Friday, February 2, 2018

शह और मात


मेरा खेल है मुझे खेलने दो तुम अपनी चाल,
मेरे हाथी है मेरे ऊंट तुम करते क्यों हो सवाल?

मेरा घोड़ा मरा यहाँ पे ,हो तुम क्यों परेशान?
मेरा खेल है, मेरी चाल है, घोड़े का बलिदान।

मेरा जीवन है और मुझे है यदि स्वर्ग की चाह,
मेरा मरण ही पहली पग पे, मांगे स्वर्ग की राह।

तुम्हे चाहिए जीत हमारी, है आभार तुम्हारा,
पर तेरे निर्देश से बाधित, होता खेल हमारा।

तुम ज्ञानी हो, तुम मानी हो , इसका मुझको ज्ञान,
पर चींटी का भी तो होता, है अपना स्वाभिमान।

मेरा देश है, मेरा वेश है, मेरी जीत और हार,
मेरी राह है ,मेरा जीवन, सबकुछ है स्वीकार।

मेरी चाल पे किंचित ना हो, तुम भी यूँ हैरान,
हार की गलियों से ही चलकर बनते लोग महान।


अजय अमिताभ सुमन
सर्वाधिकार सुरक्षित

ओ वैज्ञानिक किस बात का है तुझको अभिमान?


ओ वैज्ञानिक किस बात का है तुझको अभिमान?
एक लक्ष्य अति दुष्कर दुर्लभ कठिन अति संधान।
जैसा है व्यवहार मनुज का, क्या वैसा है भाव?
कैसा है मन मस्तिष्क इसका, कैसा है स्वभाव?

अधरों पे मुस्कान प्रक्षेपित जब दिल में व्याघात,
अतिप्रेम करे परिलक्षित जब करना हो आघात।
चुपचाप सा बैठा नर जब दिखता है गुमनाम,
सीने में किंचित मचल रहे होते भीषण तूफान।

सत्य भाष पे जब भी मानव देता अतुलित जोर,
समझो मिथ्या हुई है हावी और सत्य कमजोर।
स्वयं में है आभाव और करे औरों का उपहास,
अंतरमन में कंपन व्यापित , बहिर्दर्शित विश्वास।

और मानव के अकड़ की जो करनी हो पहचान,
कर दो स्थापित उसके कर में कोई शक्ति महान।
संशय में जब प्राण मनुज के, भयाकान्त अतिशय,
छद्म संबल साहस का तब नर देता परिचय।

करो वैज्ञानिक तुम अन्वेषित ऐसा कोई ज्ञान,
मनुज-स्वभाव की हो पाए सुनिश्चित पहचान
तबतक ज्ञान अधुरा तेरा और मिथ्या अभिमान ,
पूर्ण नहीं जबतक कर पाते मानव अनुसंधान।

 
अजय अमिताभ सुमन:सर्वाधिकार सुरक्षित






ये कैसा विधान विधी का कैसा ये संयोग?






जिसे मानते सुख का उपवन और आकांक्षित प्रीत,
वो ही बिछुड़न पे दुख का कारण बन जाता है मीत.
मंगल, मोहन, पावन , शितवन और मधुर श्री राम,
पर उनके वनवास के कारण, दशरथ त्यागे प्राण.

प्रेम मधुरस काम अकांक्षी सज्ज सोलहों श्रृंगार,
पर कोमल अधरों से भी होते कितने तकरार।
दुर्योधन का चिर निमंत्रण द्रौपदी  का  इनकार,
फिर उसके परिहास से जनित भीषण नर संहार। 

मन तो चाहे प्रेम का मधुवन ढूंढे सुख की छाँव,
पर दुख की भी बदली आती छिपती नंगे पाँव.
मछली को ले खीच के लाती  है आंटे की चाह.
उसे ज्ञात क्या बनी आखेट वो चली मौत की राह.
 
माँ सीता के हरण का कारण, वो सोने का लोभ.
मृगनयनी  ने जनित किया था विश्वामित्र में क्षोभ. 
कैसा ये विधान विधी का कैसा ये संयोग?
कोमल कलियों में छिपे हुए होते काँटों के योग.


अजय अमिताभ सुमन :सर्वाधिकार सुरक्षित 







नायक कौन?


