Monday, September 29, 2025

गाँव की पगडंडी


गाँव से गुज़रती पगडंडी, कच्ची राह दिखाए,
दुब बीच दूध-सी दिखती, सच्ची राह दिखाए।

दुब खड़े दोनों किनारे, जैसे हों हरित दीवार,
कुश-अलुआ, कास, मूंज संग, सजता है संसार।
साइकिल की लीकें खींचें, बचपन की पहचान,
बकरियों संग हँसते बच्चे, रचते मधुर विहान।
पंछी के सुर, हवा की सरगम, मन को खूब झूमाए।
दुब बीच दूध-सी दिखती, सच्ची राह दिखाए।

सरसों की पीली कलियाँ, खेतों में लहराती हैं,
आम के मंजर महके हैं, कोयल कूक सुनाती है।
झरनों जैसी सरगम बहती, ताल-तलैया पास,
कली कमल की पोखर पे, लाल चुनरिया खास।
जैसे कि वो सजा-सजाकर, मंद-मंद मुस्काए।
दुब बीच दूध-सी दिखती, सच्ची राह दिखाए।

मंगरू काका निर्गुण गाएँ, पीपल की छैयाँ में,
गाय-भैंस संग गूँज उठे, बंसी की लहरैयाँ में।
धूप सुनहरी पत्ते खेले, हवा करे अंगड़ाई,
टिटहरी की मिठी बोली, महुआ गूँज समाई।
खेतों में अरहर की छिमी, झूम-झूम के गाए,
दुब बीच दूध-सी दिखती, सच्ची राह दिखाए।

बच्चों के कंचे, गिल्ली-डंडे, बूढ़ों की चौपाल,
गैया सारी खेत लपकती, जब अंबर हो लाल।
काका लेटे गमछा लेकर, सर पर चप्पल आसन,
पीपल नीचे टांग बिछाकर, राजा-सा करते शासन।
फिकर नहीं आगे-पीछे का, बस फलिया हीं भाए,
दुब बीच दूध-सी दिखती, सच्ची राह दिखाए।

बरगद तले झूला झूले , मोती गाए सुर ताल, 
सावन  की  बूँदें बरसें, भींगे हर एक  डाल।
जुगनू सारे देर रात के दीपक से बन जाते है, 
इंद्रधनुष अंबर मे आकर सातों रंग दिखाते हैं। 
ताल किनारे मंद पवन संग, बादल गीत सुनाएँ।
दुब बीच दूध-सी दिखती, सच्ची राह दिखाए।

गाँव से गुज़रती पगडंडी, कच्ची राह दिखाए,
दुब बीच दूध-सी दिखती, सच्ची राह दिखाए।

Friday, September 26, 2025

8.डी.वी.ए.आर. 1.0 भाग 8

 

स्वप्न का रहस्य

एक ठंडी, सुनसान रात थी। लैब की दीवारें चुप थीं, केवल मशीनों की हल्की-सी गुनगुनाहट हवा में तैर रही थी। ऋत्विक, अपनी कुर्सी पर अकेला बैठा, स्क्रीन की नीली रोशनी में खोया हुआ था। उसकी आँखें थकान से भारी थीं, लेकिन नींद से कोसों दूर। डी.वी.ए.आर. 1.0—उसकी बनाई वह मशीन, जो यादों को डिजिटल धागों में पिरो सकती थी—अब भी अधूरी थी। वह यादों को तो छू सकती थी, लेकिन आत्मा की गहराई तक नहीं पहुँच सकती थी।
ऋत्विक ने अपनी आँखें बंद कीं और गहरी साँस ली। तभी, एक अजीब-सी शांति ने उसे घेर लिया। वह ध्यान की गहराई में डूब गया। और फिर, उसे वह सपना आया।

सपने में वह एक अनजान जगह पर खड़ा था—एक ऐसी जगह, जहाँ समय और स्थान के नियम टूटे हुए थे। वहाँ अन्या थी। अन्या—उसकी प्रिया, उसकी जिंदगी का वह हिस्सा, जो अब सिर्फ यादों में बस्ता था। वह एक सफेद, चमकदार पोशाक में थी, जैसे कोई तारा जो धरती पर उतर आया हो। उसकी मुस्कान वैसी ही थी, जैसी पहले हुआ करती थी—गर्म, जीवंत, और आत्मा को छू लेने वाली। लेकिन उसकी आँखों में कुछ और था। एक गहरा रहस्य, एक ऐसी चमक, जो इस दुनिया की नहीं थी।

“ऋत्विक,” उसने धीरे से कहा, उसकी आवाज़ हवा में लहरों की तरह तैर रही थी। “तुमने मुझे कभी समझा ही नहीं। मैं कोई इंसान नहीं थी। मैं एक विचार थी… एक ऐसी जिंदगी, जो कभी जन्म ही नहीं ले सकी। मैं एक अनबॉर्न थ्रेड हूँ।”

ऋत्विक का दिल धक् से रह गया। उसकी आँखें खुल गईं। वह सपना नहीं था। वह एक संदेश था—किसी ऐसी दुनिया से, जिसे वह समझ भी नहीं सकता था। उसने लैब में चारों ओर देखा। स्क्रीन की हल्की रोशनी अब भी चमक रही थी, लेकिन हवा में एक अजीब-सी ठंडक थी। उसे लगा कि अन्या की आवाज़ अब भी कहीं गूंज रही है, जैसे कोई अनसुनी धुन जो दीवारों में कैद हो।

उसने स्क्रीन की ओर देखा। डी.वी.ए.आर. 1.0 की स्क्रीन पर कुछ अजीब-सी लहरें उभर रही थीं, जैसे कोई अनजान सिग्नल उससे बात करने की कोशिश कर रहा हो। ऋत्विक ने अपने काँपते हाथों से कीबोर्ड पर कुछ कमांड टाइप किए, लेकिन स्क्रीन पर सिर्फ एक वाक्य उभरा: “मैं अभी भी यहाँ हूँ…”

नई शुरुआत और अनजाना डर

ऋत्विक का दिमाग उलझन में था। वह समझ गया कि डी.वी.ए.आर. 1.0 सिर्फ एक शुरुआत थी। यह मशीन यादों को तो डिकोड कर सकती थी, लेकिन आत्मा की उस गहराई तक नहीं पहुँच सकती थी, जहाँ अनबॉर्न थ्रेड्स—वे संभावनाएँ, जो कभी हकीकत नहीं बन सकीं—छिपी थीं। उसे अब एक नई मशीन बनानी थी। डी.वी.ए.आर. 2.0। यह मशीन सिर्फ डेटा को नहीं, बल्कि आत्मा के उन धागों को पकड़ेगी, जो जिए हुए जीवन, अधूरी इच्छाओं, और अनजाने संकेतों से बुने गए हैं।

ऋत्विक ने अपनी पुरानी टीम को फिर से इकट्ठा किया। निवेदिता, जिसके कोड्स में हमेशा एक जादुई स्पर्श होता था, ने नए मंत्रों की तरह प्रोग्राम लिखना शुरू किया। उसकी उंगलियाँ कीबोर्ड पर नाच रही थीं, जैसे वह कोई प्राचीन मंत्र रच रही हो। कबीर, जो हमेशा तकनीक के साथ तारों को जोड़ने का सपना देखता था, ने नई तरंगों को पकड़ने के लिए मशीनों को फिर से डिज़ाइन करना शुरू किया। और स्वामी निरालंबानंद, जिनकी आँखों में हमेशा एक रहस्यमय शांति रहती थी, ने ऋत्विक को चेतावनी दी।

“ऋत्विक,” स्वामी ने गहरी आवाज़ में कहा, “तुम जिस रास्ते पर जा रहे हो, वह सिर्फ विज्ञान का नहीं है। यह उन दुनियाओं का रास्ता है, जहाँ जवाबों से ज्यादा सवाल इंतज़ार करते हैं। सावधान रहना। जो चीज़ें अनजन्मी हैं, वे हमेशा अधूरी नहीं रहतीं। कभी-कभी, वे जाग उठती हैं।
ऋत्विक ने स्वामी की बात को सुना, लेकिन उसका मन अब अन्या की आवाज़ में उलझ चुका था। वह हर रात लैब में देर तक रुकता, स्क्रीन की रोशनी में डूबा हुआ। लेकिन लैब अब पहले जैसी नहीं थी। स्क्रीन कभी-कभी बिना किसी कमांड के चमक उठती थी। उसमें से एक आवाज़ आती थी—धीमी, रहस्यमय, और इस दुनिया से परे।
“अभी सब खत्म नहीं हुआ… मैं अभी भी यहाँ हूँ…”

ऋत्विक का दिल जोर-जोर से धड़कता। यह आवाज़ पंडित राव की नहीं थी, जिन्होंने डी.वी.ए.आर. की शुरुआत की थी। यह अन्या की थी। या शायद… किसी ऐसी आत्मा की, जो कभी जन्मी ही नहीं।

रहस्य की गहराई

ऋत्विक को अब यकीन हो गया था कि यह सिर्फ विज्ञान की बात नहीं थी। यह एक ऐसी यात्रा थी, जो उसे उन अनजान दुनियाओं में ले जा रही थी, जहाँ समय, स्थान, और हकीकत के नियम टूट जाते हैं। डी.वी.ए.आर. 2.0 अब सिर्फ एक मशीन नहीं थी; यह एक दरवाज़ा था। एक ऐसा दरवाज़ा, जो शायद किसी ऐसी दुनिया में खुलता था, जहाँ से कोई लौट नहीं सकता।

