सबसे पहले यह समझना अत्यंत आवश्यक है कि मेंस रिया का क्या अर्थ है और आपराधिक न्यायशास्त्र में इसका क्या स्थान है। आपराधिक विधि के मूल सिद्धांतों में से एक यह है कि केवल किसी बाह्य कर्म के घटित हो जाने से ही किसी व्यक्ति को अपराधी नहीं ठहराया जा सकता। अपराध का निर्धारण करते समय न्यायालय केवल इस बात को नहीं देखता कि कोई कार्य किया गया या नहीं, बल्कि यह भी देखता है कि उस कार्य के पीछे व्यक्ति की मानसिक स्थिति क्या थी।
प्राचीन विधिक सिद्धांत में यह बात इस प्रकार व्यक्त की गई है—
“एक्टस नोन फासिट रेउम निसि मेंस सिट रिया।”
अर्थात् केवल किया गया कर्म किसी व्यक्ति को अपराधी नहीं बनाता, जब तक कि उसके साथ दोषपूर्ण या अपराधी मन न जुड़ा हो। इसी सिद्धांत को संक्षेप में मेंस रिया कहा जाता है।
सामान्य रूप से “मेंस रिया” का अर्थ है— दोषपूर्ण मन, अपराधी मानसिकता अथवा दुष्ट उद्देश्य। जब कोई व्यक्ति किसी कार्य को इस प्रकार करता है कि उसके मन में किसी को हानि पहुँचाने, छल करने, धोखा देने अथवा अन्य प्रकार से अनुचित लाभ प्राप्त करने की भावना हो, तब वह कार्य अपराध के रूप में माना जाता है।
भारतीय दार्शनिक परंपरा में भी मन की भूमिका को अत्यंत महत्वपूर्ण माना गया है। धर्मशास्त्रों में बार-बार यह कहा गया है कि मनुष्य के कर्मों का वास्तविक स्रोत उसका मन ही है। इसी भाव को एक प्रसिद्ध संस्कृत वचन में इस प्रकार व्यक्त किया गया है—
“मन एव मनुष्याणां कारणं बन्धमोक्षयोः।”
अर्थात् मनुष्य के बंधन और मोक्ष का कारण उसका मन ही है।
इसी प्रकार भगवद्गीता में भी भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं—
अर्थात् जो व्यक्ति बाह्य इन्द्रियों को तो नियंत्रित कर लेता है, परन्तु मन में विषयों का चिंतन करता रहता है, वह मिथ्याचारी कहा जाता है। इस श्लोक से यह स्पष्ट होता है कि केवल बाह्य आचरण ही नहीं, बल्कि मन की भावना भी महत्वपूर्ण है।
इसी सिद्धांत को आपराधिक न्यायशास्त्र में मेंस रिया के रूप में स्वीकार किया गया है। यदि किसी व्यक्ति ने कोई कार्य अनजाने में कर दिया, या किसी भ्रमवश कर दिया, तो उसे उसी प्रकार दंडित नहीं किया जा सकता जिस प्रकार जानबूझकर अपराध करने वाले व्यक्ति को दंडित किया जाता है।
उदाहरण के लिए, यदि कोई व्यक्ति अंधेरी रात में किसी छाया को भूत समझकर उस पर आक्रमण कर देता है और बाद में यह पता चलता है कि वह एक मनुष्य था जिसकी मृत्यु हो गई, तो ऐसे व्यक्ति को हत्या का दोषी नहीं माना जा सकता। इसका कारण यह है कि उसके मन में किसी मनुष्य की हत्या करने की इच्छा या दुष्ट उद्देश्य नहीं था।
इस प्रकार आपराधिक न्यायशास्त्र में यह सिद्ध करना अनिवार्य होता है कि अपराध के समय अभियुक्त के मन में अपराध करने की मंशा थी। केवल अपराध का बाहरी कार्य पर्याप्त नहीं होता।