नायक  कौन ?
क्या राम , क्या रावण ?
क्या अर्जुन , क्या कर्ण ?
क्या भीम , दुर्योधन ?
कठिन प्रश्न ?
उत्तर गहन।

 नायक   ,
ना राम , ना रावण.
ना अर्जुन ,  ना कर्ण.
ना भीम ,  ना दुर्योधन ।

 नायक ,
त्रस्त या तुष्ट,
विजेता से ,
इतिहासकार की कलम।


अजय अमिताभ सुमन
सर्वाधिकार सुरक्षित  




मैंने देखा था एक सपना


मैंने देखा था एक सपना , कहना चाहूँ तुम जरा सुनना।
सपने में देखी एक दादी, दिखती थी बड़ी सीदी सादी।
उस दादी के अजब हिसाब, बंद पड़ी थी एक किताब।
देख के  दादी  पेड़ा  लडडू, घूम गई जैसे कोई लटटू

तब कहूँ क्या हुआ जनाब, खुल गयी वो बन्द किताब।
आया फिर एक बड़ा भूचाल ,दादी का मुंह हुआ विशाल।
बैठी सुरसा जीभ निकाले, खोल के अपने मुख के ताले।
बनी  हुई थी एक पहाड़, अहिरावण सी थी वो दहाड़।

लोग समोसा लाते भर कर,ट्रक भी लाते और हेलीकाप्टर।
डाले मुख में पुआ  पूूड़ी, पर दादी की क्षुुुधा अधूरी।
एक बार मे खाती ऐसे, मूषक हजम हो सर्पमुख जैसे।
उस भुखिया की गजब  दहाड़, जीभ निकाले मुख को फाड़।

ज्यों प्रज्वलित दिनकर चंड, दादी की थी क्षुधा प्रचंड।
छोले हेतु लगती दौड़, खाती कहती थोड़ा और।
सच मे दिखती थी विकराल,बहुत बड़ा सा हुआ बवाल।
कि डर के मारे टूटा सपना,कहना चाहूँ तुम जरा सुनना।


अजय अमिताभ सुमन: सर्वाधिकार सुरक्षित




Monday, January 15, 2018

ईश्वर वट



एक पत्ती 
एक डाल पे,
अन्य पत्तों से अनजान, 
अन्य डालों से अनजान,
अनजान पत्तों से, 
डालों से,
भूत के,
भविष्य के,
और फिर गिरती जमीन पे ,
डरती हुई, 
मिल जाती,
मिट जाती, 
मिट्टी बन जाती,
और जड़ों से,
तनों से,
गुजरती  हुई, 
पहुँच जाती है,
वो पत्ती, 
फिर से एक डाल पे,
अन्य पत्तों से अनजान,
अन्य डालों से अनजान,
अनजान पत्तों से, डालों से,
भूत के, भविष्य के।

अजय अमिताभ सुमन
सर्वाधिकार सुरक्षित

धन की सोच




Sunday, January 14, 2018

न्यायाधीश जब न्याय मांगने निकले जोड़े हाथ


स्वतंत्रता के बाद का इतिहास गवाह है, भारतीय न्याय पालिका ने भारतीय जनतंत्र को मजबूत करने में काफी महत्वपूर्ण भूमिका अदा की है। जब जब ऐसा लगा की भारतीय जनतंत्र खतरे में है, तब तब भारतीय न्याय पालिका ने ऐसे ऐसे जजमेंट पास किये जिससे भारतीय जन तंत्र की शाख बची रही। अभी हाल फिलहाल में माननीय सुप्रीम कॉर्ट के माननीय न्याय धीशों ने जिस तरह से प्रेस कॉन्फ्रेंस किया , उससे आम  आदमी की आस्था भारतीय न्याय पालिका में डगमगाई है।आजकल की ये घटनाएँ ये साबित करती है कि माननीय सुप्रीम में सबकुछ ठीक नही चल रहा है । आम आदमी इन घटनाओं से क्षुब्ध है। मैंने राह चलते अनेक लोगो की बात चीत में हताशा महसूस की है। लाचारी महसूस की है। इस कविता के माध्यम से मैने  इसी हताशा को परिलक्षित करने की कोशिश की है ।


उजाले की चाह मेंं आखिर ,खोजे दिन अब रात,
मुश्किल में हालात देेेश की, बड़ी अजब है बात।

इस युद्ध मे जो भी जीते, जो भी हो तकरार,
टूट गयी उम्मीद देश की, जन तंत्र की हार।

न्यायधीश जब न्याय मांगने, निकले जोड़े हाथ,
तुम बोलो हे जन तंत्र अब , किसका दोगे साथ?

शिक्षक लेने लगे छात्र से, जब ज्ञान की सीख,
न्यायधीश जनता से मांगे , जब न्याय की भीख।

तब जनता ये न्याय मांगने, पहुंचे किसके पास?
हे राष्ट्र हो तुझपे कैसे, जनता का  विश्वास?


अजय अमिताभ सुमन
सर्वाधिकार सुरक्षित

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