अध्याय 1: प्रश्न और उत्तर
एक शांत शाम थी, जब सूरज की अंतिम किरणें आश्रम की दीवारों पर सुनहरी चमक बिखेर रही थीं। मुमुक्षु, एक युवा स्नातक छात्र, गुरुदेव के चरणों में बैठा था। उसका मन ईश्वर की खोज में व्याकुल था। बचपन से ही वह भगवान के बारे में इतनी उत्कंठा से बात करता था कि उसके मित्र उसे 'भक्त' कहकर चिढ़ाते थे। आज उसने एक गहन प्रश्न पूछा, "गुरुदेव, क्या भोग और स्त्री का उपभोग करते हुए परम ब्रह्म का साक्षात्कार किया जा सकता है?"
गुरुदेव की आँखें शांत झील की तरह थीं। उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा, "बिल्कुल किया जा सकता है, मुमुक्षु। इतिहास के पन्नों में अनेक उदाहरण मिल जाएंगे। तंत्र मार्ग में तो यौन क्रीड़ा और स्त्री का बड़ा उपयोग है। वहाँ काम को साधना का माध्यम बनाया जाता है। यहां तक कि श्री रामकृष्ण परमहंस जी ने स्त्री का उपयोग करते हुए भी उसी परम ब्रह्म के दर्शन किए, जो भक्ति मार्ग का अनुसरण करते हुए। उन्होंने अपनी पत्नी शारदा देवी को माँ काली का रूप मानकर पूजा की, और उस माध्यम से दिव्य अनुभूति प्राप्त की। लेकिन याद रखो, ईश्वर प्राप्ति के लिए योग, ध्यान और ब्रह्मचर्य का मार्ग ही सर्वोत्तम है। तंत्र मार्ग पशु वृत्ति के मनुष्यों के लिए उपयोगी है, जहां काम को नियंत्रित कर ऊर्जा में परिवर्तित किया जाता है। ब्रह्मचर्य के पालन से पुरुष की इंद्रियां इतनी संयमित, सूक्ष्म और शरीर इतना शक्तिशाली हो जाता है कि जब परम ऊर्जा का शरीर पर शक्तिपात होता है, तब शरीर उस परम ऊर्जा को झेलने में सक्षम हो पाता है।"
मुमुक्षु के मन में यह बात गहराई से उतर गई। वह सोचने लगा कि क्या वह इस मार्ग पर चल सकता है?
अध्याय 2: मुमुक्षु का परिचय और गुरु से भेंट
मुमुक्षु एक साधारण परिवार का लड़का था, दिल्ली के एक कॉलेज में स्नातक की पढ़ाई कर रहा था। उसका नाम राजीव था, लेकिन आध्यात्मिक खोज में वह खुद को 'मुमुक्षु' कहलाना पसंद करता था, अर्थात मुक्ति की इच्छा रखने वाला। बचपन से ही वह मंदिरों में घंटों बैठा रहता, रामायण और गीता पढ़ता। उसके पिता एक सरकारी क्लर्क थे, जो कहते थे, "बेटा, पहले नौकरी कर लो, फिर भगवान की खोज करना।" लेकिन मुमुक्षु का मन दुनिया की चकाचौंध से ऊब चुका था।
उसी शहर में एक दिन गुरुजी पधारे। उनका नाम स्वामी विवेकानंद सरस्वती था, लेकिन लोग उन्हें बस 'गुरुजी' कहते थे। अफवाहें थीं कि उन्हें ईश्वरानुभूति हो चुकी है। वे ध्यान की गहराइयों में उतरकर लोगों को मार्गदर्शन देते थे। मुमुक्षु ने सुना तो उत्सुक हो उठा। वह आश्रम पहुंचा, जहां सैकड़ों लोग बैठे थे। गुरुजी की सभा में वह पहली बार गया। गुरुजी ने प्रवचन दिया, "ईश्वर बाहर नहीं, भीतर है। ध्यान से उसे खोजो।" मुमुक्षु प्रभावित हुआ और नियमित रूप से आने लगा। गुरुजी ने उसे देखा और कहा, "तुममें जिज्ञासा है, लेकिन धैर्य सीखो।" जल्द ही मुमुक्षु उनके निर्देशानुसार ध्यान करने लगा – सुबह उठकर प्राणायाम, फिर ध्यान।
