Thursday, January 8, 2026

मिठास


शाम के लगभग सात बज रहे थे।कचहरी की पुरानी इमारत से निकलते हुए अधिवक्ता आदित्य वर्मा ने अपनी काली कोट की जेब में हाथ डाला और गहरी साँस ली। आज भी वही दिन—तीन तारीखें, दो स्थगन, एक तीखी बहस और जज साहब की वही गंभीर दृष्टि।

उसका सिर भारी था, दिमाग थका हुआ और दिल… दिल किसी मीठी राहत की तलाश में था।“कुछ तो ऐसा चाहिए जो आज की कड़वाहट धो दे,” उसने खुद से कहा।सड़क के कोने पर एक छोटी-सी आइसक्रीम की दुकान चमक रही थी। रंगीन बोर्ड, फ्रिज की हल्की गुनगुनाहट और बच्चों की हँसी। आदित्य वहीं रुक गया।

“भैया, एक चॉकलेट आइसक्रीम देना,”फिर हल्की मुस्कान के साथ बोला—“आज कुछ ज़्यादा ही तनाव है। थोड़ा सुकून चाहिए।”

दुकान के पीछे खड़ा व्यक्ति—लगभग पचास साल का, साधारण कपड़े, माथे पर पसीने की हल्की रेखा—आदित्य को देख मुस्कुराया।उसकी मुस्कान में अपनापन था, पर आँखों में कोई अनकहा बोझ।

“तनाव?”वह बोला,“साहब, आपका काम तो फिर भी आसान है।”

आदित्य चौंका।“आसान?”“मैं वकील हूँ। रोज़ लोगों की लड़ाइयाँ, झूठ-सच, हार-जीत… आपको लगता है ये आसान है?”

दुकानदार ने आइसक्रीम निकालते हुए कहा—“साहब, आपकी लड़ाई दिमाग की है। मेरी लड़ाई शरीर और मन—दोनों से है।”

आदित्य ने उत्सुकता से पूछा—“कैसे?”

दुकानदार ने गहरी साँस ली।“मैं डायबिटिक हूँ।”

आदित्य ने सहानुभूति से सिर हिलाया।“तो?”

वह हल्की-सी कड़वी हँसी हँसा—“तो साहब, मुझे इस आइसक्रीम की दुकान पर लगातार बारह दिन खड़ा रहना है।”

“बारह दिन?”आदित्य की भौंहें सिकुड़ीं।

“हाँ,”वह बोला,“चारों तरफ मिठास—वनीला, स्ट्रॉबेरी, चॉकलेट। बच्चों की खुशी, कपल्स की फरमाइशें… और मैं?
मैं सिर्फ देख सकता हूँ, बेच सकता हूँ…खा नहीं सकता।”

उसकी आवाज़ में कोई शिकायत नहीं थी, बस एक सच्चाई थी।

“साहब,”वह बोला,“आप केस हारते हैं तो अपील होती है।मेरे लिए हर दिन एक नई परीक्षा है—स्वाद सामने है, पर मना है।खुशी चारों तरफ है, पर मेरे लिए नहीं।”

आदित्य चुप हो गया।उसने महसूस किया कि कोर्टरूम की बहसें, ऊँची आवाज़ें, फाइलों का बोझ—सब अचानक हल्के लगने लगे।

आदित्य ने आइसक्रीम ली, कुछ क्षण उसे देखा, फिर दुकानदार से कहा—“भैया, आज ये आइसक्रीम सिर्फ मेरी नहीं है।”

उसने एक चम्मच लिया, एक कौर खाया और फिर आइसक्रीम आगे बढ़ा दी।“नहीं साहब, मैं नहीं खा सकता।”

आदित्य मुस्कुराया—“चिंता मत कीजिए, ये अदालत का आदेश नहीं…बस इंसानियत की पेशकश है।”

दुकानदार की आँखों में नमी आ गई।

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