रविवार का दिन था।पत्नी जी ने फरमान जारी किया –“आज गोलगप्पे खाने की तीव्र इच्छा हो रही है।”
अब रविवार हो, पत्नी जी की इच्छा हो और गोलगप्पे हों —यह त्रिवेणी संगम टाला नहीं जाता।मैंने भी बिना बहस किए कह दिया,“ठीक है, शाम को 6 बजे चलते हैं।”
शाम के ठीक 6 बजे हम पहुँचे उसी गोलगप्पे वाले ठेले पर,जो हमारी कॉलोनी के बाहर रोड पर सालों से तपस्या कर रहा है।
वहाँ का नज़ारा ऐसा था मानो गोलगप्पे नहीं,अमृत बाँटा जा रहा हो।
लोग हाथ में प्लेट लेकर ऐसे लाइन में लगे थे,जैसे आधार कार्ड बनवाने आए हों। कोई आगे झाँक रहा था, कोई पीछे से दबाव बना रहा था, और पत्नी जी बीच-बीच में कह रही थीं –“देखो ज़रा, पानी कम मत डालना!”
करीब 15 मिनट बाद हमारा नंबर आया। लेकिन उन 15 मिनटों में मेरे अंदर का दार्शनिक जाग चुका था।
मैं सोचने लगा –बेचारा क्या कमाता होगा? बेचारा धूप में खड़ा रहता है। बेचारा घर कैसे चलाता होगा? बेचारा बच्चों की फीस कैसे भरता होगा? मतलब पूरे 15 मिनट मैं उसे गरीबी रेखा के नीचे से ऊपर खींच रहा था।
जब हमारी बारी आई तो मैंने बड़े अपनत्व से पूछ लिया – “भाई, दिन भर में क्या कमा लेते हो?”
मन में यही उम्मीद थी कि 300–400 रुपये बोल देगा और मैं अंदर से संतोष की सांस लूँगा कि चलो, हम ही ज्यादा दुखी नहीं हैं।
गोलगप्पे वाला मुस्कराया और बोला –“साहब जी, भगवान की कृपा से माल पूरा लग जाता है।”
मैंने कहा –“अरे भाई, ऐसे आध्यात्मिक उत्तर मत दो, थोड़ा गणित में समझाओ।”
वो बोला – “साहब, सुबह 7 बजे घर से 3000 खाली गोलगप्पे की पूरियाँ लेकर निकलते हैं और शाम 7 बजे से पहले
सब भगवान की कृपा से बिक जाती हैं।”
अब यहाँ से मेरे दिमाग का कैलकुलेटर ऑन हो गया।
10 रुपये में 6 गोलगप्पे…3000 गोलगप्पे मतलब…करीब 5000 रुपये की बिक्री!
अब मान लो 50% खर्च निकाल दिया, फिर भी भाई साहब दिन के 2500 रुपये कमा रहे हैं!
यानी महीने के…75,000 रुपये!!!
यहाँ मेरा दिमाग गोलगप्पे की तरह फट गया।
अब वो मुझे बेचारा नहीं लग रहा था…बेचारा तो मैं हो गया था।
7–8 क्लास पढ़ा इंसान इज्जत से 75,000 रुपये कमा रहा है। 45 लाख का घर ले चुका है। 4 दुकानें खरीद कर किराये पर दे रखी हैं, जिनसे महीने के 30,000 रुपये अलग से आते हैं।
और इधर हम…सालों पढ़ाई की, डिग्रियाँ लीं, इंटरव्यू दिए, फिर 50–55 हजार की नौकरी।
किराये के मकान में रहते हैं, और रोज़ सुबह टाई बाँधकर झूठी शान में निकल जाते हैं, जैसे देश की अर्थव्यवस्था हमारे कंधे पर टिकी हो।
अब जब भी गोलगप्पे खाता हूँ, तो पानी में थोड़ा नमक नहीं, थोड़ा आत्मग्लानि ज़्यादा लगती है।
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