर पड़ते हैं, गगनचुंबी इमारतों में रहनेवाले आदमी के लिए क्यों महल भी कम पड़ते हैं?

इस विकास पर कैसा घमंड? पलक छपकते हीं इस दुनिया के दूसरे कोने पर बैठे आदमी से बात करने में सक्षम आदमी क्यों एक हीं कमरे में बैठे साथी के बीच दिलों के दूरियों को पाट नहीं पाता?

गणित की अनगिनत गुत्थियों को सुलझाने वाले आदमी के पास अभी भी क्यों इस बात का जवाब नहीं है कि एक हीं व्यक्ति किसी के लिए अति प्रेम का वस्तु होता है तो दूसरे के लिए वोही घृणा का पात्र कैसे बन जाता है?

इस विकास पर किस तरह का अभिमान, कि आदमी को आज भी इस बात का ज्ञान नहीं कि आदमी स्वयं में क्या है? क्या ये विडंबना नहीं है कि पूरी दुनिया को जानने की कोशिश करने वाला आदमी आज भी खुद से अनजान है।

खुद की सांसों की नाप लेने में असक्षम आदमी दुनिया की माप लेने में व्यस्त है और इस बात का अभिमान भी है। कितनी आश्चर्य की बात है?

अजय अमिताभ सुमन:सर्वाधिकार सुरक्षित 

न्याय सम्राट अशोक का

कुछ साल पहले की बात है। दिल्ली हाई कोर्ट के एक माननीय न्यायधीश रिटायर हो रहे थे। दिल्ली हाई कोर्ट बार एसोसिएशन की तरफ से उनके सम्मान में एक पार्टी आयोजित की गई थी। जब माननीय न्यायाधीश महोदय अपने कार्यकाल का अनुभव प्रस्तुत कर रहे थे तो बातों बातों में उन्होंने एक कहानी सुनाई। ये कहानी बहुत हीं प्रासंगिक है। ये कहानी सम्राट अशोक से संबंधित है।

सम्राट अशोक यदा कदा रात को वेश बदलकर अपने राज्य का दौरा करते थे। वेश बदलकर राज्य का दौरा करने का मकसद ये था कि वो जान सकें कि उनके राज्य में उनके आधीन राज्याधिकारी प्रजा के साथ किस तरह का व्यवहार कर रहे हैं?एक बार रात को वो अपना वेश बदल कर बाहर निकले। जब राज्य का दौरा कर वो वापस अपने महल में आए तो महल के दरवाजे पर खड़े दो द्वारपालों ने उन्हें रोक लिया। 

जब सम्राट अशोक ने अपना परिचय दिया तब भी दोनों द्वारपाल नहीं माने। उन दोनों द्वारपालो ने सम्राट अशोक को बताया कि उनकी नियुक्ति अभी नई नई हुई है। वो सम्राट अशोक को नहीं पहचानते। इसलिए सम्राट अशोक को थोड़ी देर इंतजार करने के लिए कहा।

एक द्वारपाल अपने उच्च अधिकारी से मिलने चला गया ताकि उचित आदेश ले कर आगे की कार्यवाही पूरा कर सके। रात्रि का पहर था, उच्च अधिकारी सो रहा था , इसलिए उसे जगाकर लाने में देरी हो रही थी।इधर सम्राट अशोक लंबे समय तक महल के दरवाजे के बाहर खड़े खड़े परेशान हो रहे थे। जब उन्होंने जबरदस्ती महल के भीतर जाने की कोशिश की तो द्वारपाल ने उन्हें धक्का दे दिया।

गुस्से में आकर सम्राट अशोक ने उस द्वारपाल की हत्या कर दी। जबतक उच्च अधिकारी दूसरे द्वारपाल के साथ महल के दरवाजे पर आया तबतक सम्राट अशोक के हाथ में रक्तरंजित तलवार और द्वारपाल का प्राणहीन शहरी पड़ा था। अगले दिन द्वारपाल की मृत्यु का समाचार चारो तरफ फैल गया। महल के एक एक अधिकारी को ज्ञात हो गया की द्वारपाल की हत्या सम्राट अशोक के हाथों हो गई है।