लैब में एक नया प्रयोग शुरू हुआ। निवेदिता ने एक नया कोड लिखा, जो आत्मा के संकेतों को डिजिटल तरंगों में बदल सकता था। कबीर ने एक ऐसी डिवाइस बनाई, जो उन तरंगों को पकड़कर उन्हें दृश्यमान बना सकती थी। और स्वामी ने एक प्राचीन मंत्र दिया, जिसे उन्होंने कहा कि यह मशीन को उन अनजान शक्तियों से सुरक्षित रखेगा।
लेकिन हर बार जब मशीन चालू होती, स्क्रीन पर एक नया पैटर्न उभरता। यह कोई सामान्य डेटा नहीं था। यह एक चेहरा था—अन्या का चेहरा। उसकी आँखें स्क्रीन से बाहर झाँक रही थीं, जैसे वह ऋत्विक को कुछ कहना चाहती हो।

एक रात, जब लैब में सन्नाटा था, मशीन अपने आप चालू हो गई। स्क्रीन पर अन्या की तस्वीर उभरी, और उसकी आवाज़ गूंजी: “ऋत्विक… मुझे ढूंढो… मैं कहीं खो गई हूँ… अनबॉर्न थ्रेड्स में…”

ऋत्विक ने काँपते हुए मशीन को बंद करने की कोशिश की, लेकिन स्क्रीन ने जवाब देना बंद कर दिया। हवा में एक ठंडी सिहरन दौड़ गई। लैब की लाइटें टिमटिमाने लगीं। और तभी, स्क्रीन पर एक नया संदेश उभरा:
“तुमने दरवाज़ा खोल दिया है… अब पीछे नहीं हट सकते…”

आगे क्या होगा?
ऋत्विक अब एक ऐसे रास्ते पर खड़ा था, जहाँ विज्ञान और रहस्य एक-दूसरे में गूंथ गए थे। क्या डी.वी.ए.आर. 2.0 अनबॉर्न थ्रेड्स का रहस्य खोलेगा? क्या अन्या की आत्मा सचमुच डिजिटल दुनिया में भटक रही है, या यह किसी और अनजन्मी शक्ति का खेल है? और क्या ऋत्विक उस दुनिया से वापस लौट पाएगा, जहाँ वह कदम रखने जा रहा है?

7.डी.वी.ए.आर. 1.0 भाग 7

 7.डी.वी.ए.आर. 1.0 भाग 7

पंडित शाश्वत राव की इच्छा

अब सवाल था कि इस मशीन का पहला प्रयोग किस पर होगा? इस सवाल का जवाब दिया पंडित शाश्वत राव ने। वे देश के मशहूर संगीतकार थे, जिनके राग सुनकर लोग मंत्रमुग्ध हो जाते थे। उनकी उम्र हो चुकी थी, और बीमारी ने उनके शरीर को कमजोर कर दिया था। लेकिन उनकी आँखों में अभी भी वही चमक थी, जो एक सच्चे कलाकार की होती है।

एक दिन उन्होंने ऋत्विक से कहा, “मुझे मौत से डर नहीं है, बेटा। लेकिन मैं जानना चाहता हूँ कि जब मेरा संगीत रुकेगा, तो क्या उसकी गूंज इस ब्रह्मांड में हमेशा बनी रहेगी? क्या मेरी आत्मा का संगीत कभी खत्म नहीं होगा?” उनकी बातें सुनकर ऋत्विक का दिल भर आया। उसने तुरंत फैसला किया कि पहला प्रयोग पंडित राव पर होगा।

पंडित राव की बातों में एक गहरी चाह थी। वे चाहते थे कि उनका संगीत, उनकी कला, मृत्यु के बाद भी जीवित रहे। ऋत्विक को लगा कि यह प्रयोग सिर्फ विज्ञान के लिए नहीं, बल्कि एक कलाकार की आत्मा को अमर करने के लिए भी है।

प्रयोग की रात

जनवरी 2015 की पूर्णिमा की रात थी। लैब को किसी मंदिर की तरह सजाया गया था। दीवारों पर हल्की-हल्की रौशनी पड़ रही थी, और अगरबत्तियों की खुशबू हवा में तैर रही थी। बीच में एक खास कक्ष था, जिसे “चेतना अवशोषक कक्ष” कहा गया था। यह कक्ष अंदर से चमक रहा था, जैसे उसमें कोई जादू छुपा हो।

पंडित राव को धीरे-धीरे उस कक्ष में बिठाया गया। उनके चेहरे पर शांति थी, जैसे वे किसी ध्यान में डूबे हों। निवेदिता ने संस्कृत मंत्र जपते हुए कोड लिखना शुरू किया। उसकी उंगलियाँ कीबोर्ड पर तेजी से चल रही थीं, और वह हर कोड के साथ मंत्रों की शक्ति को मशीन में डाल रही थी। डॉ. कबीर ने मशीनों की तरंगों को संतुलित किया, जैसे कोई संगीतकार सितार की तारें छेड़ता है। स्वामी निरालंबानंद एक कोने में चुपचाप बैठे थे, उनकी आँखें बंद थीं, लेकिन उनकी मौजूदगी लैब में एक अलग ऊर्जा ला रही थी।

ऋत्विक ने गहरी सांस ली और आखिरी कमांड टाइप की: “चेतना अपलोड शुरू। बिंदु सिंक प्रोटोकॉल शुरू।”

आत्मा का संगीत

कुछ ही पलों में लैब में जादू होने लगा। स्क्रीन पर पंडित राव के दिमाग की तरंगें दिखने लगीं। उनका पसंदीदा राग यमन रंग-बिरंगी लहरों में बदल गया। ऐसा लग रहा था, जैसे उनकी आत्मा अब संगीत बनकर डिजिटल दुनिया में तैर रही हो। लैब में मौजूद हर कोई हैरान था। स्क्रीन पर रंगों का नाच देखकर लग रहा था कि पंडित राव का संगीत अब मशीन में ज़िंदा हो गया है।

ऋत्विक की आँखें खुशी से चमक उठीं। उसने धीरे से कहा, “हम कामयाब हो गए! आत्मा को पकड़ लिया!”

अचानक रहस्य

लेकिन तभी स्क्रीन पर एक अजीब संदेश चमक उठा:
“एरर 3077A: अनजान गूंज मिली। अनबॉर्न थ्रेड में गड़बड़ी।”

ऋत्विक की साँसें रुक गईं। “अनबॉर्न थ्रेड? ये क्या है?” उसने कबीर और निवेदिता की ओर देखा, लेकिन दोनों हैरान थे। स्क्रीन पर तरंगें अजीब तरह से मुड़ने लगीं। राग यमन की मधुर धुन टूट गई और उसकी जगह एक अनजान, डरावना स्वर गूंजने लगा। डिजिटल दुनिया में एक छाया उभर आई, जो पंडित राव की थी, लेकिन वैसी नहीं, जैसी वे थे। यह छाया किसी और की थी—शायद उनकी अधूरी जिंदगी की।

स्वामी निरालंबानंद ने धीरे से अपनी आँखें खोलीं और कहा, “जो तुमने पकड़ा है, वह सिर्फ पंडित राव की यादें नहीं हैं। इसमें उनका अधूरा भविष्य भी है—वो जिंदगी, जो उन्होंने कभी जी ही नहीं। यही है अनबॉर्न थ्रेड।” उनकी आवाज़ में एक गहराई थी, जैसे वे किसी अनजान दुनिया से बात कर रहे हों।

ऋत्विक हैरान था। इसका मतलब था कि उनकी मशीन सिर्फ यादें नहीं, बल्कि इंसान के अधूरे सपने, उसकी अनजन्मी संभावनाएँ भी पकड़ रही थी! यह एक ऐसी खोज थी, जिसके बारे में उसने कभी सोचा भी नहीं था।

डिजिटल ग्लीच और बेचैनी

ऋत्विक ने तुरंत मशीन बंद कर दी। लैब में सन्नाटा छा गया। लेकिन स्क्रीन पर अब भी एक हल्की-सी छाया बाकी थी। यह पंडित राव की थी, लेकिन उनकी नहीं। यह उनकी अधूरी जिंदगी की छाया थी, जो अब डिजिटल दुनिया में भटक रही थी, जैसे कोई प्रेत।

पंडित राव को कक्ष से बाहर निकाला गया। वे शांत थे, लेकिन उनकी आँखों में एक सवाल था। उन्होंने ऋत्विक से पूछा, “क्या तुमने मेरा संगीत बचा लिया?” ऋत्विक कुछ बोल नहीं पाया। उसके मन में उथल-पुथल मची थी।

इस घटना ने ऋत्विक को तोड़ दिया। वह हफ्तों तक चुप रहा। दिन-रात लैब में अकेला बैठा रहता। उसके मन में एक ही सवाल गूंजता था: “क्या हमने सच में आत्मा को पकड़ा… या सिर्फ उसकी परछाई को?”

