Thursday, December 7, 2017

लाला जिसे सताए, खुदा क्या उसे बचाए


८ जनवरी २०१२ , रविवार का दिन था . दिल्ली की सर्द रात थी . कड़ाके की ठण्ड पड़ रही थी . मैं साईं बाबा के मंदिर से लौट रहा था . बस में ज्यों ही चढा मेरा ध्यान तीन दोस्तों की तरफ गया जो आपस में बात कर रहें थे . उनकी बातचीत से ये प्रतीत हुआ की तीनों किसी छोटी सी कंपनी में क्लर्क का जॉब कर रहें थे . उनकी बात चीत का दिलचस्प हिस्सा प्रस्तुत कर रहा हूँ .

प्रथम मित्र : यार तुम इतने सारे कपड़े पहन रखे हो , माना की यहाँ ठण्ड है , पर शिमला की बर्फ तो नहीं गिर रही.

दुसरा मित्र : शिमला की बर्फ तो नहीं गिर रही , पर खुद को बचा कर रखने में क्या बुराई है . लगता है बिना ठण्ड का शिकार हुए नहीं समझोगे .

तीसरा मित्र : अरे यार हम गरीब लोगों को तो खुदा मरा हुआ हीं पैदा करता है . ठण्ड मारने की क्या जरूरत है  .

दुसरा मित्र : बिलकुल सही , ये खुदा भी हम लोगों को क्या मरेगा , दिल्ली के लाला लोग , जिनके यहाँ हम नौकरी करते है , वो खुद ही हमें चुस चुस के मार देते है.

प्रथम मित्र : बिल्कुल सही दोस्त , लाला जिसे सताए , खुदा क्या उसे बचाए?





अजय अमिताभ सुमन 

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