Thursday, July 17, 2025

सृजन

 अथक परिश्रम नहीं आराम

नहीं कर्मों को अल्प विराम।
कोर्ट केस के झगड़े सारे,
सुलझाने कई ल फड़े सारे।

जटिल प्रकरण, गहन बहसें,
न्याय की राहें कठिन भी कहें।
पर श्रम मेरा रुके नहीं,
जीत का संकल्प झुके नहीं।

मन में जो भी भाव हैं फलते,
गीत, कहानी, कविता गढ़ते।
विचारों की नदियाँ बहतीं,
कल्पना की धरती पर रहतीं।

और बढ़ानी भी निज आय,
संपन्नता का बनूँ पर्याय।
परिश्रम से हर पथ संवारूँ,
लक्ष्य नयन में सदा सँवारूँ।

कई अधूरे नाम गिना दूँ,
सोने पर विश्राम टिका दूँ।
नींद भी जब पास बुलाए,
सपनों को भी कर्म सिखाए।

समय है कम और ज्यादा काम,
क्यों दूँ खुद को मैं विश्राम?
प्रयत्नों से ही मिलती मंज़िल,
मेहनत का हर क्षण अनमोल सिल।

जीवन पथ है संघर्ष निरंतर,
निराशा का क्यों करूँ मैं मंथन?
श्रम से ही तो रचे सफलता,
सपनों को दे पूर्णता।

इस जीवन का यही है मर्म,
अथक परिश्रम, निरंतर कर्म।
आराम मेरा लक्ष्य नहीं,
सृजन की ज्वाला बुझे कहीं?

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