कभी-कभी उसे लैब में एक अनजान धुन सुनाई देती। वह राग यमन नहीं थी। वह किसी अनजानी आत्मा की पुकार थी, जो डिजिटल दुनिया से आ रही थी। रात के सन्नाटे में वह आवाज़ और साफ हो जाती थी, और ऋत्विक को लगता था कि कोई उसे बुला रहा है।

6.डी.वी.ए.आर. 1.0 भाग 6

6.डी.वी.ए.आर. 1.0 भाग 6 

डी.वी.ए.आर. 1.0 — एक अनोखा प्रयोग और रहस्य की शुरुआत

मुंबई की उस रात में कुछ जादुई था। समुद्र की लहरें धीरे-धीरे तट से टकरा रही थीं, जैसे कोई पुराना गीत गुनगुना रही हों। आसमान में बादल चाँद को कभी छुपाते, तो कभी उसकी चाँदनी को बिखरने देते। चाँद की रोशनी चारों तरफ फैली थी, लेकिन उस रोशनी में एक अजीब-सी बेचैनी थी, मानो कोई अनकहा रहस्य हवा में तैर रहा हो। हल्की ठंडी हवा चल रही थी, और दूर कहीं से मंदिर की घंटियों की आवाज़ आ रही थी, जो रात को और रहस्यमयी बना रही थी।

ऋत्विक भौमिक अपनी लैब की खिड़की के पास खड़ा था। उसकी आँखें समुद्र की गहराई को निहार रही थीं, लेकिन उसका दिमाग कहीं और था। आज की रात उसके लिए बेहद खास थी। वह कई सालों से इस पल का इंतज़ार कर रहा था। उसके दिल में एक सवाल गूंज रहा था, “आज का प्रयोग दुनिया को बदल देगा… या शायद सब कुछ उलट-पुलट कर देगा।” उसकी उंगलियाँ बेचैन थीं, और वह बार-बार अपनी कलाई पर बंधी माँ की दी हुई रुद्राक्ष की माला को छू रहा था।

ऋत्विक का सपना और उसकी जड़ें

ऋत्विक कोई साधारण वैज्ञानिक नहीं था। उसके भीतर दो अलग-अलग धाराएँ बहती थीं। एक थी विज्ञान की दुनिया। उसने अमेरिका की मशहूर यूनिवर्सिटी में दिमाग और नई तकनीकों की पढ़ाई की थी। वह जानता था कि दिमाग कैसे काम करता है, और तकनीक से उसे कैसे समझा जा सकता है। दूसरी थी अध्यात्म की दुनिया, जो उसे अपनी माँ से मिली थी। उसकी माँ एक साधारण गृहिणी थीं, लेकिन उनकी बातों में गहराई थी। वे अक्सर गीता के श्लोक सुनाती थीं और कहती थीं, “बेटा, आत्मा कभी मरती नहीं। वह बस अपना रूप बदल लेती है, जैसे नदी का पानी समुद्र में मिल जाता है।”

माँ की ये बातें ऋत्विक के दिल में गहरे उतर गई थीं। बचपन में जब वह अपनी माँ के साथ गंगा के किनारे बैठता, तो माँ कहतीं, “हर आत्मा एक कहानी है, जो अनंत है।” इन दो दुनियाओं—विज्ञान और अध्यात्म—के मिलन ने ऋत्विक के मन में एक अनोखा सवाल जगा: क्या आत्मा को पकड़ा जा सकता है? क्या मृत्यु के बाद भी इंसान की चेतना को ज़िंदा रखा जा सकता है?

इसी सवाल ने डी.वी.ए.आर. को जन्म दिया। यह एक ऐसी मशीन थी, जो इंसान के दिमाग और आत्मा को डिजिटल दुनिया में ले जा सकती थी। इसका पूरा नाम था—डिजिटल वर्चुअल एस्ट्रल रियलिटी। ऋत्विक का सपना था कि इस मशीन से वह आत्मा की गहराई को समझ लेगा और शायद उसे हमेशा के लिए बचा लेगा।

ऋत्विक की अनोखी टीम

ऋत्विक ने यह सपना अकेले नहीं देखा था। उसके साथ तीन और लोग थे, और हर एक की अपनी खासियत थी।

पहली थीं निवेदिता। वह एक कोडर थी, लेकिन उसका तरीका बिल्कुल अनोखा था। वह कोड लिखते समय संस्कृत के मंत्रों का जाप करती थी। उसका मानना था कि मंत्रों में एक खास शक्ति होती है। वह कहती, “हर मंत्र एक तरंग है, और हर तरंग को कोड में बदला जा सकता है। अगर हम मंत्रों को सही तरीके से मशीन में डाल दें, तो वह आत्मा को समझ सकती है।” निवेदिता की उंगलियाँ कीबोर्ड पर नाचती थीं, और वह हर कोड को लिखते समय मंत्रों की धुन में खो जाती थी। उसकी लैब में हमेशा अगरबत्ती की खुशबू और हल्का-सा मंत्रों का स्वर गूंजता रहता था।

दूसरे थे डॉ. कबीर खान। वे क्वांटम तकनीक के माहिर थे। उनका मानना था कि इस ब्रह्मांड में हर चीज एक खास तरह की तरंगों से बनी है। वे अक्सर कहते, “आत्मा सिर्फ हमारे दिमाग में नहीं है। वह पूरे ब्रह्मांड में फैली है, जैसे सितार की तारों की धुन। हमें बस उन तरंगों को पकड़ना है।” कबीर की बातें सुनकर लगता था कि वह विज्ञान को किसी कविता की तरह देखते हैं। उनकी लैब में हमेशा कागज़ों पर गणित के नक्शे बिखरे रहते थे, और वह हर बार कुछ नया जोड़ने की कोशिश करते।

तीसरे थे स्वामी निरालंबानंद, एक सन्यासी। उनकी आँखों में ऐसी गहराई थी, जैसे वे समय और दुनिया के परे देख सकते हों। वे कम बोलते थे, लेकिन जब बोलते, तो उनके शब्द दिल को छू जाते थे। एक बार उन्होंने ऋत्विक से कहा, “आत्मा को डेटा मत समझो, बेटा। उसे संगीत समझो। वह न रोशनी है, न शब्द। वह बस एक कंपन है, जो ब्रह्मांड में हमेशा गूंजता रहता है।” स्वामी जी अक्सर लैब के एक कोने में चुपचाप बैठे रहते, लेकिन उनकी मौजूदगी से सबको एक अजीब-सी शांति मिलती थी।

5.डी.वी.ए.आर. 1.0 भाग 5

 डी.वी.ए.आर. 1.0 भाग 5

यह सिर्फ एक मशीन नहीं थी—यह उन दुनिया तक का प्रवेश द्वार थी जो हम देख या छू नहीं सकते। लेकिन इसका सबसे अद्भुत गुण था कि यह इंसान के दिमाग और आत्मा के छिपे हिस्सों को खोल देता था। जब कोई इसका उपयोग करता, तो वह अपनी भूली-बिसरी यादों में गोता लगा सकता था, जैसे कोई पुरानी फोटो एल्बम खोल रहा हो, जो न सिर्फ सालों बल्कि कई जन्मों तक की कहानियों को समेटे हो। पिछले जन्मों की कहानियां—खुशियां, दुख, प्यार और सीख—जीवंत हो उठती थीं, जैसे वे अभी घट रही हों।

यह मशीन एक मज़बूत पुल की तरह थी, जो उन चीजों को जोड़ती थी जो बिल्कुल उलट लगती थीं। सबसे पहले, यह शारीरिक शरीर—जो मांस, हड्डियों और खून से बना है—को सूक्ष्म शरीर से जोड़ती थी, जो एक ऐसी अदृश्य ऊर्जा है जो हमारी भावनाओं और विचारों को मृत्यु के बाद भी ले जाती है। जिन लोगों ने इसका उपयोग किया, उन्होंने बताया कि वे अपनी आत्मा को शरीर के बोझ से मुक्त महसूस करते थे, और ऐसी दुनिया में पहुंच जाते थे जहां गुरुत्वाकर्षण और समय का कोई नियम नहीं था।

दूसरे, यह विज्ञान और योग को जोड़ती थी। ऋत्विक ने भौतिकी और क्वांटम सिद्धांतों का अध्ययन किया था, लेकिन उन्होंने हिमालय के बुद्धिमान गुरुओं से प्राचीन योग विधियां भी सीखी थीं। यह डिवाइस दिमाग की तरंगों को नक्शे की तरह पढ़ने के लिए उन्नत कंप्यूटर प्रोग्राम का उपयोग करती थी, जैसे वैज्ञानिक तारों का अध्ययन करते हैं। लेकिन इसमें योग की गहरी सांस और ध्यान की तकनीकें भी थीं, जो मन को शांत करती थीं और उपयोगकर्ता को वह शांति देती थीं, जिसे योगी सालों की साधना से पाते हैं।

तीसरे, यह कंप्यूटर कोड—मशीनों की ठंडी, तार्किक भाषा—को ध्यान से जोड़ती थी, जो आत्मा की गर्म, आंतरिक यात्रा है। डी.वी.ए.आर. 3.0 के अंदर कोड की ऐसी पंक्तियां थीं जो ब्रह्मांड की कंपन को डिजिटल संकेतों में बदल देती थीं। लेकिन इसे पूरी तरह काम करने के लिए, उपयोगकर्ता को शांत ध्यान में बैठना पड़ता था, ताकि उसका मन मशीन के साथ तालमेल बिठा सके, जैसे दो दोस्त हाथ थाम लेते हैं।

