Sunday, April 12, 2026

नूर-ए-आसमाँ

अरसे दिल में ख़्वाब-ए-फ़लक जागता रहा,

नूर-ए-आसमाँ  चीज क्या  ये पूछता रहा।


ना सफ़र था आसान और ना राहें हीं रोशन,

मगर आदमी था कि हर सिम्त जूझता रहा।


दूर तलक देखने का किस्सा न था ये केवल,

इंसान खुद के हौसले को झांकता रहा।


ख़ाक-ए-ज़मीं से उठा हौसलों का कारवाँ,

स्याह रात  में भी नूर-ए-राह मिलता रहा।


फ़त्ह-ए-चांद नहीं, ख़ुद पे ग़लबा था दरअसल,

इंसाँ ख़ुद हीं अपनी हद से यूँ  गुज़रता रहा।


अजय” इस फ़त्ह में भी एक तलब बाक़ी रही,

इंसाँ हर फ़त्ह के बाद और कुछ चाहता रहा।

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