लोगों की नासमझी का उठाने भी दो फायदा,
“बेनाम” शराफत जताने की भी हद है .वो नाराज हैं कि आसमाँ से तोड़ा नहीं चाँद को,
समझा दे कोई आशिकी निभाने की भी हद है ,
तेरे कहने से पी तो लूँ, पर बहकने की हद तक ,
बता दे कोई दोस्ती बनाने की भी हद है .
कहने से डरता हूँ मैं , चुप रहकर मरता हूँ मैं
मोहब्बत में इस कदर , फसाने की भी हद है .
ये आपका ही प्यार है कि जिन्दा मैं अबतलक
अब मर के यूं ईश्क को बताने की भी हद है
छत की जद्दोह्द में , कब्र तो नसीब की
खुदा तेरा यूं रहमत बरसाने की भी हद है
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