Saturday, April 4, 2026

जब रावण ने तीन प्रकार के पुरुषों के गुण बताये

जब रावण ने तीन प्रकार के पुरुषों के गुण बताये

वाल्मीकि रामायण में रावण को बार-बार महापंडित कहा गया है। वह केवल शक्तिशाली राक्षसराज नहीं, बल्कि नीतिशास्त्र, राजनीति, धर्म-अर्थ-काम के गहन ज्ञाता थे। युद्धकांड के छठे और सातवें सर्ग में हनुमान जी द्वारा लंका जलाकर चले जाने के बाद रावण की मंत्रणा सभा इसका जीवंत उदाहरण है। इस प्रसंग में रावण का अहंकार कम दिखता है और कूटनीति में कुशल, दूरदर्शी राजा की छवि ज्यादा उभरती है।

हनुमान जी ने लंका में घोर उत्पात मचाकर, अशोक वाटिका उजाड़कर, महलों को आग के हवाले कर दिया था। लंका जल उठी थी। हनुमान वापस चले गए। रावण उदास मन से सिंहासन पर बैठे। उनकी आँखों में चिंता साफ दिख रही थी। उन्होंने अपने सभी मंत्रियों, सेनापतियों और महाबली राक्षसों को बुलाया। सभा में सन्नाटा छा गया।

रावण ने गंभीर स्वर में कहा:

“देखो, एक वानर ने अजेय लंकापुरी में घुसकर कैसी दुर्दशा कर दी। उसने जनकनंदिनी सीता से मिलकर महलों को नष्ट-भ्रष्ट कर डाला और हमारे बड़े-बड़े बलवान राक्षसों को मार डाला। हनुमान ने सारी लंकापुरी में हलचल मचा दी है। अब तुम सब सोचो—मेरा भला क्या है? मुझे क्या करना चाहिए और क्या करना ठीक होगा?

तुम लोग कोई ऐसा उपाय बतलाओ जिसके करने से अंत में सफलता मिले और जिसे हम कर भी सकें। क्योंकि पंडितजन विजय की कुंजी को विचार (मंत्र) ही बतलाते हैं।

हे सज्जनों! इस समय मुझे श्रीरामचंद्र के विषय में परामर्श करना ही उचित जान पड़ता है। संसार में तीन प्रकार के पुरुष होते हैं—उत्तम, मध्यम और अधम। मैं उनके गुण-दोष विस्तार से बताता हूँ। ध्यान से सुनो।

उत्तम पुरुष वह है जो कभी अकेला निर्णय नहीं लेता। वह हितैषी मित्रों, भाई-बंधुओं अथवा अपने से अधिक योग्य, अनुभवी और बुद्धिमान व्यक्तियों के साथ बैठकर लंबी सलाह-मशविरा करता है। वह पहले सबकी राय सुनता है, हर पक्ष के गुण-दोषों को तौलता है, शास्त्रों का सहारा लेता है और फिर सामूहिक बुद्धि से निर्णय लेता है। उसमें अहंकार नहीं होता, बल्कि दूरदर्शिता और विनम्रता होती है। ऐसे पुरुष का कार्य हमेशा सफल होता है क्योंकि उसकी पीछे सामूहिक शक्ति, विविध अनुभव और शास्त्रीय मार्गदर्शन होता है। वह जानता है कि एक मस्तिष्क की जगह कई मस्तिष्क मिलकर ही सही रास्ता निकालते हैं।

मध्यम पुरुष वह है जो मित्रों या किसी से सलाह नहीं लेता। वह अकेला ही अर्थ (कार्य का उद्देश्य) का गहरा विचार करता है, धर्म का सहारा लेता है, नीति का पालन करता है और स्वयं कार्य आरंभ कर देता है। उसमें आत्मविश्वास तो होता है, लेकिन सामूहिक बुद्धि का अभाव रहता है। वह धर्म और सत्य पर टिका रहता है, किंतु कभी-कभी अकेलेपन के कारण छोटी-छोटी गलतियाँ कर बैठता है। उसका कार्य मध्यम स्तर का होता है—कभी सफल, कभी असफल। वह अच्छा है, लेकिन उत्तम पुरुष जितना नहीं।

अधम पुरुष वह है जो गुण-दोषों को भलीभाँति विचारे बिना, धर्म का सहारा त्यागकर अहंकार में भर जाता है। वह कहता है—‘मैं अकेला ही यह कार्य कर लूँगा। मुझे किसी की सलाह की जरूरत नहीं। सब कुछ मेरे बस में है।’ वह ढीला पड़ जाता है, सोचता है कि सब कुछ उसके अकेले प्रयास से हो जाएगा। वह न तो मित्रों की राय सुनता है, न शास्त्रों का आश्रय लेता है, न ही धर्म का पालन करता है। ऐसे पुरुष का कार्य प्रायः असफल हो जाता है क्योंकि उसमें अंधा आत्मविश्वास, अज्ञान और अहंकार की छाया रहती है। वह अंत में पछताता है, लेकिन तब बहुत देर हो चुकी होती है।

इसी प्रकार मंत्र (सलाह) भी तीन प्रकार के होते हैं:

