Wednesday, December 6, 2017

अहम का था बना वो



अहम का था बना वो, 
वहम में हिल गया,
मिट्टी से न जुड़ा था , 
मिट्टी में मिल गया।


अजय अमिताभ सुमन

झूठी दुनिया



झूठी दुनिया देखकर 
अक्सर सोचता हूँ "अमिताभ",
झूठ को चाहने वाले
आखिर ये लोग कौन हैं.




अजय अमिताभ सुमन 

सीख़



साथ देती हो
कभी तनहा छोड़ जाती हो,
ऐ जिंदगी
तुझे सीखने को आदमी से
बस यही एक मिला था।




अजय अमिताभ सुमन

सबक



ढूढ़ता रहा सबक जो 
जाने कितने  सवालों में, 
जाके मुझे मिला वो ,
जिंदगी की  किताबों में।


अजय अमिताभ सुमन

अख़बार


होते कुछ और हो
दिखाते कुछ और ,
"अमिताभ " खुद को
अख़बार समझ रखे हो क्या?



अजय अमिताभ सुमन       



इल्जाम



आप तो नाहक ही हमपे
इल्जाम लगा देते है,
लक्षण हैं बदतर और हम
अंजाम बता देते हैं।


अजय अमिताभ सुमन

दफ़न



यूँ ही नहीं करता ज़माने को रोशन "बेनाम"
सीने में कोई आग दफ़न तो होगी।




अजय अमिताभ सुमन

खुदा का इंसाफ


कौन कहता है खुदा इंसाफ नहीं करता,
पलंग गरीबों को नसीब नहीं,
और अमीरों को नींद





अजय अमिताभ सुमन

जहर



चख के भी भला स्वाद , बताऊँ क्या ज़माने को,
जहर नहीं होता , पिलाने के लिए ।

                           


अजय अमिताभ सुमन

इंसान की तरह



न पूरा  समंदर के माफिक, न खाली आसमान की तरह,
""अमिताभ " जिए  तो क्या जिए  ,महज एक इंसान की तरह।

         


अजय अमिताभ सुमन

राज



ये क्या किया "अमिताभ", कि शख्सियत ही खुल गयी,
तेरी जुबाँ से बेहतर , तेरी ख़ामोशी थी।




अजय अमिताभ सुमन

झा का मतलब क्या?



एक दिन रोज की तरह मैं ऑफिस से घर गया तो मेरा बेटा कुछ नाराज सा बैठा हुआ था .  

मैंने उससे पूछा : बेटा क्यों नाराज हो ?
पुत्र : पापा आज स्कूल में मुझे डाँट पड़ी . मैडम ने मेरे नाम का मतलब मुझसे पूछा तो मैं बता नहीं पाया . पापा आपने मुझे मेरे नाम का मतलब क्यों नहीं बताया ?
पिता : बेटा तुमने मुझे पूछा नहीं . तुम्हारे नाम आप्तकाम का मतलब होता है, वों जिसकी सारी ख्वाहिशें पूरी हो गयी हो .
पुत्र : ख्वाहिशें मतलब ?
पिता : इसका मतलब जो तुम्हे अच्छा लगता है .जैसे की तुम मिठाई चाहते हो .
पुत्र : लेकिन मैं तो स्पाइडर मैन भी चाहता हूँ . डोरेमन भी चाहता हूँ. तो फिर आपने मेरे नाम आप्तकाम क्यों रखा ?
पिता : ताकि बड़ा होकर तुम अपनी चाहतों से मुक्त हो सको .
पुत्र : तो क्या चाहतों से मुक्त होना अच्छी बात है ?
पिता : हाँ .

