पात्रों का परिचय (Patron ke Parichay – संक्षिप्त जीवन कहानियाँ)
- आर्यन — 38 वर्षीय स्वतंत्र पत्रकार और कट्टर नास्तिक। दिल्ली में पला-बढ़ा। बचपन में पिता की अचानक मृत्यु और माँ की लंबी बीमारी ने उसे ईश्वर के प्रति विद्रोही बना दिया। एक बार उसने एक लेख लिखा था: "ईश्वर यदि है, तो वह या तो क्रूर है या अनुपस्थित।" इसी लेख के कारण उसे कई बार धमकियाँ मिलीं, लेकिन वह कभी नहीं झुका।
- डॉ. कबीर वर्मा — 52 वर्षीय भौतिकशास्त्री, आईआईटी प्रोफेसर। वैज्ञानिक दृष्टिकोण से जीता है। उसकी पत्नी कैंसर से गुज़री थी; आखिरी दिनों में वह अस्पताल के बिस्तर पर प्रार्थना करती रही, पर कबीर ने सिर्फ़ दवाइयों पर भरोसा किया। उसकी आँखों में आज भी वह दर्द है जो विज्ञान भी नहीं मिटा सका।
- शेखर — 45 वर्षीय संस्कृत विद्वान और छोटे से मंदिर का पुजारी। उत्तराखंड के एक गाँव से। बचपन में बाढ़ ने उसका पूरा परिवार छीन लिया था। तब से वह मानता है कि "सब कुछ ब्रह्म का खेल है"। जीवन में दुख आए, तो कर्म कहता है—और वह चुपचाप स्वीकार कर लेता है।
- डेविड — 41 वर्षीय ईसाई मिशनरी, अफ्रीका में काम कर चुका। बचपन में अनाथालय में पला। एक बार जब वह बीमार पड़ा था, तो कोई डॉक्टर नहीं आया—बस एक पादरी ने प्रार्थना की और वह ठीक हो गया। उसी दिन से उसका विश्वास अटूट है: "ईश्वर प्रेम है, और प्रेम कभी व्यर्थ नहीं जाता।"
- याकोव — 57 वर्षीय रब्बी (यहूदी धर्मगुरु)। पोलैंड से इजरायल आया। होलोकॉस्ट में उसके दादा-परदादा मारे गए। फिर भी वह कहता है: "ईश्वर ने हमसे वाचा की है। हम दुख सहेंगे, पर वह हमें छोड़ेगा नहीं।" उसकी दाढ़ी में सफेद बालों के साथ-साथ दर्द की गहरी लकीरें भी हैं।
- तेनज़िन — 49 वर्षीय तिब्बती बौद्ध भिक्षु। दलाई लामा के साथ चीन से भागा। तिब्बत में उसके मठ को तोड़ा गया, कई साथी मारे गए। फिर भी वह मुस्कुराता है और कहता है: "दुख इसलिए है क्योंकि हम चीजों को स्थायी मानते हैं।"
- मीरा — 35 वर्षीय लेखिका और अज्ञेयवादी। मुंबई में रहती थी। प्रेम में कई बार धोखा खाया, परिवार ने छोड़ा। वह कहती है: "मैं न ईश्वर को मानती हूँ, न नकारती हूँ। मैं बस देखती हूँ। और जो दिखता है, वही सच है—बाकी सब कहानियाँ।"
समुद्र का कटघरा"
समुद्र की अथाह गहराई में एक छोटा-सा निर्जन द्वीप था—हरी-भरी झाड़ियाँ, काले पत्थर, और एक सूखता हुआ स्रोत। जहाज़ डूबने के बाद केवल ये सात बचे थे। पहले दिन तो बस आघात था। दूसरे दिन से भूख, प्यास और सवाल शुरू हुए।
पहला दिन: ईश्वर का अभियोग
ईश्वर का अभियोग
सूरज अभी उगा ही था कि आर्यन ने चुप्पी तोड़ी—नारे की तरह नहीं, आरोप की तरह।
“यदि ईश्वर है,” उसने कहा, “तो बताओ—यह जहाज़ क्यों डूबा?