कॉलेज में उसकी क्लास में अनेक लड़कियां थीं। वे फैशनेबल कपड़े पहनतीं – टॉप जो पीठ को नंगा छोड़ देते, स्कर्ट जो जांघों को उजागर करते, और ब्लाउज जो वक्ष को उभारते। मुमुक्षु बहुतों के प्रति आकर्षित होता। ध्यान के समय उसके मानस पटल पर उनके वक्ष, उनकी मांसल जांघें, उनके उन्नत स्तन, उनकी नंगी पीठ बार-बार आ जातीं। वह विचलित हो जाता, ध्यान टूट जाता।
अध्याय 3: प्रारंभिक संघर्ष और गुरु की सलाह
एक दिन क्लास में एक लड़की, नाम था रिया, उसके बगल में बैठी। उसकी शर्ट की नेकलाइन इतनी गहरी थी कि उसके उभरे वक्ष साफ दिख रहे थे। मुमुक्षु की नजरें बार-बार वहां जातीं। घर लौटकर ध्यान में वह दृश्य फिर आया। वह परेशान हो गया। अगले दिन वह गुरुजी के पास गया और सब बता दिया। "गुरुदेव, मेरी इंद्रियां मुझे धोखा दे रही हैं। ध्यान में वासना आ जाती है।"
गुरुजी ने शांत स्वर में कहा, "यह स्वाभाविक है, मुमुक्षु। वासना मन की कमजोरी है। सर्वदा स्वयं की श्वासों पर ध्यान दो। जब-जब किसी युवती के शरीर के प्रति वासना जागे, अपने ध्यान को अपनी नाभि पर ले जाओ। वासना को जब तक ध्यान का साथ नहीं मिलता, ये प्रकट नहीं होती। ध्यान नाभि पर होने से मन मस्तिष्क में वासना का जन्म नहीं हो पाता।"
मुमुक्षु ने इस मार्ग पर चलना शुरू किया। अब क्लास में जब किसी सहपाठिनी के उरोज उसे आकर्षित करते, नंगी पीठ दिखाई पड़ती, खुली नाभि चमकती, मोटी जांघें लुभातीं, मांसल वक्ष उभरते, वह तुरंत अपना ध्यान स्वयं की नाभि पर ले जाता। श्वासों की गति पर फोकस करता। धीरे-धीरे वासना साक्षीभाव से नियंत्रित होने लगी। वह ध्यान के मार्ग पर आगे बढ़ चला।
नया घटना: एक दिन कॉलेज फेस्ट में वह शामिल हुआ। वहां लड़कियां डांस कर रही थीं, उनके शरीर की हर हलचल कामुक लग रही थी। एक लड़की ने उसे डांस के लिए आमंत्रित किया। वह इनकार कर गया, लेकिन मन में तूफान उठा। घर जाकर उसने घंटों ध्यान किया, नाभि पर फोकस कर वासना को दबाया।
अध्याय 4: प्रगति और घमंड का उदय
लगभग दो महीने बीत चुके थे। अब उसे लड़कियों के उभरे वक्ष, खुली नाभि दिखाई पड़तीं, लेकिन वह विचलित न होता। लड़कियां उसे देखकर मुस्कुरातीं, लेकिन वह कोई प्रतिउत्तर न देता। उसके मन में घमंड आने लगा। उसे लगने लगा कि वह जितेंद्रिय बन चुका है, काम वासना पर विजय प्राप्त कर चुका है। वह दोस्तों से कहता, "मैं अब इंद्रियों का स्वामी हूं।"
नया घटना: एक बार वह बाजार गया। वहां एक युवती से टकरा गया। उसकी साड़ी सरक गई, कमर दिख गई। पहले तो मन डोला, लेकिन उसने तुरंत नाभि पर ध्यान केंद्रित किया। वासना शांत हो गई। वह खुद पर गर्व करने लगा।
अध्याय 5: पहला स्वप्न और निराशा