पुत्र : तो फिर आपने अपना नाम आप्तकाम क्यों नहीं रखा ?
पिता : क्योंकि मेरा नाम अजय अमिताभ सुमन तुम्हारे दादा जी ने रखा .
पुत्र : आपने अपना नाम खुद क्यों नहीं रखा ?
पिता : एक आदमी का नाम वों खुद नहीं रखता , उसके माँ बाप ही रखते है .
पुत्र : लेकिन दादाजी का नाम श्रीनाथ सिंह था , फिर लोग उन्हें आशावादी जी क्यों कहते है ?
पिता : क्योंकि तुम्हारे दादा जी कभी हार नहीं मानते .
पुत्र : तो उन्हें लोग श्रीनाथ सिंह के नाम से भी तो बुला सकते हैं.
पिता : हाँ लेकिन तुम्हारे दादाजी नहीं चाहते कि लोग उन्हें सिंह के नाम से पुकारे .
पुत्र : क्यों , सिंह का मतलब तो शेर होता है . इसमें बुरी बात क्या है ?
पिता : बेटा तुम्हारे दादाजी जाति प्रथा के विरुद्ध है , इसीलिए . सिंह शब्द हमारी राजपूत जाति को दिखाता है .
पुत्र : अच्छा इसीलिए आपने मेरा नाम आप्तकाम रखा है , आप्तकाम सिंह नहीं .
पिता : हाँ बेटा .
पुत्र : तो क्या राजपूत होना गन्दी बात है ?
पिता : बेटा ये तुम दादाजी से पूछ लेना .
पुत्र : नहीं पापा , मै समझ गया , इसीलिए चाचाजी का नाम प्रीतम कौशिक है , क्योंकि वो अपनी जाति छुपाना चाहते है .
पिता : नहीं बेटा , कौशिक हमारी गोत्र है , इसीलिए नाम कौशिक रखा है .
पुत्र : तो क्या सारे राजपूत कौशिक है ?
पिता : नहीं , आप्तकाम अ़ब तुम चुप हो जाओ , पढाई लिखाई करो .
पुत्र : आप गंदे पापा है . आप मुझे समझाइए , ये गोत्र क्या चीज है ?
पिता : बेटा तुम अभी नहीं समझ पाओगे .
पुत्र : पापा आप मुझे कुछ नहीं बताते , मै फिर स्कूल में डांट खाऊंगा . राम त्रिवेदी कम डांट खाता है क्योकि उसके पापा उसको सबकुछ बताते है .

पिता : अच्छा पूछो , और क्या पूछना है ?
पुत्र : पापा त्रिवेदी का मतलब क्या होता है ?
पिता : बेटा जो तीनों वेदों को जनता हो .
पुत्र : वेद क्या चीज है .
पिता : मै बेटे के इतने सारे प्रश्न से झुंझला उठा था , फिर भी अच्छा पापा बनने के चक्कर में उत्तर देता जा रहा था .
पिता : बेटा वेद का मतलब बहुत अच्छी किताब .
पुत्र : तो क्या मेरी ए , बी , सी , डी  वाली किताब जैसी .
पिता : नहीं बेटा , ये बहुत बड़ी किताब है .
पुत्र : तो क्या राम त्रिवेदी बहुत बड़ी किताब को पढ़ रखा है ?  
पिता : नहीं बेटा , वों ब्राह्मण जाति का है , इसीलिए नाम त्रिवेदी रखा है .
पुत्र : तो क्या सारे ब्रह्मण त्रिवेदी नाम रखते है .
पिता : नहीं बेटा , त्रिवेदी का मतलब काफी पढ़ा लिखा होता है और लोग ये नाम रखते है , ताकि खूब पढ़े लिखें .
मेरे बेटे के प्रश्न खत्म होने का नाम हीं नहीं ले रहें थे , मै परेशान हो उठा था .
बेटे ने कहा : अच्छा इसका मतलब  पापा अच्छे अच्छे काम करने के लिए तो लोग अच्छे अच्छे नाम रखते हैं क्या ?
पिता : हाँ बेटा तुम तो होशियार हो . बिलकुल ठीक समझे .
पुत्र : हाँ पापा , पर मेरा दोस्त नीरज झा मुझसे पूछ रहा था कि झा का मतलब क्या होता है . पापा आप बताइए ना .
मैंने झुंझला कर बेटे को डाँट दिया , बोला ये बात में बताऊंगा .
सच तो ये है पाठकों मुझे भी ये नहीं पता कि झा का मतलब क्या ?
इसीलिए ये ब्लॉग लिख रहा हूँ , अब आप गुनी लोग ही मेरी मदद करें और मेरे बेटे को बताएं कि :-
झा का मतलब क्या ?