हम क्यों यहाँ सड़ रहे हैं?
क्या यही उसकी महान योजना थी—कुछ को बचाना, कुछ को आँकड़ों में बदल देना?”
डेविड ने रेत पर घुटने टेक दिए, हाथ जोड़कर बोला,
“ईश्वर ने हमें स्वतंत्र इच्छा दी है। तूफान शायद किसी मानवीय भूल का परिणाम था—या प्रकृति का नियम।”
कबीर ने सूखे होंठों पर जीभ फेरते हुए कहा,
“तो फिर ईश्वर ने प्रकृति को इतना अंधा क्यों बनाया?
जो बच्चों और अपराधियों में फर्क न कर सके?”
शेखर ने आँखें मूँदकर उत्तर दिया,
“प्रकृति ब्रह्म है। ब्रह्म न कर्ता है, न भोक्ता।
सब उसकी लीला है—तत् त्वम् असि।”
आर्यन हँसा—कड़वाहट भरी हँसी।
“लीला?
नीत्शे ने ठीक कहा था—‘ईश्वर मर चुका है, और हमने उसे मारा है।’
और यह द्वीप उसकी कब्र है।”
याकोव ने पत्थर उठाते हुए कहा,
“हमने वाचा तोड़ी। नियम तोड़े।
दंड मिलना स्वाभाविक है।”
तेनज़िन शांत था।
“ईश्वर का प्रश्न ही भ्रम है।
दुख है—और दुख का कारण है।”
मीरा सबको देख रही थी—जैसे जूरी नहीं, बल्कि मानवता की गवाही सुन रही हो।
“शायद हम सब अधूरे हैं।
और अधूरे लोग ही पूर्ण उत्तर माँगते हैं।”
दूसरा दिन: पीड़ा का त्रिकोण
धूप जलाने लगी। होंठ फट गए। पानी की बाल्टी में अब मुश्किल से दो घूँट बचे थे।
कबीर ने कहा, "यदि ईश्वर सर्वशक्तिमान और दयालु है, तो यह पीड़ा क्यों?"
डेविड ने जवाब दिया, "पीड़ा आत्मा को शुद्ध करती है।"
मीरा ने तीखा सवाल किया, "तो क्या अफ्रीका में भूख से मरता 5 साल का बच्चा भी आत्मा की जिम्नास्टिक कर रहा था?"
डेविड चुप हो गया।
आर्यन ने एपिक्यूरस का प्रसिद्ध त्रिकोण दोहराया: "ईश्वर बुराई रोकना चाहता है, पर रोक नहीं पाता? → कमज़ोर। रुकना चाहता है, पर रोकना नहीं चाहता? → दुष्ट। दोनों चाहता है? → बुराई कहाँ से? न चाहता है, न रोक पाता है? → फिर उसे ईश्वर क्यों कहें?"
तेनज़िन ने धीरे से कहा, "दुख है, दुख का कारण है तृष्णा, तृष्णा का निरोध है निर्वाण।"
शेखर बोले, "कर्म का चक्र। पिछले जन्म का फल।"
याकोव ने विरोध किया, "नहीं, यह वाचा का उल्लंघन है। ईश्वर न्याय करता है।"
तीसरा दिन: प्रार्थना का परीक्षण
पानी लगभग खत्म था।
डेविड ने सबको इकट्ठा किया।
“आज हम प्रार्थना करेंगे,” उसने कहा, “एक साथ।
यदि ईश्वर सुनता है—तो आज सुने।”
सबने अलग-अलग ढंग से आँखें बंद कीं।
किसी ने मंत्र, किसी ने स्तुति, किसी ने मौन।
घंटों बाद—कुछ नहीं।
न बारिश।
न बादल।
न कोई संकेत।
कबीर ने चुप्पी तोड़ी,
“यदि यह प्रयोग होता, तो हम इसे असफल कहते।”
आर्यन ने जोड़ा,
“और फिर भी, असफल प्रयोगशाला को हम मंदिर कहते रहते हैं।”
डेविड का विश्वास पहली बार काँपा।
उसकी उँगलियाँ काँप रही थीं।
चौथा दिन: नैतिकता का पतन
भूख ने बहस को हिंसक बना दिया।
नारियल को लेकर झगड़ा हुआ।
याकोव ने कहा, “बच्चों और कमजोरों को पहले मिलना चाहिए।”
आर्यन ने पलटकर कहा,
“नैतिकता पेट भरे होने का विलास है।”
मीरा बीच में आई,
“यदि ईश्वर नैतिक है, तो क्या वह यहाँ होता तो राशन बाँटता—या चमत्कार करता?”
