Thursday, July 17, 2025

जुस्तजू

 दुनिया ये तेरी मेरी , फरक फकत की यू हैI

ना आरजू हुनुज है , ना कोई जुस्तजू हैII

दियारे खुप्तागा माफिक, है मंजर कायनात केI
ताउन से भी मुश्किल तबियत हालत केII

ना बहती हर सहर , मर्सत बयार सी I
शामें है शामें हिज्र , रातें सबे फिराक कीII

ऐ खुदा तू हिन् जाने , ये उक्दय्होक कायनातI
जहाँ में ईब्लिश गालिब, व दोजोख में काफिरों की जामतII

सजदे तो मैं भी रखता तेरी रहगुजर में ऐ मबुद
कि तल्खी ऐ जिस्त से , दिल भारी दिमाग उब II

अब चलो चलें पूरा करने , आपने आपने शौकI
तू पैदा कर नसले आदम मैं मुक्करार अपनी मौतII

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