जिसे फाँसी होनी थी कुछ लम्हों बाद, वो किताब पढ़ रहा था,
दीपक था वो कुछ अजीब, बुझकर भी जल रहा था।
ना शिकवा, ना शिकायत, ना कोई इल्तिज़ा थी उसकी,
वो कहानी थी बिल्कुल नई दास्ताँ बस गढ़ रहा था।
अफ़सोस था जल्लाद को जल्दी भी क्या थी इतनी,
और वो बेफ़िक्र जैसे जश्न-ए-मौत कर रहा था।
सुकून था ये कैसा उसकी इंकलाबी आँखों में
कि फांसी तले दूसरे इंक़लाब से मिल रहा था।
सलीब-पर उसने सिर झुकाया भी तो कैसे,
फांसी-ए-तख़्त पर वो जीत चढ़ रहा था।
मातम मनाती दुनिया हैरान क्या था वो मंज़र,
और शख़्स था वो खुद की मौत पे हँस रहा था।
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