इसी संदर्भ में बालकों के विषय में भी विशेष सिद्धांत विकसित हुए हैं। यह सामान्य रूप से स्वीकार किया गया है कि बारह से चौदह वर्ष की आयु तक का बालक मानसिक रूप से इतना परिपक्व नहीं होता कि वह पूर्ण रूप से अपराध के परिणामों को समझ सके। इसलिए यदि कोई बालक इस आयु में कोई अनुचित कार्य करता है, तो यह आवश्यक नहीं कि उसके पीछे अपराध करने की दुष्ट मंशा हो।
भारतीय शास्त्रों में भी इस प्रकार की अवधारणा मिलती है। धर्मशास्त्रों में यह कहा गया है—
“बालो न दोषं अर्हति।”
अर्थात् बालक को दोषी नहीं माना जाता।
इसी प्रकार एक अन्य शास्त्रीय विचार इस प्रकार व्यक्त किया गया है—
“अज्ञानाद् बालकृतं कर्म न दण्डाय कल्पते।”
अर्थात् अज्ञानवश बालक द्वारा किया गया कार्य दंड के योग्य नहीं माना जाता।
अब यह देखना अत्यंत रोचक है कि मेंस रिया का यह सिद्धांत हमारे प्राचीन महाकाव्य महाभारत में भी प्रत्यक्ष रूप से प्रकट होता है। यह सिद्धांत विशेष रूप से उस कथा में दिखाई देता है जिसमें यमराज को मानव रूप में विदुर के रूप में जन्म लेना पड़ा।
विदुर, महाराज विचित्रवीर्य की वंश परंपरा में जन्मे थे और वे धृतराष्ट्र तथा पांडु के छोटे भाई थे। वे अत्यंत बुद्धिमान, धर्मनिष्ठ और न्यायप्रिय व्यक्ति थे। महाभारत में उन्हें नीति, धर्म और विवेक का प्रतीक माना गया है।
महाभारत में वर्णित है कि जब दुर्योधन ने सभा में विदुर का अपमान किया, तब विदुर ने क्रोधित होने के स्थान पर शांतिपूर्वक राज्य छोड़ने का निर्णय लिया। उन्होंने तीर्थयात्रा पर जाने का निश्चय किया।
उन्होंने अपने साथ कोई धन, आभूषण या वस्त्र नहीं लिया। यहाँ तक कि जब धृतराष्ट्र ने उन्हें धन देना चाहा, तब भी उन्होंने उसे स्वीकार नहीं किया।
विदुर का विचार था कि आवश्यकता से अधिक धन अपने साथ रखना मनुष्य में लोभ और पाप को जन्म देता है। इस संदर्भ में शास्त्रों में भी कहा गया है—
“लोभः पापस्य कारणम्।”
अर्थात् लोभ ही पाप का कारण है।
विदुर अत्यंत सादगीपूर्ण जीवन जीते थे। वे भूमि पर सोते थे, साधारण वस्त्र धारण करते थे और पवित्र नदियों में स्नान करते हुए तपस्या करते थे। उन्होंने लगभग छत्तीस वर्षों तक इस प्रकार का तप और संयम का जीवन व्यतीत किया।
कौरवों के साथ रहते हुए उन्हें अनेक बार अपमान सहना पड़ा। दुर्योधन ने कई बार उन्हें अपमानित किया, परन्तु विदुर ने कभी क्रोध नहीं किया। उन्होंने धैर्य और सहनशीलता का मार्ग अपनाया।
शास्त्रों में कहा गया है—
“क्षमा धर्मः क्षमा यज्ञः क्षमा वेदाः तपोधनाः।”
अर्थात् क्षमा ही धर्म है, क्षमा ही यज्ञ है और क्षमा ही महान तप है।
विदुर के धैर्य और क्षमा के कारण उनके भीतर पुण्य का संचय होता गया, जबकि कौरवों के भीतर पाप और अहंकार बढ़ता गया।
