लकड़ी की पुरानी बेंचें, दीवार पर संविधान की प्रस्तावना, और बीच में ऊँचे आसन पर विराजमान माननीय न्यायाधीश महोदय, जिनकी भौंहें हमेशा ऐसी तनी रहती थीं मानो contempt jurisdiction अभी-अभी जाग उठेगा।
कटघरे में खड़ा था अभियुक्त—चेहरे पर वही क्लासिक भाव: “मैं निर्दोष हूँ, बाकी सब परिस्थितिजन्य साक्ष्य हैं।”
और सामने खड़े थे पीड़ित पक्ष के अधिवक्ता—काली कोट, सफेद बैंड, और आत्मविश्वास ऐसा कि मानो IPC की सारी धाराएँ उन्हें कंठस्थ हों।
न्यायाधीश ने फाइल पलटी, चश्मा ठीक किया और गंभीर स्वर में पूछा—मिस्टर लॉयर, एक प्रारंभिक प्रश्न है। आप इस हत्या के मामले में पीड़ित की ओर से पेश हो रहे हैं—यह तो स्पष्ट है।परंतु यह बताइए… आपको निर्देश किसने दिए हैं?”
अदालत में सन्नाटा।स्टेनोग्राफर ने टाइप करना रोक दिया।पेशकार ने पानी का गिलास आधा रास्ते में ही रोक लिया।
अधिवक्ता ने आत्मविश्वास से उत्तर दिया—“माई लॉर्ड… पीड़ित ने।”
अब सन्नाटा नहीं, बल्कि सस्पेंस।न्यायाधीश ने धीरे से चश्मा उतारा, अधिवक्ता को ऊपर से नीचे तक देखा और बोले—“आप कहना क्या चाहते हैं?पीड़ित… जो कि इस समय स्वर्गवासी है…उसने आपको निर्देश दिए?”
अधिवक्ता ने पूरे आत्मविश्वास से सिर हिलाया—“जी हाँ, माई लॉर्ड।”
अब अदालत में हल्की खुसर-पुसर।पीछे बैठा एक जूनियर वकील फुसफुसाया—“लगता है अब Evidence Act में नई धारा जुड़ने वाली है—Section 32A: Instructions from Afterlife।”
न्यायाधीश ने हथौड़ा हल्का सा बजाया—“शांति बनाए रखें।मिस्टर लॉयर, क्या आप यह कहना चाहते हैं कि आपको मृत व्यक्ति से निर्देश प्राप्त हुए?”
अधिवक्ता (शांत स्वर में):“माई लॉर्ड, बिल्कुल।और यदि मैं जोड़ सकूँ—ये निर्देश अत्यंत स्पष्ट थे।”
न्यायाधीश की भौंहें और ऊपर चली गईं—“यह तो बड़ा ही… असामान्य है।क्या आप अदालत को यह भी बताएँगे कि ये निर्देश किस माध्यम से प्राप्त हुए?”
अधिवक्ता ने फाइल खोली, एक काग़ज़ निकाला और बोला—“माई लॉर्ड, ये निर्देश मरने से पहले दिए गए थे।जब पीड़ित जीवित था—inter vivos, जैसा कि रोमन विधि में कहा गया है।उसने स्पष्ट कहा था—‘अगर मेरे साथ कुछ हो जाए, तो केस लड़ना… और पूरी ताकत से लड़ना।’”
पीछे से किसी ने धीमे से कहा—“वाह, ये तो dying declaration 2.0 है।”
न्यायाधीश ने हल्की मुस्कान दबाते हुए कहा—“तो आप यह कहना चाहते हैं कि यह कोई paranormal instruction नहीं, बल्कि पूर्व निर्देश हैं?”
अधिवक्ता:“बिल्कुल माई लॉर्ड।हालाँकि यदि अदालत अनुमति दे, तो मैं यह भी कहना चाहूँगा कि इस केस में निर्देश मरने के बाद भी प्रभावी हैं।”
अब न्यायाधीश मुस्कुरा ही पड़े—“तो यह कहा जा सकता है कि यह मामला Dead men tell no tales का अपवाद है?”
अधिवक्ता (झुककर):“माई लॉर्ड, कानून में एक सिद्धांत है—Actus non facit reum nisi mens sit rea।
यहाँ मृतक की mens आज भी अदालत के समक्ष जीवित है।”
पूरा कोर्टरूम हँसी से गूँज उठा।यहाँ तक कि अभियुक्त भी मुस्कुरा दिया—हालाँकि उसे तुरंत एहसास हुआ कि यह मुस्कान उसके लिए खतरनाक हो सकती है।
न्यायाधीश ने हथौड़ा बजाया और बोले—ठीक है, मिस्टर लॉयर। अदालत आपके ‘डेडली इंस्ट्रक्शन्स’ को स्वीकार करती है। लेकिन एक बात याद रखिए— अगर अगली तारीख पर आप कहेंगे कि ‘आज पीड़ित सपने में आया था’,तो आपको पहले मेडिकल बोर्ड के सामने पेश होना पड़ेगा।”
पूरा कोर्ट फिर से ठहाकों से भर गया। और इस तरह अदालत ने यह मान लिया कि—कभी-कभी न्याय की लड़ाई इतनी ज़ोरदार होती है कि मौत भी उसे चुप नहीं करा पाती।
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