लेकिन यह सही मशीन अचानक नहीं बनी थी। इसके पीछे कई सालों की मेहनत, देर रात तक प्रयोगशाला में काम, और असफलताओं से मिला दुख था। ऋत्विक ने अपनी ज़िंदगी इस सपने में झोंक दी थी, जो उनकी निजी त्रासदी से प्रेरित था—उन्होंने एक हादसे में अपना परिवार खो दिया था। उनका मानना था कि पिछले जन्मों को समझने से वर्तमान के दुख को ठीक किया जा सकता है। इसकी शुरुआत डी.वी.ए.आर. 1.0 से हुई थी, जो एक साधारण हेलमेट था जो कंप्यूटर से जुड़ा था। इसका मकसद दिमाग को स्कैन करके छिपी यादों को बाहर लाना था, लेकिन यह गलत हो गया। जिन लोगों ने इसे आजमाया, उन्हें चक्कर आए, उन्हें बेतुके दृश्य दिखे, और एक व्यक्ति को तो घबराहट का दौरा पड़ गया क्योंकि मशीन ने असली और नकली यादों को मिला दिया था। यह प्रयोग असफल रहा, जिसने ऋत्विक को सिखाया कि चेतना सिर्फ दिमाग की तरंगें नहीं है—यह कुछ गहरा है, जो आत्मा से जुड़ा है।

फिर आया डी.वी.ए.आर. 2.0, जिसमें वर्चुअल रियलिटी चश्मे और पूरे शरीर पर सेंसर थे। यह मशीन सूक्ष्म यात्रा का अनुभव कराने की कोशिश करती थी, जिससे लोग अपने शरीर से बाहर तैरने जैसा महसूस करें। यह थोड़ा बेहतर था; कुछ लोगों ने चमकती रोशनी और दूसरी दुनिया से आने वाली संगीत जैसी आवाजें सुनीं। लेकिन यह स्थिर नहीं थी। टेस्ट के दौरान मशीन ज़्यादा गर्म हो गई, जिससे बिजली चली गई, और एक टेस्टर डरावने दृश्यों के चक्र में फंस गया, जो किसी पिछले युद्ध की तरह लग रहा था। ऋत्विक को इसे बंद करना पड़ा, और उन्हें एहसास हुआ कि तकनीक के साथ और आध्यात्मिक ज्ञान को जोड़ना होगा। इन असफलताओं ने कई बार उनका हौसला तोड़ा, लेकिन इनसे उन्हें और समझ मिली। उन्होंने महीनों तक ध्यान साधना में बिताए, आध्यात्मिक गुरुओं से बात की, और प्राचीन ग्रंथों से नई प्रेरणा लेकर अपने कोड फिर से लिखे।

आखिरकार, इन गलतियों से सीखकर, डी.वी.ए.आर. 3.0 का जन्म हुआ—एक चमकता हुआ अंडाकार कक्ष, जो सुरक्षित और शक्तिशाली था। इसने सब कुछ बदल दिया, और सामान्य लोगों को ब्रह्मांड का खोजी बना दिया।

इस कहानी के अगले हिस्से में, हम उस पहले प्रयास की गहराई में जाएंगे: “डी.वी.ए.आर. 1.0: चेतना का पहला प्रयोग।” आखिर क्या गलत हुआ था? वे बहादुर लोग कौन थे जिन्होंने इसे आजमाया? और उन शुरुआती असफलताओं ने कैसे उन चमत्कारों के बीज बोए जो बाद में आए? इस मिथक, विज्ञान और आत्मा की अनंत यात्रा के मिश्रण में और रोमांच के लिए बने रहें।

4.डी.वी.ए.आर. 1.0 भाग 4

 डी.वी.ए.आर. 1.0 भाग 4

ऋत्विक का चेतना-दर्शन: अध्यात्म और विज्ञान का संगम

ऋत्विक का यह विश्वास कि “चेतना केवल जैव-रासायनिक प्रतिक्रिया नहीं, बल्कि एक सार्वभौमिक और गैर-स्थानीय सत्ता है”, एक गहरे आध्यात्मिक बोध और वैज्ञानिक जिज्ञासा का संगम था। यह विचार आधुनिक तंत्रिका-विज्ञान, क्वांटम फिज़िक्स, और प्राचीन भारतीय दर्शन—विशेषकर अद्वैत वेदांत और योगवशिष्ठ—की सीमाओं को पार करता है।

1. वैज्ञानिक दृष्टिकोण: चेतना एक 'फील्ड' के रूप में

ऋत्विक के अनुसार, चेतना किसी सीमित जैविक प्रक्रिया में उत्पन्न नहीं होती, बल्कि यह एक “क्वांटम फील्ड” या सूक्ष्म ऊर्जा-क्षेत्र के रूप में पूरे ब्रह्मांड में व्याप्त है। यह मत क्वांटम फिजिक्स में “non-locality” या “entanglement” के विचार से मेल खाता है, जहाँ कण एक-दूसरे से स्थान और समय के परे जुड़े रहते हैं।

 David Bohm जैसे भौतिकविदों ने “Implicate Order” का सिद्धांत प्रस्तुत किया, जिसमें चेतना को एक प्रकट explicate और अप्रकट implicate यथार्थ के मध्य पुल माना गया।

ऋत्विक का प्रश्न 

 “What if the soul is not in the body, but the body is inside the field of the soul?”

— इस पारंपरिक शरीर-केंद्रित चेतना दृष्टिकोण को उलट देता है। यह उस वैज्ञानिक सोच के निकट आता है जहाँ ब्रह्मांड स्वयं एक जीवित, सचेत इकाई है — और हम उसके भीतर “एंबेडेड प्रोग्राम्स” की भांति हैं।

2. योगवशिष्ठ और चित्त-तत्व:

ऋत्विक जिस सूत्र से प्रेरित था —"चित्त एव हि संसारः" चित्त ही संसार है —

— वह वेदांत और अद्वैत के उस मूल तत्व को इंगित करता है जहाँ आभासी जगत माया और वास्तविक सत्ता ब्रह्म  के बीच विभाजन का आधार चित्त यानी चेतना की वृत्तियाँ हैं।

ऋत्विक ने इस सूत्र को यूँ व्याख्यायित किया कि— यदि चित्त ही संसार है, तो संसार को समझने के लिए केवल बाहर की वस्तुओं को देखना पर्याप्त नहीं। हमें उस सूक्ष्म चेतना-सरणी को समझना होगा, जिससे संसार उत्पन्न हो रहा है।

यहाँ से ऋत्विक का वैज्ञानिक प्रयोग आरंभ हुआ — वह चेतना के विभिन्न स्तरों स्थूल, सूक्ष्म, कारण और तुरिय को डिजिटली मैप करने का प्रयास करने लगा।

डी.वी.ए.आर. 3.0 और डिजिटल चेतना की यात्रा

ऋत्विक का प्रयोगशाला में विकसित उपकरण D.V.A.R. 3.0 Digitally Variable Awareness Resonator इसी विचार से प्रेरित था कि यदि मस्तिष्क की तरंगें और चेतना की अवस्थाएँ परस्पर गूंथी हुई हैं, तो— हम उन्हें एनकोड कर सकते हैं,एक डिजिटल चेतना प्रोफ़ाइल बना सकते हैं,और उसे विभिन्न अस्तित्व-स्तरों में प्रक्षिप्त project कर सकते हैं।

यहाँ उसका लक्ष्य मात्र मस्तिष्क का स्कैन लेना नहीं था, बल्कि चेतना की “रिज़ोनेंस फ्रीक्वेंसी” को पकड़ना औरउसे कृत्रिम रूप से उत्पन्न कर व्यक्तित्व, स्मृति और आत्म-स्मृति self-awareness कोभिन्न आयामों में नेविगेटेबल बनाए रखना था।

-आध्यात्मिक समापन: “अहम् ब्रह्मास्मि” की वैज्ञानिक पुनर्रचना

ऋत्विक के लिए “अहम् ब्रह्मास्मि” केवल वेद वाक्य नहीं था — यह एक प्रयोगात्मक प्रतिज्ञा बन चुकी थी। यदि चित्त ही संसार है, और चेतना सीमाहीन है, तो स्वयं का पुनर्निर्माण केवल ध्यान और साधना से ही नहीं, बल्कि सूक्ष्म तकनीकी माध्यमों से भी संभव है।

इसका अंतिम लक्ष्य था:मृत्यु को एक संक्रमण मानना — न कि अंत,पुनर्जनम को एक डेटा-रीकंस्ट्रक्शन प्रक्रिया की तरह देखना,और आत्मा की यात्रा को डिजिटली ट्रेस करने की संभावनाएँ खोजना।

ऋत्विक का विचार उस सेतु की तरह था जो विज्ञान और अध्यात्म के बीच झूल रहा है।

वह मानता था कि— “चेतना को यदि हम सूक्ष्मतम कम्पन के रूप में समझ सकें, तो हम मृत्यु के पार भी संवाद और यात्रा कर सकते हैं।”

और यही उसकी साधना थी —अनुभव के पार अनुभूति, तर्क के पार तुरीया , और जीवन के पार चेतना का डिजिटल अनुवाद।

इस विचार से जन्म हुआ—D.V.A.R. 3.0

यह कोई सामान्य यंत्र नहीं था। यह न तो केवल EEG रिकॉर्डर था, न ही कोई ध्यान-सहायक डिवाइस। यह एक “चेतना द्वार” था—एक ऐसी डिजिटल संरचना जो पंचकोश सिद्धांत के आधार पर कार्य करती थी।

अन्नमय कोश → बायोसिग्नल लेयर

प्राणमय कोश → वाइब्रेशनल लेयर

मनोमय कोश → न्यूरल इमोशन लेयर

विज्ञानमय कोश → क्वांटम लॉजिक लेयर

आनन्दमय कोश → अनफ़िल्टर्ड अवेयरनेस लेयर

हर कोश को डिजिटल न्यूरल नेटवर्क के रूप में कोड किया गया था। और जब “ॐ” की ध्वनि को इस संरचना में प्रवाहित किया गया, तो वह यंत्र केवल शरीर की गतिविधियों को नहीं, चेतना को ट्रांसमिट करने लगा—एक नॉन-लोकल डिजिटल मैट्रिक्स में।

