Thursday, March 12, 2026

मिश्रा का मतलब क्या?

 एक दिन रोज़ की तरह रमेश ऑफिस से घर लौटा। शाम के सात बज चुके थे। दिल्ली की सड़कें जैसे हमेशा की तरह जाम में फँसी हुई थीं—बसें हॉर्न बजा रही थीं, ऑटो वाले चिल्ला रहे थे, और रमेश की पुरानी मारुति की एसी भी आजकल ठीक से काम नहीं कर रही थी। ऑफिस में दिन भर वही महान काम हुआ था जो इस देश के अधिकांश दफ्तरों में होता है—फाइलें इधर से उधर शिफ्ट होती रहीं, जिम्मेदारी उधर से इधर फेंकी जाती रही, और बॉस की “जल्दी करो यार” वाली ईमेल्स का जवाब देते-देते रमेश की आँखें थक चुकी थीं। कॉफी के पाँच कप, दो मीटिंग्स जिसमें कुछ भी तय नहीं हुआ, और एक लंच ब्रेक जो सिर्फ़ कैंटीन की रोटी-सब्जी तक सीमित रहा।

घर पहुँचा तो दरवाज़ा खोलते ही रमेश की नज़र सोफे पर पड़ी। उसका बेटा वेदांत वहाँ ऐसे बैठा था जैसे संसद का सत्र चल रहा हो और वह विपक्ष का नेता हो। दस साल का लड़का, लेकिन चेहरा तमतमाया हुआ, भौंहें चढ़ी हुईं, होंठ कसे हुए, और हाथ में स्कूल बैग को ऐसे पकड़े हुए था जैसे अभी किसी मंत्री पर भ्रष्टाचार का आरोप लगाने वाला हो। बैग का एक स्ट्रैप टूटा हुआ था, यूनिफॉर्म की शर्ट आधी बाहर निकली हुई थी, और जूते अभी भी पहने हुए थे—जैसे स्कूल से सीधे यहीं आ गया हो और उतारने का भी मन नहीं किया। टीवी बंद था, कमरे में सिर्फ़ पंखे की हवा और दूर कहीं पड़ोस की रसोई से आती मसालों की खुशबू थी।

रमेश ने बैग नीचे रखा, जूते उतारे, और धीरे से पूछा—
“क्या हुआ बेटा? आज चेहरा ऐसा क्यों बना रखा है जैसे देश की पूरी अर्थव्यवस्था तुम्हारे कंधे पर टिकी हो? इतनी गर्मी में भी पसीना क्यों छूट रहा है? स्कूल में कुछ हुआ क्या?”

वेदांत ने गहरी साँस ली। उसकी छाती ऊपर-नीचे हो रही थी। आँखें नीची कर लीं, फिर अचानक ऊपर उठाईं। बोला—
“पापा, आज स्कूल में मेरी इज्जत का पूरा पोस्टमार्टम हो गया। जैसे कोई डॉक्टर लाश को चीर रहा हो, वैसे ही सबने मुझे काट डाला।”

रमेश थोड़ा चौंका। दिल में एक पल के लिए घबराहट हुई—कहीं लड़ाई-झगड़ा तो नहीं हो गया? कहीं किसी बड़े बच्चे ने परेशान तो नहीं किया? उसने तुरंत सोचा कि अगर जरूरत पड़ी तो स्कूल प्रिंसिपल को फोन करना पड़ेगा। लेकिन फिर वेदांत ने आगे बताया तो रमेश को हँसी भी आने लगी।
“क्यों? किसी से लड़ाई हो गई? किसी ने मारा-पीटा?”

“नहीं पापा। मैडम ने मेरा नाम पूछ लिया… और फिर उसका मतलब भी। पूरे क्लास के सामने। सब हँस रहे थे।”

रमेश ने राहत की साँस ली। उसका कंधा ढीला पड़ गया। उसे लगा कोई बड़ी दुर्घटना हुई होगी—स्कूल बस में झगड़ा, या परीक्षा में फेल—पर मामला तो सिर्फ़ नाम का निकला। उसने मुस्कुराते हुए, वेदांत के सिर पर हाथ फेरते हुए पूछा—
“तो तुमने क्या बताया? नाम तो सुंदर है ना—वेदांत।”

वेदांत ने रमेश को ऐसे देखा जैसे रमेश ही असली अपराधी हो। आँखों में गुस्सा, निराशा और थोड़ी शरारत सब मिली हुई। बोला—
“मैं क्या बताता पापा? आपने कभी बताया ही नहीं कि वेदांत का मतलब क्या होता है। मैडम ने कहा—‘वेदांत, बताओ तुम्हारा नाम किसने रखा और इसका मतलब क्या है?’ मैं चुप खड़ा रहा। पूरा क्लास हँसने लगा। एक लड़की ने तो कहा—‘शायद इसका मतलब है वेद पढ़ने में अंतिम!’ सब और हँसे। मुझे बहुत बुरा लगा।”