एक रात वह सोया हुआ था। स्वप्न में उसने देखा कि उसकी सहपाठिनी रिया उसके पास आकर एकदम से खड़ी हो गई। उससे कलम मांगती है। जब वह देता है, कलम हाथ से छूट जाती है। जैसे ही रिया कलम लेने झुकती है, उसके कपड़े पीछे से सरक कर नीचे गिर जाते हैं। उसका पूरा नंगा बदन, कमर की उभार, सब मुमुक्षु के सामने आ जाते हैं। वह घबराकर मुमुक्षु की गोद में गिर जाती है। मुमुक्षु उसे कसकर अपने बदन से भींच लेता है। उसके हाथ नवयुवती के स्तनों को दबोच लेते हैं। स्वप्न टूटने पर मुमुक्षु बहुत निराश हुआ। उसकी दो महीनों की मेहनत बेकार हो चुकी थी। वह रोने लगा, "मैं असफल हूं।"
अगले दिन गुरुजी को बताया। गुरुजी ने कहा, "मुमुक्षु, तुमने चेतन मन को तो वश में कर लिया है, लेकिन असली परीक्षा अवचेतन मन पर विजय है। स्वप्न के समय अवचेतन मन दबी हुई वासनाओं को दिखाता है। उसी पर विजय प्राप्त करनी होती है। स्वयं पर नियंत्रण बनाए रखो। ध्यान जारी रखो।"
अध्याय 6: निरंतर अभ्यास और नए स्वप्न
मुमुक्षु ने अभ्यास तेज किया। अब वह रात को सोने से पहले भी नाभि ध्यान करता। दो-तीन महीने बाद फिर स्वप्न आया। लड़की फिर आई, इस बार पूर्ण नग्न रूप में। उसने मुमुक्षु के कपड़े खोल दिए। मुमुक्षु की नसें फटने लगीं। उस अति सुंदरी नग्न स्त्री को चूमने की इच्छा हुई, लेकिन वह स्वयं पर नियंत्रण रखता रहा। स्वप्न टूट गया। उसे अपनी जीत पर खुशी हुई।
नया घटना: इस बीच वह एक यात्रा पर गया। हिमालय की तलहटी में एक आश्रम में रहा। वहां साधु मिले, जिन्होंने उसे बताया कि वासना प्रकृति का हिस्सा है, लेकिन उसे ऊर्जा में बदलो। वहां ध्यान में उसे पहली बार हल्की रोशनी दिखी। लौटकर गुरुजी को बताया, वे खुश हुए।
इस तरह समय बीतने लगा। दो-तीन महीने के अंतराल पर नग्न लड़कियों के स्वप्न आते – कभी कोई नंगा बदन दिखाती, कभी खुली नाभि, कभी मांसल जांघ, तो कभी मादक स्तन। लेकिन वह सजग रहता और उठ जाता। इसी बीच ध्यान में विचित्र रोशनियां नजर आने लगीं। गुरुजी के पास जाकर वह स्वयं के जितेंद्रिय होने की घोषणा करने लगा।
अध्याय 7: चार साल बाद की हार और अहंकार का पतन
लगभग चार साल बीत चुके थे। मुमुक्षु ध्यान की गहराइयों में गोते लगा रहा था। वह अब आश्रम में ज्यादा समय बिताता, कॉलेज खत्म हो चुका था। एक दिन ध्यान में उसने देखा एक पुरुष चोट खाकर गिर पड़ा है। वह जैसे ही उसके पास जाता है, अचानक वह पुरुष एक नग्न स्त्री में परिवर्तित हो जाता। उसके दो बड़े-बड़े स्तन मुमुक्षु की छाती में गड़ जाते हैं। मुमुक्षु हमेशा की तरह जगना चाहता था, लेकिन उस कामुक स्त्री ने मुमुक्षु के हाथ को स्वयं के कमर के नीचे भाग में चिपका दिया। मुमुक्षु की सांस तेज हो गई। उस स्त्री ने मुमुक्षु को पकड़कर सारे कपड़े फाड़ डाले। उसकी नसें गर्म हो उठीं। वह उस स्त्री के चुम्बन लेने लगा। उसका ब्रह्मचर्य फिर भंग हो चुका था।
नया घटना: इस घटना से पहले, वह एक गांव में गया जहां एक युवती की मदद की। वह बीमार थी, मुमुक्षु ने उसे दवा दी। लेकिन उसकी नजरें उसके शरीर पर गईं। वह भागा, लेकिन मन में अपराध बोध रहा।
