उस दौर में जब मुल्क की आवाज़ थम गई,
जॉन ऑफ आर्क लिख चली तक़दीर थी नई।
गाँव की छोटी सी थी बेटी पर बेशक गौर कर,
सदियों की गर्दिश में थी आवाज वो नई।
तलवार ढाल होते है साजो सामान जंग के पर,
हौसलों से हीं गढ़ चली तासीर एक नई।
रोशनी ना बंध सकी थी वक्त की जंजीर से,
वो रूह की पुकार में जलती थी लौ नई।
शोला में जल राख पर बेशक बदन मिटा नहीं,
खाक से भी उठ खड़ी हुई तामीर एक नई।
चिनारी ऐसी आज भी रुकने का कोई नाम ना,
सदियों पुरानी आग थी लगती पर वो नई
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