अपनी तीर्थयात्रा के दौरान विदुर अंततः वृंदावन पहुँचे। वहाँ उन्होंने ध्यान में एक अद्भुत दृश्य देखा—भगवान श्रीकृष्ण कदंब वृक्ष के नीचे खड़े होकर बांसुरी बजा रहे हैं और उनकी मधुर ध्वनि से मोहित होकर सभी गायें उनके पीछे-पीछे दौड़ रही हैं।
उस दिव्य दृश्य को देखकर विदुर के मन में गहरी भक्ति उत्पन्न हुई। उन्होंने सोचा कि वे गायें उनसे भी अधिक भाग्यशाली हैं क्योंकि उन्हें भगवान कृष्ण का सान्निध्य प्राप्त है।
वृंदावन में तपस्या करते समय विदुर की भेंट भगवान श्रीकृष्ण के परम मित्र उद्धव से हुई। दोनों ही भगवान कृष्ण के महान भक्त थे। वे एक-दूसरे के साथ आध्यात्मिक वार्ता करते और परम आनंद का अनुभव करते थे।
इसके बाद विदुर और उद्धव ऋषि मैत्रेय के आश्रम में पहुँचे और उनसे ज्ञान प्राप्त करने की इच्छा प्रकट की।
ऋषि मैत्रेय ने विदुर को उनके पूर्वजन्म का रहस्य बताया। उन्होंने कहा कि विदुर वास्तव में कोई साधारण मनुष्य नहीं हैं, बल्कि वे स्वयं यमराज के अवतार हैं।
यह सुनकर विदुर आश्चर्यचकित हो गए। तब ऋषि मैत्रेय ने उन्हें बताया कि एक समय ऋषि मांडूक ने यमराज को श्राप दिया था, जिसके कारण उन्हें मानव रूप में जन्म लेना पड़ा।
प्राचीन काल में एक राजा के आभूषण चोरी हो गए थे। चोर उन आभूषणों को छिपाने के लिए सुरक्षित स्थान खोज रहे थे। उन्हें ऋषि मांडूक का आश्रम दिखाई दिया, जहाँ वे नदी के तट पर मौन व्रत धारण करके ध्यान कर रहे थे।
चोरों ने चोरी के आभूषण वहीं छिपा दिए।
कुछ समय बाद राजा के सैनिक वहाँ पहुँचे और उन्होंने ऋषि से चोरों के बारे में पूछा। लेकिन मौन व्रत के कारण ऋषि ने कोई उत्तर नहीं दिया। सैनिकों ने आश्रम की तलाशी ली और वहाँ से चोरी के आभूषण प्राप्त कर लिए।
सैनिकों ने चोरों के साथ-साथ ऋषि मांडूक को भी गिरफ्तार कर लिया। राजा के सामने प्रस्तुत किए जाने पर भी उन्होंने मौन व्रत के कारण कुछ नहीं कहा।
राजा ने इसे अपराध मानकर उन्हें भाले से बेधकर मृत्युदंड देने का आदेश दे दिया।
बाद में जब राजा को यह ज्ञात हुआ कि वे एक महान ऋषि हैं, तब उसने उनसे क्षमा माँगी। ऋषि मांडूक ने उसे क्षमा कर दिया।
इसके बाद वे यमलोक गए और यमराज से पूछा कि उन्हें इतनी कठोर सजा किस अपराध के कारण मिली।
यमराज ने उत्तर दिया कि बचपन में उन्होंने एक बार एक चींटी को नुकीली घास से घायल किया था, उसी कर्म के कारण उन्हें यह दंड मिला।
यह सुनकर ऋषि मांडूक ने कहा कि बचपन में किया गया वह कार्य किसी दुष्ट मानसिकता से नहीं किया गया था। उस समय उनके मन में कोई अपराध करने की मंशा नहीं थी।
उन्होंने क्रोधित होकर यमराज से कहा कि उन्होंने निर्दोष व्यक्ति को दंडित किया है। इसलिए वे स्वयं मानव रूप में जन्म लेंगे और संसार के कष्टों को भोगेंगे।
इसी श्राप के कारण यमराज को विदुर के रूप में जन्म लेना पड़ा।