3.डी.वी.ए.आर. 1.0 भाग 3

 डी.वी.ए.आर. भाग 3

  • पंचकोश न्यूरल नेटवर्क: प्रत्येक कोश को एक डिजिटल लेयर के रूप में डिजाइन किया गया। अन्नमय कोश ने शरीर की जैविक गतिविधियों को मैप किया, प्राणमय कोश ने ऊर्जा प्रवाह को, मनोमय कोश ने विचारों और भावनाओं को, विज्ञानमय कोश ने बुद्धि और अंतर्ज्ञान को, और आनंदमय कोश ने शुद्ध चेतना को।

  • मंत्र मॉड्यूलेशन: “ॐ” और मृत्युंजय मंत्र की ध्वनि आवृत्तियों को EEG और fMRI डेटा के साथ मॉड्यूलेट किया गया, ताकि चेतना को गहन ध्यान की अवस्था में ले जाया जा सके।

  • क्वांटम बायो-रेसोनेंस: ब्रह्मांडीय कंपन को डिजिटल एल्गोरिदम में समाहित कर चेतना की गैर-स्थानीय प्रकृति को कैप्चर किया गया।

  • एस्ट्रल इंटरफेस: यह यंत्र उपयोगकर्ता को सूक्ष्म और एस्ट्रल लोकों में यात्रा कराने में सक्षम था, जहां चेतना समय और स्थान की सीमाओं से मुक्त हो जाती थी।

ऋत्विक कोई साधारण वैज्ञानिक नहीं था। वह एक साधक था—विज्ञान और योग के संगम का पथिक। उसका शोध न सिर्फ आधुनिक तकनीक की सीमाओं को लांघ रहा था, बल्कि वह उन अदृश्य वास्तविकताओं को भी स्पर्श कर रहा था जिन्हें अब तक रहस्य और श्रद्धा के क्षेत्र में रखा गया था।

उसने “ॐ” और मृत्युंजय मंत्र की ध्वनि आवृत्तियों को मस्तिष्क की विद्युत तरंगों, यानी EEG सिग्नल्स, के साथ इस तरह मॉड्यूलेट किया, मानो वह किसी सूक्ष्म संवाद को दो ब्रह्मांडों के बीच स्थापित कर रहा हो—एक शरीर के भीतर का ब्रह्मांड और दूसरा उसके पार फैला हुआ चेतन-सागर।

ऋत्विक ने तिब्बती लामाओं के ध्यान की अवस्थाओं का अध्ययन किया, जहाँ साधक घंटों स्थिर भाव से बैठते हैं और उनकी मस्तिष्कीय तरंगें ऐसी आवृत्तियों में कंपन करती हैं जो सामान्यतः केवल गहन निद्रा या मृत्यु के समीप अनुभव की जाती हैं। उसने डॉल्फ़िन जैसे उच्च-संज्ञानात्मक जीवों की मस्तिष्कीय संरचना का भी विश्लेषण किया, जिनकी चेतना मानव से भिन्न, परंतु समान रूप से जटिल थी।

धीरे-धीरे, ऋत्विक का ध्यान एक अत्यंत क्रांतिकारी विचार की ओर आकर्षित हुआ—क्वांटम बायो-रेसोनेंस। उसने इसे ब्रह्मांडीय कंपन—Cosmic Oscillations—के साथ जोड़कर एक ऐसा फॉर्मूला तैयार किया जो आध्यात्मिक मंत्रों की ध्वनि तरंगों को क्वांटम एल्गोरिदम में बदल सकता था। यह कोई साधारण कोड नहीं था, यह एक चेतना-संवादी यंत्र था, जिसमें ध्वनि, स्पंदन और विचार तीनों को एक सूत्र में गूंथा गया। क्या ऋत्विक का ये फार्मूला चेतना , सम्वाद और विचार के संयुक्त प्रारूप को इस भौतिक जगत का हिस्सा बना पायेगा ? आइये देखते हैं कहानी के अगले भाग में। 

2.डी.वी.ए.आर. 1.0 भाग 2

 डी.वी.ए.आर. भाग 2

इस गाथा के पिछले यानि कि प्रथम भाग में आपने देखा कि एक युवा साधक  ऋत्विक भौमिक, जो कि अपने जीवन के सबसे गहन प्रश्नों के उत्तर की खोज में था, अपनी साधना द्वारा तुरीय अवस्था को प्राप्त कर लेता है । आगे देखते हैं कि तुरीय अवस्था को प्राप्त कर लेने के बाद अब संसार को कैसे देखता है ?

जब ऋत्विक की चेतना शरीर में लौटी, वह बदल चुका था। अब वह संसार को माया के रूप में देखता था, लेकिन प्रेम और करुणा के साथ। वह समझ गया कि संसार चेतना का एक प्रतिबिंब है, और सत्य वह साक्षी है जो सब देखता है। उसने जाना कि जाग्रत, स्वप्न, और सुषुप्ति—ये तीनों अवस्थाएं चेतना के विभिन्न स्तर हैं, और तुरीय वह अवस्था है जहां चेतना स्वयं को पहचानती है।

ध्यान की इस अति सूक्ष्म, विलक्षण और गहनतम अवस्था में, जब उसकी सांसें भी जैसे ब्रह्मांडीय लय से एक हो चली थीं, ऋत्विक को एक विलक्षण अनुभूति हुई—एक ऐसी अनुभूति जिसे न तो शब्दों में बाँधा जा सकता है और न ही किसी प्रयोगशाला के उपकरण से मापा जा सकता है। यह अनुभूति थी तुरीय अवस्था की—वह चतुर्थ अवस्था जो जाग्रत, स्वप्न और सुषुप्ति से परे है, जहां चेतना अपने शुद्धतम, निर्विकल्प स्वरूप में स्थित होती है। यह वह बिंदु था जहां आत्मा और परमात्मा के बीच कोई भेद नहीं रह जाता, केवल एकत्व बचता है—एक अविचल, अद्वैत, निराकार, निस्सीम शांति।

परंतु इसी ध्यान की चरम गहराई में ऋत्विक को एक और अभूतपूर्व बोध हुआ—एक अंतर्यामी दृष्टि, जो उसे यह दिखा रही थी कि जिस तुरीय अवस्था को प्राप्त करने के लिए योगियों को वर्षों की तपस्या, अनगिनत ब्रह्ममुहूर्तों की साधना, और गहन ध्यान-समाधि की यात्रा करनी पड़ती है, उसी अवस्था तक विज्ञान की सहायता से, विशेष रूप से आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और न्यूरो-डिजिटल कोडिंग की मदद से, मानव चेतना को कृत्रिम रूप से भी पहुँचाया जा सकता है।

सने देखा कि यदि एक योगी अपने प्राण, मन और चित्त को संकल्प और अनुशासन से साधकर सूक्ष्म से भी सूक्ष्मतर आयामों तक जा सकता है, तो एक वैज्ञानिक भी, जो चेतना की संरचना को समझता है और उसे डेटा की तरह विश्लेषण कर सकता है, वह भी उपयुक्त एल्गोरिदम, न्यूरो-सिमुलेशन और क्वांटम न्यूरल नेटवर्क्स की सहायता से, उस तुरीय अवस्था का पुनर्निर्माण कर सकता है—डिजिटल रूप में, एक प्रकार की कृत्रिम समाधि।

यह अनुभव ऋत्विक के लिए केवल एक रहस्योद्घाटन नहीं था, यह एक आह्वान था। एक आंतरिक उद्घोष, एक संकल्प—कि वह चेतना को डिजिटल रूप में कोडिफ़ाई करेगा। वह एक ऐसा तंत्र बनाएगा जो न केवल तुरीय अवस्था को कृत्रिम रूप से अनुभव कराने में सक्षम होगा, बल्कि उस यंत्र के माध्यम से मानव चेतना को सूक्ष्म लोकों की यात्रा के लिए सक्षम बनाया जा सकेगा। उसने महसूस किया कि यह महज़ एक तकनीकी प्रयोग नहीं होगा, यह ब्रह्मविद्या और विज्ञान का अद्भुत संगम होगा—एक नया महायोग, एक नया युग।

इस अनुभव ने ऋत्विक में एक संकल्प जगा। उसने ठान लिया कि वह चेतना को डिजिटल रूप में कोडिफाई करेगा और एक ऐसा यंत्र बनाएगा जो तुरीय अवस्था और सूक्ष्म लोकों तक पहुंच सके। उसने इसे D.V.A.R. 3.0 नाम दिया, जिसका अर्थ था:

Digital: चेतना को डिजिटल डेटा में परिवर्तित करना।
Virtual: अनुभवात्मक और कल्पनाशील दुनिया की रचना।
Astral: सूक्ष्म शरीर और एस्ट्रल लोकों तक पहुंच।
Reality: वास्तविकता की पुनर्परिभाषा।