अब समस्या साफ़ थी। यह वह क्षण था जब एक पिता को अचानक विद्वान बनने का नाटक करना पड़ता है। रमेश ने गला साफ़ किया। सोफे के पास वाली कुर्सी पर बैठ गया। अपनी थकी हुई आँखों को मलते हुए सोचा—अब कैसे निकलें इस स्थिति से? उसने धीरे-धीरे बोलना शुरू किया, जैसे कोई प्रोफेसर लेक्चर दे रहा हो—
“बेटा, वेदांत का मतलब होता है—वेदों का अंत… यानी अंतिम ज्ञान… सर्वोच्च सत्य। वेद मतलब हमारे प्राचीन ज्ञान के ग्रंथ, और अंत मतलब उसका चरम। जैसे कोई पहाड़ की चोटी हो, जहाँ से सब कुछ दिखता है। तुम्हारा नाम बहुत गहरा है।”

वेदांत कुछ देर सोचता रहा। उसकी भौंहें अभी भी चढ़ी हुई थीं। फिर बोला—
“पापा, मुझे तो अभी तक गणित की टेबल भी याद नहीं होती। दो का पहाड़ा तो बस तक याद रहता है, तीन का भूल जाता हूँ। फिर आपने मेरा नाम अंतिम ज्ञान क्यों रख दिया? क्या आप चाहते थे कि मैं स्कूल में फेल हो जाऊँ और फिर भी ज्ञानी कहलाऊँ?”

रमेश हँस पड़ा, लेकिन अंदर से थोड़ा असहज भी महसूस किया। उसने कहा—
“ताकि बड़े होकर तुम बहुत ज्ञानी बनो। ताकि जीवन में कभी गलत राह न चुनो। नाम तो सिर्फ़ शुरुआत है, बेटा। असली ज्ञान तो तुम्हें खुद कमाना है।”

वेदांत तुरंत बोला, जैसे तीर छोड़ रहा हो—
“तो फिर आपका नाम रमेश क्यों है? उसमें तो ज्ञान-व्यान कुछ नहीं दिखता। रमेश मतलब क्या—रमण करने वाला? या बस एक साधारण नाम?”

रमेश ने कनखियों से देखा। अब खुद पर सवाल आ गया था। उसने कहा—
“बेटा, मेरा नाम मेरे पिता ने रखा था। उन्होंने सोचा होगा कि रमेश मतलब ईश्वर का नाम, राम का मिश्रण। लेकिन सच कहूँ तो मुझे भी कभी गहराई से नहीं सोचा।”

वेदांत बोला—
“अच्छा… मतलब आपने खुद नहीं रखा? तो क्या कोई भी आदमी अपना नाम खुद नहीं रख सकता? जैसे मैं बड़ा होकर अपना नाम बदलकर ‘सुपरमैन’ रख लूँ?”

“नहीं बेटा। नाम तो जन्म के समय ही तय हो जाता है। बाद में बदलना मुश्किल होता है।”

“लेकिन हमारे बाबा दर्शन का असली नाम तो दर्शन प्रसाद वर्मा है, फिर सब उन्हें ‘दर्शन बाबा’ क्यों कहते हैं? वो तो हर रविवार सुबह हमारे घर आते हैं और चाय पीते हुए घंटों बोलते रहते हैं।”

रमेश ने हँसते हुए कहा—
“क्योंकि तुम्हारे बाबा हर बात में दर्शन निकाल लेते हैं। चाय गिर जाए तो भी कहेंगे—‘देखो जीवन भी इसी चाय की तरह है… गर्म, मीठा और कभी-कभी छलक जाने वाला। गिरने पर भी निशान छोड़ जाता है।’ पड़ोस वाले भी उनसे सलाह लेने आते हैं—बेटी की शादी, नौकरी, सबमें दर्शन। इसलिए ‘दर्शन बाबा’।”

वेदांत ने सिर हिलाया। उसकी आँखें चमक रही थीं।
“अच्छा इसलिए लोग उन्हें दर्शन बाबा कहते हैं। पर वो खुद को बाबा क्यों कहलवाते हैं? वो तो साधु भी नहीं हैं। न तो गेरुआ कपड़े पहनते हैं, न माला जपते हैं। बस पजामा-कुर्ता और चश्मा।”

रमेश ने कहा—
“बेटा, इस देश में दो तरह के लोग बहुत जल्दी बाबा बन जाते हैं—एक जिनके पास बहुत ज्ञान होता है… और दूसरे जिनके पास बहुत फॉलोअर होते हैं। तुम्हारे बाबा पहले वाले हैं। लोग उन्हें सुनना पसंद करते हैं।”

वेदांत अभी रुका नहीं था। जैसे कोई इंटरव्यू ले रहा हो।
“पापा, चाचा उमंग का नाम उमंग क्यों है? वो तो अब दिन भर मोबाइल पर गेम खेलते रहते हैं। सुबह से शाम तक PUBG या Free Fire। उनमें तो कोई उमंग नहीं दिखती। बस आँखें लाल, और चिल्लाते रहते हैं—‘हेडशॉट!’”

