क्या कहूँ जब पापा और माँ झगड़ रहे थे ,
बिजली कड़क रही थी , बादल गरज रहे थे.
इधर से दनादन थप्पड़ , टूटी थी चारपाई ,
उधर से भी चौकी और बेलन बरस रहे थे.
जमने की थी बस देरी , औकात की लडाई
बेचारे पूर्वजों के , पुर्जे उखड रहे थे.
अरमान पडोसियो की , मुद्दत से पड़ी थी सुनी ,
वारिस अब हो रही थी , वो भींग सब रहे थे.
मिलता जो हमको मौका , लगाते हम भी चौका ,
बैटिंग तो हो रही थी , हम दौड़ बस रहे थे.
इन बहादुरों के बच्चे , आखिर हम सीखते क्या ,
दो चार हाथ को बस , हम भी तरस रहे थे.
अजय अमिताभ सुमन
बिजली कड़क रही थी , बादल गरज रहे थे.
इधर से दनादन थप्पड़ , टूटी थी चारपाई ,
उधर से भी चौकी और बेलन बरस रहे थे.
जमने की थी बस देरी , औकात की लडाई
बेचारे पूर्वजों के , पुर्जे उखड रहे थे.
अरमान पडोसियो की , मुद्दत से पड़ी थी सुनी ,
वारिस अब हो रही थी , वो भींग सब रहे थे.
मिलता जो हमको मौका , लगाते हम भी चौका ,
बैटिंग तो हो रही थी , हम दौड़ बस रहे थे.
इन बहादुरों के बच्चे , आखिर हम सीखते क्या ,
दो चार हाथ को बस , हम भी तरस रहे थे.
अजय अमिताभ सुमन

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