अजय अमिताभ सुमन 

Sunday, December 3, 2017

जलन


प्रॉब्लम इस बात में नही है
कि वो बड़ा आदमी है।

प्रॉब्लम इस बात में है
कि वो अपने आप को बड़ा आदमी समझता है।

प्रॉब्लम इस बात में नही है
कि वो अपने आप को बड़ा आदमी समझता है ,
प्रॉब्लम इस बात में है
कि वो जितना बड़ा आदमी है ,
अपने आपको उससे बड़ा आदमी समझता है।

प्रॉब्लम इस बात में भी नही है
कि वो जितना बड़ा आदमी है ,
अपने आपको वो उससे बड़ा समझता है .
प्रॉब्लम इस बात में है
कि अपने आपको जितना बड़ा आदमी समझता है
उससे अपने आपको ज्यादा बड़ा आदमी दिखाता है।

प्रॉब्लम इस बात में भी नही है
कि वो अपने आपको ज्यादा बड़ा दिखाता है ,
प्रॉब्लम दरअसल इस बात में है
कि वो जो कुछ भी दिखाता है ,
मुझे सब कुछ दीखता है।

प्रॉब्लम इस बात में भी नही है
कि वो जो कुछ भी दिखाता है
मुझे सब कुछ दिखाता है ,
प्रॉब्लम दरअसल इस बात में है
कि मुझे जो भी दिखाता है
वो सब मुझे खलता है।


                        
अजय अमिताभ सुमन

गधे आदमी नही होते



गधे आदमी नहीं होते।  

क्योंकि दांत से घास खाता है ये,
दांते निपोर नहीं सकता।

आँख से देखता है ये,  
आँखे दिखा नहीं सकता।

गधा अपना मन नहीं बदलता
हालत बदलने पे आदमी की तरह
रंग नहीं बदलता।

खुश होने पे मालिक के सामने दुम हिलाता है
औरो पे हँसता नहीं,
भूख लगने पे ढेंचू ढेंचू करता है
औरों की चुगली करता नहीं। 

दुलत्ती मरता है चोट लगने पे
लंगड़ी नहीं मारता,  
दिखाने के लिए नहीं काम नहीं करता
काम से टंगड़ी नहीं झारता।

औरों के मुकाबले ज्यादा वजन ढोये   
तो इसे जलन नहीं होती,
अगर दूसरे गधे आराम फरमाते है  
तो इसे कुढन नहीं होती।

गधों को आदमी की तरह पेट के दांत नहीं होते,
गधे गधे होते है  
आदमी की तरह बंद किताब नहीं होते।

इसीलिए गधे आदमी नहीं होते।


                        

 
अजय अमिताभ सुमन


Friday, December 1, 2017

शौक




दुनिया ये तेरी मेरी , फरक फकत की यू हैI
ना आरजू हुनुज है , ना कोई जुस्तजू हैII

दियारे खुप्तागा माफिक, है मंजर कायनात केI
ताउन से भी मुश्किल तबियत हालत केII

ना बहती हर सहर , मर्सत बयार सी I
शामें है शामें हिज्र ,रातें सबे फिराक कीII

ऐ खुदा तू  ही जाने , ये उकदायहोक कायनातI
जहाँ में ईब्लिश गालिब, दोजख में काफिरों की जामतII

सजदे तो मैं भी रखता तेरी रहगुजर में ऐ मबुद।
कि तल्खी ऐ जिस्त से , दिल भारी दिमाग उब II

अब चलो चलें पूरा करने , अपने अपने शौकI
तू पैदा कर नसले आदम मैं मुक्करार अपनी मौतII



अजय अमिताभ सुमन

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