Friday, December 8, 2017

शहर का आदमी



रोज सबेरे उठकर सोते हुए बेटे के माथे का चुम्बन लेता हूँ ,
नहाता हूँ , खाता हूँ ,
और चल पड़ता हूँ दिन की लडाई के लिए ।

लड़ता हूँ दिनभर अथक ,
ताकि 
पत्नी को मिले सुकून,
बेटे को दुलार ,
भाई को स्नेह ,
और माता पिता को सम्मान ।

फ़िर लौटता हूँ घर ,
देर रात को ,
हाथ धोता हूँ , खाता हूँ ,
सोए हुए बेटे के माथे का चुम्बन लेता हूँ,
और सो जाता हूँ ।

मैं दूर रहता हूँ आपनों से ,
अपनों के वास्ते।



अजय अमिताभ सुमन

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