Monday, February 9, 2026

सुकरात

सच को जाने अलग बात है सच वालों की  अलग जात ,

दिन को दिन कहने की कीमत पूछो उससे क्या सुकरात।


भीड़ हमेशा शोर समझती, सत्य मौन का राही किंतु,

मौन सत्य उदघाटन हेतु , जान गँवाता जो  सुकरात।


आंखों में आंख डालकर दिन को दिन और रात को रात,

अँधियारे के दरबारों में, यह कह सका जो सुकरात।


प्रश्न उठाना झूठ के आगे , जुर्म ठहरता हर दौर में,

विष प्याला ले जीवन दे जल , आग लगाता जो सुकरात।


सच जब आईना बन जाए और झूठे  नंगे हो जाएँ,

बार बार जो  तोड़ा जाता , एक आईना जो सुकरात।


जिस्म जला, पर सोच न जली,  बेफिक्री बेख़ौफ़, अडिग,

हर युग में फिर जन्म लेता है, हर युग में मरता सुकरात।

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