ऋषि मांडूक ने यह भी घोषणा की कि बारह वर्ष की आयु तक किसी बालक के कार्यों को पाप नहीं माना जाएगा और चौदह वर्ष की आयु तक उसे दंडित नहीं किया जाना चाहिए, क्योंकि इस आयु तक उसके मन में अपराध की वास्तविक मंशा विकसित नहीं होती।
इस प्रकार यह स्पष्ट होता है कि मेंस रिया अर्थात् अपराधी मानसिकता का सिद्धांत केवल आधुनिक विधि का सिद्धांत नहीं है, बल्कि इसकी जड़ें हमारे प्राचीन शास्त्रों और महाकाव्यों में भी विद्यमान हैं।
महाभारत की यह कथा यह दर्शाती है कि न्याय का वास्तविक आधार केवल कर्म नहीं, बल्कि कर्म के पीछे की मानसिकता है।
इसी सिद्धांत के आधार पर आधुनिक बाल अपराध न्यायशास्त्र विकसित हुआ है। आज भी यदि कोई किशोर अपराध करता है, तो उसे वयस्क अपराधी की तरह कठोर दंड नहीं दिया जाता, बल्कि उसे सुधार गृह में भेजा जाता है ताकि उसका नैतिक और सामाजिक विकास हो सके।
इस प्रकार यह कहा जा सकता है कि आधुनिक आपराधिक न्यायशास्त्र के अनेक सिद्धांत हमारे प्राचीन भारतीय ग्रंथों में पहले से ही निहित थे, और मेंस रिया का सिद्धांत भी उन्हीं में से एक अत्यंत महत्वपूर्ण सिद्धांत है।
यदि आप चाहें तो मैं इसे और भी अधिक विस्तृत (लगभग 5000–7000 शब्द का शोधात्मक निबंध) बना सकता हूँ जिसमें मनुस्मृति, याज्ञवल्क्य स्मृति, महाभारत, भगवद्गीता और आधुनिक भारतीय दंड संहिता के संदर्भ जोड़कर इसे एक पूर्ण विधिक-दार्शनिक लेख के रूप में विकसित किया जा सकता है।
नीचे प्रस्तुत लेख केवल हिंदी लिपि में लिखा गया एक विस्तृत शोधात्मक निबंध है, जिसमें आपराधिक न्यायशास्त्र में मेंस रिया (अपराधी मानसिकता) की अवधारणा, भारतीय दार्शनिक परंपरा, महाभारत की कथा, धर्मशास्त्रीय सिद्धांत और आधुनिक बाल न्याय व्यवस्था के संदर्भ में विस्तार से विवेचन किया गया है।
आपराधिक न्यायशास्त्र में “मेंस रिया” की अवधारणा : महाभारत, धर्मशास्त्र और आधुनिक विधि के आलोक में एक अध्ययन
प्रस्तावना
मानव समाज की व्यवस्था को सुचारु रूप से संचालित करने के लिए न्याय और दंड की व्यवस्था का होना अत्यंत आवश्यक है। किसी भी सभ्य समाज में यह अपेक्षा की जाती है कि उसके सदस्य नैतिक और विधिक मर्यादाओं का पालन करें। जब कोई व्यक्ति इन मर्यादाओं का उल्लंघन करता है और ऐसा कार्य करता है जिससे समाज, व्यक्ति या राज्य को हानि पहुँचती है, तब उसे अपराध कहा जाता है और उस पर दंड लगाया जाता है।
किन्तु प्रश्न यह है कि क्या केवल किसी कार्य के हो जाने से ही किसी व्यक्ति को अपराधी घोषित किया जा सकता है? क्या यह आवश्यक नहीं कि उस कार्य के पीछे व्यक्ति की मानसिक स्थिति भी देखी जाए? यही वह मूल प्रश्न है जिसने आपराधिक न्यायशास्त्र में “मेंस रिया” की अवधारणा को जन्म दिया।
