रोज़ सबेरे,
जब नींद की आख़िरी परतें आँखों में बाकी होती हैं,
मैं उठता हूँ — धीरे से,
ताकि मेरे बेटे की नींद न टूटे।
उसके माथे पर रख देता हूँ एक चुम्बन,
नरम-सा, उजाला-सा,
जैसे मेरी हर सुबह
उसी की साँसों से जनम लेती हो।
फिर नहाता हूँ,
कुछ खाता हूँ —
बिना स्वाद, बिना सवाल,
और चल पड़ता हूँ दिन की उस लड़ाई में
जिसका कोई नाम नहीं,
पर हारना मना है।
दिनभर लड़ता हूँ —
कभी वक्त से, कभी किस्मत से,
कभी उस ख़ामोशी से
जो भीतर बहुत शोर मचाती है।
लड़ता हूँ ताकि
पत्नी को मिले सुकून,
उसकी आँखों की थकान
थोड़ी कम हो जाए।
लड़ता हूँ ताकि
बेटे के खिलौनों में
टूटे हुए सपनों की आवाज़ न मिले।
लड़ता हूँ ताकि
भाई को स्नेह मिले,
वह अपने सफ़र में
कभी अकेला महसूस न करे।
लड़ता हूँ ताकि
माँ-बाप का सिर ऊँचा रहे,
उनकी झुर्रियों में
मेरी नाकामियाँ न बसें।
और फिर...
जब रात अपनी रज़ाई ओढ़ लेती है,
मैं लौटता हूँ —
थका, टूटा, पर जीवित।
दरवाज़ा धीरे से खोलता हूँ,
घर में नींद और शांति की ख़ुशबू फैली होती है,
टेबल पर रखा है मेरा खाना —
ठंडा, पर अपनापन गरम।
हाथ धोता हूँ,
कुछ कौर खाता हूँ,
और फिर बेटे के कमरे में जाता हूँ।
वह सो रहा होता है —
एक मासूम देवदूत की तरह।
मैं झुककर फिर एक चुम्बन रखता हूँ
उसके माथे पर,
जैसे दिन का अंत भी
प्यार की मुहर से होना चाहिए।
फिर मैं सो जाता हूँ —
उसी खामोशी में,
जहाँ सपनों की जगह
कल की चिंता पलती है।
मैं दूर रहता हूँ अपनों से,
पर हर पल,
सिर्फ़ अपनों के वास्ते।
मेरी साँसें,
मेरे कदम,
मेरी थकान,
सब किसी और के नाम हैं।
मैं अपने लिए नहीं जीता,
मैं उन चेहरों के लिए जीता हूँ
जो मेरी अनुपस्थिति में भी
मुझसे भरे रहते हैं।
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