नियमानुसार सम्राट अशोक को हीं मामले की शुरुआत करनी थी। उस हत्या के मामले में तहकीकात करनी थी।लिहाजा उन्होंने उसी उच्च अधिकारी को मामले की तहकीकात करने की जिम्मेदारी सौंपी। सम्राट अशोक के पास असीमित ताकत थी। वो मामले को रफा दफा भी कर सकते थे। लेकिन उन्होंने असीमित शक्ति के साथ साथ अपनी जिम्मेदारी भी समझी। उन्हें पता था कि वो ही उच्च अधिकारी सही गवाही दे सकता है, इसलिए उसी को चुना।

जब मामले की तहकीकात कर लेने के बाद उच्च अधिकारी ने दरबार लगाने की मांग की , तब सम्राट अशोक ने नियत समय दरबार लगाया।उस भरे दरबार में उच्च अधिकारी ने पूरी घटना का वर्णन किया। और बताया कि उस द्वारपाल का हत्यारा सम्राट अशोक हीं है। हालांकि उस वध में सम्राट अशोक के साथ साथ अनेपक्षित परिस्थियां भी जिम्मेदार थी। सम्राट अशोक ने बड़ी विनम्रता के साथ उस आरोप को स्वीकार किया।

इस कहानी को सुनाकर माननीय न्यायाधीश ने बताया कि आजीवन उन्होंने अपने कोर्ट को वैसे हीं चलाया। ऐसा देखा जाता है कि मामले की सुनवाई के दौरान कुछ माननीय न्यायधीश अनावश्यक टिप्पणियां करते रहते है। एडवोकेट और पार्टी को अनावश्यक रूप से डांटते रहते हैं।ये उचित नहीं। एक न्यायाधीश के।सहिष्णु होना बहुत जरूरी है। यदि माननीय न्यायधीश डर का माहौल कर दे तो फिर एक तानाशाह और न्यायधीश में अंतर क्या रह पाएगा।

उन्होंने आगे कहा कि न्यायधीश तो ऐसा होना चाहिए कि आम आदमी उसके पास आकर अपनी बात खुलकर रख रखे। यहां तक कि उसके खिलाफ भी बोल सके।एक न्यायधीश ईश्वर नहीं होता। फिर भी यदि ईश्वर के हाथों भी गलती हो जाती है तो फिर एक न्यायधीश की क्या औकात? एक न्यायधीश को न्यायिक प्रक्रिया के दौरान अनावशक टिप्पणी करने से बचना चाहिए। और यदि अनावश्यक टिप्पणी करते हैं तो जनता की बीच उठी आवाज को सुनने को क्षमता भी होनी चाहिए।

माननीय न्यायाधीश ईश्वर तो होते नहीं। आखिर हैं तो ये भी एक इंसान हीं। यदि आप ईश्वर की तरह शक्ति और सम्मान चाहते हो तो। ईश्वर की तरह व्यवहार भी करो। हालांकि गलतियां ईश्वर से भी तो हो जाती है। तो ईश्वर की तरह असीमित धीरज भी तो रखो।कोई भी न्याय व्यवस्था से ऊपर नहीं हो सकता। यहां तक कि न्यायधीश भी। कौन नहीं जानता भगवान शिव को भी अपने वरदान के कारण हीं भस्मासुर से भयभीत होकर भागना पड़ा था। असीमित शक्ति बिना किसी जिम्मेदारी के अत्यंत घातक सिद्ध होती है।

उन्होंने आगे कहा, अपने न्यायिक जीवन में उन्होंने सम्राट अशोक के उसी न्याय व्यवस्था को अपनाया। अदालती।करवाई के दौरान अनावश्यक टिप्पणियों से बचने की कोशिश करना और यदि अनचाहे उनसे  इस तरह की  टिप्पणी हो गई हो तो उसके खिलाफ आती प्रतिरोधात्मक स्वर को धैर्य के साथ सुनना। 

अजय अमिताभ सुमन:सर्वाधिकार सुरक्षित

तुझे शर्म नहीं आती?

