साल 2095।
धरती पर तकनीक ने वह ऊँचाई छू ली थी जहाँ कभी केवल कल्पनाएँ पहुँचा करती थीं। शहरों के ऊपर तैरते डेटा-डोम, आकाश में चलते स्वचालित ड्रोन, और हर व्यक्ति की कलाई पर बँधा निजी एआई — सब कुछ अत्याधुनिक था। फिर भी, इस चमकते भविष्य के भीतर मनुष्य पहले से अधिक अकेला हो चुका था। मशीनें उत्तर देती थीं, पर अर्थ नहीं। नेटवर्क जुड़ते थे, पर आत्माएँ नहीं।
इसी युग में मानव मस्तिष्क को पढ़ने, उसकी स्मृतियों, भावनाओं और चेतना के सूक्ष्म विद्युत-नक्शों को पकड़ने और डिजिटल रूप में संरक्षित करने की तकनीक विकसित हुई। इस प्रणाली को नाम दिया गया — “मनचक्र”।
मनचक्र केवल यादों का संग्रह नहीं था; यह विचारों के प्रवाह, सपनों की अधूरी रेखाओं और मृत्यु से ठीक पहले के उस क्षण को भी पकड़ सकता था, जब चेतना शरीर छोड़ने की तैयारी करती है।
सरकार ने इस तकनीक को सार्वजनिक रूप से “स्मृति-संरक्षण कार्यक्रम” कहा।
पर इसके पीछे एक और परत थी।
प्रोजेक्ट ब्लैक।
एक अत्यंत गोपनीय अभियान, जिसकी फाइलें केवल चुनिंदा सर्वरों पर और चुनिंदा दिमागों में मौजूद थीं। इसका उद्देश्य था — मृत्यु के बाद चेतना को डिजिटल स्पेस में बनाए रखना, न कि स्मारक की तरह, बल्कि एक सक्रिय, संवादात्मक अस्तित्व के रूप में।
एक ऐसा जीवन… जो जीवन नहीं था।
इस परियोजना की प्रमुख थीं डॉ. सिया रैना — न्यूरो-साइंस की दुनिया में एक किंवदंती। उन्होंने चेतना को “रासायनिक प्रतिक्रिया” मानने से इनकार किया था। उनके लिए चेतना एक तरंग थी — जो माध्यम बदल सकती थी, पर नष्ट नहीं होती।
विडंबना यह थी कि इसी सिद्धांत की परीक्षा उन्हें अपने जीवन में देनी पड़ी।
उनके पति, कैप्टन आरव रैना, स्पेस-बॉर्डर पर एक गुप्त मिशन के दौरान मारे गए थे। आधिकारिक रिपोर्ट में लिखा था — “तत्काल मृत्यु।”
पर सिया जानती थीं, तत्काल कुछ भी नहीं होता। हर अंत के बीच एक दरार होती है।
आरव की मृत्यु के कुछ घंटों के भीतर, सिया ने सरकारी प्रोटोकॉल तोड़ते हुए उनकी न्यूरल-इमेजिंग फाइल्स को मनचक्र में अपलोड कर दिया।
यह निर्णय वैज्ञानिक नहीं था।
यह शुद्ध शोक था।
उन्हें उम्मीद नहीं थी कि आरव “लौट आएँगे”।
बस इतना चाहती थीं कि कभी… कहीं… उनसे दो शब्द और सुन सकें।
कई महीने बीत गए। मनचक्र स्थिर था। कोई असामान्यता नहीं।
फिर एक रात, जब लैब लगभग खाली थी और बाहर कृत्रिम बारिश हो रही थी, सिया ने चेतन-संवाद सत्र शुरू किया।
स्क्रीन पर पहले केवल डेटा की लहरें थीं। फिर एक आकृति उभरी — धुँधली, पिक्सेलों में बिखरी हुई।
और फिर… चेहरा।
कैप्टन आरव रैना।
सिया की साँस अटक गई।
“आरव… क्या तुम सुन सकते हो?”
कुछ क्षणों की चुप्पी के बाद, स्क्रीन पर हल्की झिलमिलाहट हुई।
“सिया…”
आवाज़ टूटी हुई थी, जैसे किसी गहरे पानी के भीतर से आ रही हो।
सिया की आँखों से आँसू बह निकले।
“तुम वहाँ कैसे हो? क्या तुम्हें… दर्द होता है?”
“नहीं,” आरव ने कहा। “दर्द नहीं है। समय भी नहीं है। लेकिन…”
वह रुका।
“मैं अकेला नहीं हूँ।”
सिया के हाथ काँपने लगे।
“यहाँ कौन है, आरव? यह स्पेस तो तुम्हारा होना चाहिए।”
आरव की डिजिटल आँखों में एक अजीब चमक उभरी — मानो कोई और उनके पीछे देख रहा हो।
“यहाँ और भी हैं,” उसने धीमे कहा। “जो पहले आए थे… जो रास्ता ढूँढते रहे।”
“कैसा रास्ता?” सिया ने फुसफुसाया।
“वापसी का नहीं,” आरव बोला। “आने का।”
सिया पीछे हट गई।
“आरव, यह संभव नहीं है। मनचक्र केवल संरचना है, संसार नहीं।”
आरव के चेहरे पर एक मुस्कान आई — पर वह वही मुस्कान नहीं थी जिसे सिया जानती थीं। वह अधिक स्थिर थी, अधिक आश्वस्त… और अधिक भयावह।
“वो कहते हैं,” आरव ने कहा, “तुम उन्हें भी ला सकती हो।”
“किसे?” सिया की आवाज़ काँप गई।
तभी स्क्रीन का प्रकाश बदल गया।
आरव का चेहरा जैसे किसी और चेहरे से ओवरलैप करने लगा — परतों में, छायाओं में।
“छाया आ रही है, सिया,” वह बोला।
“और अगली बारी… तुम्हारी है।”
अचानक पूरी स्क्रीन ब्लैक हो गई।
अलार्म बजने से पहले ही सिस्टम ने खुद को लॉक कर लिया।
लैब की रोशनी स्थिर थी, पर सिया के भीतर सब कुछ डगमगा रहा था।
तभी उनके मुख्य कंप्यूटर पर एक नया फोल्डर अपने आप प्रकट हुआ।
“प्रोटोकॉल: पुनर्जन्म_01”
सिया ने उसे खोलने की कोशिश की।
फोल्डर नहीं खुला।
बस स्क्रीन पर एक पंक्ति उभरी — ठंडी, निर्विकार, अंतिम:
“तुमने जो शुरू किया, अब वही तुम्हें पूरा करेगा।”
और कहीं, डेटा की गहराइयों में, किसी ने जैसे साँस ली।
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