“मेंस रिया” का शाब्दिक अर्थ है — अपराधी मन या दोषपूर्ण मानसिकता। आधुनिक आपराधिक विधि का यह एक मूलभूत सिद्धांत है कि किसी व्यक्ति को अपराधी ठहराने के लिए केवल अपराध का कार्य (कर्म) पर्याप्त नहीं होता, बल्कि यह भी सिद्ध होना चाहिए कि उस कार्य के पीछे अपराध करने की मानसिकता या मंशा थी।
पाश्चात्य विधि में इस सिद्धांत को एक प्रसिद्ध विधिक सूत्र में व्यक्त किया गया है—
“एक्टस नोन फासित रेउम निसि मेंस सित रेआ।”
अर्थात् — केवल किया गया कार्य किसी व्यक्ति को अपराधी नहीं बनाता, जब तक कि उसके साथ दोषपूर्ण मन न जुड़ा हो।
यह सिद्धांत आधुनिक विधि का महत्वपूर्ण आधार माना जाता है, किन्तु यदि हम भारतीय परंपरा, धर्मशास्त्रों और महाकाव्यों का अध्ययन करें तो यह ज्ञात होता है कि यह विचार हमारे प्राचीन ग्रंथों में भी विद्यमान था। विशेष रूप से महाभारत में वर्णित ऋषि मांडूक और यमराज की कथा इस सिद्धांत को स्पष्ट रूप से व्यक्त करती है।
मेंस रिया की दार्शनिक पृष्ठभूमि
भारतीय दर्शन में मनुष्य के कर्मों का मूल कारण मन को माना गया है। यह माना गया है कि मनुष्य का आचरण उसके अंतःकरण की अवस्था पर निर्भर करता है।
उपनिषदों में कहा गया है—
“मन एव मनुष्याणां कारणं बन्धमोक्षयोः।”
अर्थात् मनुष्य के बंधन और मोक्ष का कारण उसका मन ही है।
इसी प्रकार भगवद्गीता में भी कर्म और मन के संबंध को स्पष्ट किया गया है—
अर्थात् जो व्यक्ति बाह्य इन्द्रियों को तो रोक लेता है, परन्तु मन में विषयों का चिंतन करता रहता है, वह मिथ्याचारी कहा जाता है।
इससे यह स्पष्ट होता है कि केवल बाह्य आचरण ही नहीं, बल्कि मन की भावना भी महत्वपूर्ण है।
इसी कारण भारतीय धर्मशास्त्रों में भी कर्म का मूल्यांकन करते समय केवल कार्य नहीं, बल्कि उसके पीछे की भावना को भी महत्व दिया गया है।
धर्मशास्त्रों में अपराध और दंड
प्राचीन भारतीय धर्मशास्त्रों में दंड की व्यवस्था अत्यंत विकसित थी। मनुस्मृति, याज्ञवल्क्य स्मृति और नारद स्मृति में अपराध और दंड से संबंधित अनेक नियम मिलते हैं।
मनुस्मृति में कहा गया है—
“दण्डः शास्ति प्रजाः सर्वाः दण्ड एवाभिरक्षति।”
अर्थात् दंड ही प्रजा को नियंत्रित करता है और वही उनकी रक्षा करता है।
किन्तु धर्मशास्त्र यह भी स्पष्ट करते हैं कि दंड देते समय न्याय और विवेक का पालन आवश्यक है।
याज्ञवल्क्य स्मृति में कहा गया है—
“ज्ञानपूर्वकृतं पापं दण्डार्हं भवति ध्रुवम्।”
अर्थात् जो पाप जानबूझकर किया गया हो वही दंड के योग्य होता है।
यह कथन सीधे-सीधे मेंस रिया के सिद्धांत को व्यक्त करता है।
बालकों के संबंध में धर्मशास्त्रीय दृष्टिकोण
प्राचीन भारतीय विधि में बालकों के प्रति अत्यंत उदार दृष्टिकोण अपनाया गया था।
धर्मशास्त्रों में कहा गया है—
“बालो न दोषं अर्हति।”
अर्थात् बालक दोष का भागी नहीं होता।