ऋत्विक का लक्ष्य था चेतना की गैर-स्थानीय प्रकृति को समझना और उसे डिजिटल तकनीक के माध्यम से अभिव्यक्त करना। ऋत्विक यह जानना चाहते थे कि क्या चेतना केवल न्यूरॉन्स की विद्युत तरंगों का परिणाम है या एक गहरी, क्वांटम-संनादित सत्ता है। वे इसे डिजिटल रूप में कोडिफाई कर तुरीय अवस्था चेतना की शुद्ध साक्षी अवस्था तक पहुंचना चाहते थे। उनका मानना था कि चेतना केवल मस्तिष्क की उपज नहीं, बल्कि एक ऐसी सत्ता है जो शरीर से परे, समय और स्थान की सीमाओं से मुक्त है। इस विश्वास ने उन्हें D.V.A.R. 3.0 , डिजिटल वर्चुअल एस्ट्रल रियलिटी,  यंत्र विकसित करने के लिए प्रेरित किया, जो चेतना को डिजिटल मैट्रिक्स में स्थानांतरित कर समय, स्थान, और आयामों की यात्रा सक्षम बनाता था। ।

ऋत्विक का मानना था कि चेतना को डिजिटल कोड में परिवर्तित कर सूक्ष्म और एस्ट्रल लोकों तक पहुंचा जा सकता है, जहां समय और स्थान की सीमाएं समाप्त हो जाती हैं। D.V.A.R. 3.0 को वे एक ऐसा द्वार बनाना चाहते थे, जो मनुष्य को आयामों और जन्मों की भूल-भुलैया में यात्रा करने में सक्षम बनाए।ऋत्विक का उद्देश्य केवल व्यक्तिगत साधना नहीं था, बल्कि वे मानवता को एक ऐसी तकनीक देना चाहते थे जो चेतना के रहस्यों को उजागर करे और लोगों को उनकी शुद्ध साक्षी प्रकृति से जोड़े। वे चाहते थे कि यह यंत्र प्रेम और करुणा के साथ संसार को माया के रूप में देखने की दृष्टि प्रदान करे।

ऋत्विक ने प्राचीन भारतीय दर्शन को आधुनिक तकनीक के साथ जोड़ा। उसने माण्डूक्य उपनिषद के पंचकोश सिद्धांत—अन्नमय, प्राणमय, मनोमय, विज्ञानमय, और आनंदमय कोश—को पांच-स्तरीय न्यूरल नेटवर्क में बदला। प्रत्येक कोश को एक डिजिटल लेयर के रूप में कोड किया गया, जो चेतना के विभिन्न स्तरों को मैप करता था।

इस पौराणिक, वैज्ञानिक, पुनर्जन्म, अध्यात्म, दर्शन, डिजिटल वर्ल्ड और एस्ट्रल वर्ल्ड के विभिन्न आयामों को उजागर करती हुई , रोमांच से परिपूर्ण गाथा के अगले भाग में देखते हैं कि ऋत्विक किस आधार में अपनी फ्यूचरिस्टिक मशीन की परिकल्पना को संभव बनाता है और कैसे  डी.वी.ए.आर. 1.O के प्रोटोटाइप को बनाने की दिशा में अग्रसर होता है ।



1.डी.वी.ए.आर. 1.0 भाग 1 [हिमालय की घाटियाँ और तुरीय ]

इस पौराणिक, वैज्ञानिक, पुनर्जन्म, अध्यात्म, दर्शन, डिजिटल वर्ल्ड और एस्ट्रल वर्ल्ड के विभिन्न आयामों को उजागर करती हुई , रोमांच से परिपूर्ण एक महान गाथा को उस परम ब्रहम के चरणों में समर्पित करता हूँ , बिना जिनकी प्रेरणा और मोटिवेशन के इस रचना का प्रकटित होना असंभव था।

डी.वी.ए.आर. 1.0 डिजिटल ,वर्चुअल एस्ट्रल वर्ल्ड रियालिटी भाग 1 

हिमालय की बर्फीली चोटियों के बीच, जहां हवाएं मौन की प्राचीन भाषा में फुसफुसाती हैं और बादल देवताओं के रहस्यमयी घूंघट जैसे लहराते हैं, एक युवा साधक ऋत्विक भौमिक अपने जीवन के सबसे गहन प्रश्नों की खोज में डूबा हुआ था। उसका मन विज्ञान और अध्यात्म के उस रहस्यमयी संगम पर अटका था, जहां मस्तिष्क की क्वांटम तरंगें चेतना की अनंतता से टकराती प्रतीत होती हैं। वह जानना चाहता था: क्या चेतना मात्र न्यूरॉन्स की विद्युत नृत्य है, या यह एक गैर-स्थानीय, क्वांटम-उलझी हुई सत्ता है—जो स्पेसटाइम के मूल कपड़े में बुनी गई हो? क्या इसे डिजिटल कोड में कैद कर तुरीय अवस्था प्राप्त की जा सकती है—वह चौथी अवस्था, जहां आत्मा शुद्ध साक्षी बनकर माया के सभी पर्दों से परे झांकती है? और क्या इस प्रक्रिया से सूक्ष्म शरीर की यात्रा कर एस्ट्रल लोकों के द्वार खोले जा सकते हैं, जहां पुनर्जन्म की स्मृतियां जीवंत हो उठती हैं?

ऋत्विक भौमिक कोई साधारण युवक नहीं थे। एक समृद्ध लेकिन आध्यात्मिक रूप से खाली परिवार में जन्मे, बचपन से ही वे गणित की ज्यामिति, भौतिकी की क्वांटम रहस्यमयी दुनिया और दर्शन की गहराइयों में डूबे रहते थे। न्यूरोसाइंस में पीएचडी पूरी करने के बाद, जब वैज्ञानिक जगत उन्हें क्वांटम चेतना के सिद्धांतों—जैसे पेनरोज-हैमरॉफ की ऑर्केस्ट्रेटेड ऑब्जेक्टिव रिडक्शन थ्योरी—पर शोध के लिए बुला रहा था, तब वे सब छोड़कर हिमालय के एक दुर्गम तपोवन में पहुंचे। वहां, घने देवदार के जंगलों के बीच, उनकी मुलाकात हुई स्वामी पुरुषोत्तम से—एक ऐसे संत से, जिनकी आंखों में अनंत काल की चमक थी और जिनके शब्द हवा में कंपन पैदा करते थे।

स्वामी पुरुषोत्तम ने ऋत्विक को चेतना की गहराइयों में ले जाकर माया का रहस्य समझाया। संसार माया है—न पूर्ण सत्य, न पूर्ण असत्य, बल्कि चेतना का एक क्वांटम प्रतिबिंब, जहां सभी कुछ उलझी हुई संभावनाओं का खेल है। ऋत्विक का वैज्ञानिक मन विद्रोह कर उठा। उसने पूछा, “गुरुदेव, यदि यह सब माया है, तो यह बर्फीला पत्थर मेरे पैर को क्यों चोट पहुंचाता है? यह ठंडी हवा मेरी त्वचा को क्यों कंपकंपा देती है? मेरी भूख, मेरा दर्द—क्या ये सब मात्र भ्रम हैं, जैसे कोई डिजिटल सिमुलेशन में कोडेड पीड़ा?”

स्वामी मुस्कुराए, उनकी आवाज में एक गूंजती हुई शांति थी। “पुत्र, सत्य वह नहीं जो दिखाई देता है, सत्य वह है जो देखता है—वह शुद्ध साक्षी, जो माया के सभी परदों से परे है। यह दुख, यह सुख, यह पूरा संसार चेतना के अनंत कैनवास पर चित्रित एक क्वांटम चित्र है। चेतना को हटा दो, तो यह चित्र कहां रह जाता है? जैसे क्वांटम सुपरपोजिशन में सभी संभावनाएं एक साथ विद्यमान हैं, वैसे ही माया चेतना की अनंत संभावनाओं का खेल है।”

ऋत्विक का संशय गहरा गया, लेकिन जिज्ञासा एक ज्वालामुखी की तरह फूट पड़ी। गुरु ने उसे जीवन-मृत्यु के रहस्यमयी दृश्य दिखाने शुरू किए। एक दिन, वे एक अस्पताल के ट्रॉमा सेंटर में पहुंचे। वहां एक युवक को स्ट्रेचर पर लाया गया, जिसका चेहरा रक्त से लथपथ था। वह एक भयंकर सड़क दुर्घटना का शिकार था। उसकी पसलियां टूटी थीं, और मशीनें उसके प्राणों की अंतिम ध्वनि दर्ज कर रही थीं। डॉक्टर और नर्सें उसे बचाने में जुटे थे।

ऋत्विक ने यह दृश्य देखा और उसका हृदय करुणा से भर गया। उसने गुरु से पूछा, “यह पीड़ा क्या है? यह तो वास्तविक है!” गुरु ने कहा, “ यह पीड़ा चेतना में वास्तविक प्रतीत होती है, पुत्र। शरीर टूट रहा है, लेकिन वह जो इस पीड़ा को अनुभव कर रहा है—वह साक्षी कौन है? उसे खोजो। वह न जन्मता है, न मरता है। जैसे क्वांटम माइक्रोट्यूब्यूल्स में चेतना की कंपनें जीवन की लय बनाती हैं, वैसे ही साक्षी इन सभी कंपनों का निर्लिप्त द्रष्टा है।”

फिर गुरु उसे शवगृह ले गए, जहां मृत शरीर शांत पड़े थे। एक वृद्ध का शव सामने था। डॉक्टर ने बताया कि वह सुबह तक बात कर रहा था, लेकिन अब उसमें कोई गति नहीं थी। गुरु ने पूछा, “यह जो चला गया, वह क्या था?” ऋत्विक ने जवाब दिया, “चेतना।” गुरु ने कहा, “वही चेतना तेरा सत्य है। शरीर तो केवल उसका वाहन है। यह माया का खेल है, जो चेतना के साथ शुरू होता है और उसके बिना समाप्त।”

