Saturday, January 3, 2026

या अली , ट्रेन चली

पता नहीं आपने कभी भोगी कि नहीं भोगी
रेल की जनरल बोगी
जहाँ आदमी नहीं,
आदमी की सहनशक्ति चढ़ती है
और उतरती है इज्ज़त, साँस और आत्मा
एक ही स्टेशन पर।

एक बार हम भी कर रहे थे यात्रा
सोच रहे थे –
“चलो, आम आदमी हैं
आम आदमी की तरह ही चलेंगे”
प्लेटफार्म पर देखकर सवारियों की मात्रा
हमारे पसीने छूटने लगे
ऐसे नहीं कि गर्मी थी
भीड़ देखकर आत्मा को ही हीट स्ट्रोक आ गया
हम झोला उठाकर घर की ओर फूटने लगे
कि तभी एक कुली आया
मुस्कुरा कर बोला –
“अन्दर जाओगे ?”

हमने कहा – “तुम पहुँचाओगे ?”
वो बोला –
“बड़े-बड़े पार्सल पहुँचाए हैं
आपको भी पहुँचा दूँगा
मगर रुपये पूरे पचास लूँगा।”

हमने कहा – “पचास रुपैया ?”
वो बोला – “हाँ भैया
दो रुपये आपके
बाकी सामान के”

हमने कहा – “सामान नहीं है, अकेले हम हैं”
वो बोला –
“बाबूजी,
आप किस सामान से कम हैं !
भीड़ देख रहे हैं,
कंधे पर उठाना पड़ेगा,
धक्का देकर अन्दर पहुँचाना पड़ेगा
वैसे तो ये हमारे लिए बाएँ हाथ का खेल है
मगर आपके लिए
दाँया हाथ, बायाँ हाथ,
घुटना, कमर
सब लगाना पड़ेगा
मंजूर हो तो बताओ”

हमने कहा – “देखा जायेगा,
तुम उठाओ”

कुली ने बजरंगबली का नारा लगाया
और पूरी ताकत लगाकर
जैसे ही हमें उठाया
कि खुद बैठ गया
दूसरी बार कोशिश की
तो लेट ही गया
तीसरी बार देखा ही नहीं
सीधे भगवान को याद किया

बोला –
“बाबूजी पचास रुपये तो बहुत कम हैं
हमें क्या मालूम था कि आप आदमी नहीं,
एटम बम हैं
आपको तो भगवान ही उठा सकता है
हम क्या खाकर उठाएंगे
आपको उठाते-उठाते
खुद ही दुनिया से उठ जायेंगे !”

तभी गाड़ी ने सीटी दे दी
हम झोला उठाकर भागे
बड़ी मुश्किल से
डिब्बे के अन्दर घुस पाए

डिब्बे के अन्दर का दृश्य घमासान था
पूरा डिब्बा अपने आप में
हल्दी घाटी का मैदान था
लोग लेटे थे,
बैठे थे,
खड़े थे
जो कहीं फिट नहीं हुए
वो बर्थ के नीचे ऐसे पड़े थे
जैसे रेलवे का एक्स्ट्रा स्टॉक हों

हमने एक गंजे यात्री से कहा –
“भाई साहब
थोड़ी सी जगह हमारे लिए भी बनाइये”
वो सिर झुका के बोला –
“आइये हमारी खोपड़ी पे ही बैठ जाइये
आप ही के लिए तो साफ़ की है
केवल दस रुपये देना
लेकिन फिसल जाओ
तो हमसे मत कहना”

तभी एक भरा हुआ बोरा
खिड़की के रास्ते चढ़ा
आगे बढ़ा
और गंजे के सिर पर गिर पड़ा

गंजा चिल्लाया –
“किसका बोरा है ?”

बोरा फौरन खड़ा हो गया
और उसमें से एक लड़का निकल कर बोला –
“बोरा नहीं है
बोरे के भीतर बारह साल का छोरा है
अन्दर आने का यही एक तरीका बचा है
ये हमने अपने माँ-बाप से सीखा है
आप तो एक बोरे में ही घबरा रहे हैं
ज़रा ठहर जाओ
अभी गद्दे में लिपट कर
हमारे बाप जी अन्दर आ रहे हैं
उनको आप कैसे समझाओगे
हम तो खड़े भी हैं
वो तो आपकी गोद में ही लेट जाएँगे”

एक अखंड सोऊ
चादर ओढ़ कर सो रहा था
एकदम कुम्भकरण का बाप हो रहा था
हमने जैसे ही उसे हिलाया
उसकी बगल वाला चिल्लाया –
“ख़बरदार हाथ मत लगाना
वरना पछताओगे
हत्या के जुर्म में अन्दर हो जाओगे”

हमने पूछा –
“भाई साहब क्या लफड़ा है ?”
वो बोला –
“बेचारा आठ घंटे से बिना हिले-डुले पड़ा है
क्या पता ज़िंदा है या मरा है
आपके हाथ लगते ही
अगर ऊपर पहुँच गया
तो इस भीड़ में ज़मानत कराने
क्या तुम्हारा बाप आयेगा ?”

एक नौजवान खिड़की से अन्दर आने लगा
तो पूरा डिब्बा मिलकर
उसे बाहर धकियाने लगा
नौजवान बोला –
“भाइयों… भाइयों…
सिर्फ खड़े रहने की जगह चाहिए”

अन्दर से आवाज़ आई –
“क्या ?
खड़े रहने की जगह चाहिए ?
तो प्लेटफार्म पर खड़े हो जाओ
ज़िंदगी भर खड़े रहो
कोई हटाये तो कह देना
जिसे देखो घुसा चला आ रहा है
रेल का डिब्बा साला
जेल हुआ जा रहा है !”

इतना सुनते ही
एक अपराधी जोर से चिल्लाया –
“रेल को जेल मत कहो
मेरी आत्मा रोती है
यार जेल के अन्दर
कम से कम
चलने-फिरने की जगह तो होती है !”

प्यारे!

आम आदमी का हमसफ़र बन के देखो
एक बार जनरल क्लास में
सफ़र करके देखो
फिर समझ में आएगा
कि भारत में
आत्मनिर्भर नहीं
आत्म-सहनशील कैसे बनते हैं

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