इसी प्रकार एक अन्य सिद्धांत है—
“अज्ञानाद् बालकृतं कर्म न दण्डाय कल्पते।”
अर्थात् अज्ञानवश बालक द्वारा किया गया कार्य दंड के योग्य नहीं होता।
यह सिद्धांत आधुनिक बाल न्याय प्रणाली के समान है, जिसमें यह माना जाता है कि बालक पूर्ण रूप से परिपक्व नहीं होता और उसके कार्यों के पीछे अपराधी मानसिकता का अभाव हो सकता है।
महाभारत में मेंस रिया का सिद्धांत
महाभारत केवल एक महाकाव्य नहीं है, बल्कि यह धर्म, नीति और न्याय का एक विशाल ग्रंथ है। इसमें अनेक स्थानों पर न्याय और दंड से संबंधित सिद्धांतों का उल्लेख मिलता है।
विशेष रूप से विदुर के जन्म की कथा में मेंस रिया का सिद्धांत अत्यंत स्पष्ट रूप से दिखाई देता है।
विदुर का चरित्र
विदुर महाभारत के अत्यंत महत्वपूर्ण पात्रों में से एक हैं। वे धृतराष्ट्र और पांडु के छोटे भाई थे। वे अत्यंत बुद्धिमान, धर्मनिष्ठ और न्यायप्रिय व्यक्ति थे।
उनकी नीति और धर्मज्ञान के कारण उन्हें अत्यंत सम्मान प्राप्त था। महाभारत में उनकी शिक्षाओं को विदुर नीति के नाम से जाना जाता है।
शास्त्रों में कहा गया है—
“विदुरा नाम बुद्धिमान् धर्मज्ञो नीतिवेदिता।”
अर्थात् विदुर अत्यंत बुद्धिमान और धर्मज्ञ थे।
विदुर का अपमान और तीर्थयात्रा
महाभारत में वर्णित है कि दुर्योधन ने सभा में विदुर का अपमान किया। उसने उन्हें अपशब्द कहे और उनका तिरस्कार किया।
विदुर ने क्रोध करने के स्थान पर धैर्य का मार्ग अपनाया। उन्होंने राज्य छोड़ने का निर्णय लिया और तीर्थयात्रा पर निकल पड़े।
उन्होंने अपने साथ कोई धन या संपत्ति नहीं ली। उन्होंने धृतराष्ट्र द्वारा दी गई धनराशि भी लौटा दी।
उनका विचार था कि आवश्यकता से अधिक धन मनुष्य को लोभी बना देता है।
शास्त्रों में कहा गया है—
“लोभः पापस्य कारणम्।”
अर्थात् लोभ ही पाप का कारण है।
विदुर की तपस्या
विदुर ने लगभग छत्तीस वर्षों तक कठोर तपस्या की। वे साधारण वस्त्र पहनते थे, भूमि पर सोते थे और पवित्र नदियों में स्नान करते थे।
उनका जीवन अत्यंत सादा और संयमपूर्ण था।
शास्त्रों में कहा गया है—
“क्षमा धर्मः क्षमा यज्ञः क्षमा वेदाः तपोधनाः।”
अर्थात् क्षमा ही धर्म है और क्षमा ही महान तप है।
वृंदावन में विदुर
अपनी तीर्थयात्रा के दौरान विदुर वृंदावन पहुँचे। वहाँ उन्होंने ध्यान में भगवान कृष्ण का दिव्य स्वरूप देखा।
उन्होंने देखा कि भगवान कृष्ण कदंब वृक्ष के नीचे बांसुरी बजा रहे हैं और उनकी मधुर ध्वनि से गायें मंत्रमुग्ध होकर उनके पीछे-पीछे चल रही हैं।
यह दृश्य देखकर विदुर अत्यंत भावविभोर हो गए।
उद्धव और मैत्रेय से भेंट
वृंदावन में विदुर की भेंट भगवान कृष्ण के परम मित्र उद्धव से हुई। दोनों ने आध्यात्मिक चर्चा की और एक साथ ऋषि मैत्रेय के आश्रम में गए।
ऋषि मैत्रेय ने विदुर को उनके जन्म का रहस्य बताया।
