Saturday, June 30, 2018

मिथ्या

मिथ्या:अजय अमिताभ सुमन

ऐ मेरे बंधू हैे कैसा ये क्रंदन,
कैसी घबराहट है छायी अब हर क्षण।
बुद्धि हो शुद्धि हो तुम तो निरंजन,
संसार माया क्यों करते हो चिंतन।

पोता कभी पिता कभी दादा  बने तुम,
थकते नही करके रिश्तों का अर्जन।
निद्रा तुम्हारी कई जन्मों से हावी,
दुनिया ये मिथ्या है स्वप्नों का मंथन।

समय की गाड़ी पे बैठा तन तेरा,
मन है ये चालक और यात्री तेरा चेतन।
क्या तुमने पाया था  खोया क्या तुमने,
खेला है मन का तेरे मन का प्रक्षेपण।

ना तुम जगत के ना संसार तेरा,
ना तन भी तुम्हारा ना मन का स्पंदन।
तुम हीं में वायु ये आकाश सारा ,
तुममें जगत है ना समझो अकिंचन।

त्यागो ये मिथ्या अब त्यागो ये दुनिया,
आया समय छोड़ो स्वप्नों का बंधन।
बुद्धि हो शुद्धि हो तुम तो निरंजन,
संसार माया क्यों करते हो चिंतन।

Saturday, May 26, 2018

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हौले कविता मैं गढ़ता हूँ

खुद को जब खंगाला मैंने,
क्या बोलूँ क्या पाया मैंने?
अति कठिन है मित्र तथ्य वो,
बा मुश्किल ही मैं कहता हूँ,
हौले कविता मैं गढ़ता हूँ।

हृदय रुष्ट है कोलाहल में,
जीवन के इस हलाहल में,
अनजाने चेहरे रच रचकर,
खुद हीं से खुद को ठगता हूँ,
हौले कविता मैं गढ़ता हूँ।

नेत्र ईश ने सरल दिया था,
प्रीति युक्त मन तरल दिया था,
पर जब जग ने गरल दिया था,
विष प्याले मैं भी रचता हूँ,
हौले कविता मैं गढ़ता हूँ।

ज्ञात नहीं मुझे क्या पथ्य है?
इस जीवन का क्या तथ्य है?
कभी सबेरा हो चमकूँ तो ,
कभी साँझ हो मैं ढलता हूँ ,
हौले कविता मैं गढ़ता हूँ।

सुनता हूँ माया है जग तो,
जो साया है छाया डग तो,
पर हो जीत कभी ईक पग तो,
विजय हर्ष को मैं चढ़ता हूँ,
हौले कविता मैं गढ़ता हूँ ।

छद्म जीत पर तृष्णा जगती,
चिंगारी बन फलती रहती,
मरु स्वपन में हाथ नीर ले,
प्यासा हो हर क्षण गलता हूँ,
हौले कविता मैं गढ़ता हूँ।

मन में जो मेरे चलता है ,
आईने में क्या दिखता है?
पर जब तम अंतस खिलता है ,
शब्दों से निज को ढंकता हूँ,
हौले कविता मैं गढ़ता हूँ।

जिस पथ का राही था मैं तो,
प्यास रही थी जिसकी मूझको,
निज सत्य का उदघाटन करना,
मुश्किल होता मैं डरता हूँ,
हौले कविता मैं गढ़ता हूँ ।

जाने राह कौन सी उत्तम,
करता रहता नित मन मंथन,
योग कठिन अति भोग छद्म है,
अक्सर संशय में रहता हूँ,
हौले कविता मैं गढ़ता हूँ ।

कुछ कहते अंदर को जाओ,
तब जाकर तुम निज को पाओ,
पर मुझमे जग अंदर दिखता ,
इसीलिए बाहर पढ़ता हूँ,
हौले कविता मैं गढ़ता हूँ।

अंदर बाहर के उलझन में ,
सुख के दुख के आव्रजन में,
किंचित आस जगे गरजन में,
रात घनेरी पर बढ़ता हूँ,
हौले कविता मैं गढ़ता हूँ।

जीवन उर्जा तो एक हीं है


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