सच को जाने अलग बात है सच वालों की अलग जात ,
दिन को दिन कहने की कीमत पूछो उससे क्या सुकरात।
भीड़ हमेशा शोर समझती, सत्य मौन का राही किंतु,
मौन सत्य उदघाटन हेतु , जान गँवाता जो सुकरात।
आंखों में आंख डालकर दिन को दिन और रात को रात,
अँधियारे के दरबारों में, यह कह सका जो सुकरात।
प्रश्न उठाना झूठ के आगे , जुर्म ठहरता हर दौर में,
विष प्याला ले जीवन दे जल , आग लगाता जो सुकरात।
सच जब आईना बन जाए और झूठे नंगे हो जाएँ,
बार बार जो तोड़ा जाता , एक आईना जो सुकरात।
जिस्म जला, पर सोच न जली, बेफिक्री बेख़ौफ़, अडिग,
हर युग में फिर जन्म लेता है, हर युग में मरता सुकरात।
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