जून का अंतिम महीना चल रहा था । मौसम विभाग ने आने वाले दो तीन दिनों के भीतर मानसून के आने की सम्भावना व्यक्त की थी । चिलचिलाती गर्मी से तो राहत मिल गई थी , परन्तु आकाश में छाये बादल वातावरण की गर्मी को बाहर नहीं जाने दे रहे थे । इस कारण उमस बहुत ज्यादा हो चली थी । तिस पर से नमी ने बुरा हाल कर रखा था । कूलर और ए.सी.का भी असर कम हो चला था।

शाम को जब नाश्ता करने के लिए ऑफिस से बाहर  निकला तो इसी उमस भरी गर्मी से पाला पड़ा । पसीना सूखने का नाम हीं नहीं ले रहा था । चिपचिपाहट से परेशानी और बढ़ चली थी।

वो तो भला हो ए. सी. और काम के प्रेशर का , कि दिन कब बित जाता है , पता हीं नहीं चलता । काम करते करते शाम को भूख तो लग हीं जाती थी । घर से लाया हुआ खाना लंच में हीं निबट जाता था । लिहाजा पापी पेट की क्षुधा को आप्त करने के लिए बाहर निकलना हीं पड़ता था ।

सड़कों  के किनारों पर मक्के के भुने हुए दाने बेचते हुए अनगिनत रेड़ी वाले मिल जाते थे । शाम का नाश्ता मक्के के भुने हुए दाने हीं हो चले । पेट और मन दोनों की क्षुधा को कुछ क्षण के लिए आप्त करने के लिए पर्याप्त थे।

ग्राहक को पास आते देखकर रेड़ी वालों में होड़ सी मच गयी । एक तो गर्मी ऊपर से रेड़ी वालों का शोर , शराबा । मै आगे बढ़ता हीं चला गया । थोड़ी दूर पर एक रेड़ी वाला बड़े शांत भाव से बैठा हुआ दिखाई पड़ा । उसे कोई हड़बड़ी नहीं थी शायद।

उसके पास के मक्के काफी अच्छी गुणवत्ता के दिखाई पड़े । और उसपर से वो शोर भी नहीं मचा रहा था । उसे अपने भुट्टे की गुणवत्ता पर भरोसा था शायद। इधर शोर मचाते हुए अन्य रेड़ी वालों से थोड़ी चिढ़ भी हो गई थी। लिहाजा मैंने उसी से मक्का लेने का फैसला किया। भुट्टे का आर्डर देकर मै खड़ा हो गया। 

भुट्टे वाला भुट्टे को गर्म करते हुए मुझसे पूछा , भाई साहब , ये जो महाराष्ट्र में जो हो रहा है , उसके बारे में क्या सोचते हैं ? उद्धव ठाकरे की सरकार ठीक उसी तरह से चली गई जिस तरह लगभग ढाई साल पहले बी.जे. पी. की सरकार गई थी । इतिहास दुहरा रहा है अपने आपको । है ना ये बड़ी आश्चर्य जनक बात?

उसने शायद मुझसे सहमति भरे उत्तर की अपेक्षा रखी थी। मुझे जोरो की भूख लगी थी । मैंने कहा , अरे भाई अब सरकार किसकी आती है , किसकी जाती , इससे तुझको क्या ? तुझे तो भुट्टा ही भूनना है । अपना जो काम है करो ना । इधर उधर दिमाग क्यों लगाते हो?देश और राज्य का सारा बोझ तुम हीं उठा लोगे क्या? मैंने तिरछी नजरों से उसे देखते हुए कहा।

मेरी बात उसको चुभ गई थी शायद । उसने तुनकते हुए कहा , भाई साहब , ये तो प्रजातंत्र है , एक चायवाला भी प्रधानमंत्री बन सकता है । उसपर से क्या एक नागरिक को राजनैतिक रूप से सचेत रहने का अधिकार है या नहीं ? आस पास की जो घटनाएं घट रही हैं देश में, उसके बारे में पता तो चल हीं जाता है।

मैं समझ गया। मुझे भी अपनी बात कुछ उचित नहीं लगी। उसको शांत करने के लिए समझने हुए मैंने कहा , मैंने कहा मना किया है । जानकारी भी होनी चाहिए और एक निश्चित राय भी रखनी चाहिए। परन्तु इससे तुमको क्या ? इस बात का ध्यान रखो, पैसा तो तुम्हें भुट्टा बेचने से हीं आ रहा है ना तुम्हे। काम तो यही करना है तुझे । इसी में अपना दिल लगाओ। यही उचित है तुम्हारे लिए।

