कुछ है जो हासिल होकर भी नाहासिल है
अजीब है ऐ ख़ुदा तू, और तेरी ये ख़ुदाई भी,
हासिल भी तू, नाहासिल भी ऐसे कि जैसे मेरी तन्हाई भी।
अजीब है ऐ ख़ुदा तू, और तेरी ये ख़ुदाई भी,
हासिल भी तू, नाहासिल भी ऐसे कि जैसे मेरी तन्हाई भी।
ये जमीन ये हवा ये पानी और ये सारा आकाश,अंधेरी रातों के साए चांद तारे और सूरज का प्रकाश,
मंदिर मस्जिद गुरुद्वारे में ढूँढूंं तुझको मेरी जहालत,
तुझमें ये दुनिया या तुझसे ये दुनिया क्या चक्कर,
इन सबसे हीं हूं मै जिंदा यही तेरी रहनुमाई भी।
अजीब है ऐ ख़ुदा तू, और तेरी ये ख़ुदाई भी,
हासिल भी तू, नाहासिल भी ऐसे कि जैसे मेरी तन्हाई भी।
मंदिर मस्जिद गुरुद्वारे में ढूँढूंं तुझको मेरी जहालत,
सुकून मिलता मुझे पर तेरी इनायतों के हीं बदौलत,
मगर सवालों के घेरे में अक्सर रहती तेरी परछाई भी।
मगर सवालों के घेरे में अक्सर रहती तेरी परछाई भी।
अजीब है ऐ ख़ुदा तू, और तेरी ये ख़ुदाई भी,
हासिल भी तू, नाहासिल भी ऐसे कि जैसे मेरी तन्हाई भी।
नज़र के सामने भी है तू और मेरे दिल के इतने करीब ,
मिलने को मै आतुर और तू गायब क्या है भी ये अजीब ,
कैसा है ये दर्द और क्या है इस दर्द की दवाई भी।
अजीब है ऐ ख़ुदा तू, और तेरी ये ख़ुदाई भी।
हासिल भी तू, नाहासिल भी ऐसे कि जैसे मेरी तन्हाई भी।
तुझमें ये दुनिया या तुझसे ये दुनिया क्या चक्कर,
कि तुझको समझने में खो जाता हूँ अक्सर,
कि तू है,तेरे जहाँ में मै भी और तुझसे जुदाई भी।
अजीब है ऐ ख़ुदा तू, और तेरी ये ख़ुदाई भी।
अजीब है ऐ ख़ुदा तू, और तेरी ये ख़ुदाई भी।
हासिल भी तू नाहासिल भी कि जैसे मेरी तनहाई भी।
हासिल भी तू, नाहासिल भी ऐसे कि जैसे मेरी तन्हाई भी।
सुकून भी तू सवाल भी तू ख्याल भी तू जवाब भी तू
अजय अमिताभ सुमन
अजय अमिताभ सुमन
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