शेर- घर -
घर के बेटी सब रात दिन बिलखेली
अँखियन में
आँसू भरी रात दिन सिसकेली ॥
'आशावादी' कहे कि दहेज कसाई बनल
घर-घर के
धीया सब घट घट के जीयेली ।।
गीत- बिलखि
बिलखि कहे माई से पुतरिया,
मोर मइया हो
शदिया ना लिखल लिलार ।
देखिला कि
बाबूजी के नींदिया हेराइल,
घूमत घ मत
भाई के जूतवा खिया इल।।
छछनत हिया
मोर, डहकेला जीया,
मोर मइया हो सगरों दहेज के बाजार ।
मोर मइया हो शदिया ना लिखल लिलार ।
सोचिला कि
बेटी काहे विधना वनवले ,
माई वाबू
भाई खातिर आफत मॅँगवले ।
सोइरी में
जनमते मोर नामबा बुताइत,
मोर मइया हो बाबुजो ना होइटे लाचार ।
मोर मइया हो शदिया ना लिखल लिलार ।
बेटा बेटी ए
के कोखिया से जनमावेली,
ए के कोखिया
से माई दूधबा पियावेली ।
बाकिर काहे
बेटिये के डहकेला जीया,
मोर मइया हो बेटिये के जिनगी अन्हार ।
मोर मइया हो शदिया ना लिखल लिलार ।
श्री नाथ
"आशावादी" धीया सब रोएली ,
बिलखेली
वेटी सब सुसुकत जीएली ।
केह नाहीं
बुझ ताटे धीया के दरदिया,
मोर मइया हो कब होईहैं धीया के उद्धार ।
मोर मइया हो शदिया ना लिखल लिलार ।
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