उसने कहा , अभी भुट्टा भुन रहा हूँ , कोई जरुरी तो नहीं , जीवन भर यही करता रहूँगा । ग्रेजुएट हूँ । शोर्टहैण्ड  भी सीख रहा हूँ । कहीं न कहीं तो नौकरी लग हीं जाएगी । और नहीं तो किसी कोर्ट में हीं जाकर अपनी दुकान लगाकर बैठ जाऊंगा । गुजारे लायक तो कमा हीं लूँगा ।

गरीब पैदा हुआ हूँ । इसमें मेरे क्या दोष है ? मेरे उपर अपने भाईयों की  जिम्मेदारी भी  है इसीलिए ऐसा करना पड़ रहा है ।  परन्तु समस्याएँ किसको नहीं होती ? मुझे तो आगे बढ़ना हीं है मुझे । उसने अपनी बात को जारी रखते हुए कहा।

उसके आत्मविश्वास पर मुझे ख़ुशी भी हुई और अफ़सोस भी । तबतक उसने भुट्टा गरम कर दिया था । मैंने उसे पैसा लिया और भुट्टा लेकर आगे बढ़ने लगा । पर एक बात मुझे अबतक कचोट रही थी । इस तरह का पढ़ा लिखा लड़का क्या कर रहा था वहाँ पर । 

आखिकार मुझसे रहा नहीं गया । चलते चलते मैंने उससे पूछ हीं लिया , तुझे शर्म नहीं आती , ग्रेजुएट होकर इस तरह भुट्टा बेचने पर ?

उसके उत्तर ने मुझे निरुत्तर कर दिया ।

भुट्टे वाले ने कहा , भाई साहब किसी को धोखा दिया नहीं  , झूठ बोला नहीं और मेरे उपर लोन भी नहीं है , फिर काहे का शर्म ? मेहनत और ईमानदारी से हीं तो कमा रहा हूँ , कोई गलत काम तो नहीं कर रहा । लोगो को चुना तो नहीं लगा रहा ?

ऑफिस में काम करते वक्त उसकी बातें यदा कदा मुझे सोचने पर मजबूर कर हीं देती हैं ,   किसी को धोखा दिया नहीं  , झूठ बोला नहीं और मेरे उपर लोन भी नहीं है , फिर काहे का शर्म ? 

उसके उत्तर ने मुझे कुछ बेचैन सा कर दिया। क्या ऑफिस में ऊँचे ओहदे पर बैठा आदमी हर आदमी झूठ नहीं बोलता , धोखा नहीं देता , बेईमानी नहीं करता ? और यदि करता है तो फिर उसे शर्म क्यों नहीं आती ?

दूसरों की बात तो छोड़ो , महत्वपूर्ण बात तो ये थी  क्या मैंने अपने जीवन में  कभी झूठ नहीं बोला ,  किसी को धोखा नहीं दिया , कभी बेईमानी नहीं की ? और अगर की तो क्या कभी शर्म आई मुझे ? और उत्तर तो स्पष्टत्या नकारात्मक ही था।

मैंने शायद उसको आंकने में भूल कर दी थी । हालाँकि इस भूल में भी मैंने जीवन का एक सबक तो सिख हीं लिया । किसी को उसके काम और ओहदे से मापना हमेशा सही नहीं होता । एक व्यक्ति की चारित्रिक मजबूती उसको सही तरीके से परिभाषित करती है ।

किसी दुसरे को उपदेश देने से पहले ये जरुरी हो जाता है की आप स्वयम को आईने में एक बार जरुर देख लें । उपदेश , जो कि आप किसी और को प्रदान कर रहें हैं , कहीं उसकी जरुरत आपको तो नहीं ?   