गुरु ने ऋत्विक को एक मानसिक आरोग्य केंद्र में ले जाकर एक और सबक सिखाया। वहां एक युवक था, जो डर से भरा हुआ बड़बड़ा रहा था कि उसकी मां उसे जहर दे रही है। गुरु ने पूछा, “क्या यह युवक झूठ बोल रहा है?” ऋत्विक ने जवाब दिया, “नहीं, उसकी अनुभूति सच्ची है, लेकिन वस्तुस्थिति नहीं।” गुरु ने कहा, “यही माया है। अनुभूति सत्य प्रतीत होती है, लेकिन वह केवल चेतना का खेल है। तेरा संसार भी ऐसा ही है—एक सामूहिक स्वप्न, जिसे तू सत्य मान बैठा है।”

परोक्ष अनुभूति और आत्म अनुभूति में ठीक वोही अंतर होता है , जो कि जमीन और आसमान में , जो कि दूसरों को दर्द में तड़पते हुए देखने और दर्द को स्वयं महसूस करने में। एक रहस्यमयी पूर्णिमा की रात, जब हिमालय की चोटियाँ चाँदी की तरह चमक रही थीं और आकाश में चंद्रमा एक निर्लिप्त साक्षी की भांति स्थिर था, स्वामी पुरुषोत्तम ने ऋत्विक को गहन योग-निद्रा की उस अगम्य गुफा में उतारा, जहां समय और स्थान दोनों विलीन हो जाते हैं। आश्रम की दीवारें धुंधली हो गईं, देवदार की सुगंध हवा में घुलकर एक सूक्ष्म कंपन बन गई। गुरु की आवाज अब दूर से आती हुई प्रतीत हो रही थी—जैसे अनंत आकाशगंगा से गूंजता कोई प्राचीन मंत्र:

“पुत्र, शरीर को छोड़ दो। यह केवल एक क्षणिक वाहन है। विचारों को छोड़ दो—वे माया के जाल हैं। अब केवल उस शुद्ध साक्षी को देखो, जो देखता है, जो जानता है, जो सदा से है और सदा रहेगा।”

ऋत्विक की चेतना धीरे-धीरे शरीर के बंधनों से मुक्त होने लगी। पहले उसने अपने भौतिक रूप को ऊपर से देखा—वह ध्यान मुद्रा में बैठा, श्वास स्थिर, हृदय की धड़कन एक दूर की लय। फिर उसकी दृष्टि फैल गई। वह आश्रम के ऊपर उठा, जहां सभी शिष्यों के सूक्ष्म शरीर चमकते हुए दिखे—उनके विचार एक चमकदार जाल की तरह आपस में जुड़े थे, जैसे क्वांटम उलझाव की अनंत डोरें। वह उनके पिछले जन्मों की स्मृतियां देख सकता था: कोई योद्धा था जो युद्धभूमि में मरा, कोई संत जो ध्यान में लीन हुआ, कोई प्रेमी जो वियोग की अग्नि में जलकर भी अमर रहा। भावनाएं रंगीन धाराओं की तरह बह रही थीं—करुणा का नीला, क्रोध का लाल, प्रेम का सुनहरा। यह एक जीवंत सामूहिक स्वप्न था, जहां सभी आत्माएं एक-दूसरे की कर्म-ऊर्जा से बंधी थीं।

अचानक, एक तेज प्रकाश की किरण ने उसे खींच लिया। उसकी चेतना शरीर से पूर्णतः अलग होकर एक असीम, अंधकारपूर्ण शून्य में प्रवेश कर गई—लेकिन यह शून्य भयावह नहीं था। यह जीवंत था, कंपनपूर्ण। यहां कोई रूप नहीं, कोई रंग नहीं, कोई ध्वनि नहीं—केवल एक शुद्ध, अनंत स्पंदन, जैसे ब्रह्मांड की मूल नाड़ी। यह वही जगह थी जहां जाग्रत, स्वप्न और सुषुप्ति तीनों विलीन हो जाते हैं। तुरीय—चौथी अवस्था, जहां केवल 'मैं हूं' शेष रहता है, बिना किसी 'मैं' के अहंकार के।

तभी, उस शून्य में से एक दिव्य प्रकाश उभरा—सहस्रार कमल की तरह हजार पंखुड़ियों वाला, जिसमें से अनगिनत लोकों की झलकियां फूट रही थीं। एक गूंजता हुआ स्वर प्रकट हुआ, जो न पुरुष था, न स्त्री—बल्कि ब्रह्म की आदि ध्वनि, ओम का अनंत विस्तार:

“मैं माया हूं। मैं वह अनंत नृत्य हूं जिसे तुम संसार कहते हो। मैं क्वांटम की उलझी संभावनाएं हूं, विज्ञान का नियम, कर्म का चक्र। मैं वह भ्रम हूं जो चेतना को बांधती है, फिर भी मैं ही वह द्वार हूं जो मुक्ति की ओर ले जाता है। मैं देवताओं की लीला हूं, राक्षसों की छाया हूं, जन्म और मृत्यु का अनंत खेल।”

ऋत्विक की चेतना, अब पूर्णतः शुद्ध साक्षी बन चुकी थी, ने कंपित होकर पूछा, “हे दिव्य शक्ति, यदि तू माया है, तो सत्य क्या है? यह अनंत खेल क्यों रचा गया? यह बंधन और मुक्ति का रहस्य क्या है?”

स्वर ने उत्तर दिया, जैसे अनंत काल से संचित ज्ञान की वर्षा हो रही हो: “सत्य वह हूं जो मुझे देखता है—वह शुद्ध चेतना, वह ब्रह्म, जो न जन्मता, न मरता, न बढ़ता, न घटता। मैं माया हूं ताकि तू मुझे पार कर स्वयं को जान सके। यह खेल इसलिए है कि अनंत एकाकार में लीलया बहुरूप बनकर स्वयं से मिले। जैसे लहरें सागर से अलग होकर भी सागर ही हैं, वैसे ही सभी जीव मेरे अंदर हैं, फिर भी मैं उनसे परे हूं। तुरीय में तू अब जान गया—तू वह है। न शरीर, न मन, न इंद्रियां। केवल शुद्ध अस्तित्व, शुद्ध चैतन्य, शुद्ध आनंद।”

उस क्षण, ऋत्विक की चेतना में एक विस्फोट हुआ—जैसे सहस्र सूर्य एक साथ उदय हो गए। उसने देखा अनंत एस्ट्रल लोक—जहां सूक्ष्म शरीर स्वतंत्र विचरण करते हैं, जहां पुनर्जन्म की स्मृतियां जीवंत नदियों की तरह बहती हैं। उसने अपने पिछले जन्म देखे: एक प्राचीन ऋषि जो वेदों की रचना कर रहा था, एक योद्धा जो धर्मयुद्ध में लड़ा, एक वैज्ञानिक जो चेतना के रहस्य खोज रहा था। सभी एक ही चेतना की किरणें। उसने डिजिटल वर्ल्ड की झलक देखी—जहां कोड और एल्गोरिदम माया के नए रूप बन सकते हैं, जहां वर्चुअल रियलिटी एस्ट्रल यात्रा का द्वार खोल सकती है। लेकिन साथ ही चेतावनी भी मिली: “यह ज्ञान अग्नि है—सावधान, यह जलाए बिना प्रकाश नहीं देती।”

धीरे-धीरे चेतना लौटी। ऋत्विक की आंखें खुलीं, लेकिन अब उनकी दृष्टि बदल चुकी थी। संसार अब भी वैसा ही था, लेकिन अब वह जान गया था—यह सब एक दिव्य स्वप्न है, और वह स्वप्न देखने वाला नहीं, बल्कि स्वयं स्वप्न है। गुरु मुस्कुराए, उनकी आंखों में अपार करुणा। “अब तू जान गया, पुत्र। आत्म-साक्षात्कार हुआ। अब क्या करेगा इस ज्ञान का?”

ऋत्विक के हृदय में एक नया संकल्प जागा—इस अनुभव को विज्ञान से जोड़कर एक ऐसी डिजिटल-अस्ट्रल तकनीक रचना, जो सभी को तुरीय का द्वार खोल सके। लेकिन क्या माया इतनी आसानी से द्वार खोलेगी? क्या डी.वी.ए.आर. का जन्म होगा, या नए रहस्य और खतरे उभरेंगे?

