दरवाज़े पर एक दस्तक से, धड़कन बढ़ने लगती थी तब,
सन्नाटा छा जाता वजूद पर, साँसें रुक-सी जाती थी तब।
आँखें ढूँढती थी चेहरा, दिल किसी अनहोनी से डरता था,
हर आहट में ख़तरा लगता , हर साया बोझ-सा लगता था।
माँ की गोद रूठ जाती थी, बच्चे सहमे-सहमे रहते थे,
हर बूढ़ी आँखों में सवाल भरे, होंठ मगर चुप्पी सहते थे।
घर से लोगों को निकाल कर ,जब ट्रेन में लाद दिया जाता था,
किसी को पता नहीं और, गैस चैंबर में डाल दिया जाता था।
चीख़ें दीवारों में दफ़्न हुईं , सुनने वाला कोई पर न था,
इंसाफ़ के दर पर दस्तक थी, खुलता कोई भी दर न था।
शांति की क्या है अहमियत अब , आज पता चलता है ,
जब लहू ना बिखरा सड़कों पर, दिल में ज़ख़्म ना सलता है।
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