अजय अमिताभ सुमन :सर्वाधिकार सुरक्षित 

Saturday, July 9, 2022

वर्तमान से वक्त बचा लो तुम निज के निर्माण में[तृतीय भाग ]

प्रतिकूल परिस्थितियों के लिए संसार को कोसना सर्वथा व्यर्थ है। संसार ना तो किसी का दुश्मन है और ना हीं किसी का मित्र। संसार का आपके प्रति अनुकूल या प्रतिकूल बने रहना बिल्कुल आप पर निर्भर करता है। महत्वपूर्ण बात ये है कि आप स्वयं के लिए किस तरह के संसार का चुनाव  करते हैं। प्रस्तुत है मेरी कविता "वर्तमान से वक्त बचा लो तुम निज के निर्माण में" का तृतीय भाग।
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वर्तमान से वक्त बचा लो 
तुम निज के निर्माण में
तृतीय भाग 
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क्या रखा है वक्त गँवाने 
औरों के आख्यान में,
वर्तमान से वक्त बचा लो 
तुम निज के निर्माण में।
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स्व संशय पर आत्म प्रशंसा 
अति अपेक्षित  होती है,
तभी आवश्यक श्लाघा की 
प्रज्ञा अनपेक्षित सोती है।
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दुर्बलता हीं तो परिलक्षित 
निज का निज से गान में,
वर्तमान से वक्त बचा लो 
तुम निज के निर्माण में।
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जो कहते हो वो करते हो 
जो करते हो वो बनते हो,
तेरे वाक्य जो तुझसे बनते 
वैसा हीं जीवन गढ़ते हो।
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सोचो प्राप्त हुआ क्या तुझको 
औरों के अपमान में,
वर्तमान से वक्त बचा लो 
तुम निज के निर्माण में।
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तेरी जिह्वा, तेरी बुद्धि , 
तेरी प्रज्ञा और  विचार,
जैसा भी तुम धारण करते 
वैसा हीं रचते संसार।
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क्या गर्भित करते हो क्या 
धारण करते निज प्राण में,
वर्तमान से वक्त बचा लो 
तुम निज के निर्माण में।
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क्या रखा है वक्त गँवाने 
औरों के आख्यान में,
वर्तमान से वक्त बचा लो 
तुम निज के निर्माण में।
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अजय अमिताभ सुमन:
सर्वाधिकार सुरक्षित

Tuesday, July 5, 2022

राजनैतिक जगत के कॉरपोरेट मंत्र

 

राजनीति और कॉरपोरेट जगत के काम करने के तरीके में एक समानता है। राजनीति हो या कि कॉरपोरेट घराने , दोनों के सफलता का राज यही है कि शीर्ष पर आसीन लोग सबको अपने साथ ले कर चल सकने में सक्षम है या नहीं?

इसके लिए ये जरूरी है कि मैनेजमेंट के शीर्ष पर रहने वाले व्यक्तियों के दरवाजे स्वयं के साथ काम करने वालों के लिए खुले हो।

अकड़ कर रहने से कोई बड़ा नहीं हो जाता। आपका बड़ा होना इस बात पर निर्भर करता है कि पार्टी का एक साधारण सा कार्यकर्ता आपसे बिना रोक टोक के मिल सकता है या नहीं?

यदि नेता अपने साथ काम करने वालों की बजाय कुछ गिने चुने खुशामद करने वालों के बीच हीं घिरे रहना पसंद करने लगे, तो इसका क्या दुष्परिणाम हो सकता है, राजनीति में घटने वाली आजकल की घटनाओं से ये साफ जाहिर होता है।

ठीक यही बात कॉरपोरेट घरानों पर भी लागू होती है। खुशामद करने वाले और जी हुजूरी करने वाले सदस्यों की बात सुनने के अलावा यदि प्रतिरोध का स्वर ऊंचा करने वालों की बातों को न सुना जाए तो इसमें उस घराने का हित कतई नहीं होता।

एक संस्था की मजबूती इस बात पर निर्भर करती है कि भीतर से उठते हुए असंतोष के स्वर को समझने में वो कितनी सक्षम है?

दूसरी बात , संस्था को अपने मूलभूत वैचारिक सिद्धानों से कभी समझौता नहीं करना चाहिए। हरेक राजनैतिक पार्टी का आधार कुछ आधार भूत सिद्धांत होते हैं।

काम करने के कुछ विशेष तरीके होते हैं हर संस्था के। एक विशेष लक्ष्य और लक्ष्य प्राप्त करने हेतु अपनाए गए तरीकों में हरेक संस्था अलग होती है।

कभी कभी ऐसे मौके आते हैं जब सैद्धांतिक रूप से मतभेद रखने वाले पार्टियों के साथ सहयोग तात्कालिक रूप से लाभदायक सिद्ध होते हैं। परंतु इसके दूरगामी परिणाम हमेशा पार्टी के हितों के विरुद्ध हीं साबित होते हैं।