  • उत्तम मंत्र: जहाँ मंत्रिगण शास्त्रानुसार एकमत होकर सलाह करते हैं। सबके विचार एक दिशा में होते हैं।
  • मध्यम मंत्र: जहाँ अलग-अलग मत होते हैं, लेकिन अंत में सब एकमत हो जाते हैं।
  • अधम मंत्र: जहाँ मत अलग-अलग रह जाते हैं और एकमत होने पर भी कल्याण की कोई संभावना नहीं दिखती।

अतः हे मंत्रिश्रेष्ठो! आप लोग भलीभाँति विचार करें। हम एकमत होकर कर्तव्य निश्चित करें। हज़ारों वीर वानरों के साथ श्रीराम लंकापुरी पर चढ़ाई करने आ रहे हैं। वे अपने भाई लक्ष्मण और समस्त वानर-सेना सहित समुद्र पार आसानी से आ जाएँगे—चाहे समुद्र को डुबोकर या दिव्य अस्त्रों के बल से कोई अन्य उपाय करें। लंका और राक्षसी सेना की रक्षा के लिए ऐसी सलाह दो जो हितकारी हो।”

रावण का यह भाषण सुनकर सभा स्तब्ध रह गई। उन्होंने न तो क्रोध में आकर तुरंत युद्ध का आदेश दिया, न अहंकार दिखाया। बल्कि शास्त्रों के अनुसार पुरुषों और मंत्रों के तीन-तीन भेद बड़े ही स्पष्ट, गहन और विस्तृत तरीके से समझाए। यही उनकी महापंडितता का प्रमाण था।

तब सभी महाबली राक्षस हाथ जोड़कर बोले:

“महाराज! जब तक शत्रु का बलाबल पता न चले, तब तक परामर्श देना नीतिविरुद्ध है। हमारे पास परिघ, शक्ति, गदा, शूल आदि से सुसज्जित विशाल सेना है। आप विषाद क्यों करते हैं?

आपने भोगवती पुरी में जाकर सर्पों को जीता। कैलासवासी यक्षों को पराजित किया। कुवेर से घोर युद्ध करके उन्हें अपने वश में कर लिया। लोकपाल को रोषपूर्वक रणभूमि में हराया। मय दानव ने भयभीत होकर आपको पुष्पक विमान दे दिया। कुम्भीनसी के पति मधु दानव को युद्ध में पराजित कर अपनी कन्या को भार्या बनाया। रसातल जाकर नागों को हराया। वासुकि, तक्षक, शंख और जटी जैसे प्रमुख नागों को वश में किया।

एक वर्ष तक दानवों से युद्ध करके उन्हें काबू में कर लिया। माया जानने वाले महाबली लोकपालों को युद्ध में जीता। स्वर्ग जाकर इंद्र को भी परास्त किया। वरुण के शूर-बलवान पुत्रों को हराया। चतुर्दशियों वाली सेना सहित यमलोक रूपी महासागर में डुबकी लगाई—मृत्युदंड, कालपाश, यमकिंकर आदि भयंकर शक्तियों को जीतकर मृत्यु को भी रोक दिया।

इंद्र के समान पराक्रमी वीर क्षत्रियों से भरी पृथ्वी को आपने जीता। उनके पराक्रम, बल और उत्साह देखकर राम भी रण में उनका सामना नहीं कर सकते थे, किंतु आपने उन परम दुर्जेय क्षत्रियों को भी मार डाला।

हे महाराज! आप चिंता न करें, जरा भी श्रम न करें। आपका पुत्र इंद्रजित् अकेला ही समस्त वानर-सेना को नष्ट कर देगा। इसने अयुधृष्ट महेश्वर यज्ञ करके परम दुर्लभ वर प्राप्त किया है। युद्ध रूपी महासागर में शक्ति, तोमर, गज, अश्व, रथ, पैदल आदि से भरे देवताओं के सैन्य सागर में घुसकर देवराज इंद्र को पकड़ लाया और लंका में बंदी बना दिया। पितामह ब्रह्मा के आदेश से शंबरासुर और इत्रासुर का संहार करने वाला, सर्वदेव नमस्कृत इंद्र भी छोड़ दिया गया।

अतः हे महाराज! अपने पुत्र इंद्रजित् को आज्ञा दीजिए। वह समस्त वानर-सेना सहित राम को मार डालेगा। नर-वानर रूपी नगण्य शत्रुओं से आपको कोई चिंता नहीं करनी चाहिए। आप निश्चय ही रामचंद्र को मार देंगे।”

इस प्रकार रावण की सभा में राक्षसों ने अपनी शक्ति और विजयों का वर्णन करते हुए इंद्रजित् पर पूरा भरोसा जताया। युद्धकांड का यह प्रसंग रावण की चिंता और राक्षसों की सलाह से भरा हुआ है।

इस प्रकार रावण की सभा में राक्षसों ने अपनी शक्ति और विजयों का वर्णन करते हुए इंद्रजित् पर पूरा भरोसा जताया। जब रावण ने तीन प्रकार के पुरुषों के गुण बताए, तब युद्धकांड का यह प्रसंग रावण की चिंता और राक्षसों की सलाह से भरा हुआ है। इस मंत्रणा से स्पष्ट होता है कि रावण न केवल शक्तिशाली थे, बल्कि कूटनीति, नीतिशास्त्र और सामूहिक निर्णय की कला में भी अत्यंत निपुण थे। यही कारण है कि वाल्मीकि रामायण उन्हें बार-बार महापंडित कहती है।

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