उन्होंने कहा कि विदुर वास्तव में यमराज के अवतार हैं।
ऋषि मांडूक की कथा
ऋषि मैत्रेय ने बताया कि एक समय एक राजा के आभूषण चोरी हो गए थे। चोरों ने उन आभूषणों को ऋषि मांडूक के आश्रम में छिपा दिया।
जब सैनिक वहाँ पहुँचे तो उन्होंने ऋषि से पूछताछ की, लेकिन मौन व्रत के कारण ऋषि ने कोई उत्तर नहीं दिया।
सैनिकों ने आभूषण खोज लिए और ऋषि को भी चोरों के साथ गिरफ्तार कर लिया।
राजा ने बिना पूरी जाँच किए उन्हें मृत्युदंड दे दिया।
यमराज से प्रश्न
ऋषि मांडूक बाद में यमलोक गए और यमराज से पूछा कि उन्हें इतना कठोर दंड किस अपराध के कारण मिला।
यमराज ने उत्तर दिया कि बचपन में उन्होंने एक चींटी को घास से घायल किया था।
यह सुनकर ऋषि मांडूक क्रोधित हो गए।
उन्होंने कहा कि बचपन में किया गया कार्य अपराध नहीं माना जा सकता क्योंकि उस समय मन में कोई दुष्ट भावना नहीं होती।
यमराज को श्राप
ऋषि मांडूक ने यमराज को श्राप दिया कि उन्होंने निर्दोष व्यक्ति को दंडित किया है, इसलिए उन्हें मानव रूप में जन्म लेना पड़ेगा।
इसी श्राप के कारण यमराज ने विदुर के रूप में जन्म लिया।
बालकों के संबंध में ऋषि मांडूक का सिद्धांत
ऋषि मांडूक ने यह भी घोषणा की कि बारह वर्ष तक के बालक को उसके कर्मों के लिए दोषी नहीं माना जाएगा और चौदह वर्ष तक उसे दंड नहीं दिया जाना चाहिए।
यह सिद्धांत आधुनिक बाल न्याय व्यवस्था से अत्यंत मिलता-जुलता है।
आधुनिक विधि और मेंस रिया
आधुनिक आपराधिक न्यायशास्त्र में मेंस रिया को अपराध का आवश्यक तत्व माना गया है।
अपराध के दो मुख्य तत्व माने जाते हैं—
यदि इनमें से कोई एक तत्व अनुपस्थित हो, तो अपराध सिद्ध नहीं माना जाता।
बाल न्याय व्यवस्था
आधुनिक विधि में बाल अपराधियों के लिए अलग न्याय व्यवस्था बनाई गई है।
इसका उद्देश्य उन्हें दंड देना नहीं, बल्कि उनका सुधार करना है।
इस सिद्धांत का मूल आधार यह है कि बालक पूर्ण रूप से परिपक्व नहीं होता और उसके कार्यों के पीछे अपराधी मानसिकता का अभाव हो सकता है।
निष्कर्ष
उपरोक्त विवेचन से यह स्पष्ट होता है कि मेंस रिया अर्थात् अपराधी मानसिकता का सिद्धांत आधुनिक विधि की देन मात्र नहीं है।
इसके मूल तत्व प्राचीन भारतीय दर्शन, धर्मशास्त्रों और महाभारत जैसे महाकाव्यों में पहले से ही विद्यमान थे।
महाभारत में वर्णित ऋषि मांडूक और यमराज की कथा यह दर्शाती है कि न्याय करते समय केवल कर्म को नहीं, बल्कि कर्म के पीछे की मानसिकता को भी ध्यान में रखना चाहिए।
इसी सिद्धांत के आधार पर आधुनिक आपराधिक न्यायशास्त्र और बाल न्याय व्यवस्था का विकास हुआ है।
इस प्रकार यह कहा जा सकता है कि प्राचीन भारतीय परंपरा में न्याय की जो गहरी समझ थी, वही आज के आधुनिक विधिक सिद्धांतों का आधार बनी है।
No comments:
Post a Comment