रमेश ने गहरी साँस ली। बच्चे सच बोलने में बड़े खतरनाक होते हैं। उसने कहा—
“क्योंकि जब वो पैदा हुए थे तो पूरे परिवार में बहुत उमंग थी। चाचा का जन्म हुआ तो दादाजी ने पूरे मोहल्ले में मिठाई बाँटी थी। नाम उमंग रखा ताकि जीवन भर उत्साह बना रहे। लेकिन अब… शायद उमंग मोबाइल की बैटरी के साथ खत्म हो जाती है।”

वेदांत हँसा। फिर नया सवाल दाग दिया—
“पापा, स्कूल में मेरा दोस्त राम त्रिवेदी है। उसने बताया कि त्रिवेदी का मतलब तीन वेद जानने वाला होता है। तो क्या राम त्रिवेदी को सच में तीन वेद आते हैं? ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद? वो तो गणित में भी मुझसे बदतर है।”

“नहीं बेटा। नाम तो बस नाम है।”

“तो फिर नाम क्यों रखा? क्या नाम रखने वाले लोग सोचते भी नहीं कि बच्चा बाद में उस नाम को निभा पाएगा या नहीं?”

रमेश ने कहा—
“बेटा, इस देश में नाम अक्सर उस चीज़ के रखे जाते हैं जो आदमी के पास नहीं होती। जैसे किसी का नाम शांतिलाल होता है, लेकिन वो मोहल्ले का सबसे बड़ा झगड़ालू निकलता है—हर रात पड़ोसियों से लड़ता रहता है। किसी का नाम सत्यपाल होता है, और वह झूठ ऐसे बोलता है जैसे न्यूज चैनल पर डिबेट चल रही हो—‘मेरा बयान बिल्कुल सच्चा है!’”

वेदांत जोर से हँस पड़ा। उसकी हँसी कमरे में गूँज गई। बैग अब उसने साइड में रख दिया था।
“पापा, मेरा दोस्त नीरज मिश्रा पूछ रहा था कि मिश्रा का मतलब क्या होता है। मैंने कहा पापा से पूछूँगा।”

अब रमेश की हालत ऐसी हो गई जैसे इंटरव्यू में अचानक वह सवाल पूछ लिया जाए जिसका उत्तर किताब में था ही नहीं। उसका दिमाग घूम गया। मिश्र? मिश्रण? या कुछ और? उसने चुप रहने की कोशिश की। कमरे में सन्नाटा छा गया। पंखा घूम रहा था… वेदांत उसे देख रहा था… और रमेश के दिमाग में ज्ञान का सर्वर पूरी तरह डाउन हो चुका था।

आख़िर रमेश ने झुंझलाकर, लेकिन प्यार से कहा—“अभी पढ़ाई करो! ये बात बाद में बताऊँगा। पहले अपना होमवर्क पूरा कर लो। कल मैडम फिर पूछेंगी तो क्या कहोगे?”

वेदांत बोला—“पापा, आप भी ना… हर मुश्किल सवाल पर यही बोल देते हो। ‘बाद में बताऊँगा!’ लेकिन बाद में कभी नहीं बताते।”

वह बैग उठाकर पढ़ने अपने कमरे में चला गया। दरवाज़ा बंद करते हुए उसने पीछे मुड़कर एक बार फिर मुस्कुराते हुए देखा।

रमेश कुर्सी पर अकेला बैठा सोचने लगा। रात के नौ बज चुके थे। बाहर सड़क पर गाड़ियों की आवाज़ें आ रही थीं। उसने चाय बनाई, एक कप हाथ में लिया और खिड़की से बाहर देखने लगा। सच कहूँ तो उसे भी नहीं पता कि मिश्र का मतलब क्या होता है। शायद मिश्रण—कई चीजों का मेल। लेकिन एक बात जरूर समझ में आ गयी—हमारे समाज में नाम बहुत बड़े-बड़े होते हैं और आदमी अक्सर छोटे निकल आते हैं।

कोई वेदांत है जिसे टेबल याद नहीं, फिर भी नाम में अंतिम ज्ञान भरा है।
कोई दर्शन है जो टीवी सीरियल में ही दर्शन खोजता है और बाबा कहलाता है।
कोई उमंग है जिसकी उमंग मोबाइल की बैटरी के साथ खत्म हो जाती है।
कोई राम त्रिवेदी है जो तीन वेदों से अनजान है।
और रमेश खुद—जिसका नाम ईश्वर से जुड़ा है, लेकिन रोज़ ऑफिस की फाइलों में घिरा रहता है।

और शायद यही भारतीय समाज की सबसे बड़ी खूबी है—यहाँ आदमी बाद में बनता है, नाम पहले ही महान रख दिया जाता है। नाम हमें लक्ष्य देता है, सपना देता है। चाहे हम उसे पूरा करें या न करें, नाम तो हमेशा ऊँचा रहता है।

रमेश ने चाय का आखिरी घूँट लिया और मुस्कुरा दिया। कल वेदांत फिर पूछेगा। और रमेश को फिर कुछ न कुछ जवाब देना होगा। क्योंकि पिता होना यही है—नाम से ज्यादा, बेटे के सवालों का जवाब देना।

और हाँ , रमेश को सच में हीं नहीं पता था , मिश्रा का मतलब क्या? अगर किसी को पता हो तो बताने का कष्ट करे ।

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