कोई जवाब नहीं आया।
उस रात शेखर ने स्वीकार किया—
“कभी-कभी मुझे भी लगता है…
कर्म का सिद्धांत बहुत सुविधाजनक है।
हर अन्याय को ‘पिछले जन्म’ में डाल देना।”
पाँचवाँ दिन: घायल आर्यन और करुणा
आर्यन का पैर फिसलकर चट्टान से टकराया।
खून बहा।
संक्रमण फैलने लगा।
जिसने ईश्वर को सबसे ज़्यादा नकारा था—वही अब सबसे असहाय था।
सबने मिलकर उसकी देखभाल की।
डेविड ने अपने हिस्से का पानी दे दिया।
याकोव ने रात भर पहरा दिया।
तेनज़िन ने ध्यान में बैठकर उसके दर्द के साथ साँसें मिलाईं।
डेविड ने कहा,
“देखो—यही ईश्वर का प्रेम है। हमारे भीतर।”
कबीर मुस्कुराया,
“या यह विकास की देन है—सहानुभूति।
ईश्वर की आवश्यकता नहीं।”
मीरा ने धीमे से कहा,
“पर यदि बिना ईश्वर के भी हम अच्छे हो सकते हैं—
तो फिर ईश्वर की शर्त क्यों?”
आर्यन, बुखार में काँपते हुए बुदबुदाया,
“शायद… कारण मायने नहीं रखता।
बस… करुणा रखती है।”
छठा दिन: विश्वास का टूटना
डेविड रात में रोया।
पहली बार।
“मैंने जीवन भर प्रार्थना की,” उसने मीरा से कहा,
“और आज—मैं नहीं जानता कि मैं किससे बात कर रहा हूँ।”
मीरा ने उत्तर नहीं दिया।
कभी-कभी सवाल का सबसे ईमानदार जवाब—मौन होता है।
अंतिम दिन: उद्धार और अनुत्तरित प्रश्न
सातवें दिन हेलीकॉप्टर की आवाज़ आई।
धूल उड़ी।
आशा लौटी।
जाने से पहले मीरा ने सबको देखा—
थके हुए, बदले हुए, कम निश्चित।
उसने कहा:
“हम यहाँ आए थे एक प्रश्न लेकर—
ईश्वर है या नहीं?हम जा रहे हैं बिना उत्तर के।
पर एक बात स्पष्ट है—
ईश्वर का प्रश्न मनुष्य से बड़ा नहीं।यह मनुष्य की पीड़ा,
उसकी जिद,
उसकी करुणा
और उसके संदेह का ही दूसरा नाम है।शायद ईश्वर कोई सत्य नहीं—
बल्कि हमारी सबसे लंबी,
सबसे ईमानदार बहस है।”
वे चले गए।
समुद्र फिर शांत हो गया।
पर प्रश्न—
द्वीप पर नहीं,
उनके भीतर रह गया।
और शायद हर उस मनुष्य के भीतर भी,
जो कभी रात में तारों को देखकर पूछता है—
“तुम हो भी,
या सिर्फ़ मेरी उम्मीद?”
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