अति निराशा से वह अपराध भाव में गुरु के सामने प्रस्तुत हुआ। गुरुजी ने कहा, "ये तुम्हारे अहंकार की हार हुई है। अवचेतन मन बहुत मजबूत होता है। कभी उसके सामने तन कर मत जाओ। जब तक तुम्हारे मन में जितेंद्रिय होने का भाव रहेगा, तब तक तुम हारते रहोगे। स्त्री से घृणा नहीं, स्त्री को स्वीकार करो। अपनी माँ के रूप में, अपनी बहन के रूप में। फिर स्त्री से भागने की जरूरत नहीं पड़ेगी। ईश्वर के सामने तन कर खड़े होने से नहीं, बल्कि झुकने से जीत मिलती है। जितने की कोशिश करोगे तो हारोगे। हार स्वीकारोगे तो जीतोगे।"
अध्याय 8: परिवर्तन और नई दृष्टि
मुमुक्षु के मन में काफी परिवर्तन आ चुका था। अब वह लड़कियों को देखता, लेकिन उनके अर्धनग्न कपड़े नहीं दिखते। उनकी मुस्कान दिखती, उनके खुले बदन नहीं। उनकी करुणा दिखती, वासना नहीं। वह अब स्त्रियों को देवी रूप में देखता। ध्यान के मार्ग पर वह काफी आगे बढ़ चुका था। ध्यान के समय दूधिया प्रकाश में तैरता रहता।
नया घटना: वह अब आश्रम में दूसरों को सिखाने लगा। एक युवती आई, जो ध्यान सीखना चाहती थी। पहले वह डरता, लेकिन अब उसे माँ का रूप देखा। उसने बिना विचलित हुए सिखाया।
अध्याय 9: अंतिम वर्ष और गुरु का स्वर्गवास
दस-बारह साल बीत चुके। उसके गुरुजी का स्वर्गवास हो चुका था। मुमुक्षु आश्रम में ही रह रहा था, अब वह खुद गुरु बन चुका था। एक दिन ध्यान के समय उसने देखा एक शेर गाय के पीछे भाग रहा है। वह गाय को बचाने के लिए शेर के सामने आ खड़ा होता है। जैसे ही शेर उस पर झपट्टा मारता है, मुमुक्षु जमीन पर गिर जाता है। शेर और गाय खूबसूरत पुरुष और स्त्री में परिवर्तित हो जाते हैं और प्रेमालिंगन करने लगते हैं। एक दूसरे को चूमने लगते हैं। उनकी जांघें, कमर, वक्ष एक दूसरे में समा जाते हैं। उनके कपड़े एक-एक कर शरीर से सरक कर नीचे गिरने लगते हैं। फिर दोनों नग्न स्त्री में परिवर्तित होकर उसकी तरफ आने लगते हैं। खूबसूरत युवतियों के स्तन कड़े हैं। आँखों से वासनामयी निमंत्रण आ रही थी।
नया घटना: इससे पहले, वह एक सपने में एक नदी किनारे गया। वहां देवी का दर्शन हुआ, जो स्त्री रूप में थी। उसने सीखा कि प्रकृति में पुरुष और स्त्री का मिलन सृष्टि का आधार है।
मुमुक्षु अवचेतन मन के इस प्रहार से नहीं भागता। इस बार ध्यान से उठने की कोशिश नहीं करता। वह खुद दोनों युवतियों के पास उनके कपड़े पहनाकर उनकी पूजा करता है। दोनों स्त्रियां देवी में परिवर्तित होकर अंतर्ध्यान हो जाती हैं। इस बार वह युवतियों से भागता नहीं, अपितु उनको स्वीकार करता है। चारों तरफ दूधिया प्रकाश फैल जाता है। मुमुक्षु अति शांति की अवस्था में स्थापित हो जाता है। अब उसे ब्रह्मचर्य के रक्षण की आवश्यकता नहीं थी। वह परम ब्रह्म में विलीन हो चुका था।
समापन: शिक्षा
इस यात्रा से मुमुक्षु ने सीखा कि सच्ची विजय संघर्ष में नहीं, स्वीकृति में है। वह अब दूसरों को यही सिखाता – भोग में नहीं, संयम में; घृणा में नहीं, प्रेम में ईश्वर मिलता है।
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