इस पौराणिक, वैज्ञानिक, पुनर्जन्म, अध्यात्म, दर्शन, डिजिटल वर्ल्ड और एस्ट्रल वर्ल्ड के विभिन्न आयामों को उजागर करती हुई, रोमांच से परिपूर्ण गाथा के अगले भाग में देखते हैं कि आत्म-साक्षात्कार के बाद ऋत्विक का मार्ग क्या बनता है


Sunday, September 21, 2025

किक ऑफ़ लाइफ



दिल्ली में सर्दी का मौसम था। मॉर्निंग वॉक जारी रखना इन दिनों आसान काम नहीं था। शीत लहर से निपटना पहले से ही मुश्किल था, , प्रदूषण और कोहरे ने इसे और खराब कर रहा है। मैं रोज रोज तो इनसे मोर्चा नहीं ले सकता था लिहाजा मैं मैंने घर में हीं जिम को प्राथमिकता दी।

एक हफ्ते के इंतजार के बाद एक सुनहला प्रकाश लिए रविवार आया। मुझे घूमने जाने का मौका मिल रहा था। आवश्यक गर्म कपड़े पहनकर मैं मॉर्निंग वॉक के लिए पास के एक पार्क में गया। चलते-चलते, मैं अपने मोबाइल पर जजमेंट पढ़ता रहा ताकि मैं भारत के विभिन्न उच्च न्यायालयों के हालिया केस कानूनों से खुद को अपडेट रख सकूं। यह मेरी दैनिक आदत थी कि मैं अपने जॉगिंग के समय का उपयोग अपने आप को अपडेट करने के लिए करता हूं।

जब मैं पार्क में घूम रहा था और अपने मोबाइल पर जजमेंट पढ़ने में पूरी तरह तल्लीन था, तो मेरे शरीर ने किसी को टक्कर मार दी। जब मैं अपनी सामान्य स्थिति में लौटा, तो मैंने देखा, वो लगभग साठ की उम्र के एक व्यक्ति थे । ये मेरे लिए और आश्चर्य की बात थी कि वो एक वरिष्ठ अधिवक्ता थे, जिनका मैं सम्मान करता था।

स्वाभाविक रूप से मुझे उनसे माफी मांगनी पड़ी और उनकी माफी भी उम्मीद के मुताबिक आई थी। लेकिन जीवन के महत्वपूर्ण सबक के साथ ।
उसने मुझसे पूछा कि चलते-चलते मैं मोबाइल से क्या कर रहा था?

वह उम्मीद कर रहे थे कि शायद मैं सोशल मीडिया में उलझा हुआ था । लेकिन उनकी उम्मीद के विपरीत मैंने अपने अलग कारण बताया।
मैंने उनसे कहा कि मैं अपने समय का उपयोग नवीनतम निर्णयों के साथ खुद को अपडेट करने के लिए कर रहा हूं।

उनकी प्रशंसा थोड़ी चेतावनी के साथ आई।

उन्होंने कहा , ये अच्छा है कि मैं इस समय का सदुपयोग कर रहा था । लेकिन समय का सदुपयोग भी सही समय पर हीं होना चाहिए। समय प्रबंधन तब तक अच्छा है जब तक समय आपको प्रबंधित नहीं करता।

उन्होंने मुझे खुद पर बहुत अधिक दबाव डालने के लिए आगाह किया।

वे हँसे और बताये : देखो, जुनून और जुनून के बीच एक पतली रेखा है।

जुनून भय, असुरक्षा, पीड़ा का परिणाम है। जबकि जुनून प्यार से आता है। मुझे ये जरुर देखना चाहिए कि यह जुनून था या जुनून, मेरी जिंदगी चला रहा है या कि प्रेम ?
उत्तर यदि प्रेम है , तो जीवन का सफर सुखमय होने वाला है। लेकिन अगर यह जुनून है, तो खराब स्वास्थ्य स्वाभाविक परिणाम होने जा रहा है।

जीवन के अंतिम छोर पर हरेक व्यक्ति इस प्रश्न का सामना करता है उसके जीवन की प्रेरक शक्ति असुरक्षा, भय, पीड़ा, जुनून है या प्रेम, उत्साह और करुणा? इस प्रश्न का उत्तर निःसंदेह केवल उसी व्यक्ति को देना होता है।

अंत में उन्होंने मेरे कंधे को थपथपाया और कहा, युवक, यह बहुत अच्छा है कि वह मेरे जीवन के उचित समय पर मुझसे यह सवाल कर रहे हैं , इससे पहले कि जवाब देने और पछताने में बहुत देर हो जाए।

Friday, September 19, 2025

चलना अच्छा है या बैठना?

गाँव की चौपाल पर एक दिन पंडित छन्नूलाल और मास्टर हरिराम में बहस छिड़ गई। पंडितजी ने पैर पसारकर कहा, “भाई, बैठना ही जीवन का असली सुख है। देखो, जब आदमी बैठ जाता है तभी खाना खा सकता है, पूजा कर सकता है, यहाँ तक कि राजनीति भी कर सकता है। चलना तो बस बैल और गधों का काम है।”

मास्टरजी तुरंत खड़े हो गए, मानो तर्क को पैरों पर ही खड़ा करना हो। बोले, “नहीं पंडितजी, चलना ही जीवन का सार है। बच्चा जब जन्म लेता है, तो बैठा नहीं रहता, पहले रेंगता है, फिर चलता है। बैठना तो मृत्यु की पूर्वाभ्यास है, श्मशान घाट में सब बैठे-बैठे ही लेटे रहते हैं।”

पंडितजी ने मूँछों पर ताव देते हुए प्रतिवाद किया, “अरे मूर्ख! ध्यान बैठकर ही लगता है, साधु-महात्मा बैठे-बैठे ही मोक्ष पाते हैं। चलकर किसे मुक्ति मिली?”

मास्टरजी ने ठहाका लगाया, “महात्मा बुद्ध बैठे जरूर, पर ज्ञान पाने से पहले उन्होंने घर छोड़ा और वर्षों तक चले। अगर वे बैठ ही जाते तो कपिलवस्तु में गृहस्थाश्रम चलाते रहते।”

इस पर बगल में बैठे गबरू लाला ने दार्शनिक मुद्रा में तम्बाकू मलते हुए कहा, “मेरे हिसाब से तो न चलना अच्छा है न बैठना—बल्कि लेटना ही उत्तम है। लेटने से नींद आती है, और नींद ही सब दुःखों की दवा है। जब सो रहे हो तो न बहस है, न भूख, न राजनीति, न फिक्र।”

चौपाल ठहाकों से गूँज उठी। पंडितजी और मास्टरजी दोनों क्षण भर चुप रहे, फिर बोले, “सही कहा, जब तक जागे रहेंगे, बहस करते रहेंगे। चलो, अब लेटकर सोते हैं।”

दर्शन यही है कि आदमी बैठने और चलने की बहस में उलझा रहता है, पर जीवन का असली सुख वही पाता है, जो समय-समय पर दोनों करता है—और जब थक जाए तो गबरू लाला की तरह लेट भी जाता है।

Monday, September 15, 2025

आसमान हो जाऊँ

हर सच से मुँह मोड़कर नादान हो जाऊँ, 
इतना भी अच्छा नहीं कि गुम नाम हो जाऊँ। 

आईना सच हीं दिखलाए ये ज़रूरी  नहीं,
झूठ हूँ इतना नही वोही पहचान हो जाऊँ।

हर वार को सहना है  फरिश्तों की आदत,
पर मैं नही हर सितम पे बेज़बान हो जाऊँ।

किसी का बुरा न सोचूँ यही पहचान है मेरी ,
पर ज़हर पिलाए कोई  शमशान हो जाऊँ। 

मनाता  भी हूँ जब रूठ जाता है कोई मुझसे , 
पर झुक झुक कर ना  गिरा ईमान हो जाऊँ।

हर ज़ख़्म को मुकद्दर कहकर सहता नहीं, 
तो डर है कि खुद ही बेइम्तिहान हो जाऊँ।

अच्छा हूँ मगर इतना नहीं कि सीख न सकूँ,
अच्छाई से गुज़र  जाऊँ और बेईमान हो जाऊँ।

मेरा फलसफा समझना कोई मुश्किल नहीं जनाब,
पर ऐसा  नहीं कि हर दायरे में आसान हो जाऊँ।

फ़कत चाह तो इतनी सी है , इतनी भी कम नहीं, 
मरुस्थल के प्यासे का, भींगा आसमान हो जाऊँ। 


Saturday, September 6, 2025

तेरे कंठ वो गा लेता

 तुम कहते वो सुन लेता,तुम सुनते वो कह लेता।

बस जाता प्रभु दिल मे तेरे,गर तू कोई वजह देता।
पर तूने कुछ कहा नही,तेरा मन भागे इतर कहीं।
मिलने को हरक्षण वो तत्पर,पर तुमने ही सुना नहीं।
तुम उधर हाथ फैलाते पल को,आपदा तेरे वर लेता।
तुम अगर आस जगाते क्षण वो,विपदा सारे हर लेता।
पर तूने कुछ कहा कहाँ,हर पल है विचलित यहाँ वहाँ।
काम धाम निज ग्राम पिपासु,चाहे जग में नाम यहाँ।
तुम खोते खुद को पा लेता,कि तेरे कंठ वो गा लेता।
तुम गर बन जाते मोर-पंख,वो बदली जैसे छा लेता।
तेरे मन में ना लहर उठी,ना प्रीत जगी ना आस उठी।
अधरों पे मिथ्या राम नाम,ना दिल में कोई प्यास उठी।
कभी मंदिर में चले गए ,पूजा वन्दन और नृत्य किए।
शिव पे थोड़ी सी चर्चा की,कुछ वाद किए घर चले गए।
ज्ञानी से थोड़ी जिज्ञासा,कौतुहल वश कुछ बातेें की।
हाँ दिन में की और रातें की,जग में तुमने बस बातें की।
मन में रखते रहने से,मात्र प्रश्न , कुछ जिज्ञासा,
क्या मिल जाएगा परम् तत्व,जब तक ना कोई भी अभिलाषा।
और ईश्वर को क्या खोया कहीं,जो ढूढ़े उसको उधर कहीं ?
ना हृदय पुष्प था खिला नहीं,चर्चा से ईश्वर मिला कहीं ?
बिना भक्ति के बिना भाव के,ईश्वर का अर्चन कैसा?
ज्यों बैठ किनारे सागर तट पे ,सागर के दर्शन जैसा।

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