यही बात कॉरपोरेट घरानों पर भी लागू होती है। हरेक कॉरपोरेट घरानों के काम करने के कुछ अपने विशेष तरीके और अपने मूलभूत आधार होते हैं। सबके अपने अपने कुछ मूलभूत सिद्धांत और वैचारिक आधार होते हैं।

इन सिद्धांतों का त्याग करके नए सहयोगी ढूंढने में कोई फायदा नहीं । याद रहे ये काम करने के ये वो हीं तरीके है जिस कारण एक संस्था का अस्तित्व इतने लंबे समय तक बना हुआ है। फिर मूलभूत सैद्धांतिक आधार से समझौता कर बनाए गए संबंध लंबे समय तक चल नहीं पाते ।

राजनीति में मिली जुली सरकारों का बनना और बिखरना और क्या साबित करता है? आखिकार राजनीति भी तो व्यक्तियों द्वारा हीं चलाई जाती रही है। दो भिन्न भिन्न प्रकार के पहियों पे चलने वाली गाड़ी आखिर कितने दिनों तक चल सकती है?

हरेक राजनैतिक पार्टी युवा पीढ़ी का बढ़ावा देना पसंद करती है। परंतु गर्म जोश के साथ साथ पुरानी पीढ़ी का साथ भी अति आवश्यक होता है सफलता के लिए।

जिस प्रकार देश , काल और परिस्थिति के अनुसार कभी त्वरित फैसले लेने जरूरी होते हैं तो कभी कभी किसी कदम के उठाने से पहले लंबे और गंभीर सोच विचार की जरूरत होती है।

एक हथियार का मजबूत होना जरूरी होता है परंतु इससे ज्यादा महत्वपूर्ण ये कि हथियार से लक्ष्य का संधान करने वाले हाथ कितने सधे हुए है?

और यहां पे ये जरूरी हो जाता है कि उन हाथों ने बार बार इन तरह की परिस्थितियों का सामना किया है कि नहीं? उन हाथों को पर्याप्त अनुभव है या नहीं?

पुरानी पीढ़ी के अनुभव और नई पीढ़ी के जोश के बीच सामंजस्य स्थापित किए बिना ना तो कोई राजनैतिक पार्टी हीं आगे बढ़ सकती है और ना हीं कोई कॉरपोरेट घराना।

अक्सर ये देखा देता है कि सत्ता के नशे में संस्था के शीर्ष स्थानों पर विराजमान नेता सदस्यों से राय लिए बिना अपने फैसले थोपने लगते हैं। यदि सदस्यों पर फैसले लादने हैं तो थोड़ी बहुत उनकी भागीदारी भी बहुत जरूरी है।

यदि एक संस्था सदस्यों के कार्य के प्रति लगन की अपेक्षा करती है तो संस्था की भी जवाबदेही भी तो अपने कार्यकर्ता के प्रति होनी चाहिए। और ये काम अपने सदस्यों को निर्णय लेने की प्रक्रिया में शामिल किए बिना नहीं हो सकता।

याद रहे एक संस्था का सफल या असफल होना इस बात पर निर्भर करता है कि उस संस्था में काम करने वाला हरेक सदस्य उस संस्था के प्रति कितना समर्पित है?

और अंतिम परंतु महत्वपूर्ण बात , बड़बोलेपन से बचना। राजनैतिक रूप से बड़बोलापन न तो केवल आपके नए नए प्रतिद्वंद्वियों को जन्म देता है, अपितु आपको कहीं ना कहीं अहंकारी भी साबित करता है।

ठीक यही बात कॉरपोरेट घरानों पर भी लागू होती है। किसी दूसरे के खिलाफ बोलकर या किसी और को नीचा दिखाकर आप स्वयं बड़े नहीं हो जाते।

बेहतर तो ये है कि बड़े बड़े बोल बोलने के स्थान पर आपके कर्म हीं आपकी आवाज हो । मितवादी और कर्म करनेवाले कहीं असफल नहीं होते, फिर चाहे ये राजनीति हो या कि कॉरपोरेट घराने।

अजय अमिताभ सुमन:सर्वाधिकार सुरक्षित

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