Thursday, February 26, 2026

सुभाष

जिस वीर ने  गुंजाया था  “जय हिन्द” का  आस,

दहक रही थी उर में  क्रांति  ज्वाला-सा विश्वास?


तुम खून दो   आजादी दूंगा उनकी ऐसी भाषा ,

सुप्त पड़ी धूमिल नयनों में जो गढ़ते थे आशा।


रचने लगे थे रक्त रक्त से अभिनव भारत  गाथा,

रचयिता आजाद फौज के विजय की परिभाषा।


गुलामी की जंजीरों को काटा वो थे अभय अजय,

किंतु मात्र कुछ हीं पन्नों में  सिमटा उनका परिचय।


सत्ता के  गलियारों में है   नाम मात्र उल्हास ,

मालाएँ तो भारी भरकम पर हल्का  इतिहास।


यक्ष प्रश्न ले आज खड़ा है "अजय " वक़्त के पास,

क्या उनको सम्मान मिला जिस काबिल थे सुभाष?

Sunday, February 22, 2026

जॉन ऑफ आर्क

उस दौर में जब मुल्क की आवाज़ थम गई,

जॉन ऑफ आर्क लिख चली तक़दीर थी नई।


गाँव की छोटी सी थी बेटी पर बेशक गौर कर,

सदियों की गर्दिश में थी आवाज वो नई।


तलवार ढाल होते है साजो सामान जंग के पर,

हौसलों से  हीं गढ़ चली  तासीर  एक नई।


रोशनी ना बंध सकी थी वक्त की जंजीर से,

वो रूह की पुकार में जलती थी लौ  नई।


शोला में जल राख पर बेशक बदन मिटा नहीं,

खाक से  भी उठ खड़ी हुई तामीर एक नई।


चिनारी ऐसी आज भी रुकने का कोई नाम ना,

सदियों पुरानी आग थी लगती पर वो नई

Monday, February 9, 2026

भगत सिंह

जिसे फाँसी होनी थी कुछ लम्हों बाद, वो किताब पढ़ रहा था,
दीपक था वो कुछ अजीब,  बुझकर भी जल रहा था।

ना शिकवा, ना शिकायत, ना कोई इल्तिज़ा थी उसकी,
वो  कहानी थी बिल्कुल नई दास्ताँ बस  गढ़ रहा था।

अफ़सोस था जल्लाद को जल्दी भी क्या थी इतनी,
और वो बेफ़िक्र  जैसे  जश्न-ए-मौत  कर रहा था।

सुकून था ये कैसा उसकी इंकलाबी आँखों में 
कि फांसी तले दूसरे इंक़लाब से मिल रहा था।

सलीब-पर उसने सिर झुकाया भी तो कैसे,
फांसी-ए-तख़्त पर वो  जीत  चढ़ रहा था।

मातम मनाती दुनिया हैरान क्या था  वो  मंज़र, 
और शख़्स था वो खुद की मौत पे हँस रहा था।

सुकरात

सच को जाने अलग बात है सच वालों की  अलग जात ,

दिन को दिन कहने की कीमत पूछो उससे क्या सुकरात।


भीड़ हमेशा शोर समझती, सत्य मौन का राही किंतु,

मौन सत्य उदघाटन हेतु , जान गँवाता जो  सुकरात।


आंखों में आंख डालकर दिन को दिन और रात को रात,

अँधियारे के दरबारों में, यह कह सका जो सुकरात।


प्रश्न उठाना झूठ के आगे , जुर्म ठहरता हर दौर में,

विष प्याला ले जीवन दे जल , आग लगाता जो सुकरात।


सच जब आईना बन जाए और झूठे  नंगे हो जाएँ,

बार बार जो  तोड़ा जाता , एक आईना जो सुकरात।


जिस्म जला, पर सोच न जली,  बेफिक्री बेख़ौफ़, अडिग,

हर युग में फिर जन्म लेता